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घृणा और द्वेष के बीज अब फलने लगे हैं। विषबेल ने एक बड़े से वृक्ष को जकड़कर उसके प्राण सोखने प्रारंभ कर दिए हैं। रंग-बिरंगे फूलों से सजे उद्यान का हर फूल दूसरे रंग के फूलों से नफ़रत करने लगा है। किसी डाल को कटते देखकर अन्य डालियाँ ख़ुश होने लगी हैं। क्यारियों ने अपनी सोच सीमित करके अपने भीतर उग आए विजातीय बिरवे के घेरकर मारना शुरू कर दिया है।
अनुभवी बागवां इस माहौल से विचलित हैं। एक दिन, हमारे समाज ने संप्रदायों की कुल्हाड़ी से कटना स्वीकार किया था लेकिन आज जातियों के बुलडोजर, पंथ के फावड़े, परंपराओं की खुरपियाँ, विचारधाराओं की छुरियाँ और मतांतर की आरियाँ हमारे सौहार्द को खंड-खंड कर रही हैं।
‘फूट डालो, शासन करो’ की नीति से समाज का नहीं, राजनीति का भला होता है। यह सत्य जानते हुए भी हम बँटते जा रहे हैं। हिंदू-मुस्लिम के साम्प्रदायिक दंगों ने जातीय हिंसा तक पैर पसार लिए हैं।
किसी हादसे में पीड़ित की पीड़ा से पहले हम उसका धर्म और जाति देखना हमने कब सीख लिया, हमें पता ही न चला। उन्माद के इस आवेश में हम कब अपने ही आदर्शों की हत्या करने लग गए, हम समझ ही न सके।
हमें समझ ही नहीं आ रहा है कि डीपी पर श्रीराम की फोटो लगाकर जब हम दूसरों की पोस्ट पर माँ-बहन की गालियाँ लिखते हैं तो राम की मर्यादा का उल्लंघन कर रहे होते हैं। हमें समझ ही नहीं आ रहा है कि प्रोफाइल कवर पर नबी का कोई निशान छापकर जब हम किसी को ट्रोल करते हुए भद्दी भाषा लिखते हैं तब कुल इस्लाम की छवि पर धूल उड़ा रहे होते हैं। हम समझने को तैयार नहीं हैं कि नाम के आगे ‘जैन’ लिखकर जब हम किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन अथवा अनुमोदन कर रहे होते हैं तो महावीर की देशना का उपहास कर रहे होते हैं। हम सुनने को तैयार नहीं हैं कि ख़ुद बाबा साहब के अनुयायी कहकर जब कभी हम अराजक होते हैं तब बाबा साहब के संविधान का अपमान कर रहे होते हैं।
हिन्दू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, पटेल, ठाकुर, दलित और जितने भी समाज हैं उन सबमें राजनीति के कुछ रंगे सियार घुस आए हैं। ये स्वयं को समाज का उद्धारक घोषित करके समाज को विनाश के रास्ते पर धकेल देते हैं। ये रंगे सियार बच्चों को प्यार के बजाय लड़ाई-भिड़ाई करना सिखाते हैं। ये रंगे सियार आपको विज्ञान तथा शिक्षा का उपहास करना सिखाते हैं ताकि आपका विवेक जागृत न हो सके और आप अपने धर्मग्रंथों को वैसे समझें, जैसे ये रंगे सियार आपको समझाना चाहते हैं।
ये रंगे सियार आपको बताते हैं कि जो आपको प्यार से रहने की सीख देता है, वह आपका दुश्मन है; और आप मान लेते हैं। ये आपको सिखाते हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव, सौहार्दपूर्ण वातावरण, शांति, भाईचारा और सहकार जैसे शब्द खतरनाक हैं; और आप मान लेते हैं।
इन सियारों के कहने पर आप अराजक हो जाते हैं। इन सियारों के कहने पर आप अपराधी हो जाते हैं। और जब पुलिस आपको पकड़ लेती है तो आप ही जैसे अन्य अंधानुकरणियों की ताक़त दिखाकर ये आपको थाने से छुड़ा लाते हैं और आप इनके एहसानमंद हो जाते हैं।
जब आप पूरी तरह इनकी गिरफ्त में आ जाते हो, तो ये रंगे सियार किसी दूसरे दल के सियार से गठबंधन करके अपने फ़ायदे के लिए आपकी ताकत बेच देते हैं। आप भी अपने अपने सियार का अनुसरण करते हुए ख़ुशी-ख़ुशी उसका जयकारा लगाने लगते हो, जिसको कल तक गाली देते फिर रहे थे। धीरे-धीरे धर्म पीछे रह जाता है और कोई एक रंगा सियार अपने कट-आउट से धर्म को ढक लेता है। धीरे-धीरे जाति के उद्धार का आंदोलन पीछे रह जाता है और एक सियार का चेहरा पूरे आंदोलन से बड़ा हो जाता है। और हम उस चेहरे की चुनावी जीत को ही अपने धर्म की जीत मानने लगते हैं। हम उस चेहरे की जीत को ही अपनी जाति की जीत मानने लगते हैं। हम उस चेहरे को ही राष्ट्र मानने लगते हैं।
इस लेख में कुछ नया नहीं है। ऐसे दर्जनों लेख पहले भी लिखे जा चुके हैं, लेकिन उन्माद के नक्कारखाने में सौहार्द की तूती इस उम्मीद से आवाज़ लगाती रहेगी कि कभी तो कोई कान नगाड़ों के हो-हल्ले में सरगम की मिठास सुन सकेगा। कभी तो सियारों की हुवा-हुवा के बीच कोयलों की कूक सुनी जाएगी। कभी तो कंस के जानकारों पर कृष्ण की बाँसुरी विजयी होगी!
✍️ चिराग़ जैन
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साहित्य करुणा से उपजता है। साहित्य संवेदना से जन्म लेता है। ‘आह से उपजा होगा गान’ -यही ‘आह’ साहित्य की सर्जना का बीज है। यही कारण है कि साहित्य सदैव कमज़ोर की आवाज़ बनता है।
साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो महाभारत के युद्ध में बर्बरीक की थी। वह न पाण्डवों के पीछे खड़ा है, न ही कौरवों के पीछे। क्योंकि साहित्य जानता है कि कोई भी दल हर हाल में निर्दोष नहीं हो सकता और कोई भी दल हर हाल में दुष्ट नहीं होता। इसीलिए बर्बरीक घोषणा करते हैं कि युद्ध में जो हारने लगेगा, मैं उसकी ओर से लड़ने लगूंगा। ठीक यही घोषणा साहित्य की मूल प्रवृत्ति है।
जीतता हुआ मनुष्य अपनी नैसर्गिक विनम्रता खोने लगता है। इसीलिए विजयी को देखकर उन्माद फूटता है, आह नहीं। सत्ताधीश इतिहास का नायक हो सकता है, साहित्य का नहीं। आपने कभी सुना भी न होगा कि विजेता का ही ‘साहित्य’ लिखा जाता है। क्योंकि विजयी के यहाँ साहित्य का कच्चा माल है ही नहीं।
जहाँ पीड़ा होगी, साहित्य वहीं उपजेगा। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि साहित्यकार पीड़ित के पीछे नहीं, बल्कि पीड़ा के पीछे चलता है। यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि साहित्य सत्ताधीश के विरुद्ध न होकर सत्ताभिमान के विरुद्ध होता है।
कठोर होना सत्ता की विवशता है। किन्तु इस विवशता को प्रवृत्ति बनने में देर नहीं लगती। इस अपरिहार्यता को अन्याय बनने में समय नहीं लगता। और जिस क्षण यह कठोर, क्रूर बना; ठीक उसी क्षण साहित्य उसके विरुद्ध खड़ा मिला। क्रूरता और करुणा का परस्पर विरोध सर्वविदित है।
जो इंदिरा गांधी आपातकाल के समय कड़ी साहित्यिक आलोचना झेल रही थीं, उन्हीं की हत्या पर साहित्य की आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी थी। जो अटल बिहारी वाजपेयी अनवरत विपक्ष में रहते हुए साहित्य का अनवरत समर्थन पाते थे, उन्हीं के प्रधानमंत्री बनने के बाद साहित्य ने उनके अनेक निर्णयों की चुटीली आलोचना की। जो राहुल गांधी प्रधानमंत्री का अध्यादेश फाड़ने के बाद साहित्य की तीखी आलोचना के शिकार हुए, उन्हीं को पदयात्रा के बाद साहित्यिक गलियारों का कमोबेश समर्थन मिलने लगा।
यहाँ कोई इंदिरा जी, कोई अटल जी या कोई राहुल गांधी महत्वपूर्ण नहीं है। अपितु इनकी परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण हैं।
यही राहुल गांधी अपनी पार्टी के लोगों को उपलब्ध नहीं होते तो यही साहित्य वहाँ उनकी खिंचाई करने से नहीं चूकता। क्योंकि कांग्रेस मुख्यालय में राहुल गांधी सत्ताधीश हैं। इसलिए यह समझना होगा कि साहित्य का काम वंचित और सत्ता के मध्य संतुलन स्थापित करना है।
यदि साहित्य बर्बरीक की भूमिका न निभाए तो सत्ताधीश को आततायी बनने में देर नहीं लगेगी। और यदि साहित्य कर्ण की भाँति दुर्योधन के दुर्गुण देखते हुए भी उसे टोकने से परहेज करेगा तो वह दुर्योधन का मित्र नहीं अपितु कुरुवंश का आत्मघाती शत्रु सिद्ध होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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‘ख़ून का बदला ख़ून’ किसी सभ्य समाज के संचलन की नीति नहीं हो सकती। बर्बरता का पहला आक्रमण नैतिकता के आत्मबल पर होता है। और इस आक्रमण से बौखलाकर ज्यों ही आप अनैतिक हुए, उसी क्षण आपने बर्बरता का आत्मविश्वास दोगुना कर दिया।
भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने भाजपा विरोधियों की ट्रोलिंग प्रारंभ की। वे भाजपा, सरकार और प्रधानमंत्री के सम्मुख उठे हर सवाल पर गाली-गलौज तक उतरने लगे। इस प्रवृत्ति से विवेकशील और लोकतांत्रिक मस्तिष्क आहत हुए। लेकिन इनका आहत होना भाजपा की विजय नहीं थी। भाजपा की विजय उस क्षण प्रारम्भ हुई जब सत्य, तथ्य और लोकतांत्रिक तरीकों को छोड़कर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थक भी गाली-गुफ़्तार और चरित्र हत्या तक उतरते दिखाई दिए।
आज परिस्थिति यह है कि अगर आप किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सक्रिय हैं तो आप निष्पक्ष तथा लोकतांत्रिक नहीं रह सकते। आपको किसी एक दल अथवा व्यक्ति का अंध-समर्थन करना ही होगा। आप नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल में से किसी एक को भी देवदूत न मानकर तीनों को मनुष्य मानकर सरवाइव नहीं कर पाएंगे।
एक बार जिसके बैंक में आपने अपना विवेक समर्पित कर दिया उसकी स्तुति और उसके विरोधियों की भर्त्सना ही आपका धर्म है।
मैं आम आदमी पार्टी की किसी नीति या योजना पर प्रश्न पूछ लूँ तो यह मान लिया जाएगा कि मैं भाजपा का आदमी हूँ। मैं राहुल गांधी की यात्रा की प्रशंसा कर दूँ तो मुझे कांग्रेस का चमचा मान लिया जाएगा। मैं बग्गा की गिरफ्तारी के तरीके पर सवाल कर लूँ तो मुझे भगवंत मान और केजरीवाल का विरोधी घोषित कर दिया जाएगा। मैं बीबीसी के ऊपर हुई कार्रवाई का सवाल उठाने की सोचूँ तो मुझे कांग्रेसी मान लिया जाएगा।
मैं देश की महँगाई पर बोला तो मैं मोदी विरोधी और दिल्ली की ट्रैफ़िक व्यवस्था पर बोला तो केजरीवाल विरोधी। यहाँ तक कि आपराधिक मुआमलात पर चर्चा करने पर भी आपका राजनैतिक चरित्र जज किया जाने लगा है। आप हाथरस के बलात्कार कांड की भर्त्सना करो तो आप भाजपा विरोधी हैं। आप श्रद्धा-आफताब मुआमले के अपराधी को लानत भेजें तो आप भाजपा समर्थक हैं।
और आजकल तो लोग यहाँ तक लिखने लगे हैं कि दिल्ली का सीएम इतना पढ़ा-लिखा है, तेरी औक़ात नहीं है उसे कुछ कहने की’; ‘मोदी जी पर कुछ बोलने की औक़ात तेरी नहीं है’; ‘राहुल गांधी विदेश में पढ़ा है, उसकी सोच तू नहीं समझेगा -ये कैसा देश बना रहे हैं हम। ये किधर दौड़े चले जा रहे हैं हम?
देश का एक नागरिक अपने प्रतिनिधियों से सवाल क्यों नहीं पूछ सकता? वह अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को सलाह देने की औक़ात क्यों नहीं रखता? जिनका चुनाव मैं कर सकता हूँ उन्हें सुझाव क्यों नहीं दे सकता?
यदि विरोध की चरित्र हत्या करने की भाजपाई परम्परा को आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के समर्थकों ने पुष्ट न किया होता तो आज पवन खेड़ा और मनीष सिसोदिया के मुआमलात पर लोकतन्त्र इतना कमज़ोर न दिखाई देता। और भारतीय जनता पार्टी ने सिस्टम का उपयोग करके अपने विरोधियों की जड़ें खोदने का कार्य न किया होता तो किसी भी बग्गा की गिरफ्तारी से पहले पंजाब सरकार को लाख बार सोचना पड़ता।
मैं इस देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को पुष्ट किए जाने का प्रबल समर्थक हूँ। मैं स्पष्ट देख सकता हूँ कि यदि अपने पक्ष में हो रही अराजकता का मैंने समर्थन किया तो मेरे विरुद्ध हो रही अराजकता का विरोध मैं स्वयं नहीं कर पाऊँगा।
मूलभूत प्रश्नों पर आँखों में आँखें डालकर बोलना आवश्यक है। अन्यथा वो आपके सिसोदिया को उठाएंगे और आप उनके बग्गा को उठाते रहना। अन्यथा वो पठान में भगवा के अपमान का मुद्दा गढ़ते रहेंगे और आप नोटों पर देवी-देवताओं के चित्र लगवाने का पुंछल्ला छेड़ते रहना। अन्यथा वो आपके समर्थकों को गाली दिलवाते रहेंगे और आप उनके समर्थकों को गाली दिलवाते रहना।
✍️ चिराग़ जैन
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हमने लड़ाकों के इतने गुण गाए हैं, कि हम सौहार्द और शांति को ‘हीन’ मान बैठे हैं। हम अहिंसा का संदेश देनेवाले महावीर की संज्ञा को समझने में चूक गए हैं। अध्यात्म की पाठशाला में हमने ‘धैर्य’; ‘क्षमा’; ‘दया’; ‘करुणा’; ‘विश्वास’; ‘आत्मबल’; ‘त्याग’ और ‘परोपकार’ की थ्योरी अवश्य पढ़ी, किंतु प्रैक्टिकल करने के समय हमने धैर्य को उद्वेग से रिप्लेस कर दिया। क्षमा को हम प्रतिशोध की ज्वाला में भस्म कर बैठे। दया और करुणा को हमने अनावश्यक घोषित कर दिया। विश्वास करनेवाले को हम मूर्ख कहने लगे। आत्मबल की धार को हमने कृत्रिम अस्त्र की ओट में ओझल कर दिया। त्याग को हमने कायरता और पलायन कहना शुरू कर दिया तथा परोपकार को हमने स्वार्थ की नृशंसता से विक्षिप्त कर डाला।
अब हमारे पास समाज को बाँटने के लिए घृणा की दुधारी तलवार है, जिससे हम अपने विवेक का कचूमर निकाल चुके हैं। पिछली कई सदियों से हम लगातार इस तलवार से वार करते जा रहे हैं और हर वार आख़िरकार हमें और अधिक विवेकहीन बनाए जा रहा है।
और मज़ेदार बात यह है कि इस तलवार को हम अपनी मर्ज़ी से नहीं अपितु किसी न किसी सत्ता के कहने से चला रहे हैं। अंग्रेजों ने हमें हिन्दू मुस्लिम में बाँटकर दोनों वर्गों के हाथ में ऐसी तलवारें थमा दीं और हम लगे अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने। ऊँची जाति-नीची जाति, सिया-सुन्नी, दिगंबर-श्वेतांबर, सरयूपारीण-कान्यकुब्ज; भूमिहार-वेदपाठी, दक्षिण भारतीय-उत्तर भारतीय; सैयद-खान और न जाने कितने सारे वर्गों में बँटकर हम एक-दूसरे से घृणा करते रहे हैं। हमें यह कहा जाता रहा है कि तुमने तलवार नहीं चलाई तो सामने वाले तुम्हें मार देंगे। जबकि सामनेवाले हमारी तलवार की पहुँच में थे ही नहीं। हमारी घृणा की तलवार हमें ही लहुलुहान करती रही है और सामनेवाले अपनी घृणा की तलवार से खूनम-खून होने के लिए आत्मनिर्भर हैं। लेकिन हम हर रक्तपात का गुणगान करते हुए नाचते रहे हैं।
हम यह बात मान चुके हैं कि लड़नेवाले ही जिवित रहते हैं। जबकि लड़ाई की राह छोड़कर मौन हो गए अवतारों ने हमें बताया कि बाहर चल रही इस भीषण मारकाट से अधिक कठिन है अपने आपको जीतना।
लेकिन हम कमाल के लोग हैं। हमने हर युग में समाज को विवेकशील बनानेवाले को मौत के घाट उतार दिया। हमने मूर्खता की पोल खोलनेवाले हर शख़्स को ‘धर्मविरोधी’ घोषित करके मार डाला। हमने सुकरात की हत्या की क्योंकि उसने हमें विवेकशील बनाने की भूल की। हमने मीरा को मार डाला क्योंकि उसने हमें प्रेम के विदेह होने की सूचना दी। हमने जीसस को मार डाला क्योंकि उसने हमें करुणा का पाठ पढ़ाया। हमने गांधी को मार डाला क्योंकि उसने हमारे आत्मबल को जागृत करने का दुस्साहस किया।
बिल्कुल सही हुआ इन सबके साथ। ये सब लोग अपने-अपने समय की सियासत के लिए ख़तरा बन गए थे। इसलिए इनका मरना आवश्यक हो गया था। इन सभी के हाथ आडंबर के बदबूदार पर्दे को खींचकर फेंक देना चाहते थे। ऐसे में अगर इन्हें जिवित छोड़ दिया जाता तो ये समाज को सत्य के सम्मुख ला खड़ा करते। इससे तो समाज विवेकी बन जाता। फिर घृणा की तलवार का चलना असंभव था। फिर आडंबर का धंधा चलना नामुमकिन था।
फिर रक्तपात पर जयकारे नहीं, करुणा उपजती। फिर युद्ध को किसी जीवन का लक्ष्य नहीं, बल्कि किसी समस्या का अंतिम उपाय समझा जाता।
ऐसी स्थिति में भय की सत्ता ध्वस्त हो जाती। ऐसे में घृणा का कारोबार चौपट हो जाता। लोग ख़ुद को लहुलुहान करना छोड़ देते तो मरहम के व्यापारी देवदूत का रूप धरकर उन्हें ग्राहक कैसे बनाते।
इसलिए विवेक जगानेवाले को मौत के घाट उतार देना सत्ता के लिए परम आवश्यक है। इसलिए आडंबर का कोलाहल ‘शोर’ बन जाने की हद्द तक बना रहना चाहिए क्योंकि अगर इस शोर से मनुष्य के कानों को थका नहीं दिया गया तो ये कान अपने राम, अपने कृष्ण, अपने महावीर, अपने बुद्ध, अपने वाल्मीकि, अपने रैदास, अपने जीसस और अपने पैगंबर का मौन सुन लेंगे और यह स्थिति हथियारों के व्यापारियों के लिए घातक सिद्ध होगी। विवेक जाग गया तो अर्थ की सत्ता निस्तेज हो जाएगी। विवेक जाग गया तो अनर्थ हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
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जो आस्था न तोड़ सका उसने मन्दिर तोड़े और जो विचार को न मिटा सका वह किताबें जलाने लगा। लेकिन यह कृत्य वीरता का नहीं, अपितु स्वयं के परास्त होने की घोषणा है। अभिमन्यु की हत्या करके कौरवों ने पाण्डवों को आतंकित नहीं किया था अपितु आश्वस्ति प्रदान की थी कि कौरवों का नैतिक बल समाप्त हो गया है।
जब तर्क करते-करते कोई तर्क के स्थान पर बल अथवा क्रोध का प्रयोग करने लगे तो यह सूचना है कि उसके तरकश में तर्क का कोई तीर शेष नहीं है। यह ऐसे ही है जैसे कोई धनुष से तीर छोड़ने के स्थान पर धनुष ही फेंककर मार दे।
किसी ग्रंथ की प्रतियाँ जलाना, किसी धर्म का आस्था केंद्र ध्वस्त करना, अपने विपक्षी की चरित्र हत्या करना, अपने विरोधी का नाम बिगाड़कर बोलना -यह सब इस बात की सूचना है कि तर्क के संग्राम में हमारे पार तर्क ही नहीं कुतर्क भी समाप्त हो चुके हैं।
यह सब कुछ बहुत बचकाना है। रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाने से मानस में विराजित राम कैसे अपमानित हो सकते हैं? आप तुलसी की चौपाई पर तर्क करें, वह आपका अधिकार है किन्तु पुस्तक जलाकर आप उस ग्रंथ को मिटाना चाह रहे हैं तो यह आपके मूढ़ होने का प्रमाण है।
ये डिजिटल युग है भाई। दो कौड़ी की तुकबंदी करने वाले भी रेडियो तरंगों और बाइनरी में रूपान्तरित होकर अनन्त काल तक सुरक्षित रहने के जुगाड़ कर लेते हैं, ऐसे में आप हार्डकॉपी जलाकर रगों में दौड़ती रामचरितमानस को मिटाने का दंभ भर रहे हैं! हास्यास्पद है यह।
युद्ध में अनैतिक आचरण करनेवाला योद्धा, जन सहानुभूति खो देता है। बाबा तुलसी के जिस लेखन को आप फूंकना चाह रहे हैं, वह किसी काग़ज़ के टुकड़े पर नहीं बल्कि मानस पटल पर अंकित है।
जब कोई भाजपा का प्रवक्ता राजनैतिक बहस में विपक्षी नेताओं के नाम बिगाड़कर बोलता है तब यह साफ़ समझ आता है कि इस व्यक्ति के पास विचार का घोर अभाव है इसलिए यह हरकतों से ध्यान बंटाने की चेष्टा कर रहा है। राहुल गांधी को ‘पप्पू’ कहनेवाले; नरेंद्र मोदी को ‘फेंकू’ कहनेवाले; रवीश को ‘रबिश’ या ‘खबीस’ कहनेवाले दरअस्ल राहुल, मोदी या रवीश को नहीं चिढ़ा रहे होते हैं, ब्लकि अपनी पराजय पर एक बेहूदा हँसी का पर्दा डालने की कोशिश कर रहे होते हैं।
ठीक इसी प्रकार मानस की प्रतियाँ जलानेवाले मानस को भस्म नहीं कर रहे अपितु एक पूरे विमर्श को स्वाहा करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
किसी को मानस के किसी अंश पर शंका हुई- इसमें कोई अपराध नहीं है। किसी अन्य ने अपने ज्ञान के अनुसार उस शंका का उत्तर दे दिया, इसमें भी कुछ ग़लत नहीं है। शंका करने वाला उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ- यह भी बेहद समान्य घटना है। निवारण करने वाला झल्लाहट और क्रोध से भर गया- यह भी स्वाभाविक है। चर्चा, शास्त्रार्थ में बदल गई; सन्दर्भ स्पष्ट किए गए -इस सबमें कोई बुराई नहीं थी। वरन् यह तो किसी सभ्य समाज के सविवेक होने का द्योतक है।
किन्तु इस चर्चा में शंका करनेवाले को अपमानित करना अनैतिक था और इस चर्चा के दौरान मानस की प्रतियां जलाना अपराध था।
तुलसी, राम और मानस; ये तीनों ही अग्नि के प्रभाव क्षेत्र से बहुत दूर निकल चुके हैं। मान-अपमान जैसे लौकिक शब्द भी इनके आभामंडल के तेज में विलुप्त हो जाते हैं। किंतु इनके विषय में चर्चा करते हुए अभद्रता या अराजकता की लक्ष्मण रेखा लांघनेवाला अपने संस्कारों का आधार कार्ड अवश्य सार्वजानिक कर देता है!
इस घटना पर इसके अपराधियों को लज्जित होना चाहिए और इस पर प्रतिक्रिया करने से पहले राम में आस्था रखने वाले हर मनुष्य को यह चौपाई अवश्य स्मरण रखनी चाहिए :
सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे॥
✍️ चिराग़ जैन