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पीर के गाँव

प्रेम की राह में पीर के गाँव हैं
प्रेम फिर भी हमेशा लुभावन हुआ
एक सावन बिना प्रेम पतझर बना
पतझरों ने छुआ प्रेम; सावन हुआ

जब नदी ने समुन्दर छुआ झूम कर
तब नदी की सुधा को निचोड़ा गया
अपहरण कर लिया सूर्य ने देह का
और बादल उसे ओढ़ बौरा गया
हिमशिखर में ढली, आँसुओं-सी गली
छू सकूँ फिर समुन्दर -यही मन हुआ

एक अनमोल पल की पिपासा लिए
मौन साधक जगत् में विचरता रहा
घोर तप में तपी देह जर्जर हुई
श्वास से आस का स्रोत झरता रहा
चल पड़े प्राण आनन्द के मार्ग पर
जग कहे- ‘साधना का समापन हुआ’

एक राधा कथा से नदारद हुई
एक मीरा अचानक हवा हो गई
सिसकियाँ उर्मिला की घुटीं मन ही मन
मंथरा इक अमर बद्दुआ हो गई
बस कथा ने सभी को अमर कर दिया
फिर न राघव हुए ना दशानन हुआ

✍️ चिराग़ जैन

पुत्री के जन्म पर

इक किरण सूर्य की आई हो जैसे धरती के प्रांगण में
वैसे ही आई है बिटिया मेरे मुस्काते जीवन में
उसके आ जाने से मेरी मुस्कानों ने मआनी पाए
उसको गोदी में ले चूमा तो अन्तस् ने उत्सव गाए
शब्दों को ख़ूब निचोड़ लिया फिर भी यह गान अधूरा है
बिटिया के जन्मोत्सव के इस सुख का अनुमान अधूरा है
सारी ख़ुशियों से बढ़कर है उल्लास पिता बन जाने का
मन को बालक कर देता है अहसास पिता बन जाने का
तुलना करना नामुमक़िन है, जग के सब रिश्ते-नातों से
क्या मिलता है जब छूती है मुझको वो कोमल हाथोे से
उसकी किलकारी से बेहतर कोई मधुरिम संगीत नहीं
उसकी सुविधा से आवश्यक दुनिया की कोई रीत नहीं
जब वो अपना छोटा सा सिर सीने पर रखकर सोती है
उस क्षण धरती का राजा होने की अनुभूति होती है
दुनिया का सब ऐश्वर्य व्यर्थ सारा सुख-वैभव झूठा है
अपनी संतति की धड़कन सुनने का आनंद अनूठा है
✍️ चिराग़ जैन

ज़रा से तार में ख़ुशियाँ पिरोना

निभाना, सहन करना, बाट जोहना सीख लेती थीं
बिना आवाज़ के छुप-छुप के रोना सीख लेती थीं
कहाँ ग़ुम हो गईं वो पीढ़ियाँ जब बेटियाँ माँ से
ज़रा से तार में ख़ुशियाँ पिरोना सीख लेती थीं

✍️ चिराग़ जैन

नेपाल भूकंप त्रासदी

ईश्वर के एक इशारे पर
मानवता दहल गई सारी
लेकिन मानव की जिजीविषा
पल भर भी हिम्मत कब हारी
धरती डोली, हड़कंप मचा
ईश्वर ने यह भूकंप रचा
भय, शोक, करुण-चीखें, पुकार
मानव मन काँपा बार-बार
क्षण भर में भीषण वज्रपात
धन-जन हानि और प्राणघात
लेकिन अगले ही पल मानव
भरकर भीषण हुंकार उठा
जो चला गया उसको तजकर
कर जीवन का सत्कार उठा
दुनिया हर वर्गभेद भूली
मानवता की आशा फूली
हर दिशा सहायक हो आई
ज़ख़्मों का मरहम ले आई
मनुपुत्र मिलाकर ताल चले
अब कैसा भी भूचाल चले
हम फिर से गाँव बसा लेंगे
छप्पर से छाँव जुटा लेंगे
ईश्वर तेरे सुत दीन नहीं
भय से हारें वो हीन नहीं
कल फिर से सृजन करेंगे हम
फिर तेरा भजन करेंगे हम

✍️ चिराग़ जैन

सोशल मीडिया

फेसबुक पर छा गए लिक्खाड़
लिखते हैं दनादन
हर किसी मुद्दे पे इनकी राय है तैयार

बहुत बेख़ौफ़ लिखते हैं
इन्हें लिखे हुए शब्दों की ताक़त का
कोई आभास तो हो
इन्हें मालूम हो
इनकी बिना सोची हुई हर बात
पल भर में
किसी की साख पर बट्टा लगाती है

हवस-सी हो गई है
सबसे पहले
अपनी एफबी वॉल पर
सबसे ज़ियादा लाइक पाने की

इन्हें मालूम है सब कुछ
विदेशी ताक़तों ने
किस तरह बाज़ार को शैदा किया है
और ये भी इल्म है
कौन किसने कब कहाँ
किस गाँव में पैदा किया है
कौन कब मर जाएगा
कैसे मरेगा
कौन से ट्रक में लदेंगी गाय
कब हिन्दू डरेगा
कोई तो हो, जो इन्हें ये सब
बयां करने से पहले
दो घड़ी को ही
मगर कुछ सोच लेने की
हिदायत दे

ये नहीं कर पाए तो
ये काम कर दे
जब नए युग के ये सारे वर्चुअल भगवान
अपनी वॉल पर
ज़िंदा यूसुफ़ खानों के मरने की
नई तहरीर लिख दें
तो उसे पढ़ कर
युसुफ जी
ख़ुद-ब-ख़ुद उस बात को
सच में बदल डालें

ये नहीं समझेंगे
जब ये लोग
लोहू से रची ग़ज़लेँ चुराकर
पोस्ट करते हैं
तो उन ग़ज़लों पे मिलने वाली हर तारीफ़
उस शाइर के हक़ को
छीन लेती हैं
किसी कविता को
उसके रचयिता के नाम से
महरुम करना
किसी बच्चे को बिन कारण
यतीमी के जहन्नुम में
पटक देने के जैसा है।

इन्हें कोई ज़रा समझाए
चाकू सिर्फ़ इक औजार है
बस सृजन जिसका काम है
इसे हथियार में तब्दील कर देना
गुनाह से भी कहीं ज़्यादा बुरा है
बड़ा इलज़ाम है।

✍️ चिराग़ जैन

ज़िंदगी

सादगी के आँगन में
चहकी है, खेली है
हाव-भाव बदले तो
ज़िंदगी अकेली है
ओढ़ी हुई बातों से
कष्ट में धकेली है
सहजता सफलता की
पक्की सहेली है

एक तरफ़ जकड़न है
क़ातिल शिकंजा है
नाख़ूनी रंजिश है
नफ़रत है, पंजा है
उसी के ज़रा पीछे
प्यार की हवेली है
सहजता से खुली हुई
गुदगुदी हथेली है

बचपन से सीखा है
उत्तर उन्हीं में है
जिन शब्दों से मिलकर
बनती पहेली है

✍️ चिराग़ जैन

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