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हरसिंगार

तुमसे सिंचित कली
हौले-हौले खिली
चहकी …महकी
इतराने लगी।
हवाओं में
बिखरने लगी उसकी ख़ुश्बू।

…अरे!
तुम रूठ क्यों गए हरसिंगार?
काॅम्प्लेक्स में आ गए हो क्या?
बर्दाश्त न हुई
अपने जने की ख़ुश्बू?
भार लगने लगा
अपना ही अंश?

तुम्हारी तो कीर्ति ही बढ़ाता था!
वरना कौन देखता था तुम्हारी ओर?
तुमने उसे ही गिरा दिया
ज़मीन पर!

देखो कैसा बिछ गया है बेचारा!
अनवरत निहारता
तुम्हारी ओर।

तुम मुँह फेरे खड़े हो!
ठूँठ कहीं के!

✍️ चिराग़ जैन

आग्रह

आग्रह एक जंक्शन है
यहाँ से संबंध
बदल सकता है गाड़ी…

घृणा के लिए भी
घनिष्ठता के लिए भी
विस्तार के लिए
घुटन के लिए भी…

हर जगह की गाड़ी है हुज़ूर
आपको कहाँ का
टिकट चाहिए?

✍️ चिराग़ जैन

सरकार चल रही है

जो ख़ास हैं उन्हीं की अब दाल गल रही है
और आम आदमी की टोपी उछल रही है
सब चोर हैं सदन में- अख़बार बोलता है
फिर भी ग़ज़ब है उनकी, सरकार चल रही है

✍️ चिराग़ जैन

मेला बरसात में

उठ जा रे
देख सुबह से बरस रहा है रामजी।
….बेमौसम
….झमाझम।

मुझे चिंता हुई
रामलीलाओं का क्या होगा?
और अधबने रावण के पुतले…
…वो तो भीग गए होंगे।

देखने गया
तो पाया
सब कुछ भीग गया था
रामलीला का मंच
रावण का दरबार
ऋष्यमूक पर्वत
दंडक वन
पर्णकुटी
पुष्पक विमान।

…ये क्या किया रामजी
अपनी ही लीला पर
पानी फेर दिया।

और वो अधबना रावण
पानी-पानी…

चीथड़े बन गए थे
उसके नीले, पीले परिधान
छाती तक काली हो गई थी
मूँछों के रंग से
और आँखों को ढँक लिया था
सोने के मुकुट ने बहकर।

वाह रे रावण
त्रेता से कलयुग तक आ गया
लेकिन आँखों पर आज भी
सोने का पर्दा!

लटक गया था रावण का चेहरा
लीला कमेटी के
पदाधिकारियों की तरह।

✍️ चिराग़ जैन

मीठी याद

पीले पड़ चुके सफ़हे पर
लिखी मिली है
केक की रेसिपी
आठवीं क्लास की
एक लड़की की हैंडराइटिंग में।
ऑईल, शुगर, चोको पाउडर…
…वगैरा वगैरा।

साँस में घुल रही है
एक चाॅकलेटी गंध
ऐसा लग रहा है
किसी उंगली पर लगा केक
चाट रहा हूँ मैं।

साथ ही
ये भी महसूस कर रहा हूँ
कि केक से ज़्यादा मीठी है
….उंगली।

✍️ चिराग़ जैन

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