+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

कलाम साहब नहीं रहे!

आह!
कलाम साहब नहीं रहे!
जीवन की अंतिम श्वास तक
सक्रिय और सकारात्मक रहकर
आप नहीं रहे!!
देह ही हारी होगी
मन तो जीवित ही था आपका
चिकित्सकों ने काश मन टटोला होता
तो कह न पाते कि “ही इज़ नो मोर…”
सुना है “लिवेबल प्लेनेट अर्थ” पर बोल रहे थे आप
महसूस हुआ होगा इस दौरान
कि ये प्लेनेट अब लिवेबल रहा नहीं।
आपने कभी जुड़ने ही नहीं दिया अपने साथ
कोई वाद, कोई धर्म, कोई विशेषण।
आप मानव थे
सिर्फ़ मानव…
भरपूर मानव।
आपने कभी कुछ नहीं लिया इस देश से
आपने कभी कुछ नहीं मांगा इस देश से
यहाँ तक कि
अंतिम समय इतना भी समय नहीं दिया
कि कोई कुछ दे सके आपको।
आपने कभी प्रवचन नहीं दिया
आपका हर आचरण एक संदेश देता था।
एक लम्बे समय बाद बच्चों को कोई ऐसा मिला था
जिसके जैसा बनने के सपने देखे गये।
बच्चों जैसी जो निश्छल खिलखिलाहट आपकी सखी थी
वह आपके अन्तर्मन की जीवंत एक्स-रे थी।
आप राष्ट्रपति ही नहीं थे कलाम साहब
आप तो हृदयाधिपति थे इस देश के
आप धड़कते रहोगे यौवन के सीने में
आप खिलते रहोगे बच्चों की मुस्कान में
आप पुलकते रहोगे उत्सवों में
आप दौड़ते रहोगे धमनियों में
बन्द गले का सूट पहने
जब कोई लम्बे सफ़ेद बालों वाला
खिलखिलायेगा हाथ हिलाकर
तब सब कहेंगे
ये तो कलाम साहब जैसा है यार!

✍️ चिराग़ जैन

जश्न को चीखों में बदला है

नई नस्लों को हमने ख़ुद गुनहगारों में बदला है
हँसी को टीस में और जश्न को चीखों में बदला है
जिन्हें पुरखों ने ख़ुश होने की ख़ातिर हमको सौंपा था
उन्हीं मौकों को हमने जंग की वजहों में बदला है

✍️ चिराग़ जैन

त्योहार

अपना भी त्योहार है, उनका भी त्योहार।
अब तो मीठा कीजिये, आपस का व्यवहार॥

रथ पर शोभित हो गए, जगन्नाथ महाराज।
उनका रूप निहारने, ईद आई है आज॥

✍️ चिराग़ जैन

ज़िन्दगी का अर्थ

मंज़िल की धुन में राह के मंज़र निकल गये
ख़ुशियों के गाँव आए तो छूकर निकल गये
कुछ लोग ज़िन्दगी का अर्थ बूझते फिरे
कुछ लोग इसे शान से जीकर निकल गये

✍️ चिराग़ जैन

ख़ास लकीरें ग़ायब हैं

जब से कंधों पर कुछ भार पड़ा, तब से
हाथ बंधे हैं और ज़जीरें ग़ायब हैं

जिसने सख़्त ज़मीं पर चलकर देख लिया
उसकी बातों से तहरीरें ग़ायब हैं

जाने कैसे तुमने हाथ मिलाया है
हाथों की कुछ ख़ास लकीरें ग़ायब हैं

बस आईने लटके हैं दीवारों पर
और आईनों से तस्वीरें ग़ायब हैं

✍️ चिराग़ जैन

ज़िंदगी है चार पहरों की तरह

कुल मिलाकर ज़िंदगी है चार पहरों की तरह
हर किसी का वक़्त चढ़ता है दुपहरों की तरह
सांझ को दुल्हन सी सजती है सभी की ज़िंदगी
और फिर सूरज ढलक जाता है चेहरों की तरह

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!