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अलविदा 2015

दो हज़ार पन्द्रह में किसने कैसा-कैसा किया कमाल
पाँच मिनिट में दिखलाता हूँ आओ तुमको पूरा साल
शुरू हुआ जब साल तो बीजेपी के दिल पर था कुछ भार
भूल नहीं पाए थे मोदी काश्मीर की आधी हार
लेकिन तभी पढ़ा मोदी ने ऐसा इक अमरीकी मंत्र
अतिथि बनकर आए ओबामा झूम उठा अपना गणतंत्र
गली-गली घूमे मोदी जी, ओबामा का थामे हाथ
करी रेडियो स्टेशन पर नए यार से मन की बात
विदा हुए ओबामा जिस पल उस पल आ पहुँचा चुनाव
अमित शाह ने झोंक दिया सब बीजेपी का लश्कर लाव
गली-गली में रैली करके मोदी जी ने मांगे वोट
लेकिन दिल्ली की जनता ने किया गज़ब का ही विस्फोट
कजरी की खांसी सुन ली पर नहीं सुनी मोदी की बीन
झाडू वाले सड़सठ आए बीजेपी के केवल तीन
पहली बार हुई भारत में राजनीति की ऐसी रेस
खाता तक भी खोल नहीं पाई राहुल जी की कांग्रेस
अच्छे दिन बीते तो आया ऐसा इक चैतरफ़ा खोट
जख़्मों में मिर्ची-सा लागा मोदी का लखटकिया कोट
अभी ठीक से थमा नहीं था दिल्ली वाला ये हड़कंप
उधर आ गया काठमांडु में दर्दनाक भीषण भूकंप
पशुपति की नगरी में ऐसा तांडव करती नाची मौत
धरती की इक करवट बन गई मानव की ख़ुशियों की सौत
हार गई पर मौत, देखकर मानवता का साथी भाव
सारी दुनिया मरहम लेकर भरने पहुँच गई जब घाव
इधर रंग लाया दिल्ली में रामदेव का बिज़निस जोग
पीएम ने जब किया राजपथ पर जाकर बाबा का योग
योग दिवस की धूम मच गई गूंज उठा दुनिया का व्योम
अमरीका अनुलोम कर रहा, रूसी उसका ठीक विलोम
नाॅर्थ-ईस्ट में इक दिन आई, इक ऐसी दुखियारी शाम
खड़े-खड़े अशरीर हो गए, डाॅक्टर एपीजे कलाम
इसी बीच हम सबने देखा न्याय नीति का अद्भुत मेल
दो घंटे में हाईकोर्ट से सलमानों को मिल गई बेल
मुम्बई हमलों के दोषी की दया याचिका हो गई फेल
शुरू हुआ फिर भारत भर में धर्म-सम्प्रदायों का खेल
शर्म आ रही है कहने में ऐसी घटिया ओछी बात
हत्यारे की रक्षा करने लगी अदालत आधी रात
उधर दादरी में छोरों ने गौरक्षा का चोला ओढ़
लगा दिया पूरे भारत को हिन्दू-मुस्लिम वाला कोढ़
हिन्दू-मुस्लिम, सपा-भाजपा से पाई भी ना थी पार
तभी सड़क पर आरक्षण का ढोल पीट गए पाटीदार
आसमान में जाकर बैठी, ऐसी तनकर तूअर दाल
आम आदमी सन्न रह गया, चांदी काटे फिरे दलाल
सहनशीलता के मुद्दे पर यकदम ऐसा उठा बवाल
सम्मानों को वापिस करने दौड़ पड़े वाणी के लाल
सहिष्णुता का डंका पिटते.पिटते हो गई काफी देर
दिल्ली में रैली करने आए ख़ुद चलकर अनुपम खेर
दुश्मन को कमज़ोर मानने की फिर से कर ली मिस्टेक
छोटे-मोटे, टेढ़े-मेढ़े सभी विरोधी हो गए एक
मोदी देख तलक़ ना पाए, इन सब बातों का रेफरेंस
पटना में रपटा औंधे मुँह अमित शाह का काॅन्फिडेंस
लालू ने मोदी को पटका, धरे रह गए सारे ठाठ
सांठगांठ ने उम्मीदों को दी चैड़े में धोबीपाट
टूट गए सब टिके हुए थे न्यायालय पर जो अरमान
हत्याओं के इल्ज़ामों से पूरे छूट गए सलमान
दिल्ली के सचिवालय में अब रहे केजरी खुलकर खाँस
लोकपाल फिर लटक गया पर वेतन का बिल हो गया पास
समझ लिया है स्वयं केजरी ने ख़ुद को ही सैमी गाॅड
पाॅल्यूशन पर रोक लगाने को ले आए ईवन-आॅड
लेकिन विचलित नहीं कर सका है पीएम को कोई कलेश
मोदी जी ने घूम लिए हैं छप्पन दिन में बाईस देश
मेमन, दाउद, काला धन और डाॅलर, सोना, कच्चा तेल
संथारा, पर्यूषण, अरहर, हिन्दू, मुस्लिम, जाट, पटेल
सिंगापुर, बैंकाॅक, बनारस, फ्रांस, जर्मनी, गांधीधाम
सारे मुद्दे फीके पड़ गए, साल रहा मोदी के नाम

✍️ चिराग़ जैन

नया पड़ोसी

पिछले महीने
नया पड़ोसी आया है।
दुश्मन लगता है
पिछले जन्म का।
कमबख्त
पुराने गानों का शौक़ीन है।
रोज़ रात
दुनिया भर के सोने के बाद
युद्ध शुरू करता है।
कभी रफ़ी, कभी हेमंत, कभी लता।
ख़ुद तो सो जाता है
आध-पौन घंटे में
लेकिन उसे क्या पता
क्या क्या गँवा बैठता हूँ मैं
रोज़ रात।

बदला भी लूँ तो कैसे
उसके लिए तो ये सब
सिर्फ़ लोरी के काम आता है
उसे क्या पता
क्या होता है
जब रेकॉर्ड पर बजता है-
“मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है”

✍️ चिराग़ जैन

बेवफ़ा को इश्क़ हो जाए

कली चटके तो गुलशन से हवा को इश्क़ हो जाए
वफ़ा ऐसी ग़ज़ब हो, बेवफ़ा को इश्क़ हो जाए
इबादत वो कि रब बंदे का दीवाना बना भटके
मुहब्बत वो कि आशिक़ से ख़ुदा को इश्क़ हो जाए

✍️ चिराग़ जैन

संतृप्ति

आपकी प्रीत जबसे सुलभ हो गई
फिर किसी मीत की आरज़ू ना रही
प्यार में हार कर जो मिला है मुझे
अब किसी जीत की आरज़ू ना रही

साँवरे के लिए गीत गाती फिरी
एक मीरा दीवानी कहाती फिरी
क्षण समर्पण का जब तक न हासिल हुआ
तब तलक हर नदी गुनगुनाती रही
राधिका कुंजवन में मिली श्याम से
फिर उसे गीत की आरज़ू ना रही

शब्द आँखों में आकर ठहरने लगे
भाव चेहरे की लाली में ढलने लगे
कण्ठ में जम गए ज्ञान के व्याकरण
अर्थ अधरों पे आकर पिघलने लगे
श्वास का राग धड़कन से ऐसा मिला
मुझको संगीत की आरज़ू ना रही

अबकी सावन मिलेगा तो पूछूंगी मैं
मेघ पहले क्यों ऐसे न लाया कभी
बिजलियों ने न इतना प्रफुल्लित किया
कोयलों ने न यूँ मन लुभाया कभी
मन के चातक ने कैसा अमिय चख लिया
अब उसे छींट की आरज़ू ना रही

✍️ चिराग़ जैन

उजियारे के अवशेष

गाँव का
पुराना मकान
कच्चा-पक्का फ़र्श
दीमक लगी जर्जर चौखट
और
देहरी के दोनों ओर
चिकनाई के
दो गोल निशान!मुद्दत हुई
हर साल
दीपावली पर
दीपक जलाते थे दो हाथ।

फिर
अपने पल्लू की ओट में छिपाकर
हवा के झोंके से बचाते हुए
दीवार की आड़ में
हौले से
देहरी पर
दो दीपक
धर आते थे दो हाथ।

न जाने क्यों
आज फिर से
जीवंत हो उठी है माँ!

✍️ चिराग़ जैन
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