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आवाज़ बग़ावत की

शिक्षा के आँगन में गूंजी जब आवाज़ बग़ावत की
तब सीमाएँ पार हुईं थीं ज़्ाुर्रत और हिमाक़त की
उन हाथों ने कीचड़ फेंकी हिंदुस्तानी शानों पर
जिनका रोम-रोम गिरवी है भारत के एहसानों पर
जिस धरती पर चले गुडलने वो धरती भारत की है
जिसे पकड़ कर लगे संभलने, वो उंगली भारत की है
जिस बगिया से आम चुराए, वो बगिया भारत की है
जिस पर इस दुनिया में आए, वो खटिया भारत की है
जिससे पिट कर पढ़ना सीखे, सख्त छड़ी भारत की है
जिसमें तुमने पुरखे फूंके वो लकड़ी भारत की है
बचपन में जो माटी चाटी वो माटी भारत की है
जिस पर घात लगा बैठे हो, वो घाटी भारत की है
आतंकों के आका तुममें कैसी प्यास बढ़ा बैठे
जिस छाती से दूध पिया उसमें ही दाँत गढ़ा बैठे
हमें शांति से प्यार बहुत है, हिम से ढंके शिखर हैं हम
लेकिन ठण्डी हिम के नीचे ज्वालामुखी प्रखर हैं हम
मूढ़ समझकर छोड़ रहे थे शिशुपालों के पापों को
क्षण में दंतहीन कर देंगे आस्तीन के साँपों को
ग़लती अब अपराध बन गई, सब हिसाब हो जाएगा
जिसकी जड़ में पले सपोले, वृक्ष साफ हो जाएगा

✍️ चिराग़ जैन

भावों का अवसान

सच जब किरच-किरच कर बिखरा
भावों का अवसान हो गया
उसको शब्दों तक लाने में
कवि भी लहूलुहान हो गया

सच के टुकड़े हाथ उठाए
जिसने उन्हें निकट से देखा
उसकी हुई हथेली घायल
भंग हुई जीवन की रेखा
अक्षर साथ छोड़कर भागे
वाणीकुल वीरान हो गया

सब सिद्धांत तड़ककर टूटे
झूठे पर्दों ने सुख लूटे
बड़े हुए तो हमने पाए
बचपन के सब किस्से झूठे
मछली जल की रानी है; ये
घड़ियालों को ज्ञान हो गया

मटके में जो कंकड़ डाले
उनने सारा पानी सोखा
प्यासा कौआ श्रम कर करके
अब भी खा जाता है धोखा
कछुओं के तप से भी ऊँचा
खरगोशों का स्थान हो गया

✍️ चिराग़ जैन

शिक्षा की रौशनी

पहाड़ की
घुमावदार पगडंडी पर
स्कूल जा रही हैं लड़कियाँ।
…मतलब
बचपन में हमें ग़लत पढ़ाया गया था
कि रौशनी
सीधी रेखा में ‘ही’ यात्रा करती है।
✍️ चिराग़ जैन

प्रतिशोध

ओ धोबी
सच बताना
क्या तुम्हारे पुरखे भी गए थे
राम के पीछे-पीछे
विह्वल होकर
वनवास की हठ लिए

या फिर
तुम ही चले आए थे
राम के पीछे-पीछे
लंका से
प्रतिशोध लेने

© चिराग़ जैन

सपना

बेहद आलीशान मकान का
सपना पाला है तो
पहले संस्कारों की झाड़ियाँ उखाड़ दो
और वो जो ज़मीर है ना
उसे मकान की नींव में गाड़ दो।

इससे नींव को मज़बूती तो मिलेगी ही
जी भी कड़ा हो जाएगा
और पत्थर जैसे कलेजे की सपोर्ट से
सपनों का महल खड़ा हो जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

परिधि

जो लोग
चोरी किये जाने के ख़िलाफ़ हैं
वे लोग
सिर्फ दूसरों के द्वारा चोरी किये जाने के खिलाफ हैं

जो लोग
झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
वे लोग सिर्फ दूसरों का झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
और जो लोग
स्त्रियों को सुरक्षित देखना चाहते हैं
वे लोग
स्त्रियों को सिर्फ दूसरों से सुरक्षित देखना चाहते हैं

ये बात
समझ तो नहीं आती
लेकिन समझ रहा हूँ

कि वे लोग
जब चोरी करते पकड़े जाएँ
तो उसको इत्तफ़ाक़ समझना चाहिए
वे लोग
जब झूठ बोलते पकड़े जाएँ
तो उस परिस्थिति को समझना चाहिए
और वे लोग
जब किसी स्त्री को दबोचे हुए
नंगे होने लगें
तो उसको
ब्राॅड माइंडेड होकर देखना चाहिए

क्योंकि वे लोग
सभ्य समाज की परिधि हैं
और सभ्य होने के नाते
मुझे परिधि लांघने का
कोई हक़ नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

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