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धनतेरस का दीया

‘सुन!
धनतेरस का दीया
जोड़ रही हूँ।
ध्यान रखियो
बाहर मत आइयो।’

-कहते हुए
हर साल
धनतेरस पर
दीपक बालती थी माँ।

अगली सुबह
चुरा लेता था मैं
उस दीये के
तेल में भीगा रुपैया।

‘क्यों रे
ये दीये में से
सवाया किसने उठाया’

‘मुझे नहीं पता मम्मी
मैंने तो
दीया ही नहीं देखा
आपने ही तो कहा था
अंदर रहने को।’

मेरा धनतेरस तो
शुभ ही रहता था
लेकिन
माथे में त्यौरियाँ डाले
देर तक
बड़बड़ाती थी माँ!

आज दीवाली के लिए
फूल लेने बाहर निकला
किसी की चैखट पर
दीया रखा था
धनतेरस का
पाँच रुपैये भी थे उसमें
तेल में भीगे हुए।

…किसी ने
चुराए ही नहीं अब तक।

जी तो बहुत किया
चुराने का
लेकिन छोड़ आया
…उस बड़बड़ को मिस करूंगा!

✍️ चिराग़ जैन

इच्छा

मुझे हुनर की बड़ी नेमतें अता करना
मेरे ख़ुदा तू मुझे शोहरतें अता करना
मैं रोज़ रात इक हुजूम से मुख़ातिब हूँ
ख़ुद से मिल पाऊं इतनी मोहलतें अता करना

✍️ चिराग़ जैन

दंगे

बाज़ी बिछी हुई है और दांव हैं दंगे
होते हों, आदमी पे अगर घाव हैं दंगे
कुछ लोग हैं बेचैन सियासत की भूख से
जिस पर सिकेगी रोटी वो अलाव हैं दंगे

✍️ चिराग़ जैन

अनदेखी

कैसा था वो अनुभव तुमने
सबसे पहले जब मेरे
संदेशों की अनदेखी की थी

जब सम्बन्ध प्रगाढ़ रहा था
सहज मिला करते थे हम-तुम
पहरों जाने कितनी बातें
रोज़ किया करते थे हम-तुम
तब भी मुझको डर लगता था
तब भी मैं सोचा करता था
आपस में दूरी आई तो
तुम उत्तर ना दे पाई तो
तब कैसे रातें काटेंगे
किससे अपना मन बाँटेंगे
तब भी तुमने बेफ़िक्री से
मेरे मन के ऐसे सब
अंदेशों की अनदेखी की थी

पहले सोचा व्यस्त हुई हो
दुनियादारी की बातों में
फिर जाना अभ्यस्त हुई हो
कोमलता पर आघातों में
जब संदेशा पहुँचा होगा
तुमने ये तो सोचा होगा
उत्तर बिना उदास रहेंगे
वो मुझसे नाराज़ रहेंगे
मैं उनको समझा ही लूँगी
कारण एक बना ही लूँगी
ख़ुद को लापरवाह बनाकर
तुमने उन अपनत्व भरे
आदेशों की अनदेखी की थी

जब मेरा सन्देश तुम्हारी
दिनचर्या में खो जाता हो
कुछ पल मेरी याद जगाकर
आख़िर धूमिल हो जाता हो
तब उत्तर की प्यास जगाए
हर आहट से आस लगाए
मन व्याकुल होता जाता था
सब धीरज खोता जाता था
खीझ, तड़प, चिंता, आकुलता
क्रोध, प्रलय, संशय, आतुरता
मत पूछो क्या क्या होता था
जब तुमने अधिकार भरे
परिवेशों की अनदेखी की थी

✍️ चिराग़ जैन

व्यक्तित्व

एक अज्ञात कलाकार ने
हवा में कुछ लकीरें बनायीं

कुछ खड़ी रेखाएँ
जैसे भृकुटि के मध्य त्यौरियाँ पड़ती हैं
कुछ आड़ी रेखाएँ
जैसे ललाट पर बौद्धिकता उभरती है।
कुछ अर्द्धवृत्ताकार
जैसे नयनों के नीचे की चिन्ताएँ
कुछ हल्की पनियाई
जैसे आँखों की कोरों पर तैरती इच्छाएँ

कुछ होंठों पर बिखरी मुस्कानों की
सुखद यादों जैसी
और कुछ कसमसाते हुए
पूरे न हो सके वादों जैसी।

कुछ ख़ुशियों की
कुछ ग़म की
कुछ आशाओं के उजियारे की
कुछ निराशाओं के तम की
कुछ अप्राप्य के प्रति रोष की
और कुछ असीम संतोष की

…इन आड़ी-तिरछी रेखाओं में
जाने कब एक व्यक्तित्व उभर आया
मैं रेखाएँ देखता रह गया
और हवा में मेरा चेहरा उकर आया!

✍️ चिराग़ जैन

संवाद कविता

आगे के सफ़हों पर जो कुछ है वह भी है तो गोमुख निसृत गंगाजल ही, लेकिन इसका संचय जिस पात्र में किया गया है वह किंचित आधुनिक है। यह खण्ड फेसबुक पर हुई चर्चाओं का यथावत् संकलन है। इसमें मित्रों से हुई काव्यात्मक चैटिंग को जस का तस समायोजित किया गया है। इस खण्ड में केवल उन्हीं अंशों का सृजन-श्रेय मेरा है, जो मेरे नाम/चित्र के साथ प्रकाशित हैं। अन्य अंशों के सर्जकों को अपने नाम उजागर करने में संकोच था, सो फिलहाल उनको ‘अज्ञात’ जानकर ही आनंद लें।

✍️ चिराग़ जैन

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