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कैसे खेलें होली

जबसे कुर्सी पाई जी, मोदी कैसे खेलें होली
ऐसी आफ़त आई जी, मोदी कैसे खेलें होली

फ्यूज़ उड़ा कर गए केजरी दिल्ली ली हथियाई
उधर जाट सब फेल कर गए पानी की सप्लाई
धोती ना धुल पाई जी
मोदी कैसे खेलें होली

रास चल रहा जेएनयू में बिना डरे बिन सहमे
उधर कूद गए रविशंकर जी स्वयं कालिया दह में
रोई जमुना माई जी
मोदी कैसे खेलें होली

ड्रीम गर्ल तो साफ कर रही मथुरा वाला पानी
और मिनिस्टर बन बैठी है गुजरातन ईरानी
ख़ुद की दूर लुगाई जी
मोदी कैसे खेलें होली

बचपन बीता हाथ उठाए केतलिया का हत्था
और बुढ़ापे में निरखत हैं जेटलिया का मत्था
यूँ ही उमर गंवाई जी
मोदी कैसे खेलें होली

तीन राज्य तो गँवा चुका है अमित शाह का फंडा
अब डंके की चोट बज रहा आरएसएस का डंडा
लुटिया रहे डुबाई जी
मोदी कैसे खेलें होली

गठबंधन ने बीजेपी से पटना हथिया लीना
धीरे धीरे सिकुड़ रहा है छप्पन इंची सीना
गैया काम न आई जी
मोदी कैसे खेलें होली

दिल्ली वाले वोट बैंक पर पड़ा विपक्षी डाका
हरियाणा को ले बैठेंगे इक दिन खट्टर काका
घाटी ले गई ताई जी
मोदी कैसे खेलें होली

विजय माल्या लेकर भागे पैसा नंबर वन का
अब भी सपना देख रहे हो क्या तुम काले धन का
कैसे करें उगाही जी
मोदी कैसे खेलें होली

धर्म कर्म की बाजारों में ऐसी तैसी हैगी
रविशंकर जी कल्चर बेचें, रामदेव जी मैगी
फैशन राधा माई जी
मोदी कैसे खेलें होली

✍️ चिराग़ जैन

अमन की ज़रूरत है

देश की आवाम को अमन की ज़रूरत है
इसे कोई फालतू बबाल नहीं चाहिए
शासक को चाहिए सुशासन बनाए रखे
व्यर्थ बकवाद, झोलझाल नहीं चाहिए
जनता को भरपेट रोटी चाहिए सुकूं की
धरना या भूख हड़ताल नहीं चाहिए
यदि संविधान का हो पूरी तरह पालन तो
फिर हमें कोई लोकपाल नहीं चाहिए

✍️ चिराग़ जैन

नारी

परहित का ही व्याकरण रहा
उसके अंतस् की भाषा में
मर्यादा पार हुई भी तो
कुछ सत्कर्मों की आशा में
तुम तुला उठाए फिरते हो
पलड़े में रखे चरित्रों को
मुट्ठी में स्वार्थ पसीज गया
पापी कर दिया पवित्रों को

जब जी चाहा पाहुन धोकर
कन्यापूजन में बिठा लिया
जब जी चाहा दासी कहकर
बिस्तर की वस्तु बना दिया
जब जी चाहा शृंगार किया
जब जी चाहा दुत्कार दिया
चुटकी से उसकी मांग भरी
पंजे से चीर उतार दिया

हाथों को बेड़ी देते हो
पैरों को छाले देते हो
इतिहास प्रश्न करता है तो
फिर वही मिसालें देते हो
लक्ष्मी कहकर इतराते हो
दुर्गा कहकर डर जाते हो
मंदिर में पूजा करते हो
मंडी में दाम लगाते हो

जब घिरा अंधेरा रातों का
औरत से रात निखारी है
जब सुबह हुई तो बिस्तर से
सिलवटें समझ कर झाड़ी है
उसने निस्पृह भक्ति ढूंढी
मीठी बातों के दर्पण में
तुमको केवल वासना दिखी
प्रेयसी के मौन समर्पण में

जब तक बन पड़ा अधर सीकर
कीचक तक का सम्मान किया
जब सीमा रेखा पार हुई
सारा कुल लहूलुहान किया
शबरी बन अद्भुत प्रेम किया
मीरा बनकर विषपान किया
सीता बन अग्नि परीक्षा दी
लक्ष्मी बन शर संधान किया

✍️ चिराग़ जैन

शिखरों का निर्माण

सिद्धांतों की बलिवेदी पर, अपनापन बलिदान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

लंका हो या अवधपुरी हो, सब ही ने ली अग्निपरीक्षा
धोबी के आक्षेपों की भी, मन में कर ली स्वयं समीक्षा
नष्ट सभी ने सीताओं का, सारा सुख-सौभाग किया है
रावण ने अपहरण किया था, राघव ने परित्याग किया है
जो मर्यादित थे उनका भी, पल में अलग विधान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

मथुरा जाने के निर्णय में, राधा की स्वीकृति भी थी क्या
राजपथों पर बढ़ते पग ने, पगडण्डी की पीर सुनी क्या
कौरव, पाण्डव, शकुनी, गीता, नगरी स्वर्ग लजाने वाली
याद नहीं आई पल भर भी, वो पगली बरसाने वाली
उदय किसी का तब ही संभव, जब कोई अवसान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

लक्ष्मण ने निजधर्म निभाया, उर्मिल भीतर-भीतर रोई
घिरा इधर अभिमन्यु अगर तो, उधर उत्तरा सिसकी कोई
गौतम की कुण्ठा को झेले एक अहिल्या पत्थर बनकर
रजवाड़ों की आन बचाई, पद्मिनियों ने जौहर रचकर
आधारों पर पैर टिकाकर, शिखरों का निर्माण हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

✍️ चिराग़ जैन

हमें ज़िद है

हम अपनापन जताए जा रहे हैं
वो बस रस्में निभाए जा रहे हैं
हमें ज़िद है कि उनको ख़ुश रखेंगे
वो हमको आज़माए जा रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन

निभा ले मुझको

मौत ने ज़िन्दगी का मोल लगा रखा है
अपने इक़रार की क़ीमत दे, बचा ले मुझको

मेरे किरदार का हर रंग तो चुभता भी नहीं
एक मौसम ही समझ के तू निभा ले मुझको

✍️ चिराग़ जैन

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