Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
किसी ख़्वाब को आज छू कर के देखें
अमां अब कोई आरज़ू कर के देखें
जिस इक बात पर हमसफ़र बन गए हम
वही बात फिर हू-ब-हू कर के देखें
ख़मोशी की राहें जुदा कर रही हैं
घड़ी दो घड़ी गुफ़्तगू कर के देखें
जहाँ से मरासिम फ़ना हो गया था
वहीं इक दफ़ा फिर शुरू करके देखें
कोई ज़ख़्म दिल को दुखाने लगा है
चलो आँसुओं से वजू कर के देखें
तकल्लुफ़ हटेगा, क़रीबी बढ़ेगी
जहाँ आप था, उसको तू करके देखें
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Jainism, Muktak, Poetry
कहीं मन्नत के धागे बांध कर आने नहीं पड़ते
किसी लालच से अपने तीर्थ फुसलाने नहीं पड़ते
हमारे देव बिन मांगे ही देते हैं हमें सब कुछ
हमें कुछ मांगने को हाथ फैलाने नहीं पड़ते
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जो सबके अपराध टटोलें
मीठे पानी में विष घोलें
जो जल से जल-जल जाते हैं
जब बोलें कड़वा ही बोलें
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
दर्पण में उनका चेहरा है, उस पर भौंहें तान रहे हैं
हर युग में कान्हा जन्मे हैं, हर युग में शिशुपाल हुए हैं
जिस धरती पर बुद्ध चले थे, उस पर अंगुलिमाल हुए हैं
दशरथ ने मर कर समझाया, अनुचित के आगे मत झुकना
जब-जब कोपभवन की मानी, तब-तब युग बदहाल हुए हैं
कभी सुदर्शन से समझाए
कभी समर्पण के पथ आए
तम के चेले कभी, कहीं भी
सत के आगे टिक ना पाए
सच का जीवित रहना तय है, इसके बहुत प्रमाण रहे हैं
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
ईर्ष्या ढूंढ रही है कमियाँ, प्रतिभा बस बढ़ती जाती है
तिनके तकते रह जाते हैं, और लता चढ़ती जाती है
बिन समझे कहने वालों ने, माटी सनी हथेली देखी
लेकिन लगन उसी माटी से, अमृत घट गढ़ती जाती है
अपनों को दुत्कार चुके हैं
यश-वैभव सब हार चुके हैं
एक ज़रा सी ज़िद्द के आगे
पूरा कुल संहार चुके हैं
ख़ुद के हित का ज्ञान नहीं है, कहने को विद्वान रहे हैं
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
✍️ चिराग़ जैन
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उस पल जब चीख़ बन गई थी
एक नन्हीं किलकारी
जब दहल उठा था सारा ब्रह्मांड
जब दरक गई थी धरती
उस पल केवल तुम आई थीं
उसकी छटपटाहट को आलिंगन में भरकर दुलारने
तुम दूर ले गईं उसे बर्बर वहशी की पहुँच से! …
तुमने उसे मारा नहीं; बचा लिया है मृत्यु!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
एक शुबहा अज़ान देता है
आइये हिज्र की नमाज़ पढ़ें
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सीप से अधखुले ये अधर मत हिला
नैन की पाँखुरी खोल कर बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर
ये प्रणय साधना का सुफल है प्रिये
एक पल भी मिलन का न बर्बाद हो
नैन से, बैन से, देह से, नेह से
जिस तरह हो सके, आज संवाद हो
मौन रहकर समय मत गँवा बावरी
इस घड़ी को तू अनमोल कर, बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर
आज की रात जो कुछ कहा जाएगा
वो सुखद याद में दर्ज हो जाएगा
लाज की बात मानी अगर आज तो
ज़िन्दगी पर बहुत कर्ज़ हो जाएगा
सब नियम भूल जा, हर झिझक छोड़ दे
आज मत सोच, मत तोल कर बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर
सेज पर साज सा बज उठा देख ले
चूनरी जो तेरी सरसराने लगी
चूड़ियों ने खनक कर इशारा किया
और पायल तराने सुनाने लगी
कान की बालियों ने कहा कान में
आज की रात दिल खोल कर बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर
✍️ चिराग़ जैन