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प्यार कहाँ खो बैठे

जिसको छू लेने से मन की महक गुलाबी हो जाती थी
जिसमें आँखें बतियाती थीं, हम वो प्यार कहाँ खो बैठे
जिसके दम पर हम दोनों का अपनापन गहरा होता था
जो हमको इक-दूजे पर था, वो अधिकार कहाँ खो बैठे

जाने कैसी ज़िद्द पनपी है, संवादों का स्वर ऐंठा है
तन पर मन भर बोझ चढ़ा है, मन ऐसा तन कर बैठा है
ख़ुशियों की क्यारी जिसके आलिंगन में फूला करती थी
जिसमें रिश्ता पंख पसारे, वो विस्तार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

बातें करने बैठ गए तो फिर बातों का छोर नहीं था
नयनों में बस मुस्कानों का डेरा था, कुछ और नहीं था
जो छोटी सी दुनिया हमको, दुनिया से अच्छी लगती थी
जिसमें अपने सब अपने थे, वो संसार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

आपस की सरगम ऐसी थी, खटपट से भी सुर सजते थे
पल भर सन्नाटा होता था, फिर घंटों नूपुर बजते थे
जो धागा हम-तुम दोनों को आपस में बांधे रखता था
जिससे हम हर बार जुड़े थे, वो इस बार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

✍️ चिराग़ जैन

नियति

रोज़ नया अनुभव जुड़ता है
रोज़ उमर घटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

जब यह तय है कुछ दिन पीछे हम सबको निश्चित मरना है
फिर इतने सारे अनुभव का आख़िर हमको क्या करना है
बिन मतलब के अनुभव से ही
निश्छलता छँटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

सागर युग-युग तक गरजेगा, लहरें आएंगी-जाएंगी
कुछ सागर तट को चूमेंगी, कुछ पहले ही मिट जाएंगी
लहर नियत सीमा तक बढ़कर
ख़ुद पीछे हटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

श्रम में जीवन बीत गया तो, कब तन को विश्राम मिलेगा
काया केवल कष्ट सहेगी, और चेतन को राम मिलेगा
जो पाया उसको बिसराकर
दुनिया क्या रटती जाती है
रोज़ नए बिरवे उगते हैं
रोज़ फसल कटती जाती है

✍️ चिराग़ जैन

दो हज़ार अठारह विदा

दो हज़ार अठारह बीता देकर कितने सारे घाव
कालखंड की चौसर पर ज्यों मौत जीतती जाए दांव
साल अभी प्रारम्भ हुआ था काल दिलों को छील गया
दूर देश में एक हादसा श्रीदेवी को लील गया
अभिनय के घर मातम छाया, इस ग़म की सिसकी थमती
उससे पहले विदा हो गए श्री जयेंद्र जी सरस्वती
अगला सदमा लगा अचानक सूफी की कव्वाली को
विदा किया हमने धरती से प्यारेलाल वडाली को
तभी काव्य की गलियों की ख़ुशियों को पाला मार गया
हिंदी कविता का इक ध्रुवतारा टूटा केदार गया
काल साथ ले चला अचानक शोलों के सहभागी को
काव्य जगत ने खोया अपने बालकवि बैरागी को
इसके बाद कारवां गुज़रा गीतों के जादूगर का
धरती का नीरज बन बैठा अमर सितारा अम्बर का
राजनीति की गलियाँ रोईं दक्षिण के स्वर क्लान्त हुए
चेन्नई की धरती के बेटे करुणानिधि जी शांत हुए
जाने क्या विधि ने ठानी थी, कैसी थी उसकी मर्ज़ी
पाँच दिनों के बाद बिछुड़ गए सोमनाथ जी चटर्जी
ऐसा लगता था ईश्वर ने सारे गौहर बीन लिए
जब निर्मम होकर भारत से अटल बिहारी छीन लिए
एक एक कर हमसे छीने कितने जगमग दीप गए
पत्रकारिता जी भर रोई जब नैयर कुलदीप गए
कड़वे प्रवचन मौन हो गए, ओझल हुआ अमिट आलोक
सारे संत जगत पर छाया संत तरुण सागर का शोक
फिर नारायण दत्त तिवारी, और खुराना लाल मदन
इतने सारे हीरे खोए, घायल है अब अंतर्मन
ये आँसू का साल रहा है अब कोई संघर्ष न हो
ईश्वर से बस यही दुआ है अगला वर्ष हर्ष का हो

✍️ चिराग़ जैन

पुरुषोचित

जनक ने कहा-
“प्रत्यंचा चढ़ाओ!”
तुमने धनुष ही तोड़ दिया।

जनता ने कहा-
“धोबी की पत्नी को न्याय दिलाओ!”
तुमने अपनी पत्नी को ही छोड़ दिया।

धनुष तोड़ कर सीता को तो वर लाए
फिर कभी सुधि नहीं ली
उस टूटे वरदान की,
सीता को त्याग कर उदाहरण तो बन गए
लेकिन चिंता नहीं की
अर्धांगिनी के सम्मान की।

मांगलिक कार्यों में
शस्त्र का खण्डन
और ऋषि का कोप
अपशकुन था राम जी!
और सँवारने की कोशिश में
बिगाड़ कर छोड़ देना
तुम्हारा पुरुषोचित गुण था राम जी!

✍️ चिराग़ जैन

हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

हवा में
ज़हर घुलता जा रहा है।

वो सारी गंदगी
जो आग के ज़रिए
हवाओं में कहीं ग़ुम हो गई थी;
वही अब साँस के ज़रिए
हमारे फेफड़ों में जम रही है।
हमारी साँस की सरगम सुनाती धौंकनी से
अचानक आह की आवाज़ आने लग गई है।

कोई तो है
जो अपने साथ बीती ज़्यादती का
हमारी नस्ल से दिन-रात बदला ले रहा है।
कोई तो है
जो हमसे ही हमारी कौम को बर्बाद करने के लिए
बारूद-असला ले रहा है।

कोई तो है जिसे मालूम है
कमरे को ठंडा कर रहे
हर देवता का दूसरा चेहरा
बड़ा भभका उठाता है।
कोई तो है जिसे एहसास है
हर आँख में पलती
हर इक अय्याश हसरत की
कोई मजलूम ही क़ीमत चुकाता है।

हमारा ढोंग खुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

सुना है
पेड़ बादल को बुलाने के लिए
बाँहें उठाते थे।
सुना है प्यास से थक कर परिंदे
बारिशों की मिन्नतों के गीत गाते थे।
सुना है
सर्दियों में खेत कोहरे की रिजाई ओढ़ लेते थे।
सुना है
फूल गुलशन में टहलती तितलियों को
रोक लेने की सुबह से होड़ लेते थे।

सुना है
एक मुद्दत से किसी भी फूल से मिलने
कोई तितली नहीं आई।
सुना है
एक अरसे से
सिमटते जा रहे तालाब पर
बदली नहीं छाई।
सुना है
पूस की ठंडी ठिठुरती रात में भी
खेत नँगा सो रहा है।
सुना है कोयलें सब ग़ैर-हाज़िर हो चुकी हैं;
सुना है बांझ होते जा रहे फलदार पेड़ों की
पुराना बाग़ लाशें ढो रहा है।

सुना है
हर नदी नाराज़ हैं।
हवाएं रोज़ बेइज़्ज़त हुई हैं।
ज़मीं के ख़ूबसूरत जिस्म पर
तेज़ाब फेंका है हमारी हसरतों ने।
सुना है पेड़ अब इस बेअदब इंसान को
छाया नहीं देते।

जिन्हें हम पूजते थे देवता कहकर
बहुत बेफ़िक्र थे हम लोग जिस आगोश में रहकर
सुकूँ देता था जिनका साथ, जिनका संग
बहुत गहरा था जो इक दोस्ती का रंग

वो गहरा रंग धुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है

✍️ चिराग़ जैन

सीख

मैंने
सीमेंट से सीखा है
कि जोड़ने के लिए
नर्म होना ज़रूरी है
और
जोड़े रखने के लिए
सख़्त…!

✍️ चिराग़ जैन

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