+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

उदासी का अफ़साना

जिन डेरों ने उत्सव पूरा था रैना के आँचल में
भोर उन्हीं डेरों पर इक वीराना पाती है
अंधियारे में जीवन सबका रंग-रंगीला लगता है
पहली किरण उदासी का अफ़साना पाती है

जिनके बिन हर महफ़िल का सिंगार अधूरा होता है
उन फूलों का गुच्छा सुबह केवल घूरा होता है
जिसके दम पर महफ़िल अपना सिर ऊँचा कर लेती है
वो सब कुछ सुबह होने तक चूरा-चूरा होता है
झूठे रंग उतर जाते हैं रात गुज़रने से पहले
भोर महज सच का बदरंग ख़ज़ाना पाती है

साज पड़े होते हैं लेकिन सुर थक कर सो जाते हैं
देह पड़ी रह जाती है और प्राण कहीं खो जाते हैं
जिनका आकर्षण था उनसे दिल घबराने लगता है
जश्न सुबह की क्यारी में इक सन्नाटा बो जाते हैं
रात जवानी की बाँहों में रास रचाती फिरती है
और सुबह रंगरलियों से उकताना पाती है

✍️ चिराग़ जैन

आख़िर फूल बिखर जाने हैं

चाहे कितनी देह सँवारें
चाहे जैसे रूप निखारें
चाहे कितनी गन्ध उड़ाएं
चाहे गुलशन को महकाएं
लेकिन इतना तय है इक दिन, इस डाली से झर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं

सारा नूर हवा होता है, तन भी कुम्हलाने लगता है
जिस सूरज ने प्राण भरे थे, वो ही झुलसाने लगता है
जिन झोंकों के छूने पर हम, ख़ुद पर इतराते फिरते थे
उन झोंकों के छूने से भी, ये मन घबराने लगता है
कुछ पल के मेहमान सभी हैं, फिर सब अपने घर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं

इस क्यारी ने जाने कितने फूलों का खिलना देखा है
रस की चाहत में भँवरों के पंखों का छिलना देखा है
इस बगिया को इन फूलों का रूप लुभा पाएगा कैसे
इस बगिया ने सुंदरता का मिट्टी में मिलना देखा है
इसको है मालूम सभी के इक दिन रंग उतर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं

इसका नूर दिनों ने देखा, उसके हिस्से रातें आईं
कुछ वनफूलों के हिस्से बस, आँसू की बरसातें आईं
हम सब लोगों का ही जीवन, केवल क़िस्मत का खेला है
कुछ को माली ने दुलराया, कुछ के हिस्से घातें आईं
हम सारे ही लोग यहाँ बस कुछ दिन जीकर मर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं

✍️ चिराग़ जैन

कमी

मरने की चाह, ज़िन्दगी जीने से कम रही
लहरों की चाल मेरे सफ़ीने से कम रही

दौलत की चमक सबसे ज़ियादा रही मग़र
मजदूर के माथे के पसीने से कम रही

सेहरा की तेज़ धूप में भी तिश्नगी तो थी
पर हिज्र में सावन के महीने से कम रही

ताउम्र मैं ख़ुशी की शक्ल भूल न पाया
आफ़त भी मेरे पास क़रीने से कम रही

✍️ चिराग़ जैन

महंगा क्षण

आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया
आज समझ आया चूड़ी बिन
कैसे कंगन जी पाया

जिस पल मथुरा का आकर्षण वृंदावन से ज़्यादा था
कर्तव्यों का मोह किसी को अपनेपन से ज़्यादा था
निर्णय ले बैठा निर्मोही, बिरहन याद नहीं आई
दाँतों ने अधरों को काटा, नयनों में लाली छाई
आज तुम्हारा निर्णय सुनकर
राधा का मन जी आया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया

राघव स्वयं नहीं सक्षम थे, जो सच्चाई कहने में
वैदेही पर क्या बीती थी, वो सच्चाई सहने में
जब लक्ष्मण वन में ले जाकर, सीता को बतलाते हैं
उस पल सिय के मन में क्या क्या, भाव उमड़कर आते हैं
पाँव जमे, आँखें पथराईं
ख़ुद का तर्पण जी आया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया

आंधी से मिलकर जब अमुआ, बौर गिराने लगता है
तब सहमी सहमी कोयल का, मन घबराने लगता है
अब समझा जब कोहरे में छुप सूरज को बिसराते हैं
तब इन हरियाले पेड़ों से पत्ते क्यों झड़ जाते हैं
आज अचानक मैं मन ही मन
रूठा सावन जी पाया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी पाया

✍️ चिराग़ जैन

एयर इण्डिया

बादलों के बीच तैरता
भारतीयता का रिवाज़ देखिए
आइए साहब
एयर इंडिया का जहाज देखिए

जब ये जहाज उड़ता है ना आसमान में
तो यह अकेला नहीं उड़ता
इसके साथ उड़ती हैं
हज़ारों आँखों की आशाएं
सुरक्षा की सारी परिभाषाएं
किसी की प्रतीक्षा से किया गया वादा
किसी का जीवन बचा लेने का इरादा
किसी का सपना पूरा करने की चाह
किसी का कॅरियर बना देने की परवाह
इस जहाज को
हम भारतीयों ने अपने श्रम से पोसा है
यह जहाज हर मंज़िल पर
सुरक्षित पहुँचने का भरोसा है

जब कोई विदेश जाता है इस जहाज से
तो यात्रा में उसको
अपनत्व का परिवेश मिलता है
विदेश की धरती पर कदम रखने से
एक क्षण पहले तक
उसे आसपास अपना देश मिलता है

सिपाही को मोर्चे पर पहुँचाना हो
आपदा के समय पर
मानव धर्म निभाना हो
मुसीबत में फँसे अभागों की
मदद का सवाल हो
बाढ़ हो, सूनामी हो,
अकाल हो या भूचाल हो
एयर इंडिया का जहाज
हर समय तैनात रहता है
हर मुश्किल में
अपने देशवासियों के साथ रहता है

भीतर झाँको
तो यात्रा की थकान के बीच
सुकून भरी निंदिया है
बाहर से देखो तो
आसमान के माथे पर
सजावटी बिंदिया है
जी साहब
ये एयर इंडिया है
जी हुज़ूर
ये एयर इंडिया है

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!