Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
वरदान दे दे मुझे छंद-गीत-कविता का,
वाग्देवी तेरा उपकार मांगता हूँ मैं
रंग-ओ-तरंग तेरे संग से मिलेगा मुझे,
जीवन में तेरे सुविचार मांगता हूँ मैं
मृदु-सौम्य-भावपूर्ण वाणी बोलने के लिए
वाणी तेरे सभ्य-संस्कार मांगता हूँ मैं
वाणी का वरद् सुत बन के जिऊँ मैं यहाँ,
हंसवाहिनी ये अधिकार मांगता हूँ मैं
शारदे, दे ऐसा वरदान कि मुखर करे
पीड़ितों के दिल की पुकार मेरी कविता
जहाँ सच मौन की घुटन में सिसकता हो,
वहाँ बन जाए ललकार मेरी कविता
यौवनों में डोले बन प्यार मेरी कविता; औ
पीढ़ियों में घोले संस्कार मेरी कविता
निराशा औ तेजहीनता की सूखी धरती पे
बने आशाओं की जलधार मेरी कविता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
उनकी बातों में इक इबारत है
उनसे मिलना भी इक इबादत है
इस ज़मीं के ख़ुदा हैं वो बन्दे
जिनके दिल में कहीं मुहब्बत है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
ज्वार भावनाओं का जो मन में उमड़ता है,
तब आखरों का रूप धरती है कविता
आस-पास घट रहे हादसों की कीचड़ में
कुमुदिनी बन के उभरती है कविता
प्रेयसी के रूप में सँवरती है कविता; औ
शहीदों की अरथी पे झरती है कविता
लोग मानते हैं काग़जों पे लिखी जा रही है,
कवि जानते हैं कि उतरती है कविता
‘रश्मिरथी’ में ‘रेणुका’ में ‘सामधेनियों’ में
दिनकर बन के दमकती है कविता
सूर, रसख़ान जैसे साधुओं में बसती है,
निराला की ‘बेला’ में झलकती है कविता
कभी घुंघरुओं में ख़नकती है कविता; औ
कभी ‘मधुशाला’ में छलकती है कविता
कभी महादेवी-सा बिरह झेलती है; कभी
आँसुओं की धार में ढलकती है कविता
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
अपने आप से दूर हो रहे लोग
इंसानियत से अधिक आवश्यक हो रहे भोग
अदालतों में टूटता भाई-बहन का प्यार
अस्सी साल की नारी का बलात्कार
पश्चिम की धुनों पर थिरकता यौवन
चुनाव-दर-चुनाव बढ़ता प्रलोभन
बेटियों को बेचकर ख़रीदा गया राशन
धर्ममंचों से पढ़ा जा रहा राजनैतिक भाषण
स्कूलों के सामने चाय बनाते बच्चे
धर्म के नाम पर उड़ते मानव के परखच्चे
केसर-क्यारी में पलते धतूरे के पेड़
मेमनों को खाती हुई मांसाहारी भेड़
मुस्कुराना भूल चुके आदमी के होंठ
हर आँख में तैरती निकृष्टता की खोट
राह चलती नारियों का तन घूरती आँखें
फ़ैशन की होड़ में उघड़ी हुई काँखें
हर मस्तिष्क में पनप रही भ्रष्टाचारी दानवता
सिद्ध करती है कि मर रही है
पर ध्यान रखो, मानवता मर रही है, मरी नहीं है
अभी इसने आख़िरी हिचकी भरी नहीं है
हम चाहें तो इसे मरने से बचा सकते हैं
इसकी डूबती हुई साँसों को वापिस ला सकते हैं
इस बुझते हुए दीये को फिर से जलाना होगा
फिर से परोपकार का एक बाग़ लगाना होगा
फिर से चरण-स्पर्श की परम्परा लानी होगी
हर बोली में मिठास की फ़सल उगानी होगी
फिर आदमी को देख आदमी खिलखिला उठेगा
अर गली में प्रेम का सिलसिला उठेगा
फिर से विद्यार्थी किताबों में झाँकेगा
फिर से यौवन विवेकानन्द के पीछे भागेगा
फिर से बेटा, बाप को ‘पिताजी’ कहेगा
फिर दो बेटों का बाप, वृद्धाश्रम में नहीं रहेगा
फिर से बच्चे, बड़ों का आदर करेंगे
जवान बेटे, बूढ़े बाप की आँखों से डरेंगे
फिर भाई के मरने पर भाई दिल से रोयेगा
फिर प्यार की घाटी में कोई नफ़रत न बोयेगा
फिर भाषणों में झूठ नहीं बोला जायेगा
नारी आश्रम के नाम पर वेश्यालय नहीं खोला जायेगा
फिर से नारी अंग ढँक कर चलेगी
फिर हर आँख में नारी के लिये इज़्ज़त पलेगी
फिर हर युगल को गंदी निगाहों से नहीं देखेंगे
फिर दिल के तालाब में सब प्यार के कंकर फेंकेंगे
जिस दिन मानव की मृत्यु से मानव के दिल पर चोट आयेगी
उस दिन मानवता की डूबती हुई साँस लौट आयेगी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
डरी-सहमी पत्नी
और तीन बच्चों के साथ
किराए के मकान में
रहता है रिक्शावाला।
बच्चे
रोज़ शाम
खेलते हैं एक खेल
जिसमें सीटी नहीं बजाती है रेल
नहीं होती उसमें
पकड़म-पकड़ाई की भागदौड़
न किसी से आगे
निकलने की होड़
न ऊँच-नीच का भेद-भाव
और न ही
छुपम्-छुपाई का राज़
….उसमें होती है
”फतेहपुरी- एक सवारी“ की आवाज़।
छोटा-सा बच्चा
पुरानी पैंट के पौंचे ऊपर चढ़ा
रिक्शा का हैंडिल पकड़
ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाता है,
और छोटी बहन को
सवारी बना
पिछली सीट पर बैठाता है
…थोड़ी देर तक
उल्टे-सीधे पैडल मारने के बाद
अपने छोटे-काले हाथ
सवारी के आगे फैला देता है
नकली रिक्शावाला
पूर्व निर्धारित
कार्यक्रम के अनुसार
उतर जाती है सवारी
अपनी भूमिका के साथ में
और मुट्ठी में बँधा
पाँच रुपये का नकली नोट
(जो निकलता है
एक रुपए के सौंफ के पैकिट में)
थमा देती है
नकली रिक्शावाले के हाथ में।
तभी खेल में
प्रवेश करता है तीसरा बच्चा;
पकड़ रखी है जिसने
एक गन्दी-सूखी लकड़ी
ठीक उसी तरह
…ज्यों एक पुलिसवाला
डँडा पकड़ता है।
मारता है रिक्शा के टायर पर
फिर धमकाता है उसे
पुलिसवाले की तरह;
और छीन लेता है
नकली बोहनी के
नकली पैसे
नकली रिक्शावाले से
नकली पुलिसवाला बनकर
असली पुलिसवाले की तरह।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
हम क़लम थामकर सोचते रह गए
भाव आँसू बने, आँख से बह गए
इक ग़ज़ल काग़ज़ों पर उतर तो गई
दर्द दिल के मगर अनकहे रह गए
✍️ चिराग़ जैन