Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
एक जन्म की साधना
या तपस्या कुछ रातों की
व्यक्ति को नहीं बनाती है कवि।
कविता के रूप में
शब्दों को संजाने के लिये
करनी पड़ती है तपस्या जन्मों तक
तब कहीं जाकर
कठिनाई से जन्मता है कवित्व।
जानते हो?
कवि के सामने रखी दवात में
नहीं होती है स्याही
ख़ून होता है।
वही ख़ून
जो जलता है स्वयं
कविता के सृजनार्थ
स्वैच्छिक।
और जब कवि
उस दवात में
चिंतन की क़लम डुबोकर
अभिव्यक्तियों का शब्दचित्र उतारता है ना
काग़ज़ पर
तब उसे मिलती है
‘संतुष्टि’!
जिसे पाकर
वह स्वामी बन जाता है
बैकुण्ठ का!
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
क्या आपने
हिन्दुस्तान को देखा है
ग़रीबी से सिसकती जान
और भूख से निकलते प्राण को देखा है?
…ज़रूर देखा होगा
बरसात में फुटपाथ पर भीगता हुआ हिन्दुस्तान
जिसे पास भीगने को सिर है
पर छिपने को घर नहीं है।
जिसने अपने चीथड़ों के
एक-एक रेशे को
उधड़ते हुए देखा है।
क्या आपने हिन्दुस्तान को देखा है?
…देखा होगा!
वह हिन्दुस्तान
जो बनकर एक युवक
परेशान;
भटक रहा है दफ़्तर-दर-दफ़्तर
नौकरी की तलाश में
जिसके एक हाथ में
फाइल है डिग्रियों की
और दूसरे हाथ में
दिए गए साक्षात्कारों का लेखा है।
क्या आपने हिन्दुस्तान को देखा है?
…देखा होगा!
रेल-लाइन के दोनों ओर
दूर तक फैले हुए खेत
गरम हवाओं के साथ उड़ती हुई रेत
गरमी में आग की बरसात
और खेत में फावड़ा चलाते हुए
दो नन्हें-नन्हें
प्यारे-प्यारे
छोटे-छोटे हाथ।
जो ऊपर से काले पड़ गए हैं।
जिनमें फावड़ा उठाने के कारण
बड़े-बड़े छाले पड़ गए हैं।
जिन्हें विद्या से कोई सरोकार नहीं
जिन्हें किताबों से कोई प्यार नहीं
जिन्हें किताबें पढ़ना आता नहीं
जिन्हें डाँटकर, मारकर, फटकार कर
या प्यार कर
कोई पढ़ाता नहीं।
जो आपके पड़ोस में
चाय की दुकान पर कप-प्लेट धोते हैं
जो गाँव से आई
माँ-बाबा की पाती को देखकर
अपनी निरक्षरता पर फूट-फूटकर रोते हैं।
जिनके हाथों में मात्र
ग़रीबी, मजदूरी, अत्याचार
और चायवाले की मार की रेखा है।
क्या आपने हिन्दुस्तान को देखा है?
…ज़रूर देखा होगा!
लालकिले की प्राचीर के आसपास
भागीरथी के तीर के आसपास
कलकत्ते के गलियारों में
नैनीताल की बहारों में
बाड़मेर की जलन में
सियाचीन की गलन में
अयोध्या के विवाद में
गुजरात-अहमदाबाद में
साम्प्रदायिक दंगों में
भाई-भाई की जंगों में
लोकसभा के दंगल में
वीरप्पन के जंगल में
इक मजबूर भिखारी को
बलात्कार की मारी को
घर से निकले बाप को
नित-नित बढ़ते पाप को
राम रूप में रावण को
घर-घर में दुःशासन को
मरते हुए ज़मीर को
पिटते हुए फकीर को
रोते हुए ईमान को
लुटते हिन्दुस्तान को
रोज़ आपने देखा है
पर ये सोचा नहीं कभी
रक्त हमारा पानी है
क्या हम हिन्दुस्तानी हैं?
✍️ चिराग़ जैन
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महावीर मुसलमान थे।
क्योंकि उनके पास मुकम्मल ईमान थे।
महावीर सिख थे।
क्योंकि वे सितम करने से ख़बरदार करते थे।
महावीर हिन्दू थे।
क्योंकि वे हिंसा से दूर थे
और सब जीवों से प्यार करते थे।
महावीर पारसी थे।
क्योंकि उनमें
संसार के पार देखने की क्षमता थी।
महावीर आर्यसमाजी थे।
क्योंकि उनमें सत्य के प्रति ममता थी।
हाँ, महावीर बुद्ध थे।
क्योंकि उनके उसूल दुर्बुद्धि के विरुद्ध थे।
…और हाँ!
महावीर ईसाई भी थे
क्योंकि वे इंसानियत के साईं भी थे।
लेकिन, महावीर जैन नहीं थे।
…क्योंकि उनकी वाणी में
हमारी जिव्हा की तरह कटु बैन नहीं थे;
उनके हृदय में
श्वेताम्बर-दिगम्बर का झगड़ा न था;
उनके अन्तस् में
बीस और तेरह का रगड़ा न था;
वे नियम थोपते नहीं थे;
वे हिंसा रोपते नहीं थे;
वे नित नए धर्म गढ़ते नहीं थे;
वे लकीर के फ़क़ीर बनकर
लड़ते नहीं थे;
वे हमारी तरह ढोंगी नहीं थे;
वे दिन के जोगी
रात के भोगी नहीं थे;
वे तो आडम्बरों के बिन थे
सचमुच……..
मेरे महावीर जैन नहीं थे
….’जिन’ थे।
✍️ चिराग़ जैन
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ज्ञानसिंधु वीतरागी हित-उपदेषी हैं जो
ता की करो पूजा नित प्रति अष्ट द्रव्य से
पंच-महाव्रतों का जो बाना पहन के चलें
ऐसे गुरुओं की सेवा करो जीव भव्य रे
जिन की जो वाणी जिनवाणी का मनन करो
संयम का पालन बनाओ बस लक्ष्य रे
व्रत-उपवास करो नितप्रति दान करो
तब ही चिराग कहलाओगे सुसभ्य रे
✍️ चिराग़ जैन
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क्षमा को भुलाओ नहीं मति भरमाओ नहीं
घाव को कुरेदोगे तो ख़ून बह जाएगा
जो हुआ सो भूल जाओ आज में सुधार लाओ
निज को संवारे वही वीर कहलाएगा
अम्बर को छोड़ के दिगम्बर को ओढ़ ले तो
धन्य तेरी जननी का क्षीर कहलाएगा
समता का भाव धरे काऊ से ना राग करे
तब ही ‘चिराग’ महावीर कहलाएगा
✍️ चिराग़ जैन