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अनुचर

क़लम भी
कुछ कम नहीं है
कुदाल से।

…शायद
कुछ गहरी ही
चोट करती हो।

और यथार्थ
…यथार्थ तो
दास मात्र है
विचार का।

अनुचर है बेचारा
हाथ बांधे चलता है
विचार के पीछे-पीछे।

हिम्मत नहीं
कि एक क़दम भी
आगे निकल जाए!

…अवलम्बन चाहिए ससुरे को
विचार का।
✍️ चिराग़ जैन

भारतवर्ष की ख़ुश्बू

मेरे भारत के हर ज़र्रे में है संघर्ष की ख़ुश्बू
हर इक संघर्ष से उठती है पावन हर्ष की ख़ुश्बू
जो अपने मुल्क़ की मिट्टी से कोसों दूर बैठे हैं
अभी भूले नहीं वो लोग भारतवर्ष की ख़ुश्बू
✍️ चिराग़ जैन

जमुना-कवि संवाद

कल मैंने जमुना से पूछा-
“जमुना रानी!
क्यों करती हो यूँ मनमानी
कहाँ से लाई हो इतना
विध्वंसक पानी!”

जमुना बोली-
“ये पानी?
ये पानी न बारिश का है
न नदियों-नालों का है
ये पानी तो दिल्ली के सरकारी घोटालों का है।

ये जो मेरे तटबंधों की
चढ़ती हुई जवानी है
ये सारा सरकारी आँखों से
उतरा हुआ पानी है।”
✍️ चिराग़ जैन

आज़ाद हो गए हैं

कुछ इस तरह के अपने हालात हो गए हैं
सपने सभी सुहाने, बर्बाद हो गए हैं
आब-ओ-हवा है ऐसी, दम सबका घुट रहा है
कुछ लोग कह रहे हैं- ‘आज़ाद हो गए हैं’
✍️ चिराग़ जैन

बाज़ारीकरण

किस क़दर हावी हुई हैं व्यस्तताएँ देखिए
कसमसा कर रह गईं संवेदनाएँ देखिए
स्वार्थ, बाज़ारीकरण और वासना की धुंध में
खो चुकी हैं प्रेम की संभावनाएँ देखिए
✍️ चिराग़ जैन

सही उत्तर

यूँ ही पूछ बैठी थीं तुम
‘मेरे बिना रह पाओगे?’
सुनकर
मेरे मस्तिष्क में
एकाएक कौंध गया एक और प्रष्न-
‘क्या तुम सही उत्तर सह पाओगी?’

…ख़ुद से उलझते-जूझते
अनायास ही
मेरे मुँह से निकल गया-
‘नहीं!’

…और तुमने
इसे अपने प्रश्न का
उत्तर समझ लिया।

✍️ चिराग़ जैन

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