अनकहा
सदियों से
तलाश रहा हूँ
एक ऐसा श्रोता
जो सुन सके
मेरी कविताओं का वह अंश
जो मैंने कहा ही नहीं
क्योंकि
‘बहुत कुछ’
कह देने की संतुष्टि से
कहीं बड़ी है
बेचैनी
‘कुछ’ न कह पाने की
✍️ चिराग़ जैन
सदियों से
तलाश रहा हूँ
एक ऐसा श्रोता
जो सुन सके
मेरी कविताओं का वह अंश
जो मैंने कहा ही नहीं
क्योंकि
‘बहुत कुछ’
कह देने की संतुष्टि से
कहीं बड़ी है
बेचैनी
‘कुछ’ न कह पाने की
✍️ चिराग़ जैन
आस का दामन छूट गया
लगा मुक़द्दर फूट गया
फिर से पलकें भीग गईं
लो फिर से दिल टूट गया
पहले भी कई बार हुआ
मन में ग़ज़ब ख़ुमार हुआ
नैनों में सपने उभरे
और ये दिल लाचार हुआ
अब फिर वही कहानी है
हालत वही पुरानी है
अमृत पीना चाहा तो
भीतर कड़वा घूंट गया
प्यार हुआ तो पीर मिली
सबको ये तक़दीर मिली
कब लैला को क़ैस मिला
कब रांझे को हीर मिली
सबका ये अफ़साना है
क़िस्सा वही पुराना है
कहीं ज़माने की ज़िद थी
किसी से दिलबर रूठ गया
जीवन एक कहानी है
दुनिया आनी-जानी है
फिर भी गर दिल रोए तो
ये इसकी नादानी है
नादानी क्यों करता है
क्यों सपनों पर मरता है
जीवन भर का सच बाक़ी
पल दो पल का झूठ गया
✍️ चिराग़ जैन
प्रेम में प्राप्ति की जब चली बात तो
पीर सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् हो गई
दर्द सहने की ताक़त बची है मगर
दर्द कहने की ख़्वाहिश ख़तम हो गई
वेदना प्राण में कुलबुलाती रही
देह व्यापार में ही फँसी रह गई
एक लावा रगों में पिघलता रहा
होंठ पर शेष सूखी हँसी रह गई
भीड़ में बेसबब मुस्कुराना पड़ा
जब अकेला हुआ आँख नम हो गई
कब सफलता का पूरा भरोसा रहा
कब विफलता की मन में हताशा रही
नींद जब भी नदारद हुई आँख से
मूल कारण महज एक आशा रही
दीप के प्राण पल-पल सुलगते रहे
हर घड़ी एक उम्मीद कम हो गई
✍️ चिराग़ जैन
जिस सपने से डर लगता था
उसको ही साकार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
मैं कहता हूँ- ‘तुम चाहो तो अब भी परिवर्तन संभव है
स्थितियों का अपने हित में फिर से संयोजन संभव है’
तुम कहती हो- ‘छोड़ो भी अब, सारा सोच-विचार कर लिया’
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
तुम कहती हो- ‘इतना समझो, ऐसा ही ये जीवन मग है
अपना साथ यहीं तक का था, आगे अपनी राह अलग है’
इतनी आसानी से तुमने जब ख़ुद को तैयार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
‘अपना क़िस्सा ख़ास नहीं है, ऐसा तो सौ बार हुआ है
जब संवेदी मन पर हालातों का निष्ठुर वार हुआ है’
आज तुम्हारी इन बातों का मन ही मन सत्कार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
करता हूँ मनुहार अगर मैं तो तुम झुंझलाने लगती हो
स्वर ऊँचा करके मन की सच्चाई झुठलाने लगती हो
ज्ञात मुझे है, तुमने ऐसा क्यों अपना व्यवहार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
तुम पर मैं अधिकार जताऊँ, ऐसे तो हालात नहीं हैं
मेरे गीतों में तुम उतरो, अब ये अच्छी बात नहीं है
मन के अहसासों का मैंने, सीमित अब संसार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
‘व्यवहारिकता की चैखट पर, भावुक होने से क्या होगा
दिल में पीर भरी है लेकिन, नयन भिगोने से क्या होगा’
-इन कड़वे तर्कों को मैंने जीवन का आधार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
वैसे तुम व्यवहारिक हो तो आँखों में गीलापन क्यों है
मेरे दुख को देख तुम्हारे मन में इतनी तड़पन क्यों है
अब तक सच के साथी थे, अब पर्दा भी इकसार कर लिया
लो मैंने स्वीकार कर लिया
अब तो ख़ुश हो…!
✍️ चिराग़ जैन
मैंने एक गोला बनाया
और फिर
उसे चार हिस्सों में बाँट दिया
तभी किसी ने कहा-
“इन चारों हिस्सों में
अलग-अलग रंग भरो”
…तब मुझे अहसास हुआ
कि नए रंग का
अपनी मर्यादा में रहना
तभी संभव है
जब पुराना रंग
अपनी सीमाओं में
पूरी तरह जम जाए!
✍️ चिराग़ जैन
कोई महज ईमान का जज्बा लिए जिया
कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिए जिया
टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ
इक शख्स सच के नाम पे क्या-क्या लिए जिया
जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब
तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिए जिया
था बेलिबास अपनी नज़र में हर एक शख्स
दुनिया के दिखावे को लबादा लिए जिया
रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर
ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिए जिया
इक वो है जिसे दौलते-शोहरत मिली सदा
इक मैं हूँ ज़मीरी का असासा लिए जिया
तुम पास थे या दूर थे, इसका मलाल क्या
मैं तो लबों पे नाम तुम्हारा लिए जिया
✍️ चिराग़ जैन