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तनाव की आदत

भली कहाँ है भला ये तनाव की आदत
ज़रा-सी बात से आँखों में ताव की आदत

हरेक राह से मंज़िल तलक़ पहुँचता है
नहीं चुनाव पे निर्भर बहाव की आदत

माँ ने चीज़ें भी सहेजी सदा रिश्तों की तरह
हमने अपनाई नहीं रखरखाव की आदत

कभी ये देश धड़ी में हिसाब करता था
सभी को पड़ गई है आज पाव की आदत

ख़ामोश रह के सबको पार लगा देती है
एक दिन नाव डुबोएगी नाव की आदत

भरा, बड़ा, नरम, लदा, उदार और भारी
इन्हीं में तो सदा दीखी झुकाव की आदत

✍️ चिराग़ जैन

ज़िन्दगी की शिक़ायत

उम्र भर मौत से भागते जो रहे
मौत आई तो बस मौत के हो गए
मेरे हर रोम में अपना अहसास भर
एक पल में पिया सौत के हो गए

एक ही पल में ये क्या से क्या हो गया
एक पल ज़िन्दगी से बड़ा हो गया
मौत को देखकर तुम पिघल से गए
और रुख़ ज़िन्दगी पर कड़ा हो गया
मौत ने छल किया? अपहरण कर लिया?
या सफल मौत के टोटके हो गए?

मौत ने कौन सा रस पिलाया कि फिर
ज़िन्दगी की तुम्हें याद आई नहीं
हाल तक पूछने की न कोशिश हुई
इतनी भी दुनियादारी निभाई नहीं
पीढ़ियाँ तुमको थाली चढ़ाती रही
और तुम मौत के गोत के हो गए

✍️ चिराग़ जैन

भावार्थ

इन दिनों
संदर्भ निंदा कर रहे हैं
विषय की भावार्थ से-
शब्द लट्टू हो गए
भाषा पे
या फिर व्याकरण पे
बोलियों के गेसुओं में फँस गया है मर्म
कुछ अलंकारों में सीमित हो गया कवि-कर्म
जटिल सा लगने लगा है
आजकल सरलार्थ
आँख मूंदे, मुस्कुराता
मौन है भावार्थ

✍️ चिराग़ जैन

वक़्त बीमार है

वक़्त बीमार है
Short term memory loss का पुराना मरीज़।

कुछ याद ही नहीं रह पाता इसको
लिख-लिख कर
मुश्क़िल से याद रख पाता है
बड़ी से बड़ी बात

मैंने अक्सर देखा है वक़्त को
अपनी ही लिखी पर्चियों के बीच
उलझे हुए

इतिहास की किताबों में
किसी क़िरदार की
सबसे सही पहचान तलाशते हुए

सुना है
वक़्त को धोखा देने के लिये
किसी ने जला डाली थीं
कुछ पर्चियाँ

…तब से
बौराया-सा फिर रहा है बेचारा!

✍️ चिराग़ जैन

बेचारा ईश्वर

मैंने देखा-
मूसलाधार बारिश में
भीग रही थी
ईश्वर की मूर्ति

मैंने सोचा-
थपेड़े भी सहती होगी
गर्म लू के
इसी तरह।

मैंने महसूस किया-
सर्दी-गर्मी-बरसात
नंगे बदन
कैसे खड़ा रहता है परमात्मा।

…और तब मैंने चाहा-
काश, कोई इसकी भी सुध ले!

भावना की डगर

भावना की डगर भी सहज तो नहीं
इस डगर पर स्वयं का तिरस्कार है
प्रेम जिससे किया वो परेशान है
और जिसने किया प्रेम, लाचार हैै

मन हुआ मुग्ध जिस पर, उसी शख़्स के
हर कथन को कथानक बनाता रहा
प्रियतमा के नयन की चमक को सदा
कर्म का एक मानक बनाता रहा
स्वार्थ की क्यारियों में समर्पण खिला
अब यहाँ तर्क की बात बेकार है

राह चलते हुए प्रेम का हादसा
कौन जाने, कहाँ, कब घटित हो गया
एक पावन लम्हा ज़िन्दगी से जुड़ा
तन निखरता गया, मन व्यथित हो गया
बस वही इक लम्हा, बस वही हादसा
बस उसी से सुखों का सरोकार है
✍️ चिराग़ जैन

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