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साँकल फँस गई है

सूर्य चलकर आ गया है देहरी तक
द्वार की साँकल इसी पल फँस गई है
भाग्य सब वैभव लुटाने को खड़ा है
किसलिए मुट्ठी इसी पल कस गई है

रंग-भू पर जब हुआ अपमान, तब ये आस रक्खी
एक दिन रणक्षेत्र में गाण्डीव भी दो टूक होगा
शर बताएंगे कभी जब गोत्र मेरी वीरता का
राजसी वैभव पगा जयघोष उस क्षण मूक होगा
जब समर में सामने है पार्थ मेरे
क्यों उसी पल भूमि ऐसे धँस गई है

क्या करे जीवट अगर हर आस दामन छोड़ जाए
लड़खड़ाती झांझरों का ताल से संबंध क्या है
ताश के घर से कई सपने संजोए पुतलियों में
धैर्य के क्षण का भला भूचाल से संबंध क्या है
ईश जाने कौन-सी दुर्भाग्य रेखा
आज जीवन रेख के संग बस गई है

✍️ चिराग़ जैन

देवता बहरा हुआ है

पूजने वाले का संकट और भी गहरा हुआ है
जब से वेदी पर विराजा, देवता बहरा हुआ है

हम अभागों के दुखों को देखकर रोया कभी जो
क्रांति की ज्वाला जगा कर फिर नहीं सोया कभी जो
ईश जाने उस हृदय पर कौन सा पहरा हुआ है
जब से वेदी पर विराजा, देवता बहरा हुआ है

आज तक जिसने सभी के पाँव से काँटे निकाले
और सब आदेश भूखों के लिए खुद फूंक डाले
अन्न का वितरण उसी के हुक्म पर ठहरा हुआ है
जब से वेदी पर विराजा, देवता बहरा हुआ है

खून की परवाह तजने का सबक दे साथियों को
वो बताता था कि तोड़ेगा बरसती लाठियों को
आजकल लाठी पे कपड़ा खून का फहरा हुआ है
जब से वेदी पर विराजा देवता बहरा हुआ है

✍️ चिराग़ जैन

इतना संयम रखना होगा

सुनो, झरोखा खोलो लोगो
जितना चाहो बोलो लोगो
लेकिन शर्त यही है केवल
पूछ पूछकर लखना होगा
पूछ पूछकर बकना होगा

बाहर कोई सत्य नहीं है
एक घिनौना चेहरा सा है
जिसको तुम बंधन कहते हो
वो तुम पर एक पहरा सा है
खूब खिलो, जी भर इतराओ
सारे आलम को महकाओ
जब तक कहें खिलो गुलशन में
जब हम कह दें तब झर जाओ
हर सुंदरता के प्रेमी को
इतना संयम रखना होगा
पूछ पूछकर तकना होगा

✍️ चिराग़ जैन

दिन निकलेगा

रात कटेगी, दिन निकलेगा
यह क्रम तो निर्धारित ही है
दिन इक दिन मुझ बिन निकलेगा
यह अनुमोदन पारित ही है

मैं इस भ्रम में जूझ रहा हूँ
मुझसे ही सब काज सधेंगे
पर दुनिया के लोग मुझे भी
दो ही दिन में बिसरा देंगे
विस्मृतियों के वरदानों पर
यह दुनिया आधारित ही है

चाहत, सपना, डर, उम्मीदें
प्रेम, प्रयास, प्रथा, यश-वैभव,
गर्व, विनय, संबंध, सृजन, सुख
हर्ष, विजय, सम्मान, पराभव
इन सब आभासी शब्दों पर
सृष्टि कथा विस्तारित ही है

✍️ चिराग़ जैन

विजय गान

गाँव के वटवृक्ष जिसकी झाड़ियाँ छूकर दुखी थे
अब नए बिरवे उसी कीकर को बाबा बोलते हैं
जिस मुहल्ले से निकलकर स्नान करना था ज़रूरी
आजकल अख़बार उन गलियों को क़ाबा बोलते हैं

ये नया अध्याय अब इस नस्ल को किसने पढ़ाया
कौन है जो पोखरों के नाम लिखता है रवानी
धूर्तता से ध्वस्त करके भीष्म का वैभव धनंजय
गुरुकुलों में बाँचता है आत्मश्लाघा की कहानी
कुछ पुराने लोग ये सच जानते भी हैं; मगर अब
हैं बहुत लाचार, अंगारे को लावा बोलते हैं

लिख रहे हैं आज जो इतिहास इक भीषण समर का
वे समर के वक्त डरकर छुप-छुपाते बच रहे थे
जब समय इनसे अपेक्षा कर रहा था वीरता की
ये कहीं बैठे हुए झूठी कहानी रच रहे थे
दो मवाली पीट आए थे कभी इक बेसहारा
पाठ्यक्रम इस बात को ‘दुश्मन पे धावा’ बोलते हैं

✍️ चिराग़ जैन

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