Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
पूजने वाले का संकट और भी गहरा हुआ है
जब से वेदी पर विराजा, देवता बहरा हुआ है
हम अभागों के दुखों को देखकर रोया कभी जो
क्रांति की ज्वाला जगा कर फिर नहीं सोया कभी जो
ईश जाने उस हृदय पर कौन सा पहरा हुआ है
जब से वेदी पर विराजा, देवता बहरा हुआ है
आज तक जिसने सभी के पाँव से काँटे निकाले
और सब आदेश भूखों के लिए खुद फूंक डाले
अन्न का वितरण उसी के हुक्म पर ठहरा हुआ है
जब से वेदी पर विराजा, देवता बहरा हुआ है
खून की परवाह तजने का सबक दे साथियों को
वो बताता था कि तोड़ेगा बरसती लाठियों को
आजकल लाठी पे कपड़ा खून का फहरा हुआ है
जब से वेदी पर विराजा देवता बहरा हुआ है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Naavik ke teer, Poetry
धृतराष्ट्रों को विदुरों की हर बात कसैली लगती है
दर्पण मैला हो तो सारी शक्लें मैली लगती हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सुनो, झरोखा खोलो लोगो
जितना चाहो बोलो लोगो
लेकिन शर्त यही है केवल
पूछ पूछकर लखना होगा
पूछ पूछकर बकना होगा
बाहर कोई सत्य नहीं है
एक घिनौना चेहरा सा है
जिसको तुम बंधन कहते हो
वो तुम पर एक पहरा सा है
खूब खिलो, जी भर इतराओ
सारे आलम को महकाओ
जब तक कहें खिलो गुलशन में
जब हम कह दें तब झर जाओ
हर सुंदरता के प्रेमी को
इतना संयम रखना होगा
पूछ पूछकर तकना होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
रात कटेगी, दिन निकलेगा
यह क्रम तो निर्धारित ही है
दिन इक दिन मुझ बिन निकलेगा
यह अनुमोदन पारित ही है
मैं इस भ्रम में जूझ रहा हूँ
मुझसे ही सब काज सधेंगे
पर दुनिया के लोग मुझे भी
दो ही दिन में बिसरा देंगे
विस्मृतियों के वरदानों पर
यह दुनिया आधारित ही है
चाहत, सपना, डर, उम्मीदें
प्रेम, प्रयास, प्रथा, यश-वैभव,
गर्व, विनय, संबंध, सृजन, सुख
हर्ष, विजय, सम्मान, पराभव
इन सब आभासी शब्दों पर
सृष्टि कथा विस्तारित ही है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
गाँव के वटवृक्ष जिसकी झाड़ियाँ छूकर दुखी थे
अब नए बिरवे उसी कीकर को बाबा बोलते हैं
जिस मुहल्ले से निकलकर स्नान करना था ज़रूरी
आजकल अख़बार उन गलियों को क़ाबा बोलते हैं
ये नया अध्याय अब इस नस्ल को किसने पढ़ाया
कौन है जो पोखरों के नाम लिखता है रवानी
धूर्तता से ध्वस्त करके भीष्म का वैभव धनंजय
गुरुकुलों में बाँचता है आत्मश्लाघा की कहानी
कुछ पुराने लोग ये सच जानते भी हैं; मगर अब
हैं बहुत लाचार, अंगारे को लावा बोलते हैं
लिख रहे हैं आज जो इतिहास इक भीषण समर का
वे समर के वक्त डरकर छुप-छुपाते बच रहे थे
जब समय इनसे अपेक्षा कर रहा था वीरता की
ये कहीं बैठे हुए झूठी कहानी रच रहे थे
दो मवाली पीट आए थे कभी इक बेसहारा
पाठ्यक्रम इस बात को ‘दुश्मन पे धावा’ बोलते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
एक विशेषण की चाहत में, संज्ञा का अपमान किया है
लाए को अनदेखा करके, पाए पर अभिमान किया है
अभिलाषा के रथ पर फहरी स्पर्धा की उत्तुंग ध्वजा है
लोभ बुझे तीरों से भरकर लिप्सा का तूणीर सजा है
अपना ही सुख खेत हुआ है, कैसा शर संधान किया है
जीवन को वरदान मिला है, श्वास किसी की दासी कब है
मीठे जल से ना बुझ पाए, तृष्णा इतनी प्यासी कब है
निश्चित की आश्वस्ति बिसारी, संभव का अनुमान किया है
मानव होना बहुत न जाना, जाने क्या से क्या बन बैठा
चोर, दरोगा, दास, नियामक और कभी धन्ना बन बैठा
ख़ुशियों का अमृत ठुकराकर, कुंठा का विषपान किया है
भोर न जानी, रैन न देखी, दिन भर की है भागा-दौड़ी
सुख के पल खोकर जो जोड़ी, छूट गई हर फूटी कौड़ी
अपने जीवन के राजा ने औरों को श्रम दान किया है
✍️ चिराग़ जैन