Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
आजकल मुझसे न पूछो, कब उगा सूरज गगन में
आजकल मैं प्रेम के इक ताल में उतरा हुआ हूँ
बुद्धि का मत है विकलता मौन से होगी नियंत्रित
किन्तु हर इक रोम अब वाचाल हो बैठा अचानक
अब गिरा या तब गिरा का एक कौतुक चल रहा है
मन मुआ मोती भरा इक थाल हो बैठा अचानक
भाग्य है जिसका चुभन स्वीकार कर शृंगार करना
आजकल मैं उस कढ़े रूमाल में उतरा हुआ हूँ
कल्पना शालीनता के छोर से आगे बढ़ी है
प्रेम मन की देहरी को लांघ तन पर छा रहा है
कनखियों से देख कर वो झट पलट लेती निगाहें
इस झिझक को देख मेरा मन प्रफुल्लन पा रहा है
दृष्टि मेरी भाँप कर वो ढाँपती जिससे स्वयं को
मैं अभी उस लाल ऊनी शाॅल में उतरा हुआ हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
देखकर तुमको
पुलककर खोल दूंगा द्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!
याद रखना, सर्द बर्फीली हवा से भागकर
तुम मधुर मनुहार के हर इक नियम को त्यागकर
छोड़ जाते हो कड़कती ठण्ड से बन स्वार्थी
बर्फ़ के वीरान जंगल में अकेला, बेसहारा
ये सभी कुछ भूलकर तुमसे मिलूंगा; मैं निरा ईश्वर नहीं हूँ।
फिर मिलेगा भक्ति का अधिकार
इस भ्रम में नहीं रहना!
जिन धमनियों और शिराओं की उफनती वीथियों में
तुम रवां करते रहे हो, रोज़ मंत्रोच्चार के संग
प्रेम के, अपनत्व के औ आस्था के दीप अनगिन
वे नसें जमने लगी हैं, बर्फ के नीचे सिमटकर
इस दफ़ा उनका पिघलना भी असंभव जान पड़ता है।
फिर उठेगा इन रगों में ज्वार
इस भ्रम में नहीं रहना!
सच कहो, यह प्रेम क्या बस स्वार्थ का दर्पण नहीं है
क्या तुम्हारा प्राथमिक उद्देश्य पर्यटन नहीं है
रोज़ इन दुर्गम पहाड़ों में
हवा जब इस घिनौने प्रेम का आकाश तक उपहास करती है
मैं अकेला सिर झुकाए, ढोंग के संबंध का बोझा उठाता हूँ
फिर छलोगे तुम मुझे इस बार
इस भ्रम में नहीं रहना!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
पगडण्डी को छूकर निकला राजमार्ग कुछ देर
त्यौरी पिघलीं, आँखें चमकीं, चिंता हो गई ढेर
तेज़ दौड़ते वीराने को भाया दृश्य सुहाना
चैपालों को हंसी-ठहाका, पनिहारिन का गाना
बूढ़ा बरगद, मीठी पोखर और पशुओं का घेर
मन में कितनी ठंडक उतरी, कैसे मैं बतलाऊँ
जब सूखी आंखों ने देखी, मटके वाली प्याऊ
होंठ नहीं गीले कर पाते फ्रिज से सेठ-कुबेर
पगडण्डी से चलकर आती हैं जब मस्त हवाएँ
राजमार्ग का मन करता है, यहीं कहीं बस जाएं
अमराई में खाट डाल कर सुस्ता लें कुछ देर
यूं तो कितनी शहरी सड़कें आगे-पीछे घूमें
हर आगे बढ़ने वाले को आगे बढ़कर चूमें
पगडण्डी चखकर लाई है मीठे-मीठे बेर
सड़क कभी इस राजमार्ग से मिले कभी उस मग से
पगडण्डी इक बार परस ले जिसको भी निज पग से
फिर मुश्किल है पैदा होना उसके मन में फेर
सड़क लांघ जाती है अक्सर राजमार्ग का सीना
पगडण्डी ने मर्यादा की सीमा कभी तजी ना
रोज़ सबेरे ले आती है पत्ते-फूल सकेर
सड़क विदा के समय अकड़ कर दूर चली जाती है
पगडण्डी सहमी-ठिठकी सी खड़ी नज़र आती है
राजमार्ग को ही जाना पड़ता है नज़रे फेर
मिला हाँफते राजमार्ग को ज्ञान यहाँ अलबेला
बहुत तेज़ जो दौड़ा इक दिन वो रह गया अकेला
काम सभी पूरे हो जाते थोड़ी देर-सबेर
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
आज कुछ अचरज नहीं है भाग्य के व्यवहार पर
पूर्णता आ ही नहीं सकती कभी इस द्वार पर
सख्त पहरा है
किसी पिछले जनम के पाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का
भावना से शून्य कैसे प्रार्थना होगी कहो ना
है बहुत दूभर विवशता लाद कर संबंध ढोना
रेत के घर क्यों सदा ही लहर की ज़द में रहे हैं
प्रश्न गहरा है
अर्थ क्या है बस उंगलियों पर सरकते जाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का
किसलिए सुख से सदा वंचित रही अच्छी कहानी
क्यों नयन की कोर पर है पीर का अनुवाद पानी
गीत की दारुण कथा सुन सृजन की पलकें सजल हैं
अश्रु ठहरा है
क्यों हुआ निःशब्द जीवन गीत के आलाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का
जब हथेली की लकीरों से उलझना हो अकारण
कुण्डली में मिल न पाए गृहदशाओं का निवारण
जिस खगोली पिण्ड ने जीवन अंधेरा कर रखा है
वह सुनहरा है
रंग क्या देखूँ नियति से जुड़ चुके अभिशाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
बिन मतलब का अहम् कभी जब
बिन मतलब जिद से टकराया
ऐसा भीषण गर्जन गूंजा
संबंधों का दिल घबराया
स्नेह सहमकर स्तब्ध हुआ था
प्रेम घरौंदा ध्वस्त हुआ था
छितराए सुख के सब बादल, लुप्त हुईं स्नेहिल बौछारें
विश्वासों की उर्वर भू पर, उभरीं अनगिन शुष्क दरारें
मन में उपजे एक अहम् ने परिचय की अनदेखी कर दी
जिन पर था अधिकार उन्होंने अनुनय की अनदेखी कर दी
वैरी सा व्यवहार हुआ है
हृदय विराजित भद्र जनों का
राह बनाती पतवारों से
खुद ही लड़ बैठी है नौका
क्लेश सुखों को लील चुका है
द्वेष हृदय को कील चुका है
जो सम्बन्ध नहीं डिग पाए, दुनिया भर के आघातों से
वे दो टूक हुए क्षण भर में, कुबड़ी दासी की बातों से
प्रतिशोधों के आकर्षण ने परिणय की अनदेखी कर दी
जिन पर था अधिकार उन्होंने अनुनय की अनदेखी कर दी
इतना ज़्यादा मान मिला है
पल भर में घिर आए रण को
याद नहीं कर पाया कोई
साथ बिताए मोहक क्षण को
कोई साधन काम न आया
संशय ने सिंहासन पाया
दिल का अवध उजाड़ हुआ है, अपनापन जा बैठा वन में
दशरथ श्वास नहीं ले पाए, महलों के एकाकीपन में
एक चुभन ने यादों के संग्रहालय की अनदेखी कर दी
जिन पर था अधिकार उन्होंने अनुनय की अनदेखी कर दी
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
ओ रे बदरा बरस
बन के सावन सरस
राह धरती ने कबसे तकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की
हल ने काटी चिकौटी बहुत
पर धरा में नमी ही न थी
ख़ूब टपका पसीना मगर
प्यास में कुछ कमी ही न थी
प्रश्न बढ़ते रहे
हल सिसकते रहे
एड़ियाँ फट गईं खेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की
हिमशिखर का धवल कारवां
कौन जाने कहाँ लुट गया
पर्वतों पर लकीरें बनीं
और झरनों का दम घुँट गया
स्रोत सूखे सभी
घाट रूखे अभी
हर नदी हो गई रेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की
गीत बरखा नहाने चला
तो पसीना-पसीना हुआ
प्रीत जिस डाल पर झूलती
उसका हर पात झीना हुआ
गुलमुहर झर चुका
नीम का सर झुका
हाय मुरझा गई केतकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की
जब तू आया तेरी राह में
घास का इक गलीचा सजा
मेंढ़कों ने धमक छेड़ दी
पत्तियों पर तराना बजा
फूल के संग झरी
नीम ने रसभरी
इक निम्बोली तुझे भेंट की
प्यास तू ही बुझा जेठ की
✍️ चिराग़ जैन