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गाँव के वटवृक्ष जिसकी झाड़ियाँ छूकर दुखी थे
अब नए बिरवे उसी कीकर को बाबा बोलते हैं
जिस मुहल्ले से निकलकर स्नान करना था ज़रूरी
आजकल अख़बार उन गलियों को क़ाबा बोलते हैं

ये नया अध्याय अब इस नस्ल को किसने पढ़ाया
कौन है जो पोखरों के नाम लिखता है रवानी
धूर्तता से ध्वस्त करके भीष्म का वैभव धनंजय
गुरुकुलों में बाँचता है आत्मश्लाघा की कहानी
कुछ पुराने लोग ये सच जानते भी हैं; मगर अब
हैं बहुत लाचार, अंगारे को लावा बोलते हैं

लिख रहे हैं आज जो इतिहास इक भीषण समर का
वे समर के वक्त डरकर छुप-छुपाते बच रहे थे
जब समय इनसे अपेक्षा कर रहा था वीरता की
ये कहीं बैठे हुए झूठी कहानी रच रहे थे
दो मवाली पीट आए थे कभी इक बेसहारा
पाठ्यक्रम इस बात को ‘दुश्मन पे धावा’ बोलते हैं

✍️ चिराग़ जैन

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