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विभक्त

सृजन की जाह्नवी
विभक्त होकर भी
गंगा ही रहेगी।

तुम देखना
उन्मुक्त बहती संवेदना से
विभक्त होती धार
मोक्षदायिनी होकर पुजेगी
…हर की पौड़ी पर।

कविता से विभक्त काव्यांश
सूक्ति हो जाते हैं
और श्लोक से विभक्त वर्ण
मंत्र बन जाते हैं।

एक सृजन ही तो है
जहां विभक्तियां
धातुओं को अर्थ की
पहचान देती हैं।

✍️ चिराग़ जैन

प्यार का सम्प्रेषण

चीखने से
शोर बढ़ता है
सम्बन्ध नहीं।

सुकून की खटिया
बुनी जाती है
सहजता की बाण से;
इसमें प्रयास की गाँठें हों
तो मुक्त नहीं हो सकती नींद
चुभन से!

जताना
और बताना
व्यापार में होना चाहिए
व्यवहार में नहीं।

और प्यार में…
…वहाँ तो
आँखें मिलते ही
फिफ्थ गीयर लग जाता है
धड़कनों में!
ओंठ व्यस्त रहते हैं
कँपकँपाने और मुस्कुराने में।

शब्द और आवाज़
केवल शोर हैं
प्यार के सम्प्रेषण में।

✍️ चिराग़ जैन

ज़िन्दगी: एक लड़की

जिन्दगी
एक खूबसूरत लड़की है
इसकी प्रशंसा करोगे
तो ये चहक उठेगी।
इसे एकटक निहारोगे
तो इसके मुखड़ा सज उठेगा
हया के रंग से।
इसे अनदेखा करोगे
तो ये उदास हो जाएगी।
इसे कोसोगे
तो चुपके से
दूर चली जाएगी तुमसे।

बहुत प्यारी है रे जिन्दगी
इसे चहकने दो,
इससे मुस्कुरा कर मिलो
कभी कचमचा कर
चूम लोगे इसे
तो झूम उठेगी
इसकी चिरौरी करो
इसे चिकौटी काट लो

…लेकिन कोसना मत इसे कभी
कुम्हला जाएगी बेचारी।

✍️ चिराग़ जैन

पर्यावरण के नाम पर

विकासवादियो!
पर्यावरण के नाम पर
मुट्ठी न भींचो,
तुमसे किसने कहा है
कि दुनिया के भले के लिए
कोई पेड़ सींचो?
तुम तो अपनी बालकनी में
तुलसी का इक पौधा लगा लो
और अपने परिवार के लिए
थोड़ी सी सांसें उगा लो।
मत सोचो
कि किस तरह बचाई जाए
दादी नानी की कहानी,
पर ये तो विचार करो
कि तुम्हारे नौनिहाल
कहाँ से पिएंगे
साफ-शुद्ध पानी।
माना
कि तुम्हारी विकास उगलती फैक्ट्रियां
नहीं रोक सकती
काला जहरीला धुआँ,
लेकिन बचाई तो जा सकती है नदी
सहेजा तो जा सकता है कुआँ।
हमारी पढ़ी लिखी सोसाइटी से
ज्यादा समझ थी
पिछले जमाने के असभ्य-अनपढ़ों में
जो जानते थे
कि स्वस्थ भविष्य के बीज छुपे हैं
पीपल और बरगद की जड़ों में।
आओ
विकास और विनाश के बीच
एक स्पष्ट रेखा खींच आएं
आओ
स्मार्ट सिटी की ग्रीन बेल्ट पर लगे
गुलमोहर को सींच आएं।

✍️ चिराग़ जैन

शिक्षा की रौशनी

पहाड़ की
घुमावदार पगडंडी पर
स्कूल जा रही हैं लड़कियाँ।
…मतलब
बचपन में हमें ग़लत पढ़ाया गया था
कि रौशनी
सीधी रेखा में ‘ही’ यात्रा करती है।
✍️ चिराग़ जैन

प्रतिशोध

ओ धोबी
सच बताना
क्या तुम्हारे पुरखे भी गए थे
राम के पीछे-पीछे
विह्वल होकर
वनवास की हठ लिए

या फिर
तुम ही चले आए थे
राम के पीछे-पीछे
लंका से
प्रतिशोध लेने

© चिराग़ जैन

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