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शब्द शिव हैं

शब्द शिव हैं। जब कभी बहती है भावना उद्विग्न हो मन के भीतर से तो उलझा लेते हैं उसे व्याकरण की जटाओं में। रोक देते हैं उसका सहज प्रवाह। सीमित कर देते हैं उसकी क्षमताएँ। कविता वेग है आवेग है उद्वेग है। वो तो शब्दों ने उलझा लिया वरना, बहा ले जाती सृष्टि के सारे कचरे को।...

सपनों का कॅनवास

मैं खुली आँखों से एक सपना देखता था अक्सर। बनाता था इक तस्वीर अपनी ख़्वाहिशों की। न जाने कब उभर आया एक मुकम्मल इंसान मेरे मन के कॅनवास पर। न जाने क्यों मैंने रख दिया अपना दिल बिना सोचे-समझे इस इंसान के सीने में …तुम केवल एक रिश्ता नहीं हो मेरे लिए तुम मेरे सपनों...

समाधान

बहुत समझदार हो तुम! जब कभी उदासी का आँचल ओढ़कर जवान होने लगता है मेरा कोई दर्द तो चुपचाप बिना किसी शोर-शराबे के कंधा देकर …पहुँचा आते हो उसे वहाँ …जहाँ से लौट नहीं पाया कोई आज तक! ✍️ चिराग़...

कोशिश

मैं ‘मन’ लिखने की कोशिश करता हूँ ….सिर्फ़ कोशिश। कभी इसका मन कभी उसका मन कभी सबका मन …और कभी-कभी अपना भी मन। इतना ही समझ आता है मुझे कि ‘कोशिश’ और ‘कामयाबी’ उर्दू ज़ूबान के दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं! ✍️ चिराग़...

अनदेखी

देर तक देखता रहा मैं एक बिन्दु को आशा भरी नज़रों से लगातार। उतनी ही देर तक तकती रहीं दो आँखें छलछलाती हुईं मुझे भी! ✍️ चिराग़...

महत्व

तुमसे मिलना… …जैसे हाई-वे पर दौड़ती गाड़ी दो पल को ठहरे किसी पैट्रोल पम्प पर। …जैसे परवाज़ की ओर बढ़ता परिंदा यकायक उतर आए धरती पर पानी की चाह में। …जैसे बहुत लंबी मरुथली यात्रा के दौरान हरे पेड़ की छाँव! ✍️ चिराग़...
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