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चंद्रग्रहण

कई रोज़ से देख रहा था
कि बादल के आगोश से निकल कर
और ख़ूबसूरत लगता था चाँद
और बढ़ जाती थी उसकी चमक
जैसे किसी ने फेशियल कर दिया हो
प्यार का!

लेकिन कल रात
तमतमाया हुआ था चाँद का चेहरा
शोले टपक रहे थे उसकी आँखों से
क्योंकि कल रात
जिस साये ने जकड़ लिया था चाँद को
उसकी छुअन में प्यार नहीं
सिर्फ़ ज़िद्द थी
किसी नफ़रत
किसी चिढ़
या किसी जलन से भरी
…..एक वहशी ज़िद्द!

और ज़िद्द
मुँह तो काला कर सकती है
पर मन हरा नहीं कर सकती
मौसम ग़ुलाबी नहीं कर सकती!

✍️ चिराग़ जैन

मित्रता

सुदामा जैसा मित्र मुझे नहीं चाहिए
जो बचपन में मित्र के हिस्से के चने खा गया
और जवानी में मित्रता का हिस्सा मांगने आ गया

कृष्ण जैसा मित्र भी मुझे नहीं चाहिए
जो बचपन में मित्र की चालाकी पर प्रतिकार किया
और जवानी में मित्र के गिड़गिड़ाने का इंतज़ार किया

मित्रता तो दुर्योधन की बड़ी थी
जिसने कर्ण को तब अंगराज बनाया
जब उसकी प्रतिभा रंगक्षेत्र में असहाय खड़ी थी

मित्रता तो कर्ण सी होनी चाहिए
जिसने दुर्योधन का साथ देते हुए यह विचारा ही नहीं
कि उसका मित्र ग़लत है या सही

✍️ चिराग़ जैन

बोझा

स्कूटर के पीछे सधकर बैठी अधेड़ महिला
बचाती जा रही थी स्वयम् को
ट्रैफिक जाम में फँसे
अपने पति की बेफिक्री से।

रह-रहकर
आशंका और भय से भरी आँखें
मुस्कुरा कर
क्षमायाचना कर लेती थी
गाड़ी वालों से

ताकि उनकी झल्लाहट
पहुँचने न पाए
उसके पति तक।

आख़िरकार
मेरी गाड़ी के किनारे से
टकरा ही गया उसका पाँव।

…ज़ोर से लगी होगी उसे
लेकिन उसने एक पल भी नहीं देखा अपने पैरों की ओर
बल्कि झटाक से
दोनों हाथ जोड़कर मुझे देखा
फिर कसकर पकड़ ली स्कूटर की स्टॅपनी!

…और पति महाशय
ट्रैफिक जाम से गुस्साये
झल्लाते जा रहे हैं
उन्हें लगता था
वो कोई बोझा-सा ढो रहे हैं
अपने स्कूटर पर!

✍️ चिराग़ जैन

नये घर में

सुनो!
सब कुछ तो बटोर लाया हूँ
अपने पुराने मकान से
नये मकान में;
फिर भी
काफ़ी कुछ छूट गया है वहीं
…जस का तस।

अलमारी के पीछे
जाला पूरती रहती थी एक मकड़ी
उसका घर तहस-नहस कर आया हूँ
अपना घर बदलते हुए।

दीवाली की सुबह
रसोई की चौखट पर
सरस की टहनियाँ टाँकते थे पिताजी;
उनकी सूखी हुई डंडियाँ
चुभती हुई सी छूट गई हैं
चौखट की झिरियों में।

राखी के सोन चिपकाने से
एक निशान बन जाता था दीवार पर
वो साथ न आ सका।

और छोटी बहन ने
पूजा वाले कमरे में
थापे लगाए थे
विदा होते हुए।
…जिन्हें देखने भर से
जीवंत हो जाती थी बहन की विदाई;
…उन्हें सहेजने का
कोई ज़रिया न हुआ।

पड़ोस वाले अंकल
यूं भी
कभी बतियाते तो नहीं थे,
लेकिन आज
जब ट्रक में चढ़ रहा था उनका पड़ोस,
तो वे अपनी बालकनी में
रोज़ से
कुछ ज़ियादा ख़ामोश नज़र आए।

नये घर की दीवारें
एकदम नयी हैं।
फ़र्श पर नहीं है
किसी दीये की चिकनाई के घेरे।
ट्यूब के पीछे
अभी नहीं बसा है
किसी छिपकली का घरौंदा।
यहाँ सामने वाले छज्जे से
लुंगी पहने कोई अधेड़
आते-जाते घूरता भी नहीं है।

एक बड़े से ट्रक में
लाद तो लाए हम
एक पूरा युग
लेकिन वक़्त लगेगा
उस युग को
इन दीवारों पर छाने में
अभी वक़्त लगेगा
इस मकान को
घर बनाने में।

✍️ चिराग़ जैन

विभक्त

सृजन की जाह्नवी
विभक्त होकर भी
गंगा ही रहेगी।

तुम देखना
उन्मुक्त बहती संवेदना से
विभक्त होती धार
मोक्षदायिनी होकर पुजेगी
…हर की पौड़ी पर।

कविता से विभक्त काव्यांश
सूक्ति हो जाते हैं
और श्लोक से विभक्त वर्ण
मंत्र बन जाते हैं।

एक सृजन ही तो है
जहां विभक्तियां
धातुओं को अर्थ की
पहचान देती हैं।

✍️ चिराग़ जैन

प्यार का सम्प्रेषण

चीखने से
शोर बढ़ता है
सम्बन्ध नहीं।

सुकून की खटिया
बुनी जाती है
सहजता की बाण से;
इसमें प्रयास की गाँठें हों
तो मुक्त नहीं हो सकती नींद
चुभन से!

जताना
और बताना
व्यापार में होना चाहिए
व्यवहार में नहीं।

और प्यार में…
…वहाँ तो
आँखें मिलते ही
फिफ्थ गीयर लग जाता है
धड़कनों में!
ओंठ व्यस्त रहते हैं
कँपकँपाने और मुस्कुराने में।

शब्द और आवाज़
केवल शोर हैं
प्यार के सम्प्रेषण में।

✍️ चिराग़ जैन

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