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व्यस्तता

जब तक तुम संग थीं
मैंने नहीं तलाशी कोई ख़ुशी
नहीं खोजी कोई मुस्कान
नहीं ढूँढ़ी कोई हँसी
…ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

अब तलाशता फिरता हूँ
एक-मासूम सी ख़ुशी
अपने दिल के लिये।
एक कोमल-सी मुस्कान
अपने होंठों के लिये।
एक गीली-सी हँसी
अपने चेहरे के लिये।
और एक पावन-सी चमक
अपनी आँखों के लिये।

लेकिन रीती ही रह जाती है
तलाशों का जल भरने के लिए बढ़ती
छोटी-सी अंजुरी।

दूर तक यात्रा करने के बाद
पलकों के भीतर
लौट आती हैं गीली निगाहें
और देर तक इंतज़ार करने के बाद
थककर बैठ जाता हूँ मैं।

हाय राम!
खुशियों को भी
अभी व्यस्त होना था!

✍️ चिराग़ जैन

शॉर्ट-सर्किट

सर्किट के सीने में हुई
गड़बड़ का असर
उपकरण पर भी
समान रूप से पड़ा
लेकिन इन दोनों के बीच
बेचारा वायर
अकारण ही सड़ा।

तार बेचारा
सदैव अपना कार्य
सुचारू रूप से करता है
लेकिन जब भी कुछ प्रॉब्लम होती है
तो उसको जलना ही पड़ता है।

रिश्तों के कनेक्शन में हुए
झगड़ों के शॉर्ट-सर्किट से
विश्वास का वायर जल जाता है
और वक़्त का मैकेनिक
उपकरण और सर्किट को बचाने के लिये
बीच के वायर को बदल जाता है।

✍️ चिराग़ जैन

खोते मंज़र

चाहकर भी
नहीं बचा पा रहे हैं हम
वह सब
जो आनंदित करता है हमें
तनाव के क्षणों में।

क्षमा नहीं करेंगी हमें
हमारी ही सन्तानें
क्योंकि छीन लेते हैं हम
रोज़ाना
आनंद के अनिवार्य तत्व
अगली पीढ़ी से
…आधुनिक बनने की कोशिश में

मिटा देते हैं रोज़ाना
प्रकृति में बिखरे काव्यांश
अपने ही हाथों
आधुनिक बनने के लिए

सोचता हूँ अक्सर
कि कैसे देखेंगी हमारी संतानें
वह सब
जो आनंदित करता है हमें
तनाव के क्षणों में।

वासन्ती रुत के पीले फूल
स्वच्छ नदियों के गीले कूल
नंगे फ़क़ीरों का ऐश्वर्य
धूल भरी आंधियों का वेगवान सौंदर्य
कोहरे की चादर से ढँके हुए खेत
बूढ़े दादाजी की सुंदर सी बेंत
गलियों में दौड़ती बच्चों की रेल
गुड़िया और गुड्डे और कंचों के खेल
छोटी सी गिल्ली और गज भर का डंडा
मिट्टी का चूल्हा और गोबर का कण्डा
आंगन की बारिश का मल्हारी राग
कोयल की बोली और आमों के बाग
साड़ी का पल्लू और धोती की लांग
भोर भए भैरवी सी मुर्गे की बांग
उर्दू की ग़ज़लें और हिंदी के गीत
घोड़े की टापों का सुंदर संगीत

कैसे कोई झूमेगा मधुबन में जाकर
कैसे जताएगा ख़ुशियाँ कोई गाकर
क्या करेगी ये पीढ़ी, दुनिया में आकर।

नफ़रत में जलता अब सारा संसार है
प्यार की, मुहब्बत की बातें बेकार हैं
भ्रांतियों के झूलों में वे भी झूल जाएंगे
लंबी-लंबी लाइनों में जीवन बिताएंगे
जंगल का राज देख रो-रो चिल्लाएंगे
बिस्लेरी पिएंगे और यूरिया चबाएंगे
आओ, पहले अपने वर्तमान को बचाएँ
तब इस भविष्य को दुनिया में लाएँ।

✍️ चिराग़ जैन

मापदण्ड

टूट गया था मैं
ठीक वैसे ही
ज्यों कठोर धरातल पर गिरते ही
टूट जाता है कच्चा बर्तन।
क्वारी-गर्भवती कन्या के
मजबूर बाप की तरह
कसमसा उठी थी मेरी आत्मा।
जून की झुलसती गर्मी में
सड़क-किनारे खड़े
शिकंजीवाले की गीली रेहड़ी पर पड़े
बर्फ़ के छोटे-से टुकड़े की तरह
पिघल गईं थीं मेरी आँखें
और भूख से बिलबिलाते हुए
मासूम बच्चे की
ग़रीब माँ की तरह
फ़फ़क पड़ा था मेरा दिल
क्योंकि भ्रष्टाचार का शिकार हुआ था ‘मैं’।

मेरे जीवन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य
(क्योंकि अपना कार्य सभी को महत्त्वपूर्ण लगता है)
चढ़ा दिया गया था
भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर।

लेकिन आज न टूटन है मुझमें
न आत्मा में सिसक
न आँखों में पानी
और न दिल में कराह।
बस कुछ है तो लालच में लपलपाती जीभ
आँखों में अमानुषी चमक
होंठों पर जीत की कुटिल मुस्कान
आसुरी अट्टहास
और कुम्भकर्ण की तरह सोता हुआ ज़मीर।

क्योंकि भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर बलिदान हुआ कार्य
आज महत्त्वपूर्ण नहीं है
आज मैं भ्रष्टाचारी हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

अन्तर

अन्तस् की पावन भोगभूमि
और मानस की पवित्र भावभूमि पर बसी
अधरों की सौम्यता।
लोचनयुगल में अनवरत प्रवाहमान
विश्वास की पारदर्शी भागीरथी
अनायास ही छलक पड़ती है
सागरमुक्ता-सी
दन्तपंक्ति के पार्श्व से प्रस्फुटित
निश्छल खिलखिलाहट के साथ।

और इस पल को
शब्दों में बांधने के
निरर्थक प्रयास करके
कसमसाकर रह जाता है शब्दकोश।

अप्रासंगिक लगने लगती हैं
सृष्टि की समस्त लौकिक-पारलौकिक उपमाएँ
क्योंकि
बहुत अन्तर होता है
उपमान और उपमेय में!

✍️ चिराग़ जैन

दुःख

वाह के मज़मों में
अक्सर मौज़ूद होती है आह भी।
जैसे बहुत कुछ पा लेने पर भी
नहीं मिट पाती है कसक
कुछ खो जाने की।

दुःख जन्मता है
ख़ुशियों की कुक्षि से
कदाचित् यही सिद्ध करने के लिये
जलती हैं खलिहानों में रखी फ़सलें
फटते हैं धरती पर उतरते अंतरिक्ष-यान
मरते हैं जवान बेटे
फुँकते हैं बसे हुए घर
और छीन ली जाती है
घास की रोटी भी
भूखे बच्चों की उंगलियों से।

दुःख फैला है
धरती के कण-कण में
अविनाशी-सा
विराट, अरूपी, अमूर्त, अनवरत
अंधियारे-सा
सूनसान सन्नाटे की तरह
क्षितिज के छोर तक
सागर के तल पर झिलमिलाती
सूरज की किरण के समान
विशाल, अखण्ड और अनुपयोगी भी।

दुःख महसूस होता है
हृदय को प्रताड़ित करता
एक अनजाना-अनकहा एहसास
जो उभर आता है
अक़्सर सुख के बीच
सुन्दर कन्या के गाल पर
मुँहासे की तरह।

दुःख अमर्यादित है
शायद इसीलिये नहीं बंध पाता
शब्दों की मर्यादा में
क्योंकि दुःख है
सिर्फ़ एक एहसास
जिसे नकारना असम्भव है
…सुख की तरह

✍️ चिराग़ जैन

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