मन
कितना
भयंकर पल है
…मन में
कहने को बहुत कुछ है
पर कुछ भी कहने का
मन नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
कितना
भयंकर पल है
…मन में
कहने को बहुत कुछ है
पर कुछ भी कहने का
मन नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry, Unpublished
जब से डाउनलोड की है
तुम्हारे नाम की फाइल
बार-बार हैंग होता है
दिल का सिस्टम
…शायद फाइल में वायरस था
जिसने सबसे पहले
डी-एक्टिवेट किया
ब्रेन का एंटी-वायरस
और फिर
करप्ट कर दिया
ऑपरेटिंग सिस्टम
..स्लो कर दी
मेमोरी
…शायद
इंस्टॉल करनी पड़ेगी
नई विंडो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
घर के मुख्य द्वार की
देहलीज पर बैठकर
दफ़्तर से लौटते पापा की
राह तकतीं
नन्हीं-नन्हीं आँखें
रोज़ शाम
आशावादी दृष्टिकोण से
निहारती थीं
सड़क की ओर
…कि पापा
लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी
हमारे लिए।
लेकिन लुप्त हो रही है
ये स्नेहिल परंपरा
पिछले कुछ वर्षों से
बच नहीं पाती अब
वह चिल्लड़
जिसे ख़नकाकर
चिज्जी ख़रीदते थे पापा
हर शाम
दफ़्तर से लौटते वक़्त
अपने बच्चों के लिए!
ख़र्च हो गई है
सारी रेज़गारी
रोज़गार की तलाश में
और मोटी-मोटी किताबों के बीच
ग़ुम हो गया है
वक़्त का वह हिण्डोला
जिसमें बैठकर
राह तकते थे बच्चे
दफ़्तर से लौटते पापा की।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बीज ने वृक्ष से कहा-
“तुम महान हो”
वृक्ष ने उत्तर दिया-
“वृक्ष होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”
…सुनकर
बीज धरती में गड़ गया
मिट्टी का एक आवरण उस पर चढ़ गया
फिर एक दिन
उसकी सीमाओं का खोल टूटा
उसमें से एक कोमल अंकुर फूटा
धूप-पानी पाकर
धीरे-धीरे वो अंकुर बड़ा हो गया
और एक दिन
मुस्कुराते हुए
वृक्ष के समकक्ष खड़ा हो गया
मनुष्य ने ईश्वर से कहा-
“तुम महान हो”
ईश्वर ने उत्तर दिया-
“ईश्वर होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”
…सुनकर
मनुष्य इस सीधी-सादी बात के
गूढ़ अर्थ बूझने लगा
और जब कुछ नहीं सूझा
तो ईश्वर को पूजने लगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
जब तक तुम संग थीं
मैंने नहीं तलाशी कोई ख़ुशी
नहीं खोजी कोई मुस्कान
नहीं ढूँढ़ी कोई हँसी
…ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
अब तलाशता फिरता हूँ
एक-मासूम सी ख़ुशी
अपने दिल के लिये।
एक कोमल-सी मुस्कान
अपने होंठों के लिये।
एक गीली-सी हँसी
अपने चेहरे के लिये।
और एक पावन-सी चमक
अपनी आँखों के लिये।
लेकिन रीती ही रह जाती है
तलाशों का जल भरने के लिए बढ़ती
छोटी-सी अंजुरी।
दूर तक यात्रा करने के बाद
पलकों के भीतर
लौट आती हैं गीली निगाहें
और देर तक इंतज़ार करने के बाद
थककर बैठ जाता हूँ मैं।
हाय राम!
खुशियों को भी
अभी व्यस्त होना था!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
सर्किट के सीने में हुई
गड़बड़ का असर
उपकरण पर भी
समान रूप से पड़ा
लेकिन इन दोनों के बीच
बेचारा वायर
अकारण ही सड़ा।
तार बेचारा
सदैव अपना कार्य
सुचारू रूप से करता है
लेकिन जब भी कुछ प्रॉब्लम होती है
तो उसको जलना ही पड़ता है।
रिश्तों के कनेक्शन में हुए
झगड़ों के शॉर्ट-सर्किट से
विश्वास का वायर जल जाता है
और वक़्त का मैकेनिक
उपकरण और सर्किट को बचाने के लिये
बीच के वायर को बदल जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
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