+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

रिक्शावाला

डरी-सहमी पत्नी
और तीन बच्चों के साथ
किराए के मकान में
रहता है रिक्शावाला।

बच्चे
रोज़ शाम
खेलते हैं एक खेल
जिसमें सीटी नहीं बजाती है रेल
नहीं होती उसमें
पकड़म-पकड़ाई की भागदौड़
न किसी से आगे
निकलने की होड़
न ऊँच-नीच का भेद-भाव
और न ही
छुपम्-छुपाई का राज़
….उसमें होती है
”फतेहपुरी- एक सवारी“ की आवाज़।

छोटा-सा बच्चा
पुरानी पैंट के पौंचे ऊपर चढ़ा
रिक्शा का हैंडिल पकड़
ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाता है,
और छोटी बहन को
सवारी बना
पिछली सीट पर बैठाता है

…थोड़ी देर तक
उल्टे-सीधे पैडल मारने के बाद
अपने छोटे-काले हाथ
सवारी के आगे फैला देता है
नकली रिक्शावाला

पूर्व निर्धारित
कार्यक्रम के अनुसार
उतर जाती है सवारी
अपनी भूमिका के साथ में
और मुट्ठी में बँधा
पाँच रुपये का नकली नोट
(जो निकलता है
एक रुपए के सौंफ के पैकिट में)
थमा देती है
नकली रिक्शावाले के हाथ में।

तभी खेल में
प्रवेश करता है तीसरा बच्चा;
पकड़ रखी है जिसने
एक गन्दी-सूखी लकड़ी
ठीक उसी तरह
…ज्यों एक पुलिसवाला
डँडा पकड़ता है।

मारता है रिक्शा के टायर पर
फिर धमकाता है उसे
पुलिसवाले की तरह;
और छीन लेता है
नकली बोहनी के
नकली पैसे
नकली रिक्शावाले से
नकली पुलिसवाला बनकर
असली पुलिसवाले की तरह।

✍️ चिराग़ जैन

कवि

एक जन्म की साधना
या तपस्या कुछ रातों की
व्यक्ति को नहीं बनाती है कवि।

कविता के रूप में
शब्दों को संजाने के लिये
करनी पड़ती है तपस्या जन्मों तक
तब कहीं जाकर
कठिनाई से जन्मता है कवित्व।

जानते हो?
कवि के सामने रखी दवात में
नहीं होती है स्याही
ख़ून होता है।

वही ख़ून
जो जलता है स्वयं
कविता के सृजनार्थ
स्वैच्छिक।

और जब कवि
उस दवात में
चिंतन की क़लम डुबोकर
अभिव्यक्तियों का शब्दचित्र उतारता है ना
काग़ज़ पर
तब उसे मिलती है
‘संतुष्टि’!
जिसे पाकर
वह स्वामी बन जाता है
बैकुण्ठ का!

✍️ चिराग़ जैन

जिनस्य अनुयायी इति जैनः

महावीर मुसलमान थे।
क्योंकि उनके पास मुकम्मल ईमान थे।

महावीर सिख थे।
क्योंकि वे सितम करने से ख़बरदार करते थे।

महावीर हिन्दू थे।
क्योंकि वे हिंसा से दूर थे
और सब जीवों से प्यार करते थे।

महावीर पारसी थे।
क्योंकि उनमें
संसार के पार देखने की क्षमता थी।

महावीर आर्यसमाजी थे।
क्योंकि उनमें सत्य के प्रति ममता थी।

हाँ, महावीर बुद्ध थे।
क्योंकि उनके उसूल दुर्बुद्धि के विरुद्ध थे।

…और हाँ!
महावीर ईसाई भी थे
क्योंकि वे इंसानियत के साईं भी थे।

लेकिन, महावीर जैन नहीं थे।
…क्योंकि उनकी वाणी में
हमारी जिव्हा की तरह कटु बैन नहीं थे;
उनके हृदय में
श्वेताम्बर-दिगम्बर का झगड़ा न था;
उनके अन्तस् में
बीस और तेरह का रगड़ा न था;
वे नियम थोपते नहीं थे;
वे हिंसा रोपते नहीं थे;
वे नित नए धर्म गढ़ते नहीं थे;
वे लकीर के फ़क़ीर बनकर
लड़ते नहीं थे;
वे हमारी तरह ढोंगी नहीं थे;
वे दिन के जोगी
रात के भोगी नहीं थे;
वे तो आडम्बरों के बिन थे
सचमुच……..
मेरे महावीर जैन नहीं थे
….’जिन’ थे।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!