Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
मैंने एक गोला बनाया
और फिर
उसे चार हिस्सों में बाँट दिया
तभी किसी ने कहा-
“इन चारों हिस्सों में
अलग-अलग रंग भरो”
…तब मुझे अहसास हुआ
कि नए रंग का
अपनी मर्यादा में रहना
तभी संभव है
जब पुराना रंग
अपनी सीमाओं में
पूरी तरह जम जाए!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
मैं नहीं मिटाना चाहता
आधुनिकता के प्रभावों को
न ही चिंतित हूँ मैं
फैशन के बढ़ते चलन से।
मैं तो सिर्फ़
संजो लेना चाहता हूँ
अपना परिवार…
…मुझे तो चिंता है
‘माँ’ पर लिखी
कविताओं की!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
रात के सन्नाटे में
‘प्लानर’ लेकर बैठा।
सोचा, कुछ सुनियोजित कर लूँ
अपने काम-धाम!
घण्टे-सवा घण्टे तक
पृष्ठ दर पृष्ठ
लिखता रहा
प्रोजेक्ट्स और पेंडिंग्स!
…तभी
सन्नाटे को चीरती हुई
मेरे कानों में गूंजी
किसी कुत्ते के रोने की आवाज़…
…और मैंने
एक मद्धम-सी कँपकँपी के साथ
बन्द कर दिया प्लानर!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Hasya Kavita, Poetry
हर आदमी के जीवन में
तीन तरह के लोग होते हैं
एक जानने वाले
एक पहचानने वाले
एक बुरा मानने वाले
जानने वाले लोग
जीवन को बहाव देते हैं
पहचानने वाले गाहे-बगाहे भाव देते हैं
और बुरा मानने वाले
हमेशा तनाव देते हैं।
जानने वाले लोग
ज़िन्दगी की डोर होते हैं
पहचानने वाले बेमतलब का शोर होते हैं
और बुरा मानने वाले
न डोर होते हैं, न शोर होते हैं
ये साले कुछ और होते हैं।
बुरा मानने वाले लोग
पतझड़ में मिलते हैं
बहारों में मिलते हैं
दुश्मनों में मिलते हैं
यारों में मिलते हैं
पड़ोसियों में मिलते हैं
रिश्तेदारों में मिलते हैं।
शास्त्रीय भाषा में कहा जाए
तो जहाँ-जहाँ तक
जीवन के निशान हैं
ये बुरा मानने वाले
वहाँ-वहाँ तक विद्यमान हैं।
ये अपनी-अपनी हाँकते हैं
और सामने वाले को
कुछ नहीं कहने देते हैं।
ये न तो कभी ख़ुद ख़ुश रहते
और न किसी को रहने देते हैं।
इस प्रजाति के लोग
जब घर से निकलते हैं
तो इनका एक ही लक्ष्य होता है
और ये लक्ष्य जीवन भर अक्षय होता है
कि किसी नए आदमी से बैर ठानना है
आज फिर किसी बात का बुरा मानना है
इस लक्ष्य को साधने
ये सारा दिन भटकते हैं
गाड़ियों में चलते हैं, बसों में लटकते हैं
तरह-तरह से लोगों से अटकते हैं
दुनिया भर में अपनी राय भिड़ाते हैं
सबकी फटी में टांग अड़ाते हैं
सबकी समस्याएँ अपने ऊपर ओटते हैं
और फाइनली
किसी न किसी बात का
बुरा मान कर ही घर लौटते हैं
डिस्कवरी चैनल वाले
जब इन पर प्रोग्राम बनाएंगे
तो इनके बारे में कुछ यूँ बताएंगे
बुरा मानने वाले ये जीव
पृथ्वी के हर कोने मेें पाए जाते हैं
सामान्यतया
बुरा मानने का तत्व
मादा में नर से अधिक होता है
इन तस्वीरों में जो व्यक्ति
अपनी आँखों के ऊपर की भौंहें ताने हुए है
वह वास्तव में कैमरे से बुरा माने हुए है
इस जाति के एक किंग
नाम था उखड़सिंह
किसी के घर खाने पर गए
ऐसे ही नहीं गए
बाक़ायदा उसके बुलाने पर गए
बुलाने वाले ने ख़ूब दिया आदर सत्कार
सेवा-सुश्रुसा, अपनत्व और प्यार
हाथ जोड़कर विनम्रता का मनोयोग
स्वादिष्ट पकवान, पूरे छप्पन भोग
भेंट देकर स्वागत किया था
उपहार देकर विदा किया
घर पहुँचते पहुँचते
उखड़सिंह जी इस बात पर नाराज़ हो गए
कि अगले ने नाराज़ होने का मौका ही नहीं दिया
बुरा मानने वाली प्रजातियों के
अलग अलग रीति-रिवाज़ होते हैं
न तो ये व्यक्ति की परवाह करते हैं
न ही अवसर के मोहताज होते हैं
चाहे ये किसी को जानते हैं
चाहे नहीं जानते हैं
सबसे समभाव रखते हैं
मतलब, बराबर बुरा मानते हैं
ये अलौकिक लोग न चोर होते हैं
न मवाली होते हैं
न संत होते हैं, न आली होते हैं
ये लोग दरअस्ल बेहद ठाली होते हैं
परेशान रहना इनकी लाइफ का फंडा होता है
कड़वा बोलना इनका परमानेंट एजेंडा होता है
कोई इन्हें ख़ुश करने की कितनी भी कोशिश कर ले
लेकिन इनका रिस्पांस बेहद ठंडा होता है
ये गले में भौंकड़ा पूरते हुए पैदा होते हैं
माथे में त्यौरियां डाले जीते हैं
और अपने जीवन में
पानी से ज़्यादा
ख़ून का घूंट पीते हैं।
मुस्कुराहट इनके पास आने से नाटती है
हंसी इन्हें काटती है
ठहाकों से ये डरते हैं
और ज़िन्दगी से इतना बुरा माने हुए हैं
कि लगभग रोज़ मरते हैं
बुरा मानना है तो ऐसे मानो
जैसे गांधी जी ने माना था
अंग्रेजों के अत्याचार का
जैसे शांतिदूत कृष्ण ने माना था
दुर्योधन के दुर्व्यवहार का
जैसे सीता ने माना था
रावण की मनमानी का
जैसे प्रह्लाद ने माना था
हिरण्यकश्यप जैसे अभिमानी का
ऐसा बुरा मत मानो
कि निरपराध अहिल्या का जीवन
पत्थर सा शाप बन जाए
ऐसे नाराज़ न होओ
कि किसी श्रवण कुमार का पुण्य
किसी दशरथ का पाप बन जाए
ऐसी गांस मत पालो
कि कुरुक्षेत्र में महाभारत खड़ी हो जाए
और ऐसी आदत मत डालो
कि कोई भी छोटी सी बात
इस अनमोल जीवन से बड़ी हो जाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
वो तुमसे मेरी पहली मुलाक़ात थी
और सिर्फ़ तुम जानती थीं
कि आख़िरी भी…!
स्टेशन पर खड़े
चिड़चिड़ा रहे थे सभी लोग
कि ट्रेन लेट क्यों हो रही है
और हर आहट के साथ
सहम जाता था मैं
-’हाय राम!
कहीं गाड़ी तो नहीं आ रही!’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
शब्द
शिव हैं।
जब कभी
बहती है भावना
उद्विग्न हो
मन के भीतर से
तो उलझा लेते हैं उसे
व्याकरण की जटाओं में।
रोक देते हैं
उसका सहज प्रवाह।
सीमित कर देते हैं
उसकी क्षमताएँ।
कविता वेग है
आवेग है
उद्वेग है।
वो तो
शब्दों ने उलझा लिया
वरना,
बहा ले जाती
सृष्टि के
सारे कचरे को।
शब्द ब्रह्म नहीं हैं,
शब्द शिव हैं।
✍️ चिराग़ जैन