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कैमरा

ख़ुद अन्धेरे में रहकर ही
प्रकाशित करता है औरों को
…कैमरा।

लेकिन जैसे ही कोई किरण
रौशन करने आती है
कैमरे को…

…तो इसे
अंधियारी लगने लगती है
सारी दुनिया।

बिल्कुल इंसान की तरह है
कैमरा भी
…ओछा कहीं का!

✍️ चिराग़ जैन

अनुचर

क़लम भी
कुछ कम नहीं है
कुदाल से।

…शायद
कुछ गहरी ही
चोट करती हो।

और यथार्थ
…यथार्थ तो
दास मात्र है
विचार का।

अनुचर है बेचारा
हाथ बांधे चलता है
विचार के पीछे-पीछे।

हिम्मत नहीं
कि एक क़दम भी
आगे निकल जाए!

…अवलम्बन चाहिए ससुरे को
विचार का।
✍️ चिराग़ जैन

सही उत्तर

यूँ ही पूछ बैठी थीं तुम
‘मेरे बिना रह पाओगे?’
सुनकर
मेरे मस्तिष्क में
एकाएक कौंध गया एक और प्रष्न-
‘क्या तुम सही उत्तर सह पाओगी?’

…ख़ुद से उलझते-जूझते
अनायास ही
मेरे मुँह से निकल गया-
‘नहीं!’

…और तुमने
इसे अपने प्रश्न का
उत्तर समझ लिया।

✍️ चिराग़ जैन

अनकहा

सदियों से
तलाश रहा हूँ
एक ऐसा श्रोता
जो सुन सके
मेरी कविताओं का वह अंश
जो मैंने कहा ही नहीं

क्योंकि
‘बहुत कुछ’
कह देने की संतुष्टि से
कहीं बड़ी है
बेचैनी
‘कुछ’ न कह पाने की
✍️ चिराग़ जैन

मर्यादा

मैंने एक गोला बनाया
और फिर
उसे चार हिस्सों में बाँट दिया
तभी किसी ने कहा-
“इन चारों हिस्सों में
अलग-अलग रंग भरो”

…तब मुझे अहसास हुआ
कि नए रंग का
अपनी मर्यादा में रहना
तभी संभव है
जब पुराना रंग
अपनी सीमाओं में
पूरी तरह जम जाए!

✍️ चिराग़ जैन

चिंता

मैं नहीं मिटाना चाहता
आधुनिकता के प्रभावों को
न ही चिंतित हूँ मैं
फैशन के बढ़ते चलन से।

मैं तो सिर्फ़
संजो लेना चाहता हूँ
अपना परिवार…

…मुझे तो चिंता है
‘माँ’ पर लिखी
कविताओं की!
✍️ चिराग़ जैन

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