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सिस्टम का सिस्टम

पड़ी कुँए में भांग है, भली करे करतार
होरी के घर लूट में, मुखिया हिस्सेदार
मुखिया हिस्सेदार, शिक़ायत किससे करता
आखिर थाने में जा पहुँचा डरता-डरता
लिखा रपट में गया, रुपैये गए जुए में
मिला उसे यह ज्ञान, भांग है पड़ी कुँए में

✍️ चिराग़ जैन

कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका

सोशल मीडिया पर पुलिस को मिल रही बधाइयों को देखकर लगता है कि कार्यपालिका ने न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। अगर न्यायपालिका की आँखों में थोड़ा भी पानी होगा तो लोकतंत्र में शून्य होते अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्वतः संज्ञान लेगी, अन्यथा देश का लोकतंत्र पुलिसिया राज की भयावहता की ओर बढ़ने के लिए तैयार है।

✍️ चिराग़ जैन

फिल्मों से झाँकता लोकतंत्र

हिंदी फिल्मों में भारतीय समाज की पूरी तस्वीर साफ़ दिखाई देती है। एक प्रभावी संचार माध्यम होने के नाते फिल्मों ने जनमत का ही नहीं ‘जन-प्रवृत्ति’ का भी निर्माण किया।
हर फिल्म में एक नायक होता है। यह नायक जो भी करे, उसे सही मानना जनता का धर्म है। इस धर्म के निर्वाह में क़ानून की धज्जियाँ उड़ती हैं तो उड़ जाएँ। इस धर्म के निर्वाह में अदालत का अपमान होता हो, तो हो जाए। इस धर्म के निर्वाह में अराजकता पुष्ट होती हो, तो हो जाए।
जिस फ़िल्म में नायक गैंगस्टर, डॉन या स्मगलर हो, उसमें वह पुलिस को चकमा दे तो हॉल में तालियाँ बजने लगती हैं। वह पुलिस पर गोलियाँ चलाकर फरार हो जाए, तो हॉल में तालियाँ बजती हैं। वह कॉलेज में लड़की छेड़े तो तालियाँ बजती हैं। वह बैंक लूटने की फुलप्रूफ प्लानिंग करे तो तालियाँ बजती हैं। वह गाली दे तो भी तालियाँ बजती हैं। कुल मिलाकर हमें यह समझा दिया गया कि नायक जो भी करे वह प्रशंसनीय है। और हम यह समझ भी गए।
जिस फ़िल्म में नायक पुलिसवाला हो, वहाँ गुंडों की कुटाई पर, राजनेताओं की ठुकाई पर, नियम-क़ानून को ताक पर रखकर अपराधी को सबक़ सिखाने पर हम तालियाँ पीटते रहते हैं। इन फिल्मों में साफ़ दिखाया जाता है कि क़ानून का पालन करके क़ानून का पालन नहीं करवाया जा सकता।
जिन फिल्मों में नायक वक़ील हो, उसमें न्यायालय की अवमानना, पुलिस की मिलीभगत, अदालत के बाहर होने वाले प्रपंच और क़ानून की लाचारी साफ़-साफ़ दिखाई जाती है। हम अदालत में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते एक्शन हीरो, और जज के सामने धमकी देते वकीलों को देखकर ताली बजाते हैं।
फिल्मों ने हमें यह भी बताया कि हर नायक के कुछ सहयोगी होते हैं। जिस फ़िल्म का नायक गैंगस्टर हो, उसके सहयोगी छोटे-मोटे गुंडे होते हैं। ये सहयोगी अपने नायक की दादागिरी जमाने के लिए ‘जुगाड़’ करते रहते हैं। भाई को कोई दिक्कत न हो इसके लिए पुलिस से सेटिंग और जनता को साधने के लिए ‘कभी गर्म, कभी नर्म’ की नीति, प्रतिद्वंद्वी गैंग से होने वाले पंगों का निपटारा वगैरा सब इनका काम होता है। पुलिस के आला अधिकारियों और ऊँचे-ऊँचे पॉलिटिशियन्स के साथ नायक का उठना-बैठना होता है, और छोटे-मोटे इंस्पेक्टर वगैरा को सहयोगी सम्भाल लेते हैं।
जिन फिल्मों में नायक पुलिसवाला हो, उनमें ये सहयोगी या तो जूनियर पुलिस अफसर होते हैं या फिर भूतपूर्व गुंडे। इनको साथ लेकर नायक सड़े हुए सिस्टम में पल रहे अपराध के कीड़ों को साफ़ करता है।
इन फिल्मों में भीड़ के शॉट्स भी दिखाए जाते हैं, लेकिन इन शॉट्स की तीन ही सिचुएशन्स होती हैं। या तो यह भीड़, खलनायक और उसके गुर्गों के शोषण से पीड़ित होकर रोती-पीटती दिखाई देती है, या फिर इस भीड़ को खलनायक की दहशत से घरों में दुबकते दिखाया जाता है, या फिर कभी-कभी फ़िल्म के अंत में अधमरे खलनायक को ‘मॉब लिंचिंग’ से मारकर नायक को कोर्ट-कचहरी से बचाने के लिए इस भीड़ का सीन लिखा जाता है। शेष फिल्मों में अगर भीड़ है तो तालियाँ बजाने के लिए या जयकारे लगाने के लिए।
फिल्मों ने हमें बताया कि राजनेता हमेशा भ्रष्टाचारी ही होते हैं। हम भी राजनीति के दाँव-पेंच पर्दे पर देखते रहे और मान बैठे कि राजनीति की कीचड़ में कोई बेदाग़ हो ही नहीं सकता।
मीडिया इन फिल्मों में हमेशा सच को उजागर करता ही दिखाई दिया। इसलिए भ्रष्ट पुलिस, अपराधी और राजनीति को इन फिल्मों में हमेशा मीडिया से डरता हुआ ही दिखाया जाता है। ख़बरें बेचने, ख़बरें दबाने, ख़बरें बनाने और ख़बरें घुमानेवाले सीन कभी किसी स्क्रिप्ट में लिखे ही नहीं गए। अब से कुछ दशक पहले तक न्यायाधीशों के लिए संवाद लिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। उनकी सिचुएशन फिक्स थी। अदालती बहस के दौरान उन्हें केवल लकड़ी का हथौड़ा टेबल पर पीटते हुए ‘ऑर्डर… ऑर्डर…’ बोलना होता था।
इस पूरे तमाशे ने हमारे मस्तिष्क में कुछ बातें गहरे तक बैठा दीं।

जनता, भीड़ है। जो उसे हाँक ले जाए वही उसका नायक है। फिर वह चाहे पुलिस हो चाहे अपराधी।
सही वही है जो नायक करे और ग़लत वही है जो खलनायक करे।
सिस्टम को सुधारा नहीं जा सकता, उससे या तो खेला जा सकता है या फिर उसको यूज़ करके रॉबिन हुड का जीवन बिताया जा सकता है।
अराजक हो जाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते अराजक होनेवाला नायक हो।
जनता का काम केवल ताली पीटना है। उसे अपने उत्थान के लिए स्वयं कुछ नहीं करना होता। उसे केवल एक नायक की प्रतीक्षा करनी होती है, जो पूरे सिस्टम से लड़कर जनता को ख़ुशी-ख़ुशी ताली बजाने का मौक़ा देगा।

इन सब धारणाओं को मस्तिष्क में बैठाए हमारी कई पीढ़ियाँ गुज़र गईं। नायकवाद की इस धारणा ने हमें ‘जनता’ से ‘प्रजा’ बना डाला। और इससे जो ख़ामोशी पसरी उसका लाभ उठाकर हमारे तंत्र ने लोकतंत्र का मखौल बनाकर रख दिया।

✍️ चिराग़ जैन

एनकाउंटर

आठ दिन से देश एक ऐसी फिल्म देख रहा था, जिसका क्लाइमेक्स पहले से पता था। विकास दुबे जैसे घिनौने अपराधियों की मृत्यु होनी तय थी, किन्तु एक बार फिर कष्ट इस बात का है कि समस्या की जड़ को बचाने के लिए, एक शाखा काट कर संतोष कर लिया गया।
दो स्थितियाँ हो सकती हैं-
यदि यह एनकाउंटर सच है तो उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस को इसका श्रेय और बधाई देनेवाले लोग पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। उनका हर ट्वीट यह घोषणा कर रहा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने क़ानून की आँखों में धूल झोंकते हुए विकास दुबे को मौत के घाट उतार दिया। और अगर यह एनकाउंटर फर्जी है तो भी दो स्थितियाँ हो सकती हैं। पहली यह कि इस खेल के मास्टरमाइंड को बचाने के लिए पुलिस ने छोटे-मोटे गुर्गे निपटा दिए। अर्थात् पुलिस अभी भी किसी आपराधिक प्रवृत्ति के मस्तिष्क के इशारों पर नाच रही है।
दूसरी यह कि पुलिस को लगता है कि कानूनी दाँव-पेंचों का उपयोग करके कोई अपराधी छूट न निकले, इस कारण पुलिस ने ‘फैसला ऑन द स्पॉट’ करके न्याय किया है। अर्थात् स्वयं सिस्टम को ही सिस्टम पर भरोसा नहीं है।
दोनों ही सूरतों में इस देश की न्याय व्यवस्था और पुलिस महकमे की पुनर्समीक्षा अपरिहार्य हो जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

अपराध का सिस्टम

विकास दुबे की गुंडागर्दी को खाद-पानी देनेवाले जो लोग थे, वे उसी महकमे में काम करते थे, जिसे इस तंत्र ने जनता की सुरक्षा हेतु तैनात किया है। ये महक़मा जनता के टैक्स के पैसों से चलता है और जनता को ही थाली में रखकर अपराधियों के आगे पेश कर देता है।
जिन लोगों के साथ विकास दुबे और उसके गैंग ने ज़्यादतियाँ की होंगी, वे बेचारे भी पुलिस को अपना दोस्त समझकर थाने गए होंगे…. उनके साथ थाने में क्या-क्या हुआ होगा यह कल्पनातीत है।
भारत की जनता भी क़माल है और तंत्र भी। अपराधी के लिए सिस्टम मददगार है और पीड़ित के लिए मकड़जाल। आम नागरिक थाने जाते हुए थर्राता है और अपराधी थाने में बैठकर चाय पीते हैं।
किसी निर्दाेष को सज़ा न हो जाए, इस वाक्य की ओट में पूरी न्याय व्यवस्था को ध्वंस कर चुका यह तंत्र उन लोगों के विषय में क्या जवाब देगा, जिन्हें पुलिस की मदद से पल रहे अपराधियों ने तबाह कर दिया।
एक बार अपने दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि इस देश में किसी शरीफ़ आदमी के साथ कुछ ग़लत हो जाए तो ‘व्यवहारिक धरातल पर’ उसको कहाँ जाकर गुहार करनी चाहिए?

✍️ चिराग़ जैन

तुम लोगों की अनदेखी

छिछले बोल लुभाते हैं
नारे हिट हो जाते हैं
दोहरे अर्थ समेटे हेडिंग
मिलियन व्यू पा जाते हैं
फिर कहते हो मंचों से क्यों कविता अंतर्धान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

सीधी-सादी कविता वाली पोस्ट कहीं खो जाती है
नोकझोंक की क्लिप दिखते ही शेयर कर ली जाती है
गीत सिसकते रहते हैं
छंद बिलखते रहते हैं
कविता-साधक फॉलोवर का
रस्ता तकते रहते हैं
जो शालीन रहा हो उसकी वॉल बहुत वीरान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

सेंसेशन, वल्गर, फूहड़ता, इन पर सबका ध्यान हुआ
भद्दी बातें करती छोरी का जी भर गुणगान हुआ
अंधी हिंसक सोच चली
गाली और गलौज चली
नेगेटिव का बल देखो
वायरलियों की फौज चली
सभ्य सुसंस्कृत पोस्ट करी तो कचरे का सामान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

ट्रोलिंग करते फिरते हैं सब अपने-अपने वाद लिए
मानवता एकाकी फिरती, अंतस में अवसाद लिए
जितना शिष्ट प्रलाप हुआ
उतना पश्चाताप हुआ
ओछापन तो ट्रेंड बना
गहरा लिखना पाप हुआ
चोरी करने की आदत भी ईश्वर का वरदान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

✍️ चिराग़ जैन

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