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तीन उंगलियाँ अपनी ओर

‘जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ -ये भारतीय पत्रकारिता के प्रारंभिक तेवर थे। संपादन और क्रांति एक-दूसरे के पूरक थे। संपादकों को भाषा का ज्ञान इतना था कि अख़बार में छपे शब्द वर्तनी का प्रमाण होते थे। अख़बार का काग़ज़ खोटा होता था, पर ख़बरें खरी होती थीं। काली स्याही से जो अख़बार में छप गया, वह इतिहास में दर्ज हो गया।
संपादकीय टिप्पणी के एक-एक वाक्य में सत्ता की चूल हिलाने का सामर्थ्य होता था। 15 अगस्त 1947 को आज़ादी की जो फ़सल हमने काटी उसके खेत की सिंचाई में पत्रकारों का क़ाफ़ी ख़ून-पसीना शामिल था।
आज़ादी के पाँच दशक बाद पत्रकारिता में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुए। एक तो अब तक टेलिविज़न भारत में दुर्लभ नहीं रह गया था, दूसरे उद्योग जगत् को अख़बार की आड़ में अपने राजनैतिक हित साधने और औद्योगिक घपले छिपाने का फार्मूला मिल गया। अब तक अख़बार के मुताबिक़ जनता चलती थी अब जनता के मुताबिक़ अख़बार चलने लगे। उधर टेलिविज़न पर श्री सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने न्यूज़ रीडिंग को न्यूज़ एंकरिंग में तब्दील करने का पहला प्रयोग ‘आज तक’ नामक समाचार बुलेटिन में किया। लगभग इसी दौरान सुश्री नलिनी सिंह ने ‘आँखों देखी’ के माध्यम से प्रोग्रामिंग और न्यूज़ बुलेटिन के सम्मिश्रण का सफल प्रयोग किया।
इधर ये दोनों कार्यक्रम सफलता के चरम पर थे, उधर चौबीस घण्टे के समाचार चैनल्स की अवधारणा भारत में शुरू हो गई। श्री एस पी सिंह ने जो न्यूज़ एंकरिंग शुरू की थी वह सबसे पहले, सबसे तेज़, सबसे आगे, नम्बर वन और सनसनीखेज़ समाचारों के जंगल में ऐसी फँसी कि उसमें से न्यूज़ ग़ायब हो गई और केवल एंकरिंग शेष रह गई।
ठीक इसी समय प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से प्रतिद्वंद्विता और औद्योगिक घरानों की लाभप्रधान नीतियों के रोग से ग्रस्त होकर ऐसा रंगीन हुआ कि उसमें कुछ भी ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नहीं बचा। संपादकीय पृष्ठों पर लगने वाली ऊर्जा ‘पेज थ्री’ को ग्लैमरस बनाने में नष्ट होने लगी। सेलिब्रिटी मैनेजर्स को संपादकों से अधिक महत्वपूर्ण समझा जाने लगा। फिल्मी कलियाँ, स्टारडस्ट और मनोहर कहानियाँ जैसी मसालेदार सामग्री से अख़बार की बिक्री बढ़ाने की होड़ शुरू हो गई।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया; भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, खाना-पकाना और सास-बहू के सीरियल्स को ख़बर बनाकर; चौबीस घण्टे न्यूज़ चैनल चलाने का ढोंग करता रहा और प्रिंट मीडिया क्लासीफाइड, मेट्रीमोनियल, बॉलीवुड, क्रिकेट, ग्लैमर वगैरा से अपने-अपने पन्नों के ढेर को नम्बर वन अख़बार बताने पर तुले रहे।
बाज़ार में खड़ी पत्रकारिता के बीच ‘जनसत्ता’ बेचारा काफ़ी दिन तक उसी चौड़े आकार और काली स्याही पर अड़ा रहा; लेकिन चटपटे काग़ज़ को अख़बार समझकर ख़रीदनेवाले ग्राहकों ने जनसत्ता की दशा इतनी दयनीय कर दी कि वह बन्द होने के कगार पर आ गया। हारकर इस एकमात्र मंदिर को भी अपने चौक में दुकानें और सर्कस लगवाने पड़े ताकि पर्यटकों की चप्पलें गिनवाकर श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफ़ा किया जा सके।
जिस पत्रकारिता में येलो जर्नलिज्म और गटर जर्नलिज्म को हेय समझा जाता था, वहाँ ‘बटर जर्नलिज्म’ तक के दर्शन होने लगे। जिस देश में, राजनीति अख़बार देखकर जनता का मूड भाँपती थी; वहाँ राजनीति का मूड देखकर, अख़बार जनमत बनाने लगे।
जनता की अनदेखी ने दूरदर्शन के सीधे-सादे समाचार बुलेटिनों और जनसत्ता जैसे साफ़-सुथरे समाचार-पत्रों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए बाज़ारू होने पर विवश कर दिया।
जिन न्यूज़ चैनल्स को टीआरपी दे-देकर हमने सींचा है, आज वे ही किसी राजनैतिक पार्टी, किसी धन्ना सेठ और किसी मल्टीनेशनल कम्पनी के मन मुताबिक़ हमारी आँखों में धूल झोंक रहे हैं। मीडिया के इस वीभत्स रूप को धिक्कारने वाले एक बार अपने गिरेबान में झाँक कर देखें कि इस मीडिया को इतना उच्छृंखल बनाया किसने है।
जब किसी चैनल की डिबेट में पैनलिस्टों को मुर्गे की तरह लड़ाया जाता है; जब किसी स्टूडियो में बैठे एंकर शालीनता, सभ्यता और शिष्टता की समस्त मर्यादाएँ लांघते हैं; जब पीत पत्रकारिता के दम पर चार-चार दिन लोगों को मूर्ख बनाया जाता है तब भी हम पलटकर दूरदर्शन के समाचार बुलेटिन पर नहीं लौटते। जब हम अख़बार के चालीस पन्नों में से तीस में विज्ञापन और बाकी दस में ग्लैमर और हिंसा देखते हैं, तब हम उस पत्र के दफ्तर में एक चिट्ठी नहीं लिखते कि जिन पन्नों पर ख़बर, समसामयिक लेख, साहित्य, विचार प्रधान संपादकीय छपते थे; जिनमें छपा ‘बच्चों का कोना’ पढ़कर हमारा बचपन अख़बार पढ़ना सीखा है; उन पर ये क्या छाप कर हमारी बालकनी को गंदा कर रहे हो?
विश्वास कीजिये, बीहड़ बन चुके इस मीडिया में अभी भी उस पत्रकारिता के कुछ बीज ‘दबे हुए हैं’ जिन्हें हमारी दृष्टि का थोड़ा-सा पानी और समर्थन की थोड़ी-सी धूप मिल गई, तो ये वीराना फिर से लहलहा उठेगा।

✍️ चिराग़ जैन

माई लाॅर्ड

महिला का एक बयान
आपको
जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा सकता है;
इसलिए
शरीफ़ आदमी
महिला से पंगा लेने से डरता है।

…लेकिन अपराधी नहीं डरता
अपराधी तो
सबको एक नज़र से देखता है
आदमी-औरत, सवर्ण-दलित
ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा;
इन सबसे अपराधी को क्या मतलब पड़ा?

अपराधी
लिंग और जाति देखे बिना
सीधा अपराध पर आता है;
इसलिए झट से अपराध कर जाता है।
लेकिन क़ानून झट से न्याय नहीं कर पाता है।
क़ानून को सब कुछ देखना पड़ता है;
इसलिए अपराधी ख़ुद को
निर्दोष साबित करने की बजाय
केवल कमज़ोर साबित करता है।
कमज़ोर साबित होते ही
न्याय उसके पक्ष में झुक जाता है
और निष्पक्षता की उम्मीद का पहिया
रुक जाता है।

इसीलिए
शरीफ़ आदमी कचहरियों से डरता है
और अपराध;
(चाहे दाएँ कठघरे में खड़ा हो या बाएँ में)
झुके हुए क़ानूनों के दम पर अकड़ता है।

शराफ़त का तो पता नहीं माई लॉर्ड!
पर बेईमानी को पहचानना
बेहद आसान है
जो अपनी कमज़ोरी का कार्ड दिखाकर
ख़ुद को ईमानदार साबित करे
वह सबसे बड़ा बेईमान है।

✍️ चिराग़ जैन

जाति न पूछो शब्द की

जो समाज अपनी भाषा के प्रति लापरवाह होता है, उसके हाथों से उसकी संस्कृति फिसल जाती है। भारत में, वह भी उत्तर भारत में, उस पर भी उत्तर प्रदेश में हिंदी भाषा की परीक्षा के परिणाम आश्चर्य से अधिक क्षोभ से भर देते हैं।
राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की महानता का ढोल पीटने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो आशा जगी कि अब संस्कृत और हिंदी भाषा का उद्धार हो जाएगा। लेकिन इसी सरकार के कार्यकाल में संस्कृत की पढ़ाई के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लग गए। विश्विद्यालयों में हिंदी भाषा और संस्कृत भाषा की स्थिति दयनीय हो गई।
कलाओं के संवर्द्धन के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक पूरा प्रकल्प ‘संस्कार भारती’ के नाम से चलता है। इस प्रकल्प की स्थापना के पीछे भी यही सोच थी कि कविता, नृत्य, संगीत और लोककलाओं की इम्यूनिटी बढ़ाई जाए तो सांस्कृतिक प्रदूषण से देश की सेहत बची रहेगी। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य पुरस्कारों की सूची में से कविता और साहित्य को बाहर करने में मिनिट नहीं लगाया। सूर, तुलसी, निराला, प्रसाद, महादेवी, बच्चन जैसे कवियों का उत्तर प्रदेश कवियों को सम्मानित करने से पल्ला झाड़ गया।
वामपंथी सरकार में हों तो उनका भारतीय कलाओं और भारतीय संस्कृति से विशेष वैर है ही। कविता के नाम पर जो कुछ वे पढ़ाते हैं उससे अच्छे-ख़ासे कवियों का मोहभंग हो जाए। हाँ, मानवतावाद का उनका दृष्टिकोण स्तुत्य है किंतु वे उस समस्या के दूसरे चरम पर खड़े हो जाते हैं, जिसके एक छोर पर राष्ट्रवाद खड़ा है।
वामपंथियों की सत्ता विश्विद्यालयों में रही तो उन्होंने लालित्य से हीन भाषा और संस्कृति से हीन कलाओं को थोपकर भाषा और कलाओं का बेड़ा गर्क किया। समाजवादियों और सेक्यूलरों के पास भी राजनीति की व्यस्तताएँ इतनी अधिक हैं कि इन्होंने भी भाषा और शिक्षा के प्रति कोई विशेष गंभीरता नहीं दिखाई, लेकिन इन दोनों ने शिक्षा में भाषा की स्थिति को दयनीय बनाने का भी कोई उपक्रम नहीं किया। अब ये आए तो इन्होंने स्वयं को इतना महान मान लिया कि मीरा, सूर, कबीर को पाठ्यक्रम से नदारद करने में भी संकोच नहीं किया क्योंकि उन पृष्ठों पर विचारधारा को पोषित करनेवाली सामग्री प्रकाशित करनी आवश्यक लगी होगी।
जिस ज़मीन को कविता की जुताई नसीब न हो, उस पर न तो संस्कार बोए जा सकते हैं, न ही संस्कृति। एक समय में उत्तर प्रदेश का हिंदी पाठ्यक्रम सर्वश्रेष्ठ होता था। डॉ मुरली मनोहर जोशी ने विज्ञान का शोध हिंदी भाषा में इसी प्रदेश से किया। यहाँ की बोलियों का लालित्य, यहाँ की भाषा, यहाँ का उच्चारण, यहाँ का लोक साहित्य… यह सब छिन गया तो संस्कृति का नाम संग्रहालयों में भी नहीं मिलेगा।
विचारधाराओं के इस नाटक में भाषाएँ नेपथ्य में जा रही हैं और कलाएँ बेचारगी के साथ कोने में पड़ी कुम्हला रही हैं। कलाकार का नाम जानने से पहले उसकी वैचारिक जाति पूछी जाती है। कविताओं से उनका गोत्र और सहित्य से उसका आधार कार्ड मांगा जा रहा है। विमर्शों की महामारी से ग्रस्त हिंदी साहित्य पहले ही जर्जर हुआ जाता है, ऐसे में प्रतिभा से उसकी जाति पूछकर सरकारी तंत्र करेले की बेल को नीम पर चढ़ाने का काम कर रहा है। इन हालों आप समाज से उसकी भाषा छीन लेंगे, और गूंगा समाज अपने नेताओं के जयकारे भी नहीं लगा पाता।

✍️ चिराग़ जैन

लोककल्याणकारी गणतंत्र

शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, सुरक्षा और आजीविका -ये किसी भी सामाजिक मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। इसके अतिरिक्त सड़क, यातायात आदि भी अनेक सुविधाएँ हैं, जो राज्य, नागरिकों के लिए जुटाता है, और नागरिक इसके एवज में सरकार को कर देता है। आपदा के समय सरकारें जो मुआवजा देती हैं, वह भी इन्हीं मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से दिया जाता है।
भारत में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी व्यवस्थाओं की हालत इतनी ख़स्ता है कि यदि कोई अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाता है तो सामाजिक दृष्टि से यह उसके निकम्मेपन और बच्चों के प्रति लापरवाही का प्रमाण बन जाता है। सरकारें बदलती हैं तो इतिहास का पाठ्यक्रम बदल जाता है लेकिन सरकारी स्कूलों का ढर्रा नहीं बदलता।
निजी शिक्षण संस्थान बच्चों के अभिभावकों की हैसियत देखकर बच्चे को प्रवेश देते हैं। सरकारें ‘लोककल्याण’ का ढोल पीटने के लिए ‘बीपीएल कोटा’ जैसी व्यवस्थाएँ करती हैं, लेकिन इन योजनाओं का क्या हश्र होता है, यह कमोबेश सबको पता है। इस विषय पर कटाक्ष करते हुए इसी देश में ‘हिंदी मीडियम’ नाम से एक फ़िल्म भी बनी। क़माल यह है कि जिस फ़िल्म को देखकर हमारी आँखें शर्म से गड़ जानी चाहिए थीं, उसे हमने एक कॉमेडी फिल्म से ज़्यादा महत्व नहीं दिया।
सरकारी अध्यापकों के पास पढ़ाने के अतिरिक्त अनेक दायित्व हैं। पोलियो की दवाई पिलाना, वोटर लिस्ट बनाना, वोटर पर्ची बाँटना, राजनेताओं के दौरे के समय बच्चों को मंत्री जी की जय बोलने की ट्रेनिंग देना और इस प्रकार के तमाम कार्यों में बेचारे इस हद्द तक उलझे रहते हैं कि बच्चों की पढ़ाई के लिए समय ही नहीं मिलता।
किताबें धरी रह जाती हैं और बच्चे व्यवस्था की जटिलताओं और तंत्र की नाकामियों के बीच जीवित रहने के गुर सीख जाते हैं। बिना स्कूल जाए हाज़िरी कैसे लगवाई जाए यह विद्यार्थियों की व्यवहारिक शिक्षा का प्रथम अध्याय बन जाता है।
अव्वल तो पाठ्यक्रमों के आधार पर पढ़ाई होती नहीं, और जहाँ होती भी है, वहाँ पूरी शिक्षा व्यवस्था सभ्य नागरिकों का निर्माण करने में विफल होती दिखाई देती है। सड़कों पर फैली गंदगी, बेतरतीब दौड़ते वाहन, किशोर अवस्था के अपराध, पढ़े-लिखे लोगों द्वारा ऑनलाइन की जा रही ठगी, सार्वजनिक संपत्ति का ध्वंस, सोशल मीडिया पर आग की तरह फैलती भ्रामक जानकारियाँ और ‘कृपया यहाँ न थूकें’ जैसी तख्तियाँ इस बात की गवाही हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था सभ्य नागरिकों का निर्माण करने में विफल हुई है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी ख़ज़ाने का बड़ा हिस्सा वितरित किया जाता है। लेकिन सरकारी स्तर पर नागरिकों को स्वास्थ्य के लिए कितनी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है; यह कहने की ज़रूरत नहीं है। शिक्षा की तरह ही यदि आप अपने घरवालों का इलाज सरकारी अस्पताल में करवा रहे हैं, तो समाज आपको बेचारा करार दे देता है।
मैं इस बात की गवाही देता हूँ कि भारत के सरकारी अस्पतालों में सर्वश्रेष्ठ उपचार उपलब्ध है, किन्तु जनसंख्या के अनुपात में इन अस्पतालों की मात्रा इतनी कम है कि उपचार की प्रतीक्षा में सरकारी अस्पतालों के गलियारों में घिसट रहे नागरिकों को देखकर मन खिन्न हो जाता है।
उधर निजी अस्पतालों में मरीज के स्वास्थ्य से अधिक वरीयता अस्पताल के आर्थिक लाभ को दी जाती है। मुर्दों को वेंटिलेटर पर रखकर बिल बनाए जाने की अमानवीयता तक इस देश ने झेली है। टेस्ट लेबोरेटरी से लेकर मेडिकल स्टोर तक इतना पुख़्ता और ईमानदार माफ़िया सक्रिय है कि एक बार बीमार होने के बाद आप निजी स्वास्थ्य सेवाओं की किसी भी दुकान पर चले जाइये, आपसे की हुई कमाई पूरे तंत्र में ईमानदारी से बाँट ही ली जाएगी। आपका नाम एक बार पंजीकृत हुआ नहीं कि डॉक्टर, अस्पताल, मेडिकल स्टोर, दवाई कम्पनी और पैथोलॉजी लैब तक सबका मीटर डाउन हो गया। एक डॉक्टर एक बार टहलने निकलता है; जिसे दौरा या विज़िट कहते हैं; इस बीच जिस-जिस ग्राहक के बिस्तर के पास से गुज़रेगा उस-उसके बिल में डॉक्टर साहब के विज़िटिंग चार्ज जुड़ जाएंगे। आजकल कोरोना की बदौलत ‘आपदा में अवसर’ तलाशते हुए पीपीई किट के चार्ज भी जुड़ गए हैं। एक ही पीपीई किट को पहनकर एक वार्डबॉय सौ मरीज़ों का बुखार नापेगा और वह एक किट सौ मरीजों के बिल में प्रकट हो जाएगी। डॉक्टर के चार्ज अलग, शल्य चिकित्सा के चार्ज अलग, दवाइयों के चार्ज अलग, नर्सिंग स्टाफ के चार्ज अलग, सफाई कर्मचारी तक के चार्ज जोड़ दिए जाते हैं। अस्पताल की पार्किंग ख़ूब महंगी और अस्पताल के केफिटेरिया तक में खुली लूट। बाहर से खाने-पीने का सामान लाने की अनुमति नहीं, क्योंकि यदि बाहर से 10 रुपये की चाय लेकर अस्पताल में आ सके तो अस्पताल की सत्तर रुपये की चाय कौन पियेगा।
इन सबसे तंग आकर यदि आपने अदालत का दरवाज़ा खटखटा दिया तो समझ लीजिए आपका शेष जीवन व्यस्त हो गया। सब जानते हैं कि अदालतों में केस लड़ते-लड़ते आदमी की उम्र गुज़र जाती है, इसीलिए ‘कोर्ट-कचहरी के झमेलों में कौन पड़े’ और ‘अदालत के चक्कर काटते-काटते एड़ियाँ घिस जाएंगी’ जैसे वाक्य हमारे नागरिक जीवन का अंग बन गए हैं। अदालत की इसी व्यवस्था का लाभ उठाकर पेशेवर ठग जनता को लूटते रहते हैं। शिक़ायत करनेवाला अदालत जाने से डरता रहता है और अपराध करनेवाला अदालत का नाम सुनते ही ख़ुश हो जाता है, क्योंकि वह जानता है कि शिक़ायत होने के बाद फैसले आने से पहले हौसले टूट जाते हैं।
अदालतें कहती हैं कि मुआमले ज़्यादा हैं इसलिए न्याय में देरी होती है; लेकिन मन कहता है कि न्याय में देरी होती है, इसलिए मुआमले ज़्यादा हैं। बिल्डर ने पैसे लेकर फ्लैट नहीं दिया। इस मुआमले में भी जब दशक बीत जाते हैं तो न्याय व्यवस्था की नीयत पर से विश्वास उठ जाता है।
सुरक्षा के लिए नागरिकों के बीच जो सरकारी व्यवस्था है, वह पुलिस कहलाती है। पुलिस की कार्यवाही के दो पक्ष हैं। एक उन फिल्मों की तरह है जिनमें हीरो ईमानदार पुलिसवाला है, उससे पता चलता है कि ईमानदारी के साथ पुलिस महकमे में काम करना कितना असम्भव है। दूसरा उन फिल्मों की तरह है जिसमें हीरो अपराधी है, उनसे यह पता चलता है कि पुलिस को ख़रीदना और पुलिस को चकमा देना कितना आसान है। दोनों ही स्थितियों में आम आदमी पुलिस व्यवस्था से निराश हो जाता है। पुलिसिया भ्रष्टाचार और थानों में किया जाने वाला व्यवहार सभ्य नागरिक को थानों में जाने से बचने की सलाह देता है। इज़्ज़त और सभ्यता से पुलिस विभाग का दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। पुलिस यह तर्क देती है कि यदि वे सख्त न हों तो जनता उनकी बात नहीं मानेगी। इस सबसे वह दौर याद आता है जब अंग्रेजों की शासन व्यवस्था में पुलिस का काम भारतीय जनता के बीच डर क़ायम रखना था। सत्ता बदल गई, लेकिन पुलिस का काम करने का ढर्रा वही रहा। दरोगा को माई-बाप और जनाब कहने की हमारी आदतों ने हमें कभी यह आभास ही नहीं होने दिया कि हमारे जन्म से पहले 15 अगस्त 1947 को आज़ादी का नाटक इस देश में खेला जा चुका है।
रह गई आजीविका। उसमें प्रारम्भ से अब तक जो कुछ किया गया है वह ऊँट के मुँह में जीरा ही साबित हुआ है। इसमें अकेले सरकार दोषी नहीं है। जो नागरिक सरकारी नौकरियों में लग गए उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा भत्ते, रिश्वत, आरम्परस्ती और छुट्टियाँ गिनने में खपा दी। अव्वल तो स्टाफ ही नहीं है, जो स्टाफ है वह अपनी कुर्सी पर बैठकर स्वयं को सरकार ही समझता है। काम करने से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि टेबल के उस पार खड़ा नागरिक कुर्सीवाले का आदर कर रहा है या नहीं। यह आदर प्रदर्शित करने में जुड़े हुए हाथ, टिके हुए घुटने, रिरियाता चेहरा उपयोगी सिद्ध होता है। हाँ, जो नागरिक टेबल के नीचे हाथ घुसाकर करारी आवाज़ से साहब को प्रसन्न कर दे, उसके लिए मापदंड अलग हैं। दफ्तरी संस्कृति में कितने ही परिवारों की ज़िंदगी घुट-घुटकर दम तोड़ चुकी है। कितनी आश्चर्यजनक बात है, जो व्यवस्था हमारे जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए लागू की गई, उसकी जटिलताओं में ही जीवन होम हुआ जा रहा है।
स्कूल हैं तो पढ़ाई नहीं है, पढ़ाई है तो परीक्षा की प्रक्रिया, उससे बच निकले तो कॉपी जाँच के भ्रष्टाचार में मारे जाओगे। वहाँ से भी बचे तो परिणाम में मिस्टेक रहेगी, वह नहीं हुआ तो नौकरी ढूंढने के महाव्यूह, फिर जॉइनिंग की जटिलताएँ… सिस्टम तब तक आपका पीछा करेगा जब तक आप थककर गिर न पड़ें।
जो राज्य में विश्वास न रखे उसे अराजक कहा जाता है। मैं अराजकता का समर्थन नहीं करता लेकिन राज्य पर विश्वास कैसे किया जाए – यह उपाय जानने का उत्सुक हूँ।
इस लेख को पढ़कर अनेक लोग मुझे भाजपाई, कांग्रेसी, वामपंथी, समाजवादी और न जाने किन किन खेमों में खड़ा करेंगे। लेकिन मेरी लेखनी केवल उनके लिए है जो इन सब झरोखों से दूर होकर एक ख़ालिस भारतीय के जूते में पैर रखकर चिंतन करने को तैयार हो। क्योंकि मैं जानता हूँ कि नेहरू जी के अंदाज़े की ग़लती से जो युद्ध हुआ था उसका खामियाजा भी नागरिक ने ही भुगता था और मोदी जी ने जल्दबाज़ी में जो निर्णय लिए उनका खामियाजा भी नागरिक ही भुगत रहा है।
अगर न्यायपालिका और पुलिस में से किसी एक गलियारे को दुरुस्त किया जाए तो इसका प्रभाव पूरे देश के तंत्र पर दिखने लगेगा। और तब सही अर्थों में राज्य ‘लोककल्याणकारी’ बन सकेगा। झंडों का रंग हो तो हो, लेकिन आँसुओं का कोई रंग नहीं होता साहब।

✍️ चिराग़ जैन

विज्ञापन का जनहित

कोरोना वायरस लॉन्च होते ही साबुनों के विज्ञापन की भाषा बदल गई। हमें बताया गया कि ‘कोरोना वायरस से बचाव के लिए अमुक साबुन से बीस सेकेंड तक हाथ धोएँ।’ च्यवनप्राश कम्पनियों ने बताया कि ‘कोरोना वायरस से बचाव के लिए इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए अमुक च्यवनप्राश खाएँ।’ डिजिटल फाइनेंस कम्पनियों ने बताया कि ‘डिजिटल पेमेंट अपनाएँ, ख़ुद को कोरोना के ख़तरे से बचाएँ।’ रिटेल होम डिलीवरी सर्विसेज ने बताया कि ‘घर से बाहर निकलकर कोरोना को आमंत्रित न करें, हम आपका सामान आपके घर पहुँचा देंगे।’ दवाई कम्पनियाँ भी ठीक इसी तर्ज पर ‘पहले से उपलब्ध दवाइयों को बेचने के लिए’ कोरोना की परिस्थितियों का लाभ उठा रही हैं।
मज़े की बात यह है कि इनमें से एक भी कम्पनी अपने विज्ञापन में शत प्रतिशत झूठ नहीं बोल रही। यह बाज़ार की सामान्य प्रवृत्ति है कि वह कोई भी चोगा पहन ले, लेकिन उसका प्राथमिक उद्देश्य व्यापार ही होगा।
बाज़ार हमारे भय का लाभ उठाता है। उसे पता है कि इस समय हम कोरोना से भयभीत हैं, इसलिए इस भय का नाम लेकर जो कुछ बेचा जाएगा, वह बिक जाएगा। इसी भय का लाभ अधकचरे ज्योतिष, पोंगा पंडित, नीम हकीम, तंत्र-मंत्रवाले बाबा, झाड़-फूँक वाले मौलवी भी उठाते हैं।
बाज़ार पहले मांग पैदा करता है, फिर माल बेचता है। और अगर किसी प्राकृतिक कारण से कोई मांग स्वतः उत्पन्न हो जाए तो अपने माल की पैकेजिंग उसकी पूर्ति के अनुरूप कर लेता है।
भूकम्प, बाढ़, महामारी, भुखमरी, अकाल जैसी परिस्थितियों में ऐसी नई पैकेजिंग अक्सर दिखाई देती है। जब कोई बड़ा भूकम्प आ जाए तो सरिया, सीमेंट और फ्लैटबेचने वाले तुरन्त चिल्लाने लगते हैं- ‘भूकम्परोधी सरिया ले लो; भूकम्परोधी सीमेंट ले लो; भूकम्परोधी फ्लैट ले लो!’ कोई आश्चर्य नहीं कि किसी दिन कोई साबुन कम्पनी यह दावा कर दे कि जो हमारी साबुन से नहाएगा उसकी खूबसूरती भूकम्प के मलवे से ख़राब नहीं होगी। और कोई आश्चर्य नहीं कि हम इसको सच मान लें, क्योंकि हम पानी में डूबी कुर्सी देखकर फेविकोल के मजबूत जोड़ की बात को सच मानते ही आए हैं।
बाज़ार चाहे मजहब का चोगा पहन ले, चाहे समाजसेवा का; चाहे अस्पताल का चेहरा लगा ले, चाहे मीडिया का; चाहे कविता के मंच पर सवार हो, चाहे राजनीति के गलियारों में; उसका प्राथमिक उद्देश्य मुनाफ़ा ही होगा। उसकी नीतियाँ भी बाज़ारू ही होंगी। वह जनता की अभिरुचियों का अध्ययन करते हुए उसके अनुरूप अपने प्रोडक्ट की पैकेजिंग करेगा। ध्यान रहे, वह प्रोडक्ट नहीं बदलता सिर्फ़ पैकेजिंग बदलता है। विज्ञापन का शरीर लोककल्याण की भाषा बोलता है लेकिन उसकी आत्मा बाज़ार की फड़ पर खड़ी होकर माल बेचने में संलग्न होती है।
जो लोग बाज़ार तलाशते हुए साहित्यकार या कवि बने फिरते हैं, वे समाज को न तो कोई नया विचार दे पाते हैं, न ही कोई नई बात। यदि समाज उद्वेलित हो तो वे भड़काऊ लेखन से उनके उद्वेलन में वृद्धि करने लगते हैं। वे अपने लेखन के दम पर समाज का मूड बदलने का कोई उपक्रम नहीं करते, वरन समाज का मूड देखकर अपने लेखन की भाषा बदल लेते हैं।
इस सबसे ज़्यादा भयावह यह है कि अब राजनीति भी बाज़ार के सिद्धांतों पर चलने लगी है। वही डर का सिद्धांत। पहले तंत्र की अनियमितताओं को उजागर किया जाता है। वर्तमान सरकार के प्रति असंतोष को बढ़ावा दिया जाता है। और जैसे ही जनता असंतोष से भर जाती है, तो बेनक़ाब करनेवाले ख़ुद वोट मांगने के लिए झोली पसार देते हैं।
यह कथन किसी भाजपा, किसी कांग्रेस, किसी वामपंथ, किसी समाजवाद पर ही नहीं अपितु वर्तमान राजनीति की पूरे चरित्र पर लागू होता है।
ऐसे में सही राजनेता, सही साहित्यकार, सही दवा विक्रेता, सही मीडिया और सही मजहब की पहचान करने का तरीका क्या है। हो सकता है मेरा मत शत प्रतिशत सटीक न सिद्ध हो, किन्तु यदि गम्भीरता से विचार करें तो सम्भवतः हम वर्तमान बाज़ारवाद के शिकंजे को कुछ तो ढीला कर सकेंगे।
‘समाज की सामान्य सोच के विपरीत बात कहनेवाला व्यक्ति इस बात की पुष्टि करता है कि वह व्यक्तिगत रूप से हानि उठाकर भी अपनी बात कहने के लिए कटिबद्ध है। ऐसे व्यक्ति की बात को भी यदि हम आँख बंद करके सुनने की बजाय थोड़ा-सा विवेक लागू करके सुनें/समझें तो बाज़ार के हो-हल्ले में शायद सच की हल्की-सी आवाज़ हमारे कानों तक पहुँच सके।’

✍️ चिराग़ जैन

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