Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
बात 2011 की है। उन दिनों मैं जम्मू में नौकरी करता था। पहली बार अपने घर से दूर, अकेला रह रहा था। सत्वारी के लक्ष्मी निवास में पेइंग गेस्ट की तरह रहता था। बिना बतियाए न रह पाने की आदत के कारण सप्ताहांत काटना पहाड़ जैसा लगता था।
उस घर का आंगन बहुत बड़ा था। यह आंगन मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं था। अकेलेपन का अभिशाप झेलने को विवश; मैंने आंगन की फुलवारी से दोस्ती कर ली।
जम्मू की भूमि बहुत उर्वरा है। लीची, आम, अंगूर, अमरूद, नारंगी, नाशपाती और अखरोट के पेड़ लगभग हर आंगन का हिस्सा हैं। मैंने लक्ष्मी निवास के आंगन की फुलवारी से बतियाना शुरू किया। तरह-तरह के पॉम, गोल्डन डुरंटा की हैज, वॉल स्टिक और तमाम पौधों के साथ समय बीतने लगा। ख़ूब चित्र खींचता अपने इन दोस्तों के।
एक दिन बरसात की बूंदें, आंगन की फुलवारी के साथ खेलने आईं। मैं भी कैमरा लेकर इस उत्सव को सहेजने लगा। उस दिन पहली बार, मैंने आनन्द को बरसते हुए देखा। उस दिन पहली बार, मैंने पोर-पोर तृप्त होने का अर्थ समझा। उस दिन पहली बार,मुझे आभास हुआ कि प्यास बुझने का सुख कैसा होता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
जो बड़ा होता है, उसे बताना नहीं पड़ता
जिसे बताना पड़ता है, वो बड़ा नहीं होता
जो अपना होता है, उसे सफ़ाई नहीं देनी पड़ती
जिसे सफाई देनी पड़े, वो अपना नहीं होता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Purushottam, Quotation
रामजी ने जिस मुहूर्त में कोई शुभकार्य किया, ग्रहों के उसी संयोग को हम शुभ मुहूर्त मानते थे। आज राजनीति ने हमें इस कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है कि रामजी के मंदिर के लिए शुभ मुहूर्त का टंटा पड़ रहा है।
अरे, उनका नाम लेकर तो जिस मुहूर्त में ईंट रख दो, वही शुभ है मूढ़ो! भूल गए क्या, उनके नाम से तो पत्थर तिर गए थे! पर उस समय राम जी के सब कारज इसलिए सिद्ध हो जाते थे, क्योंकि तब नल-नील की पूरी ऊर्जा पुल बनाने में केंद्रित थी, यदि वे भी राजनीति कर रहे होते तो चार सीटें फालतू मिलने पर रावण के हाथों बिक जाते और राम जी के आगे नाटक करते रहते कि ‘पुल वहीं बनाएंगे’!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
हमारे यहाँ युगों-युगों से सब कहते रहे हैं कि अपने मन की सुनो। यह वाक्य इतनी बार कहा गया है कि इसमें प्राण ही न रहे। यह वाक्य नीरस हो गया, निष्प्रभावी हो गया। शब्द-शब्द पड़े रह गए और अर्थ के प्राण पखेरू उड़ गए।
यह सामान्य बात है। यह अक्सर होता है। किसी बात को बार-बार बोलो तो वह निष्प्राण हो जाती है। हमने सुना है कि बार-बार बोलने से मंत्र सिद्ध हो जाते हैं… होते होंगे। मैं मंत्र के विषय में नहीं जानता। मैं तो शब्दों को जानता हूँ, मैं तो वाक्यों को पहचानता हूँ। क्योंकि उन्हीं से मेरा काम पड़ता है।
जिससे हमारा काम न पड़े, उसे पहचानने से क्या लाभ! उसे हम पहचान ही न पाएंगे। किसी को पहचानने के लिए उसको प्रयोग करना आवश्यक होता है। व्यक्ति से लेकर शब्द तक यह बात अक्षरशः सत्य है। जिस शक्ल को आप अपनी स्मृति में किसी अच्छी या बुरी याद के साथ प्रयोग न कर सको, उसे याद रखना बहुत कठिन काम है। बाज़ार में हज़ारों शक्लें हमारे सामने से निकलती हैं, लेकिन वे हमें याद नहीं रहतीं। लेकिन उनमें से कोई हमें गाली बक दे तो उसे हम भूल न पाएंगे। कोई थप्पड़ मार दे, तो उसे मरते दम तक याद रखेंगे। और कोई प्रपोज़ कर दे, फिर तो नींद को भूल जाएंगे, पर उसे न भुला सकेंगे।
सो, मैं शब्दों को जानता हूँ। शब्द मुझे हर समय घेरे रहते हैं। और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिन बातों को बार-बार बोला जाए, वे निष्प्राण हो जाती हैं। आप इसका प्रयोग करके देख लीजिए। आप किसी से मिलकर उसका हालचाल पूछ लें- ‘और सुनाओ, कैसे हो?’ यह वाक्य इतनी बार बोला जा चुका है कि चुक गया है। हमने हाल ही में घर बदला। जहाँ घर लिया है वह स्थान हवाई अड्डे के पास है। हर दो मिनिट बाद एक जहाज गुज़रता है। पहले कुछ दिन तो बड़ा संकट हो गया। नींद ही न आए। लेकिन धीरे-धीरे वह शोर निष्प्राण हो गया। उसने प्रभावित करना बंद कर दिया। अब जैगुआर भी उड़ता है तो हमें संज्ञान ही नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, ‘और सुनाओ, कैसे हो’ भी बोला जाता है… सामने वाला भी यंत्र की तरह ‘बढ़िया हूँ’ बोल देता है। लेकिन इन दोनों ही बातों का कोई प्रभाव नहीं होता।
हम ऐसा अपराध अनेक ज़रूरी वाक्यों के साथ कर चुके हैं। ‘आई लव यू’; ‘आई एम सॉरी’ और ‘हैलो’ से लेकर गालियों तक यही दुर्घटना घटी है। मनुष्य जाति का इतिहास गालियों के इतिहास के बराबर का ही होगा। कभी-कभी तो लगता है कि गालियाँ, मानव जाति से नौ-दस महीने बड़ी ही होंगी। शायद गालियों के अतिरिक्त किसी अन्य तत्व को मनुष्य ने अपने साथ इतनी लंबी यात्रा करने ही न दी होगी। गालियाँ सम्भवतः प्रारम्भ में ही बहुतायत प्रयोग से निष्प्राण हो गई हों। सो, उनको साथ रखने में हमें कोई आपत्ति न हुई। जिसका प्रभाव नहीं, उससे आपत्ति कैसी? आपत्तिजनक होने के लिए प्रभावशाली होना पहली शर्त है।
इसीलिए भीड़ से कभी किसी को कोई आपत्ति न हुई। नेतृत्व ज़रूर आपत्ति को जन्म दे सकता है। यदि आपसे किसी को कोई आपत्ति न हो, तो यह कोई प्रसन्नता का विषय नहीं है। यह ख़तरनाक़ बात है। यह जड़ता का सूचक है। यदि किसी को आपसे कष्ट है, किसी को आपसे ईर्ष्या है, किसी को आपसे आपत्ति है तो उसके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना। वह अवश्य आपसे प्रभावित हुआ है। उसने आपके जीवन को अर्थ प्रदान किये हैं। अन्यथा आपका जीवन किसी गाली से अधिक अस्तित्व न रख पाता।
आपने लोगों के घर पर पुरखों की तस्वीरें देखी होंगीं। आपको आश्चर्य होगा, जब तक वे सब पुरखे जीते थे, तब तक जी का जंजाल बने हुए थे। उनके कारण पूरे घर का जीना हराम था। इसलिए उन्हें अपने घर में रखने को कोई भाई तैयार न हुआ होगा। लेकिन मरने के बाद उनसे कोई कष्ट नहीं हो सकता। अब वे कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। इसलिए हर भाई ने अपने घर में उनकी तस्वीरें जड़वा ली हैं। तस्वीरों से किसी को कोई आपत्ति हो ही कैसे सकती है?
हमने निष्प्रभावी वस्तुओं को, निष्प्रभावी वाक्यों को ढोने में दक्षता प्राप्त की है। क्योंकि उनसे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा ही एक वाक्य है ‘अपने मन की सुनो।’ इस वाक्य में भी प्राण नहीं हैं। इसलिए कोई मन की नहीं सुनता।
और यह बहुत अच्छी बात है कि कोई मन की नहीं सुनता। यदि ग़लती से किसी दिन आपने अपने मन की सुन ली, तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। फिर हर किसी को देखकर मुस्कुराना सम्भव न होगा। मन बोलने लगा तो आपका सामाजिक जीवन नरक हो जाएगा। फिर आप सभ्य न रह सकेंगे। मन का कैनवास तो बहुत वैविध्यपूर्ण है। एक क्षण में, आपको किसी पर प्रेम आने लगेगा। और प्रेम भी ऐसा-वैसा नहीं। पूरा प्रेम। ऐसा कि सोचकर स्वयं आपका ही चेहरा लाल हो जाएगा। और अगले ही क्षण आप उसे पीटने लगोगे। आपने स्वयं न सुनी हों, ऐसी ऐसी गालियाँ बकने लगोगे। इसलिए मन की सुनने में बड़े संकट हैं। मन कभी भी पिटवा सकता है। मन का विधान, किसी भी युग के संविधान को सूट नहीं कर सकता।
इसीलिए जिसने यह भूल कर दी, जिसने अपने मन की सुन ली उसे हमने असभ्य मान लिया, उसे हमने असामाजिक घोषित कर दिया। पापी, अभद्र, चरित्रहीन, उच्छृंखल, अनैतिक, दुराचारी जैसे शब्द मन की सुनने वालों के ही अलंकार रहे हैं। मीरा ने मन की सुनी, उसे ज़हर दे दिया। सुकरात ने मन की सुनी, उसे भी ज़हर दे दिया। हीर-रांझा, सोहनी-मिर्ज़ा, लैला-मजनू ये सब मन की सुननेवाले लोग रहे। हमने इनके साथ क्या किया!
मन की सुनना ख़तरे से ख़ाली नहीं। यदि मन खोलकर रखना हो तो तैयार रहना, कि इसके बाद तत्कालीन नियम तुम्हारे दुश्मन हो जाएंगे। धर्म, समाज, नीति, विधान सब हाथ धोकर पीछे पड़ जाएंगे। फिर बाद में सबको क़िस्से सुनाए जाएंगे।
ये लैला-मजनू के क़िस्से प्यार के क़िस्से नहीं हैं। ये तो दहशत की कहानियाँ हैं; कि देखो, वो आए थे मन की सुनने, हमने उनका कैसा सत्यानाश किया है। पीढ़ियों को ये कहानियाँ इसलिए सुनाई जाती हैं, ताकि वे इन कहानियों से यह शिक्षा ले सकें कि कोई कितनी ही बार कहे, पर भूलकर भी मन की मत सुन लेना।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
नुक्कड़ का पनवाड़ी, चाय की मढ़ैया, बीड़ी-सिगरेट का खोखा, सिटी बस, लोकल ट्रेन और सार्वजनिक शौचालय की लाइन -ये सब चर्चाओं के स्वर्ग हैं। जैसे संसद में पक्ष और विपक्ष होते हैं, ऐसे ही इन चर्चाओं में भी पक्ष और विपक्ष होते हैं। विपक्ष के बिना चर्चा हो ही नहीं सकती। विपक्ष के अभाव में तो केवल गुणगान किया जा सकता है।
कुछ साल पहले तक, ‘केवल चर्चा को जारी रखने के लिए’ हर नुक्कड़ के पान की दुकान पर कुछ लोग ख़ुद को भाजपाई समझ लेते थे, और कुछ ख़ुद को कांग्रेसी। कभी पनवाड़ी फोन पर बतियाने लगता था तो भीड़ बढ़ने पर एकाध सपाई और बसपाई भी मिल जाता था। अगर पनवाड़ी का फोन कॉल लंबा चल जाए तो मनसे, झामुमो, जद, बीजद वगैरा की भी हाज़िरी लग जाती थी। फोन कॉल समाप्त होते ही पनवाड़ी तेज़ी से काम करके सब क्षत्रपों को निबटा देता था और राष्ट्रीय दलों के प्रतिनिधि चर्चा करते रहते थे। जो चर्चा से ऊब जाता था, वो अपने काम पर चला जाता; और जो काम से ऊब जाता था, वो चर्चा करने चला आता था। इन चर्चाओं में पनवाड़ी स्पीकर की भूमिका निभाता था और चर्चा को जीवित रखते हुए दोनों पक्षों को उकसाता रहता था। इस तरह वह चर्चा और पान पर एक साथ चूना लगाता रहता था।
चूँकि इन चर्चाओं से देश की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ता था इसलिए दोनों ही पक्ष चर्चा करते हुए उतने ही गंभीर होते थे, जितने तत्कालीन नेतागण देश को लेकर होते होंगे। इसका यह लाभ था कि चर्चा और संबंध दोनों सुरक्षित रहते थे।
इन चर्चाओं में से अधिकतम का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता था और हर चर्चालु स्वयं ही अपने आप को विजेता समझकर मन लगाकर काम करने लग जाता था।
पिछले कुछ वर्षों से इस संस्कृति को लकवा मार गया। चर्चालुओं का स्थान श्रद्धालुओं ने ले लिया। ये श्रद्धालु चर्चा को लेकर इतने गंभीर होते हैं कि चर्चास्थल से काम पर जाने की बजाय युद्धक्षेत्र की ओर उन्मुख हो जाते हैं। चर्चास्थल से कूच करते समय दोनों ही पक्ष के श्रद्धालु सामनेवाले को शिशुपाल और स्वयं को कृष्ण समझते हुए ‘नितीश भारद्वाज’ मार्का मुस्कान लिए मन ही मन गांधारी की तरह समूल नाश का शाप दे रहे होते हैं।
इन चर्चाओं कुछ बातें ‘मान ली जाती हैं’, जैसे –
1) जो भी व्यक्ति सवाल पूछ रहा है, वह मोदी जी से ही सवाल पूछ रहा है।
2) जो भी व्यक्ति सिस्टम के किसी अंग से ख़फ़ा है, वह इनडायरेक्टली मोदी जी का विरोध कर रहा है।
3) जो मोदी जी का समर्थक नहीं है, वह राहुल गांधी का समर्थक है, इसलिए इसे समझाना बेकार है।
4) जो मोदी जी का समर्थक है, वह समर्थक नहीं, भक्त है। इसलिए इसे समझाना भी बेकार है।
5) जो मोदी जी का समर्थक नहीं है वह चोर है।
6) जो मोदी जी का विरोधी नहीं है, वह मूर्ख है।
7) जो एनडीटीवी नहीं देखता, वह ज़ीन्यूज़ देखता है।
8) जो ज़ीन्यूज़ देखता है, उसे कुछ ग़लत नहीं दिखता।
9) जो मेरे व्हाट्सएप पर आया है, वह किसी और के व्हाट्सएप पर नहीं आया, इसलिये हर अज्ञानी तक ज्ञान की रौशनी पहुँचाना मेरा कर्त्तव्य है।
10) सामनेवाले चर्चालु की आँखों पर एक चश्मा चढ़ा हुआ है, जिसे उतरवाए बिना मेरा मनुष्य जन्म सफल न हो सकेगा।
इन दस बिंदुओं को सामने रखकर चर्चा की गंगा बह निकलती है, और इन्हीं दस बिंदुओं पर हल्की-फुल्की बून्दा-बांदी, मूसलाधार बन जाती है। हर श्रद्धालु सामनेवाले श्रद्धालु को क्रमशः मूर्ख, भ्रष्ट, चोर, ग़द्दार, राष्ट्रद्रोही और पापी समझते हुए, ‘इसे तो वक़्त ही समझाएगा’ का कुंठित शाप देने लगते हैं।
जो श्रद्धालु अपने पंथ के मंदिर के जिस देवता को पूजता है, उसी के अनुरूप चर्चाभक्ति में उसकी भाषा का स्तर गिरता है। हर श्रद्धालु के पास चर्चायज्ञ में बोलने को कुछ रटे-रटाए मंत्र हैं, जिन्हें वह कठोर परिश्रम करके व्हाट्सएप फ़ॉरवर्ड पद्धति से प्राप्त करता है। चर्चा का विषय कुछ भी हो, श्रद्धालु अपने-अपने मंत्र पढ़ते रहते हैं।
चूँकि दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के इन रटे-रटाए जुमलों से परिचित होते हैं इसलिए धार्मिक प्रार्थनाओं की तरह ये चर्चाएँ शोर पूरा करती हैं और असर शून्य।
भाजपा-कांग्रेस; राहुल-मोदी और भक्त-चमचा के आधार पर बँट रही जनता में फैलते विद्वेष को देखकर राजनीति अपने पूर्ववर्ती नेताओं का धन्यवाद ज्ञापन करती है कि जिस जनता को उन्होंने प्रजा बनकर रहना सिखाया था, वह अब श्रद्धालु बनकर एक-दूसरे से घृणा करके कितनी ख़ुश है!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
आँखन में कजरा धर राधा ने श्याम के रूप को नैन बसायो
श्याम ने बाँसुरी होंठ लगाय के राधा के होंठों पे साज सजायो
राधा ने श्याम को श्याम ने राधा को होरी की भोरी ही रंग लगायो
देह से देह रही बिरहा पर नेह से नेह नहीं बिसरायो
✍️ चिराग़ जैन