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खो गई है पाती

‘डाकखाना’ – यह केवल एक शब्द नहीं, एक पूरी संस्कृति है। संचार की सबसे प्रारंभिक अवस्था से मनुष्य का साथ देनेवाली चिट्ठी; संस्कृति में इतनी रची-बसी रही कि उस पर गीत लिखे गये। चिट्ठी, खत, पाती, नामा, लिफ़ाफ़ा, मजमून, नामाबर, डाकिया, तार, पोस्टकार्ड, डाकबाबू, लैटर बॉक्स, डाकटिकट और न जाने कितने ही शब्दों से सुसज्जित यह डाक-व्यवस्था शायरी और कविताओं के साथ साथ कहानी और उपन्यासों का भी महत्वपूर्ण अंग रही है।
‘पीली चिट्ठी’ मांगलिक अवसर का प्रतीक होती थी और कोना फटा हुआ पोस्टकार्ड अशुभ की सूचना लेकर आता था। चिट्ठी में लिखा गया एक-एक शब्द महत्वपूर्ण होता था। व्यक्तिगत चिट्ठियों में हाशिये पर की गई चित्रकारी देखकर पानेवाले को लिखनेवाले की मनोदशा का दर्शन हो जाता था।
चिट्ठी के प्रारम्भ में ‘आपका पत्र मिला’; ‘अत्रं कुशलं तत्रप्यस्तु’; ‘हम सब यहाँ कुशलतापूर्वक हैं, आशा है आप सब भी कुशल होंगे’ जैसे वाक्यांश औपचारिक होने के बावजूद रसपूर्ण लगते थे। इसी प्रकार ‘बड़ों को चरण स्पर्श और छोटों को ढेर सारा प्यार’ जैसा वाक्य चिट्ठी से पूरे परिवार को जोड़ देता था।
लैटर बॉक्स के नीचे सुरंग की कल्पना और रात में चिट्ठी पहुँचानेवाली परियों की कल्पना करनेवाला बचपन भी डाक-संस्कृति के साथ ही कहीं गुम हो गया। डाकिये की प्रतीक्षा करने वाली दोपहरी भी अब समय के चक्र से विदा हो गई हैं।
साथ ही नदारद हो गये हैं वे गीत, जो डाक संस्कृति के इर्द-गिर्द रचे जाते थे। ‘मास्टर जी की आई चिट्ठी’; ‘हमने सनम को ख़त लिखा’; ‘जाते हो परदेस पिया, जाते ही ख़त लिखना’; ‘कबूतर जा-जा’; ‘चिट्ठी आई है’; ‘चिट्ठी न कोई संदेश’; ‘ख़त लिख दे साँवरिया के नाम बाबू’; ‘फूल तुम्हें भेजा है ख़त में’; ‘डाकिया डाक लाया’; ‘डाक बाबू आया’; ‘संदेसे आते हैं’; ‘लिखे जो ख़त तुझे’; ‘फूलों के रंग से दिल की क़लम से तुझको लिखी रोज़ पाती’; ‘सुन ले बाबू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम’; ‘तेरे खुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे’ और ‘मैंने ख़त महबूब के नाम लिखा’ जैसे दर्जनों गीत हिंदी सिनेमा की तवारीख़ में हीरों की तरह जड़े हुए हैं।
कवि-सम्मेलनों में भी चिट्ठी का ख़ूब चलन रहा। मुझे अच्छी तरह याद है। हापुड़ के एक कवि-सम्मेलन में श्वेतकेशा ज्ञानवती सक्सेना जी ने एक गीत पढ़ा- ‘ऐसे में क्या चिट्ठी लिखूँ, जब कोना फटने के दिन हैं!’ गीत उनकी वय पर इतना एकरूप प्रतीत हुआ कि उसकी संवेदना ने भीतर तक सिहरन उत्पन्न कर दी थी। किशन सरोज जी का गीत ‘कर दिये लो आज गंगा में प्रवाहित सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र तुम निश्चिंत रहना’ श्रोताओं के मन और नयन दोनों को तर कर देता था। माया गोविंद जी का ‘डाकिये ने द्वार खटखटाया, अनबाँचा पत्र लौट आया’ गीत लोकप्रियता के कीर्तिमान खड़े कर गया। आज भी डॉ विष्णु सक्सेना जब अपने मुक्तक की चौथी पंक्ति पढ़ते हुए कहते हैं कि, ‘उसने गुस्से में मेरा ख़त चबा लिया होगा’ तो चिट्ठियों के सहारे जवान हुई हज़ारों प्रेम कहानियाँ जीवंत हो उठती हैं।
उर्दू शायरी भी इस विषय से भरी पड़ी है। ‘नामाबर तू ही बता तूने तो देखे होंगे/कैसे होते हैं वो ख़त, जिनका जवाब आता है’ सरीख़े सैंकड़ों अशआर लोगों की ज़ुबान पर चढ़े।
दाग़ देहलवी साहब का मशहूर शेर ‘तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था/मैं था रक़ीब तो आखि़र वो नाम किसका था’; किसी उपन्यास का कथानक बन जाने की क्षमता रखता है। ‘लिफ़ाफ़ा देख के मजमून भाँप लेते हैं’ जैसे मिसरे मुहावरे बनकर मक़बूल हो गये। हाल ही में वाशु पाण्डेय ने भी चिट्ठियों में बन्द मुहब्बत की इबारत को बयान करते हुए कहा कि, ‘क़ासिद चिट्ठी तैश में आकर लिखी थी/ ले जाओ, पर देना मत शहज़ादी को’।
तकनीक बदली तो यह सब कुछ फ़ना हो गया। मोबाइल पर एसएमएस या कंप्यूटर पर ईमेल भेजनेवाली पीढ़ी को चिट्ठियों की उस जादुई दुनिया का अनुमान तक नहीं है। उदयप्रताप सिंह जी का ये शेर पढ़ते हुए आज भी मन तीन दशक पुरानी यादों में खो जाता है, ‘मोबाइलों के दौर के आशिक़ को क्या पता, रखते थे कैसे ख़त में कलेजा निकालकर’।
ब्याहता बिटिया की चिट्ठी मिलने पर माँ का खिला हुए चेहरा; होस्टल में रह रहे बेटे को चिट्ठी लिखती माँ की भीगी हुई पलकें; चिट्ठी में लिखे गये शब्दों के साथ अनलिखा दर्द पढ़ लेने का हुनर; हाशिये पर बनी चित्रकारी से मनोदशा पहचान लेने की कला और राखी के त्यौहार पर बहन की चिट्ठी खोलते भाइयों का कौतूहल अब देखने को नहीं मिलता।
‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ जैसी किताबें चिट्ठियों की अहमियत का चित्र प्रस्तुत करती हैं। लेकिन आज ‘ख़ून से लिख रहा हूँ स्याही न समझना’ सरीख़े मिसरे दूर खड़े होकर धूल खा रहे लैटर बॉक्स देखकर बिलख पड़ते होंगे। निदा साहब की दो पंक्तियाँ रह-रहकर उस क़िरदार की याद दिलाती हैं जिसे हम डाकिया कहते थे – ‘सीधा-सादा डाकिया जादू करे महान/एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान’।
टीवी और रेडियो पर चिट्ठियाँ भेजने का रिवाज़ अब इतिहास बन चुका है। संपादक के नाम पत्र और प्रकाशनार्थ रचना भेजने की क़वायद हम भूल चुके हैं। न ही संपादकों को अब ‘खेद सहित’ रचना लौटाने का स्वाद पता है।
आज विश्व डाक दिवस पर रमेश शर्मा जी के गीत का मुखड़ा एक पूरी परम्परा को श्रद्धांजलि देता हुआ जान पड़ता है – ‘ओ दूरभाष की सुविधाओं, मुझे वो चिट्ठी लौटा दो!’

✍️ चिराग़ जैन

भोर से ठीक पहले

रेत, अंतिम बून्द भी यदि सोख ले अपनी नदी की
साफ़ मतलब है पहाड़ों की बरफ़ अब गल चुकी है
रात का अंधियार जब अपने चरम पर आ गया हो
तब समझना, सूर्य की पहली किरण अब चल चुकी है

त्यौरियों के बोझ से भौंहें भले दुखने लगी हों
होंठ की बस एक हरक़त से हवा हो जाएंगी ये
ये निराशा, ये उदासी, ये परेशानी जगत् की
एक पल की आस जगते ही कहीं खो जाएंगी ये
दिन ढले कल धैर्य ने कुछ बीज बोये थे हृदय में
सिर्फ़ दो पल और ठहरो, वह प्रतीक्षा फल चुकी है

आँख से कह दो कि अब उजियार की मत आस छोड़े
जब सुबह होगी, इसी को लालिमा का दर्श होगा
कान, जो वीरान सन्नाटा लपेटे फिर रहे हैं
चंद घड़ियों में इन्हीं को कलरवों का हर्ष होगा
बस अभी दुर्भाग्य को तुम हाथ मलते देख लेना
भाग्य की देवी कहीं पर आँख अपनी मल चुकी है

सिर उठाओ, देख लो पूरब निखरने लग गया है
होंठ फैलाओ, सवेरा सृष्टि पर छाने लगा है
खोल दो बाँहें, पवन सौरभ लुटाता आ रहा है
पंछियों का दल गगन में झूम कर गाने लगा है
श्वास में स्वर घोल कर आकण्ठ उत्सव में उतर लो
भैरवी गाओ, अंधेरी रात जग से टल चुकी है
✍️ चिराग़ जैन

राजनीति की फ़िल्म इंडस्ट्री

राजनीति की स्क्रिप्टिंग और प्रशासन का अभिनय देखकर लगता है कि उत्तर प्रदेश में फ़िल्म इंडस्ट्री बनाने का विचार निराधार नहीं था।
✍️ चिराग़ जैन

बलात्कार को ओनर किलिंग बनाने की शुरुआत

सियासत किस तरह करती रही बर्ताव, मत भूलो
कुरेदेंगे तुम्हारे ही बदन के घाव, मत भूलो
तुम्हारी चीख़ से कुर्सी न हिल जाये मसीहा की
अरे ओ हाथरस वालो, अभी उन्नाव मत भूलो

✍️ चिराग़ जैन

रोटी का स्वाद

एक फ़कीर किसी गाँव में प्रवास कर रहे थे। प्रवास के दौरान उन्हें पता चला कि गाँव से कुछ दूर जंगली मनुष्यों की एक बस्ती है, जिन्होंने कभी रोटी नहीं खाई। वे आज भी कंद-मूल और जानवरों को खाकर जीवनयापन कर रहे हैं।
फ़क़ीर ने आठ-दस रोटियाँ बनवाकर अपने झोले में रखीं और उस बस्ती की ओर चल पड़े। एक भक्त ने टोका – ‘महाराज, वहाँ कम-से कम साठ-सत्तर जंगली रहते हैं। उनका इन आठ-दस रोटियों से कैसे पेट भरेगा?’
फ़क़ीर ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘मैं उनका पेट भरने नहीं जा रहा हूँ। मुझे बस उन्हें रोटी का स्वाद चखाना है, फिर पेट भरने का काम तो वो ख़ुद कर लेंगे।’

✍️ चिराग़ जैन

क्या करोगे

कहाँ तक झूठ का पर्दा करोगे
कभी तो झील में चेहरा करोगे

बिछाकर जाल दाना डालता है
तो क्या सय्याद का सजदा करोगे?

कराहों को दबाया जा रहा है
कहीं चीखें उठीं तो क्या करोगे

सुना है भूख शर्मिंदा हुई है
हवस को कब तलक पूरा करोगे

अगर ज़िल्लत की आदत पड़ गई तो
फिर ऐसी ज़िन्दगी का क्या करोगे

उजालों को मिटा कर देख लेना
अंधेरे में तुम्हीं रोया करोगे

✍️ चिराग़ जैन

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