Chirag Jain Writings, Hasya Kavita, Poetry
सिचुएशन: देश के बड़े-बड़े कवियों को लॉकडाउन की सिचुएशन से गुज़रना पड़ा। उनकी पत्नी ने उन्हें घर के काम में हाथ बंटाने को कहा तो उन कवियों ने क्या गुल खिलाए। हर कवि एक विशेष काम कर रहा है और उसका वर्णन अपने अंदाज़ में कर रहा है।
मैथिलीशरण गुप्त
प्राची से ज्यों दिनकर निकला
यों अग्निमिलन को दुग्ध चला
हे क्षीर न इह विधि व्यर्थ बहो
इस भाँति करो न अनर्थ अहो
मत विकल करो मेरे मन को
नर हूँ, न निराश करो मन को
अब और न अधिक सहूंगा मैं
इस क्षण तव पान करूंगा मैं
अन्यथा देवि उठ जायेगी
मुझ पर कितना चिल्लायेगी
धिक्कारेगी मम जीवन को
न रहो, न निराश करो मन को
रामधारी सिंह दिनकर
कोने-कोने में घूम-घूम
गीले कपड़े से चूम-चूम
सारा घर-आंगन स्वच्छ किया
निज कर से सब प्रत्यच्छ किया
इक मकड़ी जाला लटका था
सीलिंग पर जाकर अटका था
आँखों से ओझल था वह खर
हाथों की सीमा से ऊपर
वह एक चूक मेरे सर थी
उर्वशि की दृष्टि उसी पर थी
जब नाश मनुज पर छाता है
तब इक जाला बच जाता है
भीतर तक टीस रहा हूँ मैं
अब चटनी पीस रहा हूँ मैं
काका हाथरसी
किसी काम ना आ रही, सम्मेलन की ड्रेस
काकाजी ख़ुद लग गये, करने कपड़े प्रेस
करने कपड़े प्रेस, गन्ध महकी घर भर में
‘क्या फूंका’ का मंत्र गुंजा काकी के स्वर में
जब तक काकी ने कमरे के भीतर झाँका
कपड़े नहीं, इस्तरी फूंक चुके थे काका
गोपालदास नीरज
हींग भी गली न थी कि हाय छौंक जल गया
क्या हुआ जो फ्राइपेन का कलर बदल गया
सब्ज़ियाँ मचल गयीं, मटर-मटर उछल गया
ये हसीन सीन घर की लक्ष्मी को खल गया
सात सुर पिछड़ गये
छन्द सब बिगड़ गये
फिर रसोई की तरफ़
किसी के पाँव बढ़ गये
और हम डरे-डरे, श्लोक सुन खरे-खरे
गैस की मशाल का क़माल देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे
ओमप्रकाश आदित्य
काम न करूंगा कोई, हाथ न बँटाऊंगा मैं
मेरे हिस्से कोई काम डाल नहीं सकती
काव्य की अनन्य प्रतिभा से मैं दमकता हूँ
प्रतिभा ये कपड़े खंगाल नहीं सकती
भाव में पगा के शब्द काव्यभोग भोगता हूँ
लेखनी ये दाल तो उबाल नहीं सकती
घर से निकालेगी तो थाने चला जाऊंगा मैं
मुझको तू घर से निकाल नहीं सकती
किशन सरोज
लॉकडाउन के समय में चौंककर
दाल-सी इक नायिका को छौंककर
देख क्या पाता किसी के हाथ की मेहंदी
छौंक से झलते नयन, मलता रहा मन
धर दिए अब और बर्तन चार करने साफ
काम कर-करके मेरा जलता रहा मन
जगदीश सोलंकी
जिनका सरफ एक बार धुल जाए
उनको फिर से सरफ वाले ढेर में न रखना
पूजा के जो कपड़े हैं, उनको अलग धोना
और उन्हें धो के अपने पैर में न रखना
रंग छोड़ते हैं, नए कॉटन के क्लॉथ; सुनो
उन्हें और कपड़ों के फेर में न रखना
हाथ से रगड़कर जल्दी-जल्दी रख देना
धीरे-धीरे धो के देर-देर में न रखना
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
नवरात्रि पर्व इस बात का प्रमाण है कि स्त्री सशक्तिकरण की अवधारणा का उद्गम सनातन जीवनशैली में ही हुआ। देवी के नवरूप की आराधना के साथ-साथ कन्या पूजन की परंपरा स्त्री की महत्ता को रेखांकित करने हेतु प्रतिष्ठित की गयी होगी। स्त्री को शक्तिस्वरूपा मानने के पीछे भी स्त्री के सशक्तिकरण की ही अवधारणा रही होगी।
किन्तु यह स्त्री, सशक्त होने के लिये उच्छृंखल होने के स्थान पर अपने स्त्रैण गुणों को पोषित करती दिखाई देती है। सशक्त होने के लिये वह पुरुष हो जाने को आतुर नहीं होती। पुरुष से समानता की हठ में वह अपनी स्त्री को बिसार देने की वक़ालत नहीं करती। ‘देेेखरेख’ और ‘रोकटोक’ दो अलग-अलग शब्द हैं। पुरुष को देखरेख की आड़ में अनावश्यक रोकटोक करने की परंपरा छोड़नी होगी और स्त्री को रोकटोक का विरोध करते समय देखरेख का विरोध करने से बचना होगा।
अनुचित के विद्रोह में हथियार तक धारण करनेवाली देवी भी आद्योपांत नारीत्व से परिपूर्ण है। सनातन परम्परा की इस अवधारणा का सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने पर आभास होता है कि स्त्री-सशक्तिकरण के समर्थन में इससे अधिक उपयुक्त कोई विचार हो ही नहीं सकता कि स्त्री के भीतर की स्त्री को बलवती किया जाये, न कि उसके भीतर की स्त्री पर किसी पुरुष के प्रति, स्पर्धा थोप दी जाये।
यह पर्व इंगित करता है कि स्त्री रहते हुए सशक्त होना ही स्त्री की वास्तविक विजय है। समाज के सम्यक संतुलन के लिये यह अतीव आवश्यक भी है कि स्त्री को भी अपने स्त्रीत्व के विकास का उतना अवसर अवश्य मिले, जितना पुरुष को उसके पौरुष के विकास का मिलता है। स्त्री को भी अनुचित के प्रतिकार की उतनी ही स्वतंत्रता मिले, जितनी किसी पुरुष को मिलती है।
शक्तिरूपेण संस्थिता देवी से यही प्रार्थना है कि होड़ में सशक्तिकरण ढूंढ़ रहे स्त्री समाज के आत्मबल के विकास का मार्ग प्रशस्त हो ताकि प्रत्येक स्त्री, स्वयं के स्त्री होने पर अभिमान कर सके। यही ‘अभिमान’, स्त्री को अबला सिद्ध करके पनपी कुरीतियों के षड्यंत्र के लिये मारकेश सिद्ध होगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
आइये, मिलकर बढ़ायें नफ़रतें
चप्पे-चप्पे पर उगायें नफ़रतें
धर्म अपना यूँ निभायें नफ़रतें
एक दिन हमको ही खायें नफ़रतें
प्यार, माफ़ी,अम्न और इंसानियत
इन सभी को काट आयें नफ़रतें
गर मुहब्बत की कोई बातें करे
तो उसे ज़िन्दा जलायें नफ़रतें
जिसने ये दुनिया बनाई प्यार से
आओ, उसको भी सिखायें नफ़रतें
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ये तुमने कौन से अंदाज़ से छुआ साहिब
हुई है बेअसर हर शख़्स की दुआ साहिब
सियार करते थे शब भर हुआ-हुआ साहिब
उन्हें भगाने चला आया तेंदुआ साहिब
हमारे चैन की हुंडी का हो गया सौदा
ज़रा बताओ, मुनाफ़ा किसे हुआ साहिब
ज़ुबां तो काट दी, रोटी न छीनना हमसे
सुना है पेट भी देता है बद्दुआ साहिब
ज़रा-ज़रा सा कब तलक करोगे क़त्ल हमें
दबा ही क्यों नहीं देते हो टेंटुआ साहिब
कई करोड़ निवाले हैं दाँव पर इसमें
तुम्हारे वास्ते जो है महज़ जुआ साहिब
सही बताओ, तुम्हें कुछ समझ नहीं आता?
बहाते रहते हैं क्यों लोग टेसुआ साहिब
तुमसे पहले की मसीहाई चुआती थी छतें
ये तुमने क्या किया, आँखों से कुछ चुआ साहिब
जोंक जब जिस्म से चिपकी तो ये समझ आया
इससे अच्छा था गये साल केंचुआ साहिब
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
जुलाई 2014 की घटना है। कोटेश्वर से कवि-सम्मेलन करके प्रज्ञा विकास और मैं सुबह-सुबह ऋषिकेश के लिये रवाना हुए। सर्दियां ठीक से शुरू नहीं हुई थीं, लेकिन पहाड़ों की अपनी ताज़गी सुबह-सुबह हल्की ठण्ड का अहसास करा रही थी। पहाड़ की घुमावदार सड़क पर हरे पानी की धारा के साथ-साथ बढ़ते हुए हम देवप्रयाग पहुँचे। पतली-पतली गलियों से सीढ़ियाँ उतरते हुए हम घाट की ओर बढ़े। लगभग सत्तर-अस्सी डिग्री के कोण पर खड़ी सड़क थी जिसके दोनों ओर बाज़ार था। पहला पहाड़ पार किया तो हम एक ऐसे पुल पर पहुँच गए जिसके नीचे भागीरथी का अजस्र प्रवाह था। पुल पर से गुज़रते हुए हमने महसूस किया कि किसी के गुज़रने पर पुल हिलता था। पुल को पार करके हम फिर एक पतली सी पहाड़ी गली से गुज़रते हएु घाट तक आ पहुँचे।
जीवन में पहली बार संगम देखा था। मैं एक ऐसे छोर पर खड़ा था, जहाँ धरती समाप्त होती है और आगे जल ही जल दिखायी पड़ता है। यहाँ भागीरथी और अलकनन्दा का मिलन होता है। यहाँ से पानी की यह धारा ‘गंगा’ कहलाने लगती है।
अहा! एक ओर से भागीरथी दौड़ी चली आ रही थी। उसकी चाल किसी उत्साहित षोडशी जैसी उच्छृंखल थी। उसकी आवाज़ को कलकल नहीं, गर्जन ही कहा जा सकता है। सरकारी स्कूल की आधी छुट्टी में बच्चों का जो कलरव होता है वैसा शोर था भागीरथी की चाल में। यह होता तो शोर ही है, लेकिन मन को आनन्दित करता है।
उधर अलकनन्दा ऐसे चली आती थी मानो किसी ने पानी को संन्यास दे दिया हो। नदी में न कोई लहर, न शोर। पूरी नदी मोटे काँच की किसी प्लेट की तरह गहरे हरे रंग की पारदर्शिता लिए ठहरी-सी जान पड़ती थी। एक ओर बचपन की सी ऊर्जा और षोडशी की चुहल थी तो दूसरी ओर गहन संन्यास की सी शांति।
मेरे दाहिने कान में भागीरथी का रोर था और बाएँ कान में अलकनन्दा का मौन। मेरी आँखों में भागीरथी की उच्छृंखल धारा थी और मन में अलकनन्दा का गाम्भीर्य। दाईं ओर देखता था तो ऐसा लगता था, ज्यों किसी को वधस्थल की ओर ले जाया जा रहा हो और दाईं ओर देखता था तो लगता था कि कोई गहरी समाधि में उतरा हुआ ठहर गया हो। एक ओर जीवन का कलरव था और दूसरी ओर मरघट की शांति।
मैं इन दोनों विरोधाभासी धाराओं के मध्य निर्लिप्त-सा खड़ा था। घाट पर बजरंग बली का ग्रामीण सादगी के सौंदर्य से परिपूर्ण मंदिर था। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर मैं देर तक दो विलग प्रवृत्तियों को एकाकार होकर ‘जाह्नवी’ बनते देखता रहा।
भागीरथी और अलकनन्दा अपने-अपने स्वभाव की उत्कर्ष अवस्था में विद्यमान थीं। एक पत्थरों से टकराती हुई, भीषण शोर करते हुए, हिरन चौकड़ी भरती हुई दौड़ी चली आ रही थी। और एक इतनी शांत कि हवा भी उसके स्तब्ध-आभासी दर्पण को स्पर्श करने से संकोच कर रही थी। पटल पर एक भी सिलवट नहीं, लेकिन गतिमान थी। यूँ लगता था कि सर्वस्व प्राप्ति के बाद कोई योगिनी भंगिमा पर पूर्णता का सिंगार किये चली आ रही है।
उस दिन एहसास हुआ कि पूर्ण होने के लिए शून्य होना अनिवार्य है। जब चेहरे की समस्त भंगिमाएँ गौण हो जाती हैं तब मुखड़े पर पूर्णता की आभा दमकती है। इस आभा में कहीं कोई रंग नहीं होता, लेकिन फिर भी इसका सम्मोहन सबको आकृष्ट कर लेता है। आम्रपाली का समस्त सिंगार तथागत की इस एक झलक के सम्मुख मिथ्या सिद्ध हो जाता है।
नवम्बर की मीठी ठण्ड में मैं वसुधा, अलकनन्दा और भागीरथी के बीच खड़ा था। पाँव वसुधा पर थे, विचार भागीरथी से होड़ कर रहे थे और मन अलकनन्दा हुआ जाता था। श्वास में घुलकर यह दृश्य स्मृति पर अंकित हो रहा था।
कलकल करती नदी की पवित्र धारा को शहरों से गुज़रते हुए देखने का अनुभव स्मृति में कौंधा और फिर इसकी मीठी यात्रा के खारे समापन का विचार मन को बेचैन कर गया। यकायक मन नदी के साथ बहकर सागर तक की यात्रा कर आया। किसी सुन्दर जीवन के खारे अन्त की इस यात्रा ने वहीं एक गीत की देह धारण की। इस क्षण में एक पूरा जीवन जी लिया था मैंने। मैंने कलरव और शांति को एकाकार होते देख लिया था। मैंने देखा कि मौन जब शोर में समर्पित हो जाता है तो शोर का शोर कम हो जाता है। मैंने देखा कि स्वयं को खोकर भी अलकनन्दा में कोई सिलवट नहीं थी। मैंने देख लिया था कि सिलवटें विलीन होते ही यात्रा पूर्ण हो जाती है।
मैं भागीरथी की तरह किलकता हुआ देवप्रयाग पहुँचा था और अलकनन्दा की तरह गहरा मौन लिए लौट रहा था।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
दो दिन पहले हिसार की ख़बर थी कि एक व्यापारी को उसकी कार में ज़िन्दा जला दिया। अब करौली की ख़बर है कि मन्दिर के पुजारी को ज़िन्दा जला दिया।
हे ईश्वर! पाशविकता का यह पथ आखि़र किस मन्ज़िल तक ले जायेगा हमारे समाज को। मैंने बचपन में एक महिला को आग की लपटों में घिरे हुए सड़क पर दौड़ते देखा है। (वह एक दुर्घटना थी, जिसमें खाना बनाती महिला की साड़ी ने अंगीठी से आँच पकड़ ली थी) लेकिन उस महिला की चीख़ें आज भी मेरे दिल को दहला देती हैं। मैं महीनों ठीक से सो न सका था।
पीड़ा, भय, निराशा और करुणा से गुँथी वह चीख़ जब भी याद आती है तो मन विह्वल हो उठता है। मैं कल्पना कर रहा हूँ कि उस चीख़ में आक्रोश और घृणा भी मिल जाये, तो उससे तो सारा ब्रह्मांड काँप जाता होगा। फिर ऐसे कौन लोग हैं जिनके ज़मीर इनके प्रभाव से अनछुए रह जाते हैं!
इस घटना पर भी राजनीति और प्रशासन अपनी-अपनी फेस सेविंग से ज़्यादा कुछ न करेंगे, लेकिन इस आग की राख से यह प्रश्न पुनः उठ खड़ा हुआ है कि हम कौन से समाज का निर्माण करने में व्यस्त हैं? हम किस सभ्यता को पोसने में बेसुध हुए जा रहे हैं? हिन्दू-मुस्लिम; सवर्ण-दलित; ब्राह्मण-मीणा …और कितने विभक्त होंगे हम। कल ब्राह्मणों में भी शैव-वैष्णव होने लगेगा। आखि़र कहाँ जाकर अन्त होगा इस अभिशाप का?
करौली की घटना को ब्राह्मण बनाम मीणा का रंग दिया जा रहा है। हद्द है, हम उस समाज की स्थापना क्यों नहीं करते जिसमें पीड़ित और अपराधी दोनों को ही केवल मनुष्यता की कचहरी में खड़ा किया जाये! एक मीणा के अपराध से पूरा मीणा समाज अपराधी कैसे हो गया?
इस हिसाब से तो देश का प्रत्येक व्यक्ति अपराधी है। सामान्यीकरण की इसी प्रवृत्ति की आँच पर राजनीति अपनी रोटियाँ सेंकती है। ‘मरने वाला आदमी था क्या यही क़ाफ़ी नहीं!’ यही हमने हाथरस में किया और यही करौली में।
जातियों के इस वर्गसंघर्ष से देश को बचाने के लिये समाज में मुरझाती जा रही मानवता के बीजों को संरक्षित करना होगा ताकि अपराध करनेवाले को इस बात का डर रहे कि यदि वह अपराध करके घर लौटेगा तो अपने मुहल्ले में रहनेवाले मनुष्यों से आँखें कैसे मिलायेगा?
✍️ चिराग़ जैन