Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan, Story
एक फ़कीर किसी गाँव में प्रवास कर रहे थे। प्रवास के दौरान उन्हें पता चला कि गाँव से कुछ दूर जंगली मनुष्यों की एक बस्ती है, जिन्होंने कभी रोटी नहीं खाई। वे आज भी कंद-मूल और जानवरों को खाकर जीवनयापन कर रहे हैं।
फ़क़ीर ने आठ-दस रोटियाँ बनवाकर अपने झोले में रखीं और उस बस्ती की ओर चल पड़े। एक भक्त ने टोका – ‘महाराज, वहाँ कम-से कम साठ-सत्तर जंगली रहते हैं। उनका इन आठ-दस रोटियों से कैसे पेट भरेगा?’
फ़क़ीर ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘मैं उनका पेट भरने नहीं जा रहा हूँ। मुझे बस उन्हें रोटी का स्वाद चखाना है, फिर पेट भरने का काम तो वो ख़ुद कर लेंगे।’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
कहाँ तक झूठ का पर्दा करोगे
कभी तो झील में चेहरा करोगे
बिछाकर जाल दाना डालता है
तो क्या सय्याद का सजदा करोगे?
कराहों को दबाया जा रहा है
कहीं चीखें उठीं तो क्या करोगे
सुना है भूख शर्मिंदा हुई है
हवस को कब तलक पूरा करोगे
अगर ज़िल्लत की आदत पड़ गई तो
फिर ऐसी ज़िन्दगी का क्या करोगे
उजालों को मिटा कर देख लेना
अंधेरे में तुम्हीं रोया करोगे
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
एक फिल्मी सितारे ने अपने घर में फाँसी लगा ली। ख़बर सुनकर देश सन्न रह गया, लेकिन एक विशेष वर्ग ने उसके फिल्मी क़िरदार को लेकर उसे अपने धर्म का विरोधी घोषित किया और उसकी मृत्यु पर शोक न करने के संदेश सोशल मीडिया पर लिखे।
बाद में दो दलों के राजनैतिक हित टकराए और उस आत्महत्या को हत्या कहकर मुद्दे को हवा दी गई। कोरोना को ढाल बनाकर दूसरी स्टेट के पुलिस अधिकारी को क्वेरेन्टीन कर दिया गया। फिर सीबीआई, फिर नारकोटिक्स, फिर रिया की गिरफ़्तारी, फिर कंगना राणावत, फिर पूरे बॉलीवुड का ड्रग्स एंगल, फिर बॉलीवुड को उत्तर प्रदेश लाने की बात! पोस्टमार्टम रपट पर संदेह करके पोस्टमार्टम रपट का पोस्टमार्टम कराया गया। जिन्होंने सुशांत को अपने धर्म का विरोधी बताया था, उन्होंने ही बिहार में सुशांत राजपूत के चित्र दिखाकर वोट मांगे। और इतने सब ड्रामे के बाद सीबीआई को आत्महत्या के एंगल से जाँच करने के लिए नियुक्त किया गया।
कहीं कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटती है तो राजनीति की आँखों में आँसू नहीं, चमक आती है। उत्तर प्रदेश में बलात्कार हो तो भाजपा विरोधी राजनीतिज्ञ ख़ुश हो गए कि योगी सरकार को घेरने का मौक़ा मिल गया। अलवर में बलात्कार हो गया तो भाजपा ने राहत की साँस ली कि अब जब कोई हाथरस की बीन बजाएगा तो हम अलवर का नगाड़ा पीट कर उसकी आवाज़ को दबा देंगे।
विश्वास कीजिये, ये सब घटनाएँ राजनीति के लिये ‘अवसर’ से अधिक कुछ नहीं हैं। आज पाँच पुलिसवाले सस्पेंड कर दिए गए, ताकि हम सरकार की वाहवाही कर सकें। हम यह कभी नहीं समझेंगे कि जब तक राजनीति के रिमोट पर उंगली नहीं लगती, तब तक न तो पुलिस हिलती है न ही प्रशासन! डीएम का निलंबन भी हो जाए तो रिमोट पर उंगलियाँ तो वही रहेंगी।
इस हंगामे के बीच हम पुलिस के रवैये पर इतने फोकस्ड हो गए हैं कि अपराधियों पर किसी का ध्यान ही नहीं है। और यह वही पुलिस है जिसकी गाड़ी पलटने पर हुए एनकाउंटर की घटना पर उसके गुण गाए जा रहे थे। उन्नाव हो या जयपुर; दिल्ली हो या मुम्बई; राजनीति, मुद्दों की खरपतवार में सत्ता का फल ढूंढ ही लेती है।
हमारा दुर्भाग्य यह है कि जब ये सब राजनैतिक दल खरपतवार में घुसकर सत्ता का फल ढूंढ रहे होते हैं तब हम यह भ्रम पाल लेते हैं कि ये खेत को खरपतवार से मुक्त करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। यह इनकी आपसी खेल भावना है कि हारनेवाला भी कभी यह भेद नहीं खोलता कि खेत में दरअस्ल हुआ क्या था।
जनता, इस राजनैतिक खिलवाड़ के लिए आपस में दुश्मनी पालने की बजाय, यदि केवल मौन रहना भी शुरू कर दे तो राजनीति के हाथों देश का छला जाना बंद हो जाएगा। क्योंकि जब जनता आपस में लड़ने लगती है, तो राजनीति के पासों की आवाज़ सुनाई नहीं देती।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
सुना है कि चिरैया के नुचे हुए पंखों को उसके घोंसले की मिट्टी नसीब न हो सकी। रात के अंधेरे में घरवालों को घर में बन्द करके पुलिस ने बिटिया की चिता जला दी। उसकी मिट्टी से लिपटकर रो लेने का भी अधिकार न मिल सका लाचार परिवार को।
सुनते हैं, इस देश में कोई असुरक्षित महसूस करे तो पुलिस उसे सुरक्षा देती है। लेकिन अपने आंगन की निरपराध चिरैया का दाह संस्कार करने का अधिकार मांगनेवाले परिवार से पुलिस को न जाने कौन-सी असुरक्षा महसूस हुई होगी। जेल में बन्द दुर्दांत अपराधी के परिवार में कोई मौत हो जाए तो उसे भी अंतिम संस्कार में शामिल होने की छूट मिल जाती है, लेकिन यह क्या था कि परिवार में मौत होने पर निरपराध परिवार को घर में क़ैद करके अंतिम संस्कार किया गया। हो सकता है कि अव्यवस्था को रोकने के लिये प्रशासन को यह आवश्यक जान पड़ा हो, किन्तु मनुष्यता के लिए यह कृत्य उस अपराध से कम नहीं था, जिसके कारण उस आंगन की चहक मातम में बदल गई।
इंद्रजीत की मृत्यु के बाद श्रीराम ने पुत्र के अंतिम संस्कार तक युद्ध विराम की घोषणा करके शोकग्रस्त शत्रु को जो अभय दिया था, कल रात हाथरस में उस परम्परा की चिता जल गई।
इस देश का तंत्र एक आमूल-चूल परिवर्तन की बाट जोह रहा है। स्पष्ट शब्दों में सुन लीजिए, क़ानून की आँखों में धूल झोंकने पर आप जिसकी पीठ थपथपाएंगे, वह एक दिन आपकी आँखों में धूल ज़रूर झोंकेगा। इसलिए, अच्छा अथवा बुरा, सशक्त अथवा कमज़ोर; जो भी लिखित संविधान हमारे पास है; उसका मखौल बनाने की इजाज़त किसी को नहीं मिलनी चाहिए; फिर चाहे वह पुलिस हो या अपराधी!
एक बेटी कल रात मिट्टी हो गई। जाओ चिरैया, तुम्हारे पोर-पोर पर हुए घाव किसी पोस्टमार्टम रपट में कम या ज़्यादा दर्ज हो जाएंगे; लेकिन तुम्हारी आत्मा पर जो खरोंचें पड़ी हैं उनकी सिसकी लिखने के लिए कोई पोथी पूरी न पड़ेगी। अब हम तुम्हारी जाति पर चर्चा करके तुम्हारे मनुष्य होने के अधिकार का हनन करेंगे; अब हमारा तंत्र तुम्हारे बयान बदलने की कहानियाँ गढ़कर तुम्हारे प्रति उपजी संवेदनाओं पर आरी चलाएगा। अच्छा हुआ बिटिया, तुमने आँखें मूंद लीं, वरना इस देश में न्याय की तलाश में तुम्हें यह तंत्र बार-बार वह हादसा दोहराता हुआ दिखता।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
बलात्कारी कहीं आसमान से नहीं आते। हम जैसे ही सामान्य दिखनेवाले लोग होते हैं, ये वीभत्स अपराधी। स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कुछ बातें बनाई जाती हैं, उनकी निस्सारता हर बार उघड़कर सामने आती है। हमारे यहाँ रात-बेरात लड़कियों को अकेली जाने पर मनाही थी। लेकिन निर्भया काण्ड से पता चला कि किसी का साथ होना भी काम नहीं आता। बुलन्दशहर कांड में तो पिता के सामने माँ-बेटी को एक साथ रौंदा गया।
अब रात और दिन का भी कोई अर्थ नहीं रहा। हवस ने अब घड़ी देखना बन्द कर दिया है। बलात्कारी भी शेष समाज की तरह अमीर-ग़रीब, शिक्षित-अशिक्षित, अगड़े-पिछड़े, हिन्दू-मुस्लिम कई प्रकार के होते हैं। अमीर बलात्कारी यकायक किसी को खेत में जाकर दबोचने से परहेज करता है। वह बाक़ायदा आर्थिक, सामाजिक अथवा अन्य किसी प्रकार का दबाव बनाकर लड़की के साथ इत्मीनान से सालों तक बलात्कार कर सकता है। जबकि ग़रीब बलात्कारी के पास न तो ऐसा कोई लोभ होता है, न धैर्य। इसलिए वह मौक़ा देखते ही वीभत्स होने में यक़ीन करता है।
कुछ विशेष किस्म के बलात्कारी घर से यह सोचकर नहीं निकलते कि उन्हें बलात्कार करना है। वे तो बस हाथ आये अवसर का लाभ उठाते हुए कभी लड़की की छातियाँ मसलते दिखते हैं तो कभी दंगों या बलवों का लाभ उठाकर लूटपाट के साथ बलात्कार भी कर देते हैं। यह सब इतना अचानक घटित होता है कि न तो बलात्कारी को पुलिस की वर्दी बदलने का वक़्त मिलता है, न ही किसी धर्म विशेष का पटका गले में से उतारने की सुधि रहती है। शायद बलवों में विरोधी धर्म की बहन-बेटियों की आबरू लूटना वीरता माना जाता हो। अन्यथा किसी धर्म की रक्षार्थ निकले जत्थों में एक न एक व्यक्ति तो इस कर्म का विरोध करने के लिए आगे ज़रूर आता।
हर दुर्दांत कांड के बाद हम सरकार से कड़े कानूनों की मांग कर बैठते हैं। सरकारें भी अपनी राजनीति बचाने के लिए क़ानून बना देती हैं, लेकिन जब भी कोई लड़की अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अथवा किसी से अन्य बदला लेने के लिए इन कानूनों का दुरुपयोग कर रही होती है, तब वह किसी नए बलात्कार की नींव रख रही होती है। जब-जब इन कानूनों का दुरुपयोग होता है तब-तब समाज ऐसी घटनाओं के प्रति संवेदनहीन होता जाता है।
हैदराबाद, बुलंदशहर, कानपुर, हाथरस, अलवर, दिल्ली, गुवाहाटी… ये सब शहर ऐसी घटनाओं पर शर्मिंदा होकर अपनी बेटियों के आगे लज्जित हो चुके हैं। कॉलेज परिसर से लेकर खेत-खलिहानों तक और न्याय के मंदिर से लेकर धर्म के मंदिरों तक इस अपराध ने पैर पसारे हैं। यौन-कुंठित नपुंसकता जब पौरुष का भरम पाल लेती है, तब बलात्कार होता है। अत्याधुनिक बनने की होड़ जब ‘ओपन माइंडेड कल्चर’ की आड़ में असभ्य शब्दावली को सामान्य मानने लगती है, तब बलात्कार होता है।
स्कूल से निकलती बच्चियों से लेकर कचरा बीनती अधेड़ तक; तीन महीने नई नवजात से लेकर 80 वर्ष की वृद्धा तक, असुरक्षा के इस अभिशाप को झेलती हैं। मतलब साफ़ है, बलात्कार किसी शारीरिक सुख की प्राप्ति का ज़रिया नहीं, बल्कि पाशविक प्रवृत्ति के मुखर हो जाने का परिणाम है। और इस प्रवृत्ति को खाद-पानी देने में समाज का प्रत्येक वर्ग समान अपराधी है।
हम सबको अपने समाज में पनप रही इस पशुता को अपने-अपने स्तर पर नष्ट करना होगा, क्योंकि तंत्र से अपेक्षा रखकर हम अब तक कई बेटियों की ज़िंदगी बर्बाद कर चुके हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
देह बचेगी स्पर्श न होगा
आँखें होंगीं दर्श न होगा
सब अपनों के आने का भी
मुझको किंचित हर्ष न होगा
उस दिन अधरों पर भी कोई याद नहीं मुस्काई होगी
जिस दिन साँस पराई होगी
जिन होंठों की मुस्कानों से मुझको प्राण मिला करते हैं
जिन चेहरों के खिल जाने पर मन के तार हिला करते हैं
उन चेहरों पर पीर दिखेगी
पीड़ा की तस्वीर दिखेगी
मेरी यादों में गुमसुम-सी
ख़ुशियों की जागीर दिखेगी
शायद उस दिन मेरे कारण वे आँखें भर आई होंगी
जिस दिन साँस पराई होगी
जिस देहरी पर मेरे होने से सुख सारा हो जाता है
जिस आंगन में मेरी आहट से उजियारा हो जाता है
उस आंगन में क्रंदन होगा
कण-कण में निस्पंदन होगा
मेरी माटी की काया के
चरणों का अभिनन्दन होगा
शायद उस दिन इस आंगन की फुलवारी मुरझाई होगी
जिस दिन साँस पराई होगी
मन में रखने वाले मुझको, कंधों पर लेकर जाएंगे
मेरे संगी-साथी मुझको, सन्नाटे में धर आएंगे
पानी से रिश्ते धोऊंगा
उस दिन कड़वा सच ढोऊंगा
उस दिन मेरा मौन रहेगा
उस दिन मैं माटी होऊंगा
उस दिन मेरे पास समूचे जीवन की तन्हाई होगी
जिस दिन साँस पराई होगी
✍️ चिराग़ जैन