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हिरण्यकश्यप होने का नुक़सान

स्वयं को भगवान मानने की महत्वाकांक्षा में हिरण्यकश्यप ने होलिका के वरदान का दुरुपयोग किया। चिता ने चीख-चीख कर कहा कि, ‘मूर्ख हिरण्यकश्यप, जनता पर इतना अत्याचार न कर कि तेरे ही महल के खंभे तेरे विनाश का उद्गम बन जाएँ!’
मदान्ध राजा ने चिता की बात अनसुनी कर दी। फिर एक दिन पत्थर की भी छाती फट गयी। फिर एक दिन सारे वरदान उसके विरुद्ध खड़े हो गये। फिर एक दिन नियति के नाख़ून, अत्याचारी के पाप से अधिक बड़े हो गये।

✍️ चिराग़ जैन

आत्मबल का अवलम्बन

जो कुछ इस समय घट रहा है, उसकी भरपाई कभी न हो सकेगी। मृत्यु ने समूची मानवजाति को दहला दिया है। मानव बस्तियों में अजीब-सा अमंगल छा गया है। सब मन ही मन अपने-अपने अपनों की गिनती करके इस संख्या के यथावत बने रहने की दुआ मांग रहे हैं।
सब ऊपर ही ऊपर यह जता रहे हैं कि हमें कुछ नहीं होगा, लेकिन सब भीतर ही भीतर यह जान रहे हैं कि किसी को भी कुछ भी हो सकता है। काल इतना क्रूर हो गया है कि किसी के लिए भी जीवन बचाने से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं रह गया है।
हमने ऐसी-ऐसी दुर्भिक्ष के विषय में पढ़ा है कि गाँव के गाँव ख़ाली हो गये थे। मसान छोटे पड़ गये थे। लोगों ने खेत-खलिहान और यहाँ तक कि आंगन में ही चिताएँ जलानी शुरू कर दी थीं। इन स्थितियों के विषय में जब पढ़ते थे तो लगता था कि अब ऐसा नहीं होगा। अब समाज बहुत विकसित हो गया है। अब हम साधन-सम्पन्न हैं। किन्तु कोरोना के इस प्रकोप ने यह सिद्ध कर दिया कि स्थिति जस की तस है।
मनुष्यता का ऐसा ह्रास शायद ही कभी हुआ हो कि लोगों की अन्तिम यात्रा तक में चार कंधे पूरे नहीं हो पा रहे। पूरे माहौल पर मसान का सन्नाटा छा रहा है। इस सूनामी से स्वयं को बचाए रखने के लिये मनोबल बनाए रखना बेहद ज़रूरी हो गया है।
मैं स्वयं को यह कह-कहकर ऊर्जा और सकारात्मकता से सींच रहा हूँ कि ‘समाज पर इतना बड़ा संकट आया है, ऐसे में बीमार पड़ने की फ़ुरसत ही कहाँ है!’ यह टोटका काम कर रहा है। यह विचार डूबते हुए मन को सम्बल प्रदान करता है। जिस किसी के विषय में थोड़ा भी पता चलता है, उसकी कुशल-क्षेम जानने की क़वायद, और जहाँ तक सम्भव हो उस तक सहायता पहुँचाने की इच्छाशक्ति मेरे तन में व्याप्त रोग को सिर उठाने की मोहलत नहीं दे रही है।
समय का यह टुकड़ा एक तूफ़ान जैसा है। इसके गुज़रने से होनेवाली तबाही को रोकना लगभग असंभव है, किंतु इसकी दिशा देखकर, इसकी चपेट में आनेवालों को अपनत्व का मानसिक अवलम्बन थमाकर नुक़सान और पीड़ा को कम तो किया ही जा सकता है।

✍️ चिराग़ जैन

विनाशकाले

जिनकी जाँच नहीं हो पा रही
उनको ख़ामोश कर देना।
जिनको इलाज नहीं मिल पा रहा
उनकी ज़ुबान सी देना।
जो अस्पतालों के बाहर दम तोड़ रहे हैं
उन पर पर्दा डाल लेना।
जो श्मशान में
अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं
उनसे नज़रें फेर लेना।

…लेकिन एक क़िस्सा
अपने आलीशान बैडरूम में
ठीक अपनी आँखों के सामने लिखवा लेना
कि जब चिताएँ भी
हिरण्यकश्यप की महत्वाकांक्षा का
साधन बन जाती हैं
तब
उसके अपने ही महल के खंभे
उसके विनाश का उद्भव बन जाते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

जनता ख़ामोश है।

पूरे देश का मज़ाक़ बनाकर रख दिया है। बेशर्मी से झूठ बोलनेवाले राजनेता, एक साथ मिलकर सब कुछ बर्बाद कर रहे हैं और देश की जनता ख़ामोश होकर तमाशा देख रही है।
प्रश्न समूची राजनीति की उस ढिठाई का है जो जनता के जीवन से खिलवाड़ करने में हिचकती नहीं है। प्रश्न जनता की उस मानसिकता का है जो किसी भी राजनैतिक निर्णय की चर्चा शुरू होने से पूर्व किसी दल या विचारधारा का चश्मा पहनना नहीं भूलते।
अरे भाई, सही हर स्थिति में सही होता है और ग़लत हर हाल में ग़लत? इतनी सी बात हम समझना नहीं चाहते। कांग्रेस के शासन में कम किसानों ने आत्महत्या की थी, भाजपा के शासन में ज़्यादा किसान मर रहे हैं। इस बात को कहकर कांग्रेसी भला कैसे इतरा सकते हैं? राजनीति ने जनता को विवेकशून्य बनाया है या फिर विवेकशून्य जनता ने राजनीति को इतना मक्कार और बेशर्म कर दिया है इस पर ढंग से विचार करना ज़रूरी हो गया है।
उन्हें पता है कि चुनाव के समय उनका कोई एक पैंतरा देखते ही तुम उनकी बदतमीज़ियों के पोथे भूल जाओगे। उन्हें पता है कि पैदल चलकर घर जाती जनता को कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने के लिए छोड़ा जा सकता है क्योंकि बिहार में चुनाव आते ही राजनीति इन सब कीड़े-मकोड़ों को वोट में तब्दील कर लेगी। उन्हें पता है कि न्यायपालिका की पेचीदा भूल-भुलैया में फँसा नागरिक कभी इतनी फ़ुरसत ही न पाएगा कि व्यवस्था के सुधार की मांग कर सके।
उन्हें पता है कि लाखों-करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा करने से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि इस देश की जनता की इतनी हिम्मत ही नहीं है जो उस पैकेज के अस्तित्व पर प्रश्न पूछ लेवे। और अगर इतने वर्ष की मेहनत के बाद भी कोई विवेकशील व्यक्ति इस जनता के बीच बचा रह गया है तो उसको धराशायी करने के लिए इसी जनता के बीच अपने-अपने लीडर पर अटूट श्रद्धा रखनेवाले लोगों की कोई कमी थोड़े ही है।
राजनीति बीस लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा करेगी और हम दो पाटों में बँट जाएंगे। राजनीति मजदूरों के लिए बसों की लिस्ट लेकर आएगी, उसमें बसों के नाम पर बसें न हों तो भी हम भाजपा-कांग्रेस करने में व्यस्त हो जाएंगे।
हमारे लिए सवाल यह है ही नहीं कि तपती दुपहरी में जानवरों की तरह घिसटने को मजबूर इंसान तक सहायता पहुँची या नहीं पहुँची, हम तो इस तमाशे में व्यस्त हैं कि इसमें कांग्रेस ने बीजेपी को धूल चटाई या बीजेपी ने कांग्रेस को। इससे आगे हमारी संवेदनात्मक सोच का इंजन चल ही नहीं पाता।
हम यह समझ ही नहीं पाते कि शिवसेना और कांग्रेस के गठबंधन में भी वही लालचमण्डी है जो अन्य किसी प्रदेश में है। लेकिन हम इससे खुश हो जाते हैं कि अमित शाह की चाल फेल हो गयी।
कोई अमित शाह को फेल करके खुश है, कोई राहुल गांधी को, कोई केजरीवाल को तो कोई मोदी या दीदी को। लोकतंत्र के आखिरी पायदान पर खड़े आदमी पर किसी का ध्यान नहीं है।
राजनीति ने सिद्ध कर दिया है कि इस देश की जनता रिमोट से चलती है। जब तक राजनीति किसानों को अन्नदाता कहती रहती है तब तक कोई खेतों में पड़ रहे जानलेवा कैमिकल्स पर सवाल नहीं कर सकता। जब राजनीति ने किसानों को आतंकवादी कहना शुरू कर दिया तो कोई टीवी चैनल उनके विरोध की आवाज़ प्रसारित नहीं कर सका।
रामदेव के आंदोलन पर रात में लाठीचार्ज करवानेवाली कांग्रेस, भाजपा को आन्दोलन से निपटने की नैतिकता सिखाती है और कुल दो लोगों की तानाशाही पर चल रही भाजपा, कांग्रेस को पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक मूल्य स्थापित करने का ज्ञान देती है।
कितनी आदर्श स्थिति है, इस देश के महान राजनेता यकायक चुनाव से ठीक पहले अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर ‘नये दल’ में चले जाते हैं। जो चुनाव से पहले आत्मा की आवाज़ न सुन पाए वो चुनाव जीतने के बाद उस आवाज़ को सुन लेते हैं। सब कुछ खुल्लमखुल्ला चल रहा है लेकिन अपना-अपना चश्मा पहने जनता इस बात पर ख़ुश है कि अमित शाह ने ममता बनर्जी की पार्टी का दिवाला निकाल दिया।
सब अपनी-अपनी कांग्रेस और अपनी-अपनी भाजपा में इतने लिसड़े हुए हैं कि देश की बर्बादी उन्हें दिखाई ही नहीं देती। जिन्हें यह बर्बादी दिख रही है, जिन्होंने अपने चश्मे हटाकर देश को देखने की कोशिश की है उन्हें उनकी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है। उनको गद्दार, राष्ट्रद्रोही, हिन्दू विरोधी और ऐसे ही तमाम अलंकरणों से सँवारने के लिए पूरी टोली सक्रिय है।
लोकतंत्र में सत्ताधारी पक्ष की निरंकुशता पर लगाम लगानेवाला विपक्ष भी इस पूरी स्थिति में बराबर का हिस्सेदार है क्योंकि जिसे इस निरंकुशता के विरुद्ध खुलकर बोलने से डर लगता है समझ लो कि उसने अपने होंठों में अपना ख़ुद का कच्चा चिट्ठा भींच रखा है।
भारत की महानता के ढोल पीटते हुए सदियाँ बीत गईं, लेकिन आज भी दिल्ली से लेकर दार्जिलिंग तक कोई कस्बा, कोई शहर, कोई गाँव, कोई मुहल्ला ऐसा न मिलेगा जहाँ इस महान देश का कोई नागरिक जानवरों से बदतर ज़िन्दगी जीने को मजबूर होगा।
विचारधाराओं के नाम पर देश को टुकड़े-टुकड़े करनेवाले इन सियासतदानों से पूछो कि प्रचण्ड बहुमत की सरकार बनाकर भी ‘अंत्योदय’ की अवधारणा अहल्या की भाँति पत्थरों में ही क्यों सुबक रही है? इतने लम्बे समय तक शासन करने के बावजूद गांधी का ‘रामराज’ कोरी कल्पना ही क्यों बनकर रह गया? न लोहिया का समाजवाद आया, न अंबेडकर का संविधान ही शत प्रतिशत लागू हो सका!
फिर क्यों चल रहा है ये ढोंग? यह प्रश्न न पूछ लिया जावे इसीलिए राजनीति आपको चुटकुलों, जुमलों और सोशल मीडिया के प्रोपेगैंडा में उलझाए रखेगी। इस उलझन से आपको स्वयं बाहर आना होगा अन्यथा ये उलझन एक दिन आपकी आगामी पीढ़ियों के लिए फाँसी बन जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

एक ज़रा-सा झोंका

एक ज़रा-सा झोंका आया
नैया ने खाये हिचकोले
जिन लहरों पर तैर रही थी
उन लहरों पर डगमग डोले
बस इतने भर से इस पल में हम पूरे मुस्तैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये

बदले-वदले भूल चुके हैं, सपने-वपने याद न आए
जैसे भी हो इन लहरों से नैया पार लगा ली जाए
जिनको हल करना है इस पल
कब वो प्रश्न बहुत गहरे हैं
इक नदिया है, इक नैया है
इक हम हैं और कुछ लहरें हैं
इस क्षण कहीं और देखा तो समझो हम नापैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये

जितनी जटिल समस्या होगी, उतना बड़ा सबक लाएगी
सुख में तो कुछ तिनके डाली पर कोयल भी रख आएगी
लेकिन जब आंधी आएगी
जब डाली से बौर झड़ेगा
तब अपने जीवन की रक्षा
पेड़ आम का स्वयं करेगा
वो क्या सोचे सावन-भादो, जिसके दूभर चैत हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये
✍️ चिराग़ जैन

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