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संविधान

धागेनातीनकगधिंन ताल चलती है, पर सुर सारेगामापाधानीसा में समाय के नूपुर छनन छन, घनन घनन घण्ट; मृदंग बजत द्रुम द्रुम द्रुम गाय के पंचम-निषाद तीव्र-कोमल से रंगे राग, दुगुन-तिगुन ताल भेद समझाय के विलग विलग स्वर गान बनते हैं, जब सब एकरूप होते सम पर आय के कभी सब त्याग...

व्यवस्थित अव्यवस्था

सिस्टम… यह एक ऐसा शब्द है, जो किसी भी भारतीय भाषा में अनूदित होकर प्रपंच बन जाता है। ईश्वर को जब सृष्टि का सर्वाधिक दीन प्राणी बनाना था, तो उसने भारतीय सिस्टम में फँसा मनुष्य बना डाला। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है; इसलिए हमारा...

पाठक से लेखक बनने तक का सफ़र

हिन्दी साहित्य में दो क़िस्म के पाठक होते हैं। पहली श्रेणी है प्रशंसक पाठकों की। वे सोशल मीडिया पर खाता बनाते ही टटोल-टटोल कर लेखकों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं। फिर उनकी हर पोस्ट को देखते ही उसके नीचे कुछ निश्चित शब्दयुग्म पेस्ट करके निकल लेते हैं। इस सबमें ये इतने...

हम तुम पार उतर जाएंगे

सुख होगा, उल्लास रहेगा कभी-कभी कुछ त्रास रहेगा जब सम्बन्ध निभेगा तो फिर उसमें हर एहसास रहेगा अच्छे-बुरे समय से हम-तुम, मिलकर साथ गुज़र जाएंगे अपनेपन की नौका लेकर, इक दिन पार उतर जाएंगे हम दोनों ने इस क़िस्से को मिलकर साथ सँवारा भी है इक किरदार तुम्हारा भी है, इक किरदार...

ऐसी-तैसी हो गयी

तुमने कैसी फसल लगाई, सत्ता कैसी हो गयी पूरे लोकतंत्र की भाई, ऐसी तैसी हो गयी बीजेपी ने जीएसटी का खेल खिलाया ऐसा बाज़ारों की लुटिया डूबी, बगलें झाँके पैसा ये जीएसटी तुमसे पाई, ऐसी तैसी हो गयी जिस ईवीएम के घपले को कोस रहे कांग्रेसी अब उसके नुक़सान उठाओ, इसमें लज्जा कैसी...

किसान आंदोलन

सड़कों पे आया रे किसान, देखे संसद को पलकों पे आँसू के निशान, देखे संसद को अपनी सियासत तुम ही संभालो पैरों में चुभा बस काँटा निकालो रूठ गए हैं जो, उनको मना लो इनसे न बनो अनजान, देखे संसद को अपनों से अपनों की कैसी लड़ाई जनता है छोटी, तुम हो बड़ भाई उनकी अड़ाई, तुम्हारी कड़ाई...
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