Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
एक पहर ठहरी सखी, कान्हा जी के ठौर।
पहुँची कोई और थी, लौटी कोई और।।
योगेश छिब्बर जी का यह दोहा भारत में प्रेम के उत्कर्ष को समझने के लिये पर्याप्त हैं। भारत में प्रेम का चरम यह है कि मीरा ने जो प्रेमगीत रचे, वे भक्ति की मानक कविताएँ बनकर जग में प्रसिद्ध हुए। यह भारतीय संस्कृति ही है कि यहाँ प्रेम और भक्ति के बीच की योजक रेखा पर सर्वश्रेष्ठ साहित्य रचा जाता है।
यहाँ साकार और निराकार के भेद को समझने के लिये अकेले राधा का प्रेम समझना पर्याप्त हो सकता है। यहाँ सुभद्रा और अर्जुन के प्रेम का सम्मान करने के लिये स्वयं कृष्ण अपने वंश की परंपरा को तोड़ने का बीड़ा उठाते हैं। यहाँ शबरी का प्रेम, प्रतीक्षा की गहरी नदी में खड़े-खड़े इतना निश्छल हो जाता है कि स्वयं श्रीराम उसके कौतूहल का सम्मान करते हुए अतिथि सत्कार की टूटती हुई परंपरा को अनदेखा कर देते हैं।
यहाँ भक्ति कब प्रेम बन जाए और प्रेम कब भक्ति बन जाए, इसका अनुमान लगाना कठिन है।
हमारे यहाँ वसन्त का मौसम प्रेम का मौसम माना गया है, साथ ही वसन्त पंचमी का दिन ज्ञान की देवी सरस्वती को भी समर्पित है। मदनोत्सव के साथ सरस्वती के पूजन का यह संयोग भारतीय संस्कृति के संतुलन प्रमुख होने का सबसे बड़ा प्रमाण है।
प्रेम, मनुष्य होने की पहली अर्हता है, अतएव प्रेम के अभाव में मनुष्यता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। प्रेम और पवित्रता का अनुप्रास हमारे देश की अधिकतम प्रेम कथाओं में सहज ही घटित हो जाता है।
राधा और कृष्ण को प्रतीक मानकर रचा गया श्रृंगार हमारे प्रेम को सगुण और निर्गुण के मध्य ऐसे नखत की तरह जड़ देता है कि एक भी पंक्ति अपनी मर्यादा की धुरि से रंचमात्र भी इधर-उधर नहीं हो पाती।
प्रेम से आपूरित हृदय स्वयं तो सुन्दर होता ही है, साथ ही वह अपने आसपास के वातावरण को भी सुन्दर बनाता चलता है। वह पारिजात के उस वृक्ष के समान होता है जो अंधियारी रात जैसे जीवन में भी इस विश्वास के साथ भरपूर खिलता है कि यदि अंधियारे के कारण उसके सौंदर्य को कोई न भी भोग सका, तो भी उसकी सुवास से कुछ पहर तो रात का वीराना सँवर ही जाएगा। यही निस्पृहता हमारे प्रेम को विशेष बना देती है।
एक बात और, प्रेम कभी घटता-बढ़ता नहीं है। वह तो जब अपने पूरे सौष्ठव के साथ किसी सम्बन्ध में रम जाता है तो फिर धरती में गड़े किसी बीज के समान उस पर अपनत्व, अधिकार, विश्वास और दायित्व-बोध के फूल खिलते हैं। यह लौकिक प्रेम की सहज नियति है। जो लोग इस नियति को स्वीकार न करके इन फूलों को अनदेखा करके, उसी बीज की तलाश में सम्बन्ध की जड़ खोदने लगते हैं, वे सब कुछ खो बैठते हैं।
प्रेम, जीवन में घटित होनेवाली सबसे स्वाभाविक, सहज और सुन्दर घटना है। इसकी शाखाओं का विस्तार इसके बीज के अस्तित्व का साक्षी है, इसका पल्लवन इसके बीज के समर्पण का गवाक्ष है। इसे केवल समय और स्थान की आवश्यकता होती है, अपने हिस्से का धूप-पानी यह प्रकृति से स्वतः जुटा लेता है।
देह से विदेह तक विस्तृत प्रेम को अभिव्यक्त करता एक कबीराना दोहा और उद्धरित करना चाहूंगा-
जब मैं था, तब हरि नहीं, अब हरि हैं, मैं नाय।
प्रेम गली अति साँकरी, जा में दो न समाय।।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
इस दुनिया में प्यार रहे तो
भावों का सत्कार रहे तो
कितना प्यारा होगा ये संसार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
किस्सा सुनकर मन सबका कहता है इसमें भूल हुई है
बिन मतलब की दुनियादारी पाँखुरियों में शूल हुई है
जो रांझे के साथ हुई थी हम वो भूल सुधारेंगे कब
अपने मन से बिन मतलब की दुनियादारी मारेंगे कब
इनको सुख से जीने दें इस बार; समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
नज़रें टकराने पर जो आवाज़ हुई, वो शोर नहीं है
मन ही मन सब कह लेता है, पर फिर भी मुँहजोर नहीं है
अपनी इच्छाएं बिसरा कर उसकी मुस्कानें बोते हैं
इक-दूजे की ख़्वाहिश पूरी करके दुगने ख़ुश होते हैं
शुद्ध मुनाफे का ऐसा व्यापार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
दुनिया को मन में फूले सब फूल दिखाई दे जाते हैं
आँखों-आँखों चलने वाले शब्द सुनाई दे जाते हैं
चेहरे का कब, क्यों, कैसा था रंग समझ में आ जाता है
पलकों के झुकने का हर इक ढंग समझ में आ जाता है
तो फिर इस दुनिया की ख़ातिर प्यार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जब लालकिला बदरंग हुआ
हथियार चले हुड़दंग हुआ
उस दिन पानी-पानी क्यों था सारा का सारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
इस लालकिले ने कितने ही तख़्तों की उलट-पलट देखी
साज़िश देखीं, धोखे देखे, इतिहासों की करवट देखी
जब भी कोई दुश्मन आया, तब-तब हुंकारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
प्राचीर बहुत शर्मिंदा थी, वीरों की कुर्बानी रोई
गणतंत्र हुआ था शर्मसार, छिपकर चूनर धानी रोई
धरती में गड़ता जाता था उस दिन दुखियारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
उस दिन इसकी दीवारों पर बदनुमा दाग़ इक दंगा था
सबका अपना इक झंडा था, अपमानित खड़ा तिरंगा था
कैसे उजियारे में बदले इतना अंधियारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
अब इसके दरवाज़े आकर, बातों का मेला रहने दो
कुछ देर सियासत बन्द करो, कुछ देर अकेला रहने दो
अब कुछ भी कैसे झेलेगा, भाषण या नारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
शासन अधिकार लिए बैठा, जनता कर्त्तव्य बिसार गयी
उस दिन दोनों की मनमानी हर मर्यादा के पार गयी
शासित और शासक की जिद्द में पिसता बेचारा लालकिला
अपनों से हारा लालकिला
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
रोज़ उजड़े, रोज़ सँवरे, इस शहर का दिल अलग है
मत मिसालें दो हमारी, अपना मुस्तकबिल अलग है
कुछ अलग है नूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
खण्डहरों के साथ कितने युग खड़े हैं मुँह उठाए
ख़ून में भीगी रही है साज़िशों के ज़ख़्म खाए
पर इन्हीं सब साज़िशों ने रच दिया इतिहास जग में
इसके दीवानों का किस्सा हो गया है ख़ास जग में
है यही दस्तूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
ये शहर बनकर रहा है पांडवों की राजधानी
इसने बाँची तोमरों की और पिथौरा की कहानी
लाट दिल्ली में गुलामो की गड़ी है शान बनकर
और रज़िया बैठ पाई तख़्त पर सुल्तान बनकर
मन हुआ मग़रूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर ने खिलजियों के वहशती अरमान देखे
इस शहर ने तुगलकों के तुगलकी फरमान देखे
सैयदों का तौर देखा, लोदियों का ढंग देखा
शेरशाह सूरी सरीख़े शासकों का रंग देखा
कौन है मंसूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
शाहजहानाबाद बनकर ख़ूब इठलाती थी दिल्ली
चांदनी की रौनकों में रोज़ इतराती थी दिल्ली
लाल पत्थर के किले को चूमकर जमुना चली थी
सात दरवाज़ों के भीतर झूमकर दिल्ली पली थी
ताज था मखमूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर ने ख़ूब देखा ताज मिट्टी में मिले थे
आज जो भी खण्डहर हैं, कल वहाँ रौशन क़िले थे
तख़्त रंगीला हुआ तो, छिन गयी सब शान इसकी
महल की अय्याशियों ने छीन ली पहचान इसकी
खोया कोहेनूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
मुल्क़ की ताक़त बनी जब एक बूढ़ी बादशाहत
तब नयी करवट बदलने लग गयी पूरी सियासत
इक शहंशाह को नहीं दो ग़ज़ ज़मीं तक दे सकी ये
फिर नये ही रूप में ढलने लगी हारी-थकी ये
हाल था मजबूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
और फिर रहने लगी बेचैन आठों याम दिल्ली
नौ दशक तक लड़ रही थी इक अलग संग्राम दिल्ली
उस समर में शांति भी थी, उस समर में जोश भी था
उस समर में इक तरफ़ दिल्ली चलो का घोष भी था
रास्ता था दूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
रायसीना को बड़ी मुश्किल से जब खादी मिली थी
सैंकड़ों बलिदान देकर हमको आज़ादी मिली थी
देश बँटने का स्वयं पर बदनुमा इल्ज़ाम सहकर
इस धरा पर ही गिरा था जब कोई ‘हे राम’ कहकर
पुँछ गया सिंदूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर में दर्ज है बलिदान की अद्भुत कहानी
सीस कटवाए मगर अन्याय से कब हार मानी
तख़्त के ज़ुल्मो-सितम से जूझने की जिद्द बड़ी थी
तेग़ के आगे बहादुर की फ़क़त हिम्मत लड़ी थी
है अमर वो शूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर को औलियाओं की ज़मीरी का गुमां है
सूफियों की मस्तमौला सी फ़क़ीरी का गुमां है
राम और रहमान बढ़कर साथ चलते हैं अभी भी
इस शहर में फूलवाले सैर करते हैं अभी भी
यूँ मिटा नासूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
आओ ना साहब यहाँ का चावड़ी बज़ार देखो
नाक सी सीधी गली में इत्र का व्यापार देखो
नफ़रतों को किस अदा से मिल रही है मात देखो
एक पंक्ति में खड़े हैं धर्म सब इक साथ देखो
इश्क़ कर मंजूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
चाट की लज़्ज़त उठाओ और परांठों का मज़ा लो
चावड़ी बाज़ार में हलवा-नगौरी ख़ूब खा लो
लुत्फ़ बालूशाही का लेना हो, यमुना पार कर लो
पान या कुल्फी खिलाकर जीभ का सत्कार कर लो
स्वाद है अमचूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
इस शहर को जान पाने का कोई ज़रिया नहीं है
नाम दरियागंज है, लेकिन वहाँ दरिया नहीं है
इस शहर में आदमीयत के अभी हिस्से मिलेंगे
तंग गलियों में बड़े दिल के कई किस्से मिलेंगे
प्यार है भरपूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
गुलमोहर के लाल फूलों के लिबासों का शहर है
टेसुओं का, नीम का और अमलतासों का शहर है
गुनगुनी-सी धूप में कचनार खिलता है यहाँ पर
हर गली में एक हरसिंगार मिलता है यहाँ पर
रंग कब बेनूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
जब ग़ज़ल छेड़ी तो छेड़ी ज़ौक़ का अंदाज़ लेकर
शायरी ग़ालिब ने की तो, इश्क़ को आवाज़ देकर
आज भी इक छाप ख़ुसरो की यहाँ आली मिलेगी
आज तक भी उर्स में मक़बूल क़व्वाली मिलेगी
मन रहा संतूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
चाह कर देखो नहीं है, कौन सा पकवान इसमें
इल्म उर्दू का बहुत है, और हिन्दी ज्ञान इसमें
जनवरी शिमला सरीखी,जून राजस्थान इसमें
ध्यान से देखो मिलेगा एक हिंदुस्तान इसमें
प्यार है दस्तूर दिल्ली का
दिल बहुत मशहूर दिल्ली का
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
धागेनातीनकगधिंन ताल चलती है, पर
सुर सारेगामापाधानीसा में समाय के
नूपुर छनन छन, घनन घनन घण्ट;
मृदंग बजत द्रुम द्रुम द्रुम गाय के
पंचम-निषाद तीव्र-कोमल से रंगे राग,
दुगुन-तिगुन ताल भेद समझाय के
विलग विलग स्वर गान बनते हैं,
जब सब एकरूप होते सम पर आय के
कभी सब त्याग वीतराग निज भान करे,
कभी योग हर रोग का निदान हो गया
कभी बुद्ध, कभी युद्ध, कभी रुद्ध, कभी शुद्ध;
कभी युद्ध जीतने के बाद ज्ञान हो गया
कभी ज्ञानियों का राजधानियों ने मान किया,
कभी प्रेम ज्ञानवान से महान हो गया
विषम-विषम मान्यताओं के समक्ष भी है
सम जो विधान वही संविधान हो गया
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
सिस्टम… यह एक ऐसा शब्द है, जो किसी भी भारतीय भाषा में अनूदित होकर प्रपंच बन जाता है। ईश्वर को जब सृष्टि का सर्वाधिक दीन प्राणी बनाना था, तो उसने भारतीय सिस्टम में फँसा मनुष्य बना डाला।
हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है; इसलिए हमारा सिस्टम भी अपनी गिरफ़्त में आए सभी नागरिकों को समान रूप से प्रताड़ित करता है।
इस सिस्टम में सबसे ऊपर है, विधायिका। स्कूली किताबों ने विधायिका के विषय में यह अफ़वाह फैलाई है कि विधायिका क़ानून बनाती है। जैसे ही स्कूल की आदर्शवादी रामचरितमानस से निकलकर मनुष्य व्यवहारिकता की महाभारत बाँचता है तो उसे समझ आ जाता है कि विधायिका को सामान्य भाषा में राजनीति कहा जाता है और उसका केवल एक ही काम है- चुनाव जीतना। इस काम में राजनीति अपना जी, और नागरिकों की जान भी दाँव पर लगाने से नहीं चूकती।
संसद में क़ानून बनाने से लेकर सड़क पर भाषण देने तक और हँसने-रोने से लेकर उठने-बैठने और यहाँ तक कि जीने-मरने तक का एक ही लक्ष्य होता है, चुनाव जीतना। जिस कार्य से चुनाव जीता जा सके, उसे करने में राजनीति कभी पीछे नहीं रहती। फिर वह कार्य किसी को जीवन देने का हो या किसी का जीवन लेने का। राजनेता चुनाव जीतने के लिए ही दंगा शुरू करवाते हैं और फिर चुनाव जीतने के लिए ही दंगा बन्द भी करवाते हैं। टीवी डिबेट में गाली-गलौज से लेकर अपने-आप पर जूते-चप्पल फिंकवाने में भी इन्हें कोई परहेज नहीं होता। चुनाव जीतने के लिए ही बयान दिये जाते हैं और चुनाव जीतने के लिए ही उन बयानों से पलटा जाता है। नेता उपलब्ध है अर्थात् उसे वोट चाहिए और नेता व्यस्त है, अर्थात् उसे वोट मिल चुका है। चुनाव जीतने की इस मारामारी में जनता के दुःख-दर्द की सुधि लेने की फुर्सत किस कम्बख़्त के पास है?
अतएव, हे पार्थ! किताबों में लिखी लोकतंत्र की परिभाषाओं से भ्रमित न होओ। लोकतंत्र में तुम्हारी देह की स्थिति एक उंगली से अधिक नहीं है। यदि वोट देने के बाद उस उंगली का प्रयोग करने का विचार भी मन में आया तो यह व्यवस्था तुम्हारी शेष देह को जीते जी ही नारकीय कष्टों से अवगत करा देगी और फिर तुम युग की समाप्ति तक अपनी आत्मा पर अपनी देह का बोझ लादे हुए जीवित रहोगे। चूँकि सिस्टम की आत्मा होती ही नहीं है इसलिए उसकी आत्मा कभी मरती भी नहीं है। और जनता की आत्मा महाराज कुंभकर्ण के सिंहासन पर पैर पसारकर सोई हुई है।
विधायिका के इस विराट स्वरूप को जानने के पश्चात भारतीय नागरिक के मन में न्यायपालिका के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। चूँकि न्यायपालिका किसी के साथ भेदभाव नहीं करती अतः अपने द्वार पर आनेवाले सभी मुक़द्दमों को समान रूप से लटकाती है। काग़ज़ और औपचारिकताओं के भीषण जंजाल में फँसे न्यायालय की लय विलंबित प्रवृत्ति की है। इसलिए न्यायालय में एक बार प्रवेश करते ही मनुष्य के जीवन में ठहराव-सा आ जाता है। छह महीने प्रतीक्षा करने के बाद एक तारीख़ आती है, उस तारीख़ पर कई घण्टे प्रतीक्षा करने के बाद प्रार्थी को अपने मामले का नाम सुनाई देता है। बंदा इस आवाज़ को सुनने की ठीक से ख़ुशी भी नहीं मना पाता, कि तब तक दूसरे मामले की आवाज़ लग जाती है। लटके हुए मुँह को लेकर प्रार्थी कोर्ट के बाहर आता है तो वक़ील अगली तारीख़ नोट करवाकर उससे अपने परिश्रम का मेहनताना वसूलने की भूमिका बनाने लगते हैं। घुटन भरे इन न्यायालयों के पास पीड़ित के लिए केवल टूटन है, जिसे बटोरने का लिए लोग अखण्ड ज्योत से भी अधिक निष्ठावान बनकर माननीय न्यायालय में हर तारीख़ पर उपस्थित रहने के लिए विवश हैं। स्वाधीनता के बाद से अब तक किसी न्यायाधीश ने ‘न्याय’ को समय पर उपस्थित होने के समन जारी किए होते तो कदाचित न्याय व्यवस्था की ओर उम्मीद से देखती करोड़ों आँखें पथरा न गई होतीं।
विधायिका से जर्जर हुई देह और न्याय की प्रतीक्षा में पथराई हुई आँखों के साथ भी यदि किसी नागरिक में साँस बच जाएँ, तो उसके लिए लोकतंत्र में कार्यपालिका की पर्याप्त व्यवस्था है। यह कार्यपालिका सुरसा माई के मुख की भाँति असीम है। वायुमण्डल में जहाँ-जहाँ तक वायु है वहाँ-वहाँ तक कार्यपालिका है। यह कार्यपालिका विधायिका द्वारा बनाए गए विधान के आधार पर नागरिकों से ‘प्रत्यक्ष कर’ वसूल करती है। अपराध रोकने में इसकी कोई रुचि नहीं है, अपितु इसका पूर्ण विश्वास है कि अपराध मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति का अंग है, इसलिए यह हर नागरिक को अपराधी मानते हुए उससे अभद्र तथा अपमानजनक व्यवहार करती है। क्लर्क से लेकर हवलदार तक और अधिकारी से लेकर चौकीदार तक; सब व्यवस्थित रूप से जनता को यह समझाते रहते हैं कि सिस्टम से उलझने की भूल मत कर बैठना… क्योंकि लोकतंत्र में तंत्र से अधिक महत्वपूर्ण तो लोक भी नहीं होता।
हमने अपने बुजुर्गों से शायद कभी नहीं पूछा, लेकिन अगर हमारी पीढ़ियों ने हमसे इस सिस्टम के इस हाल का कारण पूछ लिया, तो उस समय हमारी ख़ामोशी हमें ख़ुद को भीतर तक बेन्ध जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन