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विद्वेष और कविता

कविता मुहब्बत की ज़ुबान है। किसी भी परिस्थिति में घृणा के उद्वेग बोने का काम कविता नहीं कर सकती। कविता बलिदान का शौर्यगायन कर सकती है, किन्तु किसी को ‘किसी भी परिस्थिति में’ बलि लेने के लिए उकसा नहीं सकती। किसी भी वाद या विचार से दूर मनुष्यता को सर्वाेपरि रखना कवि होने...

लॉकडाउन की दिवाली

मार्किट ठंडा घर-घर मंदा जेब सभी की ख़ाली है चारों ओर दिवाला निकला कैसी आई दिवाली है कोरोना की दहशत ऐसी अबकी गिफ्ट नहीं आये इसके डिब्बे उसके घर में होकर शिफ्ट नहीं आये ख़ूब घुमंतू सोन पापड़ी घर पर बैठी ठाली है चारों ओर दिवाला निकला कैसी आई दिवाली है कोरोना ने लक्ष्मी जी...

इलेक्सन

क्या करना है कारोबार कल और इलेक्सन होंगे कल और इलेक्सन होंगे, घनघोर इलेक्सन होंगे हर ओर इलेक्शन होंगे, पुरजोर इलेक्शन होंगे सब कुछ मुफ्त मिलेगा यार कल और इलेक्सन होंगे एमपी वाले चावल देंगे, दिल्ली वाई-फाई पटना जाकर फोकट में ले लेंगे यार दवाई मेहनत के मुँह पर पोतेंगे,...

भोर से ठीक पहले

रेत, अंतिम बून्द भी यदि सोख ले अपनी नदी की साफ़ मतलब है पहाड़ों की बरफ़ अब गल चुकी है रात का अंधियार जब अपने चरम पर आ गया हो तब समझना, सूर्य की पहली किरण अब चल चुकी है त्यौरियों के बोझ से भौंहें भले दुखने लगी हों होंठ की बस एक हरक़त से हवा हो जाएंगी ये ये निराशा, ये...

जिस दिन साँस पराई होगी

देह बचेगी स्पर्श न होगा आँखें होंगीं दर्श न होगा सब अपनों के आने का भी मुझको किंचित हर्ष न होगा उस दिन अधरों पर भी कोई याद नहीं मुस्काई होगी जिस दिन साँस पराई होगी जिन होंठों की मुस्कानों से मुझको प्राण मिला करते हैं जिन चेहरों के खिल जाने पर मन के तार हिला करते हैं...

उलाहना

मैं अंधेरों के नगर में दीप धरने जा रहा हूँ तुम उजालों की प्रतीक्षा में समय व्यतीत करना मैं पसीने से नदी का पाट भरने जा रहा हूँ तुम किसी बरसात की मनुहार का संगीत गढ़ना कर्मरत अर्जुन हुआ तो कृष्ण उसके सारथी थे देवता जीवन बदल सकते नहीं केवल भजन से आ गई चलकर अकेली जो गहन...
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