Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सुनो, झरोखा खोलो लोगो
जितना चाहो बोलो लोगो
लेकिन शर्त यही है केवल
पूछ पूछकर लखना होगा
पूछ पूछकर बकना होगा
बाहर कोई सत्य नहीं है
एक घिनौना चेहरा सा है
जिसको तुम बंधन कहते हो
वो तुम पर एक पहरा सा है
खूब खिलो, जी भर इतराओ
सारे आलम को महकाओ
जब तक कहें खिलो गुलशन में
जब हम कह दें तब झर जाओ
हर सुंदरता के प्रेमी को
इतना संयम रखना होगा
पूछ पूछकर तकना होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आओ अपने घर में सूरज का इक अंश उठा लाएँ
आओ जीवन के अंधियारे का विध्वंस उठा लाएँ
जिस सूरज की स्वर्णिम किरणें धरती को दमकाती हैं
जिस ऊर्जा से पोषित होकर सब फसलें लहराती हैं
उस सूरज की एक किरण का जगमग वंश उठा लाएं
जो सूरज की ऊर्जा वैदिक मंत्रों में ढल सकती है
वो ऊर्जा घर के भीतर बिजली बनकर जल सकती है
यंत्रों के इस मानसरोवर का इक हंस उठा लाएं
ये ऊर्जा मानवता के हित ईश्वर का उपहार सखे
इस पर कुछ अवरोध नहीं ना सिस्टम ना सरकार सखे
बिजली के उस इंतज़ार का सार्थक ध्वंस उठा लाएं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
हिंदी पढ़ने वाली लड़की
हिंदी पढ़ने वाली लड़की
सीधी-सादी, सहज-सलोनी, कभी न तड़की-भड़की
बातों का भावार्थ समझ लेती है वो झटपट से
उसके सरल वाक्य अपराजित रहते सदा कपट से
स्वाद बढ़ाते हैं बातों का उसके बोले व्यंजन
देवनागरी की अक्षर लिपटे रहते हैं लट से
अनुपम है अनुभूति भाव की
सक्षम है अभिव्यक्ति भाव की
कविता पढ़-पढ़ स्वयं हो गई कविता किसी सुगढ़ की
नियम छोड़ कर रोमन हो गई हैं जब शीला-मुन्नी
ऐसे में भी उसे सुहाए शिरोरेख सी चुन्नी
भीतर-बाहर एक सरीखी उसकी जीवनचर्या
ना कठोर, ना जटिल, न दूभर, ना अभद्र, ना घुन्नी
वो इक रोचक उपन्यास है
वो उत्सव का अनुप्रास है
शायद वो है किसी निराले कवि की बिटिया बड़की
उसको है आभास सभी की लघुता-गुरुता द्वय का
उसे पता है अर्थ शब्द संग अलंकार परिणय का
छंद भंग हों संबंधों के यह संभव कब उससे
ध्यान हमेशा रखती है वो यति-गति का सुर-लय का
कभी अकड़ है पूर्णछन्द सी
कभी रबड है मुक्तछन्द सी
भाषा से सीखी हैं उसने सब बातें रोकड़ की
नवरस की अनवरत साधना उसका धर्म ग़ज़ब है
भाषा से अनुराग उसे जो है, अन्यत्र अलभ है
मात्र भंगिमा के बल पर वह श्लेष साध लेती है
उसे यमाताराजभानसलगा से फुर्सत कब है
हीरामन-होरी से परिचित
हर गौरा-गोरी से परिचित
उसने कंधों से समझी है पावनता काँवड़ की
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सत्य तो लगती नहीं, परलोक की अवधारणा पर
आपसे मिलने की हर इक आस इस ही पर टिकी है
हाथ की रेखाओं का कोई नहीं हो अर्थ फिर भी
आपसे आजन्म दूरी की कथा इनमें लिखी है
कुछ नहीं होता है करवा चौथ के निर्जल व्रतों से
किन्तु अपनी आस्था को घोल देना अर्घ्य जल में
पत्थरों के कान सुन पाते नहीं हैं प्रार्थनाएँ
किन्तु संशय आप मत रखना तपश्चर्या के बल में
आस्था होगी विजय, तो मान्यता यह ध्वस्त होगी
है वही सच, जो मेरी आँखों के आगे भौतिकी है
इस जनम में चूक हो जाए किसी सम्बन्ध की तो
कोई भव उसकी सटीकी के लिए होता तो होगा
जिस कृषक ने शुष्क भू पर धान रोपी मूढ़ता से
वह कभी बिल्कुल सही फसलें कहीं बोता तो होगा
कर्मकाण्डों की निठुरता से सदा ही क्षुब्ध हूँ मैं
किन्तु व्यवहारिक जगत् में भावना सस्ती बिकी है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
वाणी, विद्या, वीणा, विमर्श
लालित्य, लास्य, लय, लोमहर्ष
व्याकरण, वर्ण, वैभव, विचार
अभिव्यक्ति, अल्पना, अलंकार
भाषा, भूषण, भाषण, भविष्य
दर्शन, दीपक, दादरा, दृश्य
नवरस, नाटक, नूपुर, निनाद
सरगम, संस्कृति, साधना, साध
तूलिका, ताल, ताण्डव, तुरंग
मुद्रा, मृदुता, मंचन, मृदंग
कल्पना, कण्ठ, कविता, कहास
रूपक, रचना, रस, रंग, रास
गायन, गीता, गंधर्व, गीत
पूजा, पुराण, पद, प्रेम-प्रीत
संगीत, सृजन, सुर, स्वर, सुगंध
वंशी, वनिता, विद्वत, वसंत
इन सब शब्दों का एक सार
माँ हंसवाहिनी का सिंगार
हो शोक, हर्ष, आनंद, खेद
है नहीं सृजनपथ रंच भेद
स्तंभित अतीत है मूर्तिमान
चित्रों में आगत की उड़ान
अनुभव पर है इतिहास शेष
कल्पना खोजती भविष देश
करती कविता युग का बखान
तब दर्पण देखे वर्तमान
हर काल-देश की व्यक्त शक्ति
हर सृजन साधना आप भक्ति
वाणी को कर दो दिव्य धाम
स्वाकार करो मेरा प्रणाम
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
पगडण्डी को छूकर निकला राजमार्ग कुछ देर
त्यौरी पिघलीं, आँखें चमकीं, चिंता हो गई ढेर
तेज़ दौड़ते वीराने को भाया दृश्य सुहाना
चैपालों को हंसी-ठहाका, पनिहारिन का गाना
बूढ़ा बरगद, मीठी पोखर और पशुओं का घेर
मन में कितनी ठंडक उतरी, कैसे मैं बतलाऊँ
जब सूखी आंखों ने देखी, मटके वाली प्याऊ
होंठ नहीं गीले कर पाते फ्रिज से सेठ-कुबेर
पगडण्डी से चलकर आती हैं जब मस्त हवाएँ
राजमार्ग का मन करता है, यहीं कहीं बस जाएं
अमराई में खाट डाल कर सुस्ता लें कुछ देर
यूं तो कितनी शहरी सड़कें आगे-पीछे घूमें
हर आगे बढ़ने वाले को आगे बढ़कर चूमें
पगडण्डी चखकर लाई है मीठे-मीठे बेर
सड़क कभी इस राजमार्ग से मिले कभी उस मग से
पगडण्डी इक बार परस ले जिसको भी निज पग से
फिर मुश्किल है पैदा होना उसके मन में फेर
सड़क लांघ जाती है अक्सर राजमार्ग का सीना
पगडण्डी ने मर्यादा की सीमा कभी तजी ना
रोज़ सबेरे ले आती है पत्ते-फूल सकेर
सड़क विदा के समय अकड़ कर दूर चली जाती है
पगडण्डी सहमी-ठिठकी सी खड़ी नज़र आती है
राजमार्ग को ही जाना पड़ता है नज़रे फेर
मिला हाँफते राजमार्ग को ज्ञान यहाँ अलबेला
बहुत तेज़ जो दौड़ा इक दिन वो रह गया अकेला
काम सभी पूरे हो जाते थोड़ी देर-सबेर
✍️ चिराग़ जैन