Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं
मुझ पर रस्मों का ज़ोर नहीं
मेरे सपनों को बांध सके
ऐसी दुनिया में डोर नहीं
कोमल हूँ कन्यापूजन में
चण्डी हूँ दुष्टों से रण में
जब ठान लिया तो मिला दिया
धरती को अम्बर से क्षण में
मुश्किल की कोई भी आंधी
मुझको सकती झकझोर नहीं
मेरे सपनों का देश अलग
मेरा ख़ुद का परिवेश अलग
सारी दुनिया की बात अलग
मेरे मन का संदेश अलग
कुछ भी सुनकर चुप रह जाऊँ
ऐसा अब होगा और नहीं
अर्पण की घड़ी अगर आई
अपना सर्वस्व लुटा दूंगी
धोखे से छलना चाहोगे
भारी विध्वंस मचा दूंगी
हर पल कोमल भी नहीं मगर
हर पल को बहुत कठोर नहीं
आँखों में सपना पलता है
दिल हिरण चैकड़ी भरता है
क़दमों में बिजली सी तेज़ी
मन में बेहद चंचलता है
मैं दौड़ जिसे छू नहीं सकूं
ऐसा तो कोई छोर नहीं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
प्यार ने लांघ दीं वक़्त की सरहदें
और सारे नियम देखते रह गए
इश्क़ हम पर ठहाके लगाता रहा
हम मुहब्बत के ग़म देखते रह गए
लोक-परलोक की धारणा से परे
शबरियों की प्रतीक्षा अटल ही रही
लोग कहते हैं राधा वियोगिन बनी
कृष्ण से पूछिये वो सफल ही रही
प्रेम से मृत्यु का भय पराजित हुआ
स्तब्ध से मौन यम देखते रह गए
एक कच्चे घड़े पर भरोसा किए
सोहनी तेज़ धारा में ग़ुम हो गई
कैस दर-दर भटकता रहा उम्र भर
और लैला सहारा में ग़ुम हो गई
रूह का आसमां में मिलन हो गया
जिस्म धरती पे हम देखते रह गए
कोई तो इस ज़माने को समझाइये
क़ायदे बावरों को सिखाता रहा
जो दीवाने हुए प्रेम के पान से
उनको विष के पियाले पिलाता रहा
प्रेम विषपान करके अमर हो गया
सारे ज़ुल्मो-सितम देखते रह गए
✍️ चिराग़ जैन
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परहित का ही व्याकरण रहा
उसके अंतस् की भाषा में
मर्यादा पार हुई भी तो
कुछ सत्कर्मों की आशा में
तुम तुला उठाए फिरते हो
पलड़े में रखे चरित्रों को
मुट्ठी में स्वार्थ पसीज गया
पापी कर दिया पवित्रों को
जब जी चाहा पाहुन धोकर
कन्यापूजन में बिठा लिया
जब जी चाहा दासी कहकर
बिस्तर की वस्तु बना दिया
जब जी चाहा शृंगार किया
जब जी चाहा दुत्कार दिया
चुटकी से उसकी मांग भरी
पंजे से चीर उतार दिया
हाथों को बेड़ी देते हो
पैरों को छाले देते हो
इतिहास प्रश्न करता है तो
फिर वही मिसालें देते हो
लक्ष्मी कहकर इतराते हो
दुर्गा कहकर डर जाते हो
मंदिर में पूजा करते हो
मंडी में दाम लगाते हो
जब घिरा अंधेरा रातों का
औरत से रात निखारी है
जब सुबह हुई तो बिस्तर से
सिलवटें समझ कर झाड़ी है
उसने निस्पृह भक्ति ढूंढी
मीठी बातों के दर्पण में
तुमको केवल वासना दिखी
प्रेयसी के मौन समर्पण में
जब तक बन पड़ा अधर सीकर
कीचक तक का सम्मान किया
जब सीमा रेखा पार हुई
सारा कुल लहूलुहान किया
शबरी बन अद्भुत प्रेम किया
मीरा बनकर विषपान किया
सीता बन अग्नि परीक्षा दी
लक्ष्मी बन शर संधान किया
✍️ चिराग़ जैन
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सच जब किरच-किरच कर बिखरा
भावों का अवसान हो गया
उसको शब्दों तक लाने में
कवि भी लहूलुहान हो गया
सच के टुकड़े हाथ उठाए
जिसने उन्हें निकट से देखा
उसकी हुई हथेली घायल
भंग हुई जीवन की रेखा
अक्षर साथ छोड़कर भागे
वाणीकुल वीरान हो गया
सब सिद्धांत तड़ककर टूटे
झूठे पर्दों ने सुख लूटे
बड़े हुए तो हमने पाए
बचपन के सब किस्से झूठे
मछली जल की रानी है; ये
घड़ियालों को ज्ञान हो गया
मटके में जो कंकड़ डाले
उनने सारा पानी सोखा
प्यासा कौआ श्रम कर करके
अब भी खा जाता है धोखा
कछुओं के तप से भी ऊँचा
खरगोशों का स्थान हो गया
✍️ चिराग़ जैन
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आपकी प्रीत जबसे सुलभ हो गई
फिर किसी मीत की आरज़ू ना रही
प्यार में हार कर जो मिला है मुझे
अब किसी जीत की आरज़ू ना रही
साँवरे के लिए गीत गाती फिरी
एक मीरा दीवानी कहाती फिरी
क्षण समर्पण का जब तक न हासिल हुआ
तब तलक हर नदी गुनगुनाती रही
राधिका कुंजवन में मिली श्याम से
फिर उसे गीत की आरज़ू ना रही
शब्द आँखों में आकर ठहरने लगे
भाव चेहरे की लाली में ढलने लगे
कण्ठ में जम गए ज्ञान के व्याकरण
अर्थ अधरों पे आकर पिघलने लगे
श्वास का राग धड़कन से ऐसा मिला
मुझको संगीत की आरज़ू ना रही
अबकी सावन मिलेगा तो पूछूंगी मैं
मेघ पहले क्यों ऐसे न लाया कभी
बिजलियों ने न इतना प्रफुल्लित किया
कोयलों ने न यूँ मन लुभाया कभी
मन के चातक ने कैसा अमिय चख लिया
अब उसे छींट की आरज़ू ना रही
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
किसी की बात में आकर बँटा आँगन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
जहाँ के खेत में बंदूक बोते थे भगत बाबा
जहाँ की जेल में जगते थे, सोते थे भगत बाबा
जहाँ हमको मिला दुश्मन की दहशत का नमूना था
जहाँ फाँसी के फंदे को भगतबाबा ने चूमा था
उसी लाहौर को अब जुर्म का घर दिया तुमने
जहाँ पुरखों की यादें थीं वहाँ डर भर दिया तुमने
हमारे तीरथों को ख़ून से तर कर दिया तुमने
न जाने किसके बहकावे में ये अनबन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
नहीं भूले अभी तुम चावड़ी बाज़ार की गलियाँ
कराची की हमें भी याद हैं दिन रात रंगरलियाँ
हुई तक़सीम तो जैसे ज़फ़र का ख़्वाब टूटा था
बिलख उट्ठे थे लाला लाजपत, पंजाब टूटा था
पुराने दिन करोगे याद तो ये पीर समझोगे
छिनी है प्यार की कितनी बड़ी जागीर समझोगे
तुम्हें क्योंकर नहीं देते हैं हम कश्मीर समझोगे
जहाँ ख़ुशियाँ मनानी थी वहीं मातम मना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
ज़रा सी जि़द बड़ी कर ली, वतन छोटा बना डाला
खरी आज़ादी की ख़ुशियों को भी खोटा बना डाला
ख़ज़ाना छोड़ कर अब ठीकरों की मांग करते हो
ज़ेह्न में नफ़रतें रख दोस्ती का स्वांग करते हो
सभी गर सब्ज़ हैं तो फिर बताओ ज़र्द कितने हैं
करोड़ों प्यार वाले हैं तो दहशतगर्द कितने हैं
ये दहशतगर्द अपनी क़ौम के हमदर्द कितने हैं
अमां तुम पीतलों को सोच में कुन्दन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
चलो छोड़ो ये बातें क्या हुआ होगा आज़ादी पर
किसे किस बात ने गहरे छुआ होगा आज़ादी पर
कहीं जिन्ना अड़े होंगे, कहीं नेहरू अड़े होंगे
मगर इक़बाल, गांधी और आगा रो पड़े होंगे
खुले आँगन में इक परिवार जब हारा सही था क्या
यहाँ जब भाई ने ही भाई को मारा सही था क्या
ज़रा सोचो हुआ था जो वो बँटवारा सही था क्या
अरे, ताउम्र ना मिलने का कैसे मन बना बैठे
हमीं इक दूसरे को जान का दुश्मन बना बैठे
✍️ चिराग़ जैन