Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
नाम रहेगा शेष हमारा
सर्वोत्तम परिवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
आज़ादी के नग़मे गाकर, देशप्रेम की अलख जगाकर
स्वाभिमान हित जी लेते हैं, सिर्फ़ घास की रोटी खाकर
पल भर में तलवार हमारी हो सकती है खूं की प्यासी
पल भर में ही हो सकते हैं, शस्त्र त्यागकर हम सन्यासी
विष पीता अखिलेश हमारा
वज्र बना दरवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
ओज रुधिर में, रौद्र नयन में, रूप भयानक वैरी के हित
करुणा निर्दोषों के दुःख पर, पीठ बंधा वात्सल्य सुरक्षित
हमने सीखा ढंग से जीना, हमने सीखा ढंग से मरना
सुंदरता पर आँच हुई तो, हमने सीखा जौहर करना
शाश्वत सुख उद्देश हमारा
शांतिपरक निर्देश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
हम अनुनय की बोली बोलें, रस्ता मांगें हाथ पसारे
अभिमानी के लिए भरे हैं हमने आँखों में अंगारे
हम अपनी पर आ जाएँ तो सागर से अमृत चखते हैं
हम अपनी पर आ जाएँ तो पर्वत उंगली पर रखते हैं
सागर-सा आवेश हमारा
दास हुआ लंकेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
मस्त फ़क़ीरों की धरती है, शांति-अहिंसा के अभिलाषी
वन्देमातरम गाते-गाते, रण में कूद पड़े संन्यासी
हमने सागर को लांघा है, पर्वत लेकर उड़े गगन में
एक वचन पूरा करने को, चैदह वर्ष बिताए वन में
सीधा-सादा वेश हमारा
प्रेम-त्याग संदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
आपस में लड़ते हैं तो क्या, दुःख में साथ खड़े होते हैं
हर मुश्किल के आगे हम ही, सीना तान अड़े होते हैं
जब संकट ने पाँव पसारे, जब भी कोई आफत आई
एक साथ मिलकर जूझे हैं, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई
शौर्य रहेगा शेष हमारा
मिट जाएगा क्लेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
वनवासों को पूजा हमने, राजपाट हमने ठुकराया
जिससे मोह किया वो छूटा, जिसको त्याग दिया वो पाया
हम घर में रहकर वैरागी, हम वन में रहकर शासक हैं
योग-भोग दोनों के साधक, हम प्रियतम के आराधक हैं
मत मानो आदेश हमारा
पर समझो उपदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा
✍️ चिराग़ जैन
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अकथ वेदना करती होगी रह-रहकर परिहास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
धीर धरो मैया वैदेही
अनगिन झेले कष्ट भले ही
मृग आकर्षण में अंकुर थे
स्वर्ण नगर की पीड़ा के ही
पल भर का सम्मोहन लाया जीवन भर का त्रास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
हर इक सुविधा द्वार पड़ी थी
प्राण बिना इक देह खड़ी थी
माँ सीता की आँखें नम थीं
पर उर्मिल की पीर बड़ी थी
भीतर-भीतर घुलकर सींचा प्रियतम का विश्वास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
अश्रु बहाने पर अंकुश था
पीर जताने पर अंकुश था
अगन सेज पर इक लक्कड़ को
धधक बताने पर अंकुश था
वरना सबको हो जाएगा, पीड़ा का आभास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
हमें बताया रामायण ने
भीषण पाप किया रावण ने
किन्तु देह की पर्णकुटी से
जिसका हरण किया लक्ष्मण ने
उस बेचारी ने कब की थी कंचन मृग की आस
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
✍️ चिराग़ जैन
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उमंग, शौर्य, शक्ति का अनन्त नित्यकोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
त्रिभुज, स्वरद, पणव सुसज्ज झल्लरी की गूंज है
सुरों की दिव्य देह ताल वल्लरी की मूँज है
महोत्सवों में बाँसुरी की तान का विधान है
समर समय में शंख के स्वरों का शौर्यगान है
समर्पणों को तूर्य की ध्वनि का पारितोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
नागांग, घोषदण्ड और आनकों का लास्य है
मृदङ्ग का वितान और गोमुखों का भाष्य है
हृदय धरा पे भूप, सोनभद्र का प्रवाह है
तिलंग-उदय-अजेय से शिथिल क्षणों का दाह है
अमर, अकंप, अप्रतिम, अथक, अजर, अदोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
ये श्रीनिवास सुब्बु के करों का घोषदण्ड है
ये दाते, बापुराव का प्रचण्ड शक्ति खण्ड है
किरण, तिलक-कामोद सम सृजन का दिव्य क्षेत्र है
ये केशवः की तर्जनी है शंकरः का नेत्र है
ये मेघ घोष, ब्रह्म घोष और सिंह घोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
✍️ चिराग़ जैन
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कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
फ्यूचर के सब थॉट अधूरे पीछे छूट गए
संबंधों की स्नेह आर्टरी की ब्लॉकेज हटी
बने रहे जो क्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
अनुभव और आकलन से जो सोच बनी वो छूटी
युग की क्यारी में महकेंगी दो गीतों की बूटी
गमले, हैंगर, पॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
शेष रहेगा चर्चा बस अच्छाई की जगमग में
याद रखेगी दुनिया केवल कुछ मिठास, कुछ नग्मे
कड़वाहट के डॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
भीतर घुमड़ रही थीं जाने कितनी सारी बातें
ख़ुद से बतियाते कट जाती थीं अंधियारी रातें
बतरस के सब लॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
पदक, चिन्ह, सम्मान, दुशाले, नकदी और लिफाफे
जिनके लिए उनींदे भटके, दौड़-दौड़ कर हाँफे
व्हाट एवर वी गॉट अधूरे पीछे छूट गए
कुछ गीतों के प्लॉट अधूरे पीछे छूट गए
✍️ चिराग़ जैन
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अभी गुलाबी रंगत वाले फूल नहीं मुरझाए होंगे
अभी मेज से तुमने मेरे तोहफे नहीं हटाए होंगे
अभी फोन में मेरा नम्बर उसी नाम से दर्ज मिलेगा
अभी गैलरी में केवल मेरे फोटो का सर्च मिलेगा
तुम तक मेरा प्यार न पहुँचे, तुम ऐसी परवाज न होना
इतनी भी नाराज न होना
प्यार भरे पल याद आएं तो अनबन को सुलझा ही लेना
बार-बार मैं फोन करूँ तो मन ही मन मुस्का ही लेना
पीछे पड़ जाने की मेरी आदत से तो वाकिफ हो ही
दाँत पीसकर, झुंझलाकर तुम मेरा फोन उठा ही लेना
समय बिताने भर को विंडो शॉपिंग की मोहताज न होना
इतनी भी नाराज न होना
कोई फिल्मी गीत बजेगा तो मेरी याद आ जाएगी
जब फूलों पर नूर सजेगा तो मेरी याद आ जाएगी
जिस खिड़की पर बैठे हम-तुम घंटों बतियाते रहते थे
जब उस पर सावन बरसेगा तो मेरी याद आ जाएगी
मुझे भूल जाने की कोशिश में अपना सुख साज न खोना
इतनी भी नाराज न होना
मीठे मीठे झगड़ों को सबकी चर्चा तक मत ले जाना
किसी सहेली को अपने मन की ये बातें मत बतलाना
भीगी पलकों से जो कंधा ढूंढोगी वो धुंधला होगा
अनबन कड़वाहट बन जाए इतने आँसू नहीं बहाना
जिद के कारण प्यार भुला दो, ऐसा कठिन रिवाज न होना
इतनी भी नाराज न होना
फिर भी यदि नाराज रहो तो थोड़ी रस्म निभाती रहना
अगर अकेली बैठी हो तो झूठा फोन मिलाती रहना
कॉलेज की कैंटीन हमारे झगड़े को पब्लिक ना कर दे
मेरे खाते में चढ़वाकर कभी-कभी कुछ खाती रहना
मुझे देखकर खुश हो जाने का अपना अंदाज न खोना
इतनी भी नाराज न होना
✍️ चिराग़ जैन
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लड़ने को तो लड़ ही लूंगा, लेकिन ये डर लगता है
कौरव से लड़ते-लड़ते मैं ख़ुद कौरव ना हो जाऊँ
✍️ चिराग़ जैन