Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सारे ही सुख थे बगिया में, फिर क्यों तुमने पीर चुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है
क्या तुमने भी महसूसा है, एकाकी हो जाना जग में
क्या तुमने जी भर भोगा है, सब अपने खो जाना जग में
क्या तुमने भी भावुकता को लुट कर मरते देख लिया है
क्या तुमने भी अपनेपन का रंग उतरते देख लिया है
क्या तुमने भी जान लिया है अपने ही घर में शकुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है
सच बतलाओ क्या तुमने भी चेहरा देखा है रिश्तों का
मुरझाने के बाद कभी क्या सेहरा देखा है रिश्तों का
क्या तुमने भी हर उत्सव के अगले पल सन्नाटा झेला
दिल के व्यापारों का दुनिया की मंडी में घाटा झेला
कोमलता की देह धुने बिन किन कंधों की शॉल बुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिसकी छाया में आँगन ने अपना हर त्यौहार मनाया
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
जिसके फूलों की ख़ुश्बू ने घर का हर कोना महकाया
उसके सूखे पत्तों पर झल्लाना एक रिवाज़ रहा है
जिस नदिया ने जीवन सींचा, वो बरसातों में अखरेगी
बारिश का मौसम बीता तो, छतरी हमको बोझ लगेगी
जिन अपनों के बिन जी पाना इक पल भी दूभर लगता है
जब वे अपने मर जाते हैं, तब उनसे ही डर लगता है
ऋतुओं के संग आँख बदलना, सबका सहज मिजाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
प्यास न हो तो पानी भूले, भूख न हो तो रोटी भूले
मन से बचपन बीत गया तो, व्यर्थ लगे सावन के झूले
बचपन में कुछ खेल-खिलौने, यौवन में दिल का नज़राना
फिर घर भर की ज़िम्मेदारी, फिर बिन कष्ट सहे मर जाना
जितनी देर ज़रूरत जिसकी, उतनी देर लिहाज रहा है
जब उस पर पतझर आया तो, घर उससे नाराज़ रहा है
मन के छोटे से झोले में सब कुछ ढोना नामुम्किन है
यादों की डोरी में सबके नाम पिरोना नामुम्किन है
जिससे जितनी साँसें महकी, उससे उतनी प्रीत रही है
रात अंधेरा, भोर उजाला, ये ही जग की रीत रही है
जैसा है अंजाम किसी का कब वैसा आगाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
कविता को आसान बनाकर जन-जन तक पहुँचाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले
मेले, गाँव, गली, चौबारे, संसद, देश, विदेश विचरते
चिंता की त्यौरी पिघलाकर, ओंठों पर मुस्कानें धरते
एक ठहाके के जादू से पीड़ा को ग़ायब कर देते
हर अंधियारे की झोली में आशा का सूरज धर देते
नयन भिगोकर लिखने वाले, हँसते-हँसते गाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले
जब पापी ने दुःसाहस कर भारत माँ पर आँख उठाई
हमने शोणित में साहस का ज्वार उठाती कविता गाई
हमने आगे बढ़कर टोका शासन की हर मनमानी को
हमने सच का दर्पण सौंपा सत्ता की खींचातानी को
यौवन को सरसाने वाले, उत्सव रोज़ मनाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले
जैसे श्रोता हों, कविता का वैसा रूप बना लेते हैं
नवरस की मथनी से मथकर, मन तक रस छलका देते हैं
कविता, गीत, लतीफ़े, जुमले, हम हर शस्त्र चला लेते हैं
जिस शैली में सुनना चाहो, उस शैली में गा लेते हैं
कानों के दरवाज़े घुसकर, सीधे मन पर छाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
दुनिया के ऐरे-ग़ैरे फरमानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
रोज़ी-रोटी के पचड़ों में उम्र गँवाने वाले लोग
दिल की भाषा भूल चुके हैं अक्ल चलाने वाले लोग
पैसा-पैसा करते इन नादानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
लानत की कुछ फिक्र नहीं है, तारीफ़ों की चाह नहीं
दुनिया वाले क्या सोचेंगे अब इसकी परवाह नहीं
कभी-कभी आने वाले मेहमानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
एक झलक पर दुनिया को कुर्बान किया जा सकता है
सब कुछ खोकर मिलने का अरमान जिया जा सकता है
दिल की सुनने वाले हम धनवानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
इश्क़ बरसता है तो हर मौसम सावन हो जाता है
प्यार अगर सच्चा हो तो फिर मन पावन हो जाता है
ईटू-मीटू जैसे इन अभियानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उत्सव की आँखें भीगी हैं, एक घड़ी विपदा लाई
हर उजियारे पर भरी है, एक घड़ी की परछाई
कैसे वर मांगे कैकयी ने, सिंहासन से राम छिने
काया से जीवन छीना है, आशा से आयाम छिने
नगर समूचा वन जैसा है, यश-वैभव वनवासी है
जिसने सबकी ख़ुशियाँ छीनीं, उसके द्वार उदासी है
भोली रानी ख़ुद की करनी, ख़ुद भी मेट नहीं पाई
एक ठहाका पांचाली का पूरे युग पर भार बना
एक वचन ही पूरे युग की चीखों का आधार बना
पुत्र गँवाए, लाज लुटाई, घर छूटा, वनवास सहा
एक ठहाके के बदले में जीवन भर संत्रास सहा
इतने पर भी कब संभव है, उस इक पल की भरपाई
एक घड़ी आवेश न आता, गणपति मानवमुख रहते
एक घड़ी अमृत न छलकता, सूरज-चांद न दुख सहते
एक घड़ी का दंभ न होता, वंश दशानन क्यों खोता
एक घड़ी चौसर टल जाती, युग वीरों पर क्यों रोता
ईश्वर से भी कब टल पाई, एक घड़ी वह दुखदाई
हर उजियारे पर भारी है, एक घड़ी की परछाई
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जब घिरे सवाल तो निदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
लोग जो परोपकार की मिसाल हो गए
दूसरों का दर्द ओढ़कर निहाल हो गए
उन प्रजातियों का ख़ानदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
प्रीति की प्रतीतियों में लीन राधिका हुई
प्रेम की हवाओं में विलीन साधिका हुई
ज्ञानवान प्रीति के प्रमाण खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
गौण हो गईं तमाम नीतियाँ ज़मीन पर
सत्य का असर हुआ न न्याय की मशीन पर
सुर्ख़ियों में रोज़ संविधान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
कर्मशील, भाग्यवान से परास्त हो गया
योग युद्ध का बना, तभी नसीब सो गया
तीर हाथ में रहा, कमान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
✍️ चिराग़ जैन