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साहित्य : पैथोलॉजी लैब

साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो मेडिकल प्रोसेस में पैथोलॉजी लैब की होती है। साहित्य, समाज के भीतर व्याप्त व्याधियों को ढूंढकर तंत्र के सम्मुख रखता है और फिर तंत्र अपने अनुभव, ज्ञान तथा मशीनरी के माध्यम से उस व्याधि का उपचार करता है।
कभी किसी मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट देखेंगे, तो पाएंगे कि लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में केवल उन्हीं बिंदुओं को बोल्ड अक्षरों में लिखा जाता है, जहाँ नियत मापदंडों के अनुसार परिणाम नहीं होते।
अब अगर कोई यह कहे कि पूरी रिपोर्ट में इतना कुछ बढ़िया चल रहा है, वह किसी को नहीं दिखता, एक जगह कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ आया है तो उसे बोल्ड करके दिखाया जा रहा है। या कोई यह रिपोर्ट देखकर पैथोलॉजिस्ट का गिरेबान पकड़ ले कि साले तू नेगेटिविटी फैला रहा है, तूने बीमारी ढूंढी है अब तू ही सर्जरी भी कर।
आजकल कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपनी मेडिकल रिपोर्ट देखकर भड़क कर कहते हैं कि रामलाल की रिपोर्ट में तो केवल यूरिक एसिड बढ़ा हुआ दिखाया था, मेरी रिपोर्ट में किडनी की गड़बड़ बता रहा है। ये लैब वाला रामलाल का चमचा है।
विश्वास कीजिए, पैथोलॉजी लैब आपके स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है। यदि रोगी इन लैब्स से ही इलाज पूछने लग जाएंगे तो उपचार नहीं, विध्वंस हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन

सम्मेद शिखर

सावधान देश के कर्णधारो!
सम्मेद शिखर के मुद्दे पर जैन समाज के साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह घर के एक और बेटे को घर से बाहर कर देने का षड्यंत्र है। भारत के लगभग सभी सामाजिक संगठनों में तन-मन-धन से योगदान देनेवाले जैनियों ने कभी स्वयं को सनातनियों से अलग नहीं माना। व्यवसाय, व्यापार और नौकरी-पेशों से आजीविका जुटानेवाले जैनियों ने मंदिर, अस्पताल, शिक्षण संस्थान, धर्मशालाएं, अनाथालय, वृद्धाश्रम, गौशाला और न जाने कितने ही लोककल्याणकारी प्रकल्पों की स्थापना की है। वैष्णोदेवी, बांकेबिहारी, काशी विश्वनाथ, खाटूश्याम, जगन्नाथजी, केदारनाथ, हरिद्वार, शिरडी, कामाख्या, स्वर्ण मंदिर और अन्य तमाम तीर्थस्थलों पर जैन समाज ने न केवल श्रद्धा से शीश झुकाया है, अपितु क्षेत्र के विकास हेतु उन्मुक्त हृदय से योगदान भी दिया है। अयोध्या के राम मन्दिर आंदोलन में जैन समाज मंदिर निर्माण की मांग करनेवालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चला।
आस्था, उत्सव, संयम और अहिंसा की जीवनशैली वाले इस समाज ने न तो कभी इस देश के संविधान का अपमान किया न ही नागरिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया। न कभी अपनी आस्थाएं किसी पर थोपने की कोशिश की और न ही कभी किसी की आस्थाओं को ढकोसला कहने का कार्य किया। अनुशासित इतने कि श्रवणबेलगोला में लाखों लोग जुटते हैं लेकिन कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। जैन साधुओं के चातुर्मास, पंचकल्याणक, पर्युषण पर्व और महावीर जयंती के महोत्सव में हज़ारों-लाखों की भीड़ जुटती है, लेकिन कभी कहीं अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।
देश के संचालन हेतु ईमानदारी से अपना टैक्स जमा कराने वालों में जैन समाज अग्रणी है। भारतीय शौर्य के प्रतीक महाराणा प्रताप के टूटते आत्मबल को संबल देने के लिए अपनी पूंजी का तिनका-तिनका लुटा देनेवाले भामाशाह के के वंशज आज इस देश में अपनी आस्थाओं की रक्षा हेतु आंदोलन करने पर विवश हैं। गुरु के साहबज़ादों की ससम्मान अंत्येष्टि के लिए सोने की मोहरें बिछाकर आततायी का अहंकार तोड़नेवाले टोडरमल के बेटे आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। देश की आज़ादी के लिए अपने सीने पर लाठी खानेवाले लाला लाजपत राय के नौनिहालों से उनकी श्रद्धा का मेरुदंड छीना जा रहा है। मानस की चौपाइयों को अपने सुर और स्वर से सजानेवाले रवीन्द्र जैन का कुनबा आज चीखने को विवश है। अंतरिक्ष में भारतीय वैभव का ध्वज फहरानेवाले विक्रम साराभाई के कुटुम्बी आज सत्ता से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।
प्रश्न झारखंड की सरकार या केंद्र की सरकार का नहीं है। प्रश्न यह है कि जब गिरनार के उर्जयन्त गिरी पर्वत को जैनियों से छीनकर ‘हिन्दू तीर्थ’ घोषित किया गया था, क्या तब जैन समाज की भावनाओं का किसी सत्ताधारी को रत्तीभर भी ख्याल आया था? प्रश्न यह है कि क्या उस समय जैन धर्मावलंबियों के साथ ठीक वही दुर्व्यवहार नहीं किया गया था, जो आक्रमणकारी मुग़लों के साथ किया जाता है?
और अब सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल घोषित करने का सरकारी दुस्साहस!
जैन समाज न तो कहीं बाहर से आक्रमण करके इस देश में आया है और न ही किसी तरह की विदेशी ताकतों के इशारे पर संचालित है। जैन संस्कृति न केवल इस देश की धरती पर उपजी है अपितु अपने स्वेद से इस देश को सींचने में भी उल्लेखनीय योगदान देती रही है। भोज, बिम्बिसार, अशोक और चन्द्रगुप्त सरीखे राजनैतिक पौरुष से जैन समाज ने इस देश का निर्माण किया है।
मान्यताओं का मतभेद हो तो हो, लेकिन हमारे पुरखों और हिन्दुओं के पुरखों में भी कहीं कोई भेद नहीं है। इसलिए शिखर जी की शुचिता को अक्षुण्ण रखने के लिए जारी इस आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में भारत के वर्तमान सत्ताधीश यह बात अच्छी तरह से मन में बैठा लें कि यदि जैन समाज को पराया सिद्ध करने का कोई प्रयास किया गया तो अहिंसा की साधना करनेवाला यह समाज अहिंसा और अनुशासन से बड़ी से बड़ी साज़िश की चूल हिलाने में सक्षम है। यह याद रहे कि असहयोग और सविनय अवज्ञा सरीखे अहिंसक अस्त्रों का प्रभाव पहले भी इस देश ने देखा है। यह याद रहे कि सीने पर लाठी खाकर अपने प्राण देने वाले लालाजी के हाथ में कोई हथियार नहीं था, लेकिन उनकी मृत्यु से उपजी ज्वाला ने ब्रितानिया शासन का भविष्य फूँक कर रख दिया। याद रहे कि भीतरी यात्रा में निमग्न शांत तपस्वियों की साधना भंग करनेवाले कालयवन, उन्हीं की नयनोर्जा से भस्म हो जाते हैं। याद रहे कि वर्चस्व की होड़ करनेवाला अंततः अपने अस्तित्व से हाथ धो बैठता है।

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सत्ताधीशो!
गिरिडीह में मधुबन से पारसनाथ पर्वत की ओर जानेवाली सड़क पर पांव रखते ही जैन धर्मावलंबियों के अंतःकरण में सम्मेद शिखर की आस्था का अनहद नाद गूंजने लगता है। गुणायतन, तेरापंथी कोठी, भूमिया जी, बीसपंथी कोठी और विमल समाधि मंदिर के दर्शन करते हुए जब कोई जैन तीर्थयात्री सम्मेद शिखर की यात्रा प्रारम्भ करता है, उस क्षण उसकी शिराओं में पावनता का एहसास प्रवाहित होने लगता है।
वैभव और संपन्नता का जीवन जीनेवाला जैन समुदाय बहुत कम सुविधाओं के बावजूद शिखर जी की यात्रा में अलौकिक आनंद की अनुभूति करता है। अर्थ के बल पर अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त होटल और परिसर बनवा लेना जैनियों के लिए बिल्कुल भी कठिन नहीं है, किंतु इन सुविधाओं के साथ इस क्षेत्र की पावनता के सम्मुख जो संकट उत्पन्न होगा; उसके लिए जैन समाज का कोई भी नुमाइंदा कभी तैयार नहीं हो सकता।
सम्मेद शिखर हमारे लिए एक तीर्थक्षेत्र ही नहीं अपितु दैवीय ऊर्जा का एक भंडारगृह भी है। सत्तू, गुलदाना और बेसन के सेव खाकर पर्वत की जो कठिन यात्रा जैन मतावलंबी करते हैं उसे ‘यात्रा’ नहीं, ‘वंदना’ कहा जाता है।
यह अकेली संज्ञा ही जैन समाज के लिए इस तीर्थक्षेत्र का महत्व स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है। अपनी काया से इस दुर्गम पर्वत की यात्रा को ‘वंदना’ कहा जाता है। इसका तात्पर्य है कि हमारे लिए यह पूरा पर्वत एक वेदी है, जिस पर अपनी काया के संपूर्ण अस्तित्व के समर्पण के साथ ‘वंदना की जाती है।
सुनने में आया है कि झारखंड सरकार इस पर्वत को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने जा रही है। यह सुनना जैन समाज के लिए ठीक ऐसे ही है, ज्यों कोई हमारे देवता को शो-पीस कहकर बेचने की बात कर रहा हो। जैसे कोई आस्था की किसी हाट में कीमत लगा रहा हो।
पर्यटन इन्द्रियों की लिप्सा की पुष्टि करता है और अध्यात्म इन्द्रियों को जीतने की राह दिखाता है। इन दोनों विरोधाभासी विषयों को एक साथ रखना कम से कम आस्था के अस्तित्व पर तो कुठाराघात होगा ही होगा।
जैन समाज भगवान महावीर के सिद्धांतों का अनुगामी है। पारसनाथ पर्वत पर न हिम है, न ही वन्यजीव! इस पर्वत की यात्रा का मार्ग भी बहुत रमणीक नहीं है। आस्थाओं के कुछ केंद्र यहाँ अवश्य हैं, जिनकी सादगी और एकरूपता आपके ‘भौतिक पर्यटकों’ का मनोरंजन करने में सक्षम नहीं हैं। इस क्षेत्र की सादगी का अर्थ अध्यात्म के बटोही को समझ आता है। इसलिए इसे पर्यटक स्थल घोषित करना सरकार की एक अपरिपक्व तथा अनावश्यक सोच का उदाहरण बनेगा।
भारत आस्थाओं का देश है। जैन दर्शन और जैन समाज ने देश के उन्नयन हेतु अग्रिम पंक्ति में रहकर सेवा की है। देश के अर्थ की जड़ों को अपने स्वेद से सींचनेवाला जैन समुदाय पूरे विश्व में शान्तिप्रिय जीवनशैली के लिए जाना जाता है। ऐसे में यदि जैन समाज को अपने तीर्थक्षेत्र की शुद्धता को बचाने के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है तो यह विषय समूचे भारतीय समाज की सोच पर प्रश्नचिह्न जड़ देगा।
जैन समाज आहत है। अहिंसा के अनुगामी अनशन और आंदोलन की राह पर निकल पड़े हैं। भामाशाह के बेटे अपनी श्रद्धा की शुचिता मांग रहे हैं। देश के राजनैतिक सिंहासन पर उनका राज है, जो आस्था और धार्मिक भावना का अर्थ भी समझते हैं और ताकत भी!
ऐसे मे सरकार को चाहिए कि पर्यटन की चकाचौंध से जैन समाज के इस आस्था केंद्र को दूर रखे क्योंकि आत्मा के स्तर पर घटित होनेवाली लौ की ज्योति भौतिकता की हैलोजन से बहुत ऊपर होती है। क्योंकि यदि इस आंदोलन में जैन समुदाय को कड़वे शब्द बोलने पड़े तो झारखंड की सरकार भारत की मीठी संस्कृति से आँखें नहीं मिला सकेगी।
क्योंकि स्वर्णभद्र कूट से जो हवाएँ टकराती हैं, उनके विघटन की ख़बर तक छापने कभी कोई नहीं आया!

✍️ चिराग़ जैन

नकारात्मकता भी आवश्यक है

नकारात्मक और सकारात्मक दोनों से मिलकर ही सृष्टि संचालित होती है। हमने नकारात्मकता को ‘ग़लत’ का पर्यायवाची समझकर बड़ी भूल की है। नेगेटिव और पॉजिटिव में से कोई भी एक तार हटा दो तो विद्युत अवरुद्ध हो जाएगी। संचरण यकायक रुक जाएगा। इसीलिए महावीर कर्म शून्यता की अवस्था को मोक्ष कहते हैं। वे पुण्य और पाप, दोनों से मुक्ति पर बल देते हैं। बहीखाते में डेबिट बचे या क्रेडिट, दोनों ही अवस्था में खाता शेष रहेगा। इसलिए एट पार जाना है। ज़ीरो बैलेन्स। न लेनी, न देनी।
लेकिन हमने लाभ को शुभ और हानि को अशुभ समझना शुरू कर दिया। यकायक देखने में हानि अशुभ लग भी सकती है। किंतु जो ठहरकर देखेगा वह जान सकेगा कि लाभ भी कम अशुभ नहीं है। यही लाभ तो हानि के भय का जनक है। आपके पास कुछ होगा ही नहीं तो लुटेरा लूट कर क्या ले जाएगा। उसे ख़ाली हाथ लौटना पड़ेगा। इसलिए महावीर ख़ाली हाथ हो जाने पर बल देते हैं। दिगंबर। नाम, गोत्र, जाति, कुल सभी अहंकार से शून्य।
लेकिन हमने प्राप्ति को सकारात्मक मान लिया। नकारात्मकता और सकारात्मकता हमारी क्षुद्र बुद्धि से उपजे विशेषण हैं। अग्नि के प्रज्वलित होने पर एक व्यक्ति ने उसमें विध्वंस की आशंका देख ली और दूसरे ने प्रकाश की संभावना। बस यही है नकारात्मकता और सकारात्मकता। लेकिन ये दोनों ही सत्य हैं। नकारात्मकता का अर्थ असत्य नहीं है। अग्नि भस्म कर सकती है यह भी उतना ही सत्य है जैसे अग्नि के प्रकाश उत्पन्न करने की बात। और अग्नि को ‘केवल’ प्रकाश का स्रोत मानने वाला भी उतना ही अल्पज्ञ है, जितना उसे केवल ध्वंसक मानने वाला है। ब्लकि अग्नि को केवल रौशनी माननेवाला अधिक बड़ा मूढ़ है। यदि वह अग्नि के ताप को न समझा तो स्वयं को झुलसा बैठेगा। फिर कोई सकारात्मकता काम न आ सकेगी। इसलिए समग्र देखना होगा। इसीलिए सर्वज्ञ होना होगा। किसी एक आयाम को नकारात्मक कहकर नकार देना तुम्हारे आत्मघाती होने की सूचना है। इसी को जैन ग्रंथों ने स्याद्वाद कहा है। यही अनेकांत है।
सत्य की खोज में किसी एक तथ्य से मोह लगा लिया तो गए काम से। समष्टि की राह में व्यष्टि पर अटक गए तो फिर कहीं न पहुँच सकोगे। ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ इसीलिए आवश्यक है। जीवित रहना है तो साँस तो लेनी ही होगी। लेकिन साँस से मोह कर लिया तो जी न सकोगे। साँस ली है तो उच्छ्वास अपरिहार्य हो जाएगी। आप प्रयास करके भी उसे रोक न सकोगे। थोड़ी देर रोक भी लिया तो दम घुटने लगेगा। फेफड़े चंद सेकेंड में ही थकने लगेंगे। आँखों में प्राण उतर आएंगे। नथुनों में भीतर का सारा संघर्ष इकट्ठा हो जाएगा। फिर कोई चारा न रहेगा। फिर साँस छोड़नी ही पड़ेगी। और जिस क्षण छोड़ दिया, ठीक उसी क्षण जो अनुभूति होगी वह सुख है।
आपने एक अटकाव को छोड़ना स्वीकार किया और आपको एक क्षण का सुख मिल गया। यही कारण है कि जिसके भीतर संन्यास घटित हुआ उसने सारा अटकाव छोड़ दिया। फिर उसके चेहरे पर सुख नहीं आनंद की आभा दमक उठी।
इस दमक में ध्वंस नहीं, केवल रौशनी है। यह अग्नि को सम्पूर्ण जान लेने से सम्भव हुई। यह नकारात्मकता और सकारात्मकता को समभाव से देखने के बाद घटित हुई। इसीलिए उन्होंने जो त्यागा उससे भी घृणा नहीं की। लेकिन हम सोच रहे हैं कि जो त्याग दिया वह घृणित ही होगा। वे तो स्याद्वाद के अन्वेषक थे। घृणा और मोह, दोनों ही की फ़ुरसत नहीं थी उनके पास।
‘बनाकर फकीरों का हम भेस ग़ालिब, तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं’ -जीवन का लुत्फ़ लेना है तो उसे तमाशा समझकर देखना होगा। उसमें कुछ बदल देने की इच्छा जगी और आप बंदर की तरह गुलाटी मारने लगते हो। कर्ता भाव जगा और आप अतिथि से मजदूर हो गए। यह ऐसा ही है ज्यों कोई फिल्म देखने जाए और उसे खलनायक से नफ़रत हो जाए। फिर वह फिल्म नहीं देख सकेगा। फिर वह ख़ुद फिल्म बन जाएगा। सिनेमाघर में बैठे लोग पर्दे से दृष्टि हटाकर उस पर टिका लेंगे। वह होगा भी बहुत मज़ेदार। ज्यों ही पर्दे पर खलनायक आएगा, वह दोनों हाथों से कसकर कुर्सी के हत्थे पकड़ लेगा। उसके जबड़े भिंच जाएंगे। वह आवाज़ लगाकर नायक को खलनायक की चाल बताने की कोशिश भी कर सकता है। वह नायक को ऑर्डर भी दे सकता है कि ‘मार साले को!’ यह व्यक्ति अन्य लोगों को बड़ा हास्यास्पद प्रतीत होगा। क्योंकि यह व्यक्ति पर्दे को सत्य और स्वयं को निर्देशक समझ बैठा है।
ठीक यही भूल हम अपने जीवन में कर रहे हैं। हम ख़ुद को कर्ता मान बैठे हैं और अपने आसपास के लोगों को नायक और खलनायक मानकर उनके प्रति मोह और घृणा से भरे बैठे हैं। जिस क्षण हमने यह समझ लिया कि नकारात्मक और सकारात्मक तो केवल भूमिका हैं। हमें भूमिका की नहीं अभिनय की प्रशंसा करनी सीखनी होगी। निर्देशक ने जिसे जो भूमिका दी, वह उसे कितनी साकार कर पाता है, यह एक अभिनेता के आकलन का आधार है।
शोले फिल्म से गब्बर की भूमिका बदल कर देखिये। पूरी फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। गब्बर का क्रूर होना ठाकुर के प्रतिशोध को नायकत्व प्रदान करता है। अन्यथा गब्बर सीधा-सादा काश्तकार हो और ठाकुर दो कुख्यात बदमाशों को उसकी सुपारी देता तो ठाकुर की शक़्ल तक से नफ़रत हो सकती थी। लेकिन गब्बर की बर्बरता ने जय-वीरू के सुपारी किलिंग जैसे अपराध को जस्टीफाई कर दिया।
इसलिए नकारात्मकता और सकारात्मकता, दोनों ही कहानी को चलाने के लिए आवश्यक हैं। इसमें सही-ग़लत तलाशने वाले कुर्सी पर उछलता हुआ वह दर्शक है जिसकी हरकतें देखकर पूरा सिनेमाघर ठहाके लगा रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

गणपति : एक जीवनशैली

गणेश… बुद्धि के अधिपति।
गणेश… रिद्धि-सिद्धि के स्वामी।
गणेश… शुभ-लाभ के पिता।
गणेश… संतोषी के जनक।
भारतीय पौराणिक साहित्य में गणेश अद्वितीय हैं। गणेश जी को लेकर जो प्रतीक विधान गढ़ा गया है वह लक्षणा नहीं, विलक्षण है।
पाराशर ऋषि के आश्रम को विनष्ट करने वाले मूषक को ‘कुतर्क’ का प्रतीक मानकर ‘बुद्धि’ के देव द्वारा उसको परास्त करने की कथा, चातुर्य तथा हास्यबोध से परिपूर्ण है। पराजित मूषक अपने विजेता गणेश से कहता है कि वर मांगो। उसकी इस धृष्टता पर गणेश क्रुद्ध नहीं होते, अपितु हँस पड़ते हैं। क्रोध आ गया होता तो वध कर दिया होता मूषक का। किंतु बुद्धि के अधिपति हैं, सो क्रुद्ध न हुए… खिलखिला उठे। मूषक की धृष्टता को एक खिलखिलाहट से ओछा बना दिया। मूषक आश्वस्त रहा होगा कि मैं ऐसा अनापेक्षित आचरण करूंगा तो क्रोध आ ही जाएगा। लेकिन गणेश ने उसके अनुमान को असत्य कर दिया। और इतना ही नहीं, उससे वर भी मांग लिया। और वर भी ऐसा जिसका कुतर्की को अनुमान तक नहीं हो सकता। लेकिन गणेश बुद्धिमान हैं। वे कुतर्की को कुतर्क से घेरने में निष्णात हैं। वे मूषक की धृष्टता से क्रुद्ध होकर उस पर वार करने की बजाय उस पर सवार हो जाने का वर मांग लेते हैं। यह कथा हमें यह सिखाना चाहती है कि यदि शत्रु अपनी धूर्त बुद्धि की क्षमता से तुम्हें परास्त करना चाहे तो तुम अपनी बुद्धिमत्ता से उसे उसकी हीनता का बोध करा दो। गणपति ने धूर्त हुए जा रहे मूषक को तुरंत उसकी काया की क्षुद्र अवस्था याद दिला दी और हमेशा के लिए उसके ऊपर सवार हो गए।
गणपति स्वयं में एक प्रेरणा हैं। प्रत्येक असंभव को सम्भव बना देने का उपाय हैं। गणेश से जुड़ी प्रत्येक कथा सतर्क और सविवेक हो जाने का आह्वान है। समान्य नियमों के पार जाकर जीवन की संभावना तलाशने का मार्ग हैं गणेश। परिस्थिति का सम्मान करते हुए स्वयं को ढाल लेने का कौशल हैं गणेश।
गणपति अपने इसी गुण के कारण प्रथम पूज्य हैं। कैसा भी आयोजन हो, कैसा भी विधान हो, कैसी भी आवश्यकता हो… गणेश तो एडजस्ट हो ही जाएंगे। बाकी देवताओं को निमंत्रण देने से पूर्व अवसर का विचार करना पड़ेगा। बाकी सब देवता प्रकृतिस्थ हैं किंतु गणेश प्रकृत्यातीत हैं। वे हेय से सृजित हैं। वे मानव देह पर पशु का सिर सम्भव कर लेते हैं। वे मोदक भी खाते हैं और उन्हें दूर्वा भी प्रिय है। वे अद्भुत हैं। वे अद्वितीय हैं। वे यंत्रवत महाभारत लिखकर एक ऐसे भाव का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें लेखक अपनी बुद्धि, अपने विचार, अपनी सोच का हस्तक्षेप किए बिना चिंतक के आशुलिपिक बनना सम्भव हो सके।
गणपति का रूप एक जीवन शैली का दर्शन है। गणपति स्थापना से विसर्जन तक की सम्पूर्णता हैं। गणपति अनन्त हैं, यही कारण है उनका जाना भी उनके आने की आशा जगाता है। इसीलिए हम गणपति को यह कहकर विदा करते हैं कि ‘अगले बरस तू जल्दी आ!’

✍️ चिराग़ जैन

शैलेन्द्र की याद

नोबेल पुरस्कार विजेता रूसी लेखक एलेक्जेंडर सोल्ज़ेनित्सिन का एक उपन्यास है- ‘द कैंसर वार्ड’। इस उपन्यास में एक स्थान पर कैंसर वार्ड में भर्ती एक रोगी की पीड़ा को देखकर, उसका मन बहलाने के लिए नर्स एक गाना गाती है। गीत के बोल थे- ‘आवारा हूँ, आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ।’
यह उद्धरण आज इसलिए प्रासंगिक है कि इस गीत के रचयिता शंकरदास केसरीवाल ‘शैलेन्द्र’ की आज जयंती है। 43 वर्ष के कुल जीवन में लगभग 800 गीतों से हिंदी सिनेमा को समृद्ध करनेवाले इस कवि का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं।
बचपन में माँ की मृत्यु हो गयी। स्वास्थ्य कारणों से पिता रावलपिंडी का काम-धंधा छोड़कर मथुरा आ बसे। पिता की बीमारी ने आर्थिक स्थिति ऐसी कर दी कि भूख मारने के लिए शैलेन्द्र और उनके भाइयों को जबरन बीड़ी पिलाई जाती थी। यही ग़रीबी इलाज के अभाव में उनकी इकलौती बहन को लील गई।
रेलवे में नौकरी मिली तो लेखन और नौकरी के बीच संघर्ष छिड़ गया। खुद्दारी ऐसी कि राजकपूर को यह कहकर लौटा दिया कि मैं पैसों के लिए नहीं लिखता।
परिस्थितियाँ जब किसी सिद्धांतवादी को झुकाने कि ठान लेती हैं तो उसके परिजनों को दाँव पर लगाती हैं।
पत्नी गर्भवती थी और परिवार की आर्थिक आवश्यकताएँ बढ़ रही थीं। विपन्नता के अभिशाप से अपनों को खो चुके शैलेन्द्र ने अपने सिद्धांतों की लक्ष्मण रेखा लांघकर फ़िल्मों में गीत लिखना स्वीकार किया। ‘बरसात में हमसे मिले तुम सजन’ से प्रारम्भ हुआ यह सफ़र ‘जीना यहाँ मरना यहाँ’ की आखि़री संवेदना तक जारी रहा।
14 दिसंबर 1966 को जब इस रचनाकार ने दुनिया से मुँह फेरा तब इसके दिल में ‘तीसरी कसम’ की विफलता का विषाद और लिवर में ‘लिवर सिरोसिस’ का रोग तो था ही, साथ ही अपनों के द्वारा छले जाने का क्षोभ भी था। संवेदनशील व्यक्ति किसी पर बहुत आसानी से विश्वास कर लेता है। अपनी निश्छलता की लत के चलते बहुत आसानी से किसी के भी सामने अपना मन खोलकर रख देता है। वह व्यापार में भी संवेदना तलाशने की भूल करता है और शुद्ध व्यावसायिक लोग उसकी संवेदनशीलता का लाभ उठाकर उसके विश्वास की हत्या करते रहते हैं।
जो लोग यह समझते हैं कि शैलेन्द्र की मृत्यु 14 दिसंबर 1966 को हुई, वे केवल स्थूल दृष्टि से शैलेन्द्र को देख पाते हैं। संवेदनशील व्यक्ति जब छला जाता है, तो चला जाता है।
बाद में लोगों ने ‘तीसरी कसम’ को सेल्युलायड पर लिखी कविता कहा। बाद में लोगों ने शैलेन्द्र को सदी का कवि कहा। बाद में आलोचकों ने उन्हें संत रविदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण दलित कवि बताया। बाद में भारत सरकार ने शैलेन्द्र के नाम पर पूरे 5 रुपये का डाक-टिकट भी जारी किया। बाद में ‘तीसरी कसम’ मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में शामिल होकर भारत का गौरव बन गई। लेकिन बाद में हुए इस आकलन से ख़ुश होने के लिए जीवित न थे, शैलेन्द्र। व्यावसायिक छल और अपनत्व की अवसरवादिता से उत्पन्न पीड़ा से व्यथित होकर ‘मारे गए गुलफाम’।

✍️ चिराग़ जैन

बोया पेड़ बबूल का…

हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। अराजकता किसी समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। जिन लोगों ने अपने राजनैतिक हित साधने के लिए आपको गाली देना सिखाया है, वे ही अपनी अन्तरराष्ट्रीय छवि बचाने के लिए आपको असभ्यता के आरोप में पार्टी से बाहर कर देते हैं। जिन लोगों के चित्र अपनी प्रोफाइल फोटो में चेपकर आप किसी व्यक्ति अथवा पार्टी विशेष के समर्थक होने का दंभ भरते हैं वे लोग आपके विवेक को हाइजैक करके आपकी प्रोफाइल को ‘यूज़’ कर रहे हैं, और आपको पता भी नहीं चलता।
नफ़रत के बीज बोते समय यह हमेशा स्मरणीय है कि काँटे आपका झंडा देखकर आपको ज़ख्मी नहीं करते हैं। आप कितनी भी सावधानी से दूसरे की ओर लक्ष्य करके नागफनी बोते रहिए, उसका एक न एक फन आपकी ओर ज़रूर मुड़ेगा।
हैदराबाद एनकाउंटर पर पुलिस को बधाई देने वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि पुलिस प्रशासन को न्याय का अधिकार दे दिया गया तो क्या होगा। अदालतों के सिस्टम में व्याप्त ख़ामियों को सुधारने की बजाय स्वयं को अदालत मान लेना बर्बरता की ओर बढ़ने का संकेत है।
जब मॉब लिंचिंग की ओट लेकर हत्याएँ की जा रही थीं, तब हमारा राजनैतिक नेतृत्व अपने-अपने कार्यकर्ताओं को यह नहीं समझा सका कि जेल में बंद अपराधी को भी मारने का अधिकार किसी व्यक्ति या भीड़ को नहीं दिया जा सकता। ऐसे में केवल ‘आरोप’ अथवा ‘संदेह’ के आधार पर ‘फैसला ऑन द स्पॉट’ करनेवालों से लोकतन्त्र को सर्वाधिक ख़तरा है। लिंचिंग की घटनाएँ हो रही थीं और सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी वोटिंग का बहीखाता खोलकर लाभ-हानि का गणित लगाने में व्यस्त थे।
कांग्रेस ने रामदेव के आंदोलन को कुचलने के लिए जो लाठी चलाई थी, उसी के वार से आज कांग्रेस के एक लीडर की पसली टूट गई है। कांग्रेस ने सीबीआई को तोता बनाकर अपने राजनैतिक विरोधियों पर छोड़ दिया था। इसी परम्परा के फलस्वरुप आज भारतीय जनता पार्टी ने ईडी के कंधे पर बंदूक रखकर विरोधियों को निशाने पर ले लिया है।
किसान आंदोलन के समय आंदोलनकारियों को आतंकवादी और ग़द्दार कहनेवाले यह न भूलें कि सत्ता हमेशा किसी की नहीं रहती। आंदोलन के अस्त्र को इतना बदनाम मत करो कि यदि सत्ता से बाहर होकर कभी आपको आंदोलन के अस्त्र का प्रयोग करना पड़े तो इसमें धार ही न बचे।
बुलडोजर चलाकर स्वयं को विक्रमादित्य समझने वाले यह स्मरण रखें कि यदि सत्ता चली गई तो यही जेसीबी बेताल बनकर उनकी कमर तोड़ देगी। पाटीदार आंदोलन के समय गुजरात की सड़कों पर अग्निवर्षा करनेवाले आज तत्कालीन सत्ताधीश के साथ बैठे हैं। उस समय उस अराजकता को समर्थन देने वाले कांग्रेसी भी लोकतन्त्र के अपराधी थे और आज उस अराजकता से उपजे लीडर को साथ बैठाने वाले भाजपाई भी उसी अपराध में संलग्न हैं।
किसी भी सरकारी योजना का विरोध करना युवाओं का लोकतांत्रिक अधिकार है किन्तु उस अधिकार की ओट में अराजक हो जाना कम से कम गांधी के देश में तो बर्बरता ही कहा जाएगा। जिस गांधी को गाली दे-देकर राष्ट्रवादियों ने सोशल मीडिया पाट दिया है, जिस गांधी को ‘यूज़’ करके कांग्रेस ने सत्ता की शतरंज बिछायी है उसी गांधी की ज़रूरत आज फिर आन पड़ी है।
अग्निवीर योजना के मुआमले में यदि आंदोलन को ही ग़लत ठहरा दिया जाए तो भी अनुचित होगा और यदि उस आंदोलन के बहाने की जा रही आगजनी और हिंसा का समर्थन किया जाए तो भी अनुचित होगा।
ऐसे में गांधी का ‘शांतिपूर्ण विरोध’ का मंत्र सामयिक लगता है। टेलिविज़न डिबेट से लेकर राजनैतिक बयानबाज़ी तक एक तरीके के लोग इन आंदोलनकारियों को अनपढ़, असभ्य, राष्ट्रद्रोही और नालायक सिद्ध करना चाह रहे हैं और दूसरी तरह के लोग इस आगजनी को आंदोलन, विरोध, क्रोध और सत्ता की मनमानी का प्रतिफल बताने पर तुले हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि ये सब लड़के हमारे इसी समाज के वे नौनिहाल हैं, जिनको लोकतन्त्र के अधिकारों का पाठ पढ़ाते समय मास्टर जी ने गांधी की अहिंसा का पन्ना हिकारत से पलट दिया था।

✍️ चिराग़ जैन

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