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अमर पंक्तियों का व्याकरण

किसी पंक्ति में ऐसा क्या विशेष होता है कि वह अचानक युगजयी हो जाती है! हज़ारों-लाखों लोगों ने पूरा-पूरा जीवन लगा दिया काव्य रचने में, लेकिन पूरी दुनिया में उंगली पर गिने जाने योग्य कविताएँ ही अमर हुई हैं। और जो अमर हुई हैं उन पंक्तियों के शब्द शिल्प में कुछ असाधारण दिखाई भी नहीं देता। उनसे बेहतर भाषा, उनसे बढ़िया व्याकरण, उनसे अधिक अलंकार से सजी पंक्तियाँ अपने रचयिता की देहरी नहीं लांघ सकीं।
इससे यह बात साफ़ है कि काव्य की प्रसिद्धि कम से कम शिल्प पक्ष पर तो निर्भर नहीं है। लेकिन भाव भी कुछ एक्स्ट्रा ordinary नहीं जान पड़ता। कई जगह तो जन समान्य में प्रचलित ‘अच्छी बातों’ की तुकबंदी सी की हुई है। और इन बातों को अधिक प्रभावी बिम्ब विधान से कहने वाले कवि भी उपलब्ध हैं, लेकिन वे अपनी कविता को जन कविता न बना सके। अर्थात भाव पक्ष भी कविता की लोकप्रियता का आधार तत्व नहीं है।
फिर क्या ख़ास है? शायद कहने वाले का व्यक्तित्व? लेकिन ऐसा होता तो किसी कवि की हर कविता अमर हो जाती। लेकिन मीरा के समूचे साहित्य में से एकाध ही पंक्ति क्यों अमर हुई? रैदास, कबीर, तुलसी, रहीम, निराला, पंत, पाश… इनकी कोई एकाध पंक्ति ही क्यों कहावत बन सकी? इनकी कोई एक अर्द्धालि, कोई एक दोहा, कोई एक मिसरा, कोई एक श्लोक ही सूक्ति-सौभाग्य से युक्त क्यों हैं?
कवि जब सर्जना करना प्रारंभ करता है तब वह सदेह होता है, उस समय उसके मन मे लोक की अभिरुचि, जन की पसंद-नापसंद, प्रशंसा की आकांक्षा, आलोचना का भय विद्यमान रहता है। लेकिन ज्यों-ज्यों रचना स्वयं को गढ़ना प्रारंभ करती है तब लोक पीछे छूटने लगता है। फिर उसके कान लोक का कोलाहल नहीं सुन पाते। फिर उसकी चेतना देह से ऊपर उठने लगती है। फिर वह अपने अनहद को सुनने लगता है। फिर उसकी चेतना अपने अनहद की ओर आकृष्ट होने लगती है।
यहाँ से उसकी सर्जना विस्तार पाती है। उसकी चेतना गहराई में उतरती है और उसकी सर्जना ऊँचाई की ओर बढ़ चलती है। अनवरत बढ़ते-बढ़ते वह अपने अनहद को लिपिबद्ध करने लगता है और जिस पंक्ति पर अनहद लिपिबद्ध हो गया, उसका कालजयी होना सुनिश्चित है। जिस पंक्ति की चेतना जितने गहरे उतरी होगी, उसका आकाश उतना ही अधिक विस्तार पा जाएगा।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो… कुछ भी तो ख़ास नहीं इस काव्यांश में। इसका अर्थ लिखो तो एक अनुच्छेद नहीं लिखा जाएगा किंतु फिर भी यह पंक्ति अमर हो गई! क्योंकि इसको मीरा ने सोचा नहीं होगा। सोचकर लिखा गया काव्य इतना विराट हो ही नहीं सकता। सोचकर लिखे गए शब्दों में इतना अजस्र रस हो ही नहीं सकता। यह तो अनवरत तलाश के बाद बंद पलकों के भीतर किसी को पा लेने का आनंद है जो एक पंक्ति में अनूदित हो गया।
इस पंक्ति का साधारण होना ही इसके विशेष होने का प्रमाण है। और यह भी सत्य है कि इसको रचने वाली मीरा स्वयं इस बात से भिज्ञ न रही होंगी कि इस पंक्ति का वातायन कितना विराट होगा। जान जाती तो इसे और अधिक कलात्मक बनाने की चेष्टा करने लगती। और यही चेष्टा इस महान पंक्ति की हत्या कर देती।
चेष्टातीत होना ही किसी पंक्ति के अमर होने की घोषणा है।
मीरा तो कृष्ण की दीवानी थी, फिर राम रतन धन क्यों? कृष्ण रतन धन क्यों नहीं? क्योंकि जहाँ इस पंक्ति का सृजन हुआ है वहाँ संज्ञाभेद है ही नहीं। वहाँ तो स्वयं मीरा भी राम ही हो गई होंगी। वहाँ तो आनंद का उत्कर्ष घटित हुआ होगा। और आनंद के उत्कर्ष में संज्ञा का क्या काम। वहाँ तो बस नृत्य है। वहाँ तो बस अनहद है। वहाँ जाकर शब्द भी कहाँ सूझता होगा। कभी युगों के बाद ऐसी घटना घटती है कि अनुभूति के उस उत्कर्ष पर पहुंचकर यकायक किसी के मुख से कोई पंक्ति निकल पड़े। बस यही पंक्ति युग की सीमाओं के पार निकल जाती है।
इसे वायरल करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह तो धूप की तरह फैलती है। इसे पूरा करने की भी जरूरत नहीं पड़ती। इसे पूरा कर भी दिया जाये तो यह शेष सचेष्ट को साथ लेकर नहीं चलती। सचेष्ट लेखन इसके साथ दौड़ ही नहीं सकता। राजधानी एक्सप्रेस के इंजन से बैलगाड़ी जोड़ दोगे तो बैलगाड़ी या तो टूट जाएगी, या छूट जाएगी।
इसीलिए मानव सभ्यता के इतिहास में कई टन काव्य लिखा गया लेकिन युग, वर्ग, भाषा, देश, संस्कृति, वाद और विमर्श की सीमा से परे अम्बर के सितारों सरीखी सार्वजनिक पंक्तियाँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं।
✍️ चिराग़ जैन

आस्था का अपमान

जो आस्था न तोड़ सका उसने मन्दिर तोड़े और जो विचार को न मिटा सका वह किताबें जलाने लगा। लेकिन यह कृत्य वीरता का नहीं, अपितु स्वयं के परास्त होने की घोषणा है। अभिमन्यु की हत्या करके कौरवों ने पाण्डवों को आतंकित नहीं किया था अपितु आश्वस्ति प्रदान की थी कि कौरवों का नैतिक बल समाप्त हो गया है।
जब तर्क करते-करते कोई तर्क के स्थान पर बल अथवा क्रोध का प्रयोग करने लगे तो यह सूचना है कि उसके तरकश में तर्क का कोई तीर शेष नहीं है। यह ऐसे ही है जैसे कोई धनुष से तीर छोड़ने के स्थान पर धनुष ही फेंककर मार दे।
किसी ग्रंथ की प्रतियाँ जलाना, किसी धर्म का आस्था केंद्र ध्वस्त करना, अपने विपक्षी की चरित्र हत्या करना, अपने विरोधी का नाम बिगाड़कर बोलना -यह सब इस बात की सूचना है कि तर्क के संग्राम में हमारे पार तर्क ही नहीं कुतर्क भी समाप्त हो चुके हैं।
यह सब कुछ बहुत बचकाना है। रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाने से मानस में विराजित राम कैसे अपमानित हो सकते हैं? आप तुलसी की चौपाई पर तर्क करें, वह आपका अधिकार है किन्तु पुस्तक जलाकर आप उस ग्रंथ को मिटाना चाह रहे हैं तो यह आपके मूढ़ होने का प्रमाण है।
ये डिजिटल युग है भाई। दो कौड़ी की तुकबंदी करने वाले भी रेडियो तरंगों और बाइनरी में रूपान्तरित होकर अनन्त काल तक सुरक्षित रहने के जुगाड़ कर लेते हैं, ऐसे में आप हार्डकॉपी जलाकर रगों में दौड़ती रामचरितमानस को मिटाने का दंभ भर रहे हैं! हास्यास्पद है यह।
युद्ध में अनैतिक आचरण करनेवाला योद्धा, जन सहानुभूति खो देता है। बाबा तुलसी के जिस लेखन को आप फूंकना चाह रहे हैं, वह किसी काग़ज़ के टुकड़े पर नहीं बल्कि मानस पटल पर अंकित है।
जब कोई भाजपा का प्रवक्ता राजनैतिक बहस में विपक्षी नेताओं के नाम बिगाड़कर बोलता है तब यह साफ़ समझ आता है कि इस व्यक्ति के पास विचार का घोर अभाव है इसलिए यह हरकतों से ध्यान बंटाने की चेष्टा कर रहा है। राहुल गांधी को ‘पप्पू’ कहनेवाले; नरेंद्र मोदी को ‘फेंकू’ कहनेवाले; रवीश को ‘रबिश’ या ‘खबीस’ कहनेवाले दरअस्ल राहुल, मोदी या रवीश को नहीं चिढ़ा रहे होते हैं, ब्लकि अपनी पराजय पर एक बेहूदा हँसी का पर्दा डालने की कोशिश कर रहे होते हैं।
ठीक इसी प्रकार मानस की प्रतियाँ जलानेवाले मानस को भस्म नहीं कर रहे अपितु एक पूरे विमर्श को स्वाहा करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
किसी को मानस के किसी अंश पर शंका हुई- इसमें कोई अपराध नहीं है। किसी अन्य ने अपने ज्ञान के अनुसार उस शंका का उत्तर दे दिया, इसमें भी कुछ ग़लत नहीं है। शंका करने वाला उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ- यह भी बेहद समान्य घटना है। निवारण करने वाला झल्लाहट और क्रोध से भर गया- यह भी स्वाभाविक है। चर्चा, शास्त्रार्थ में बदल गई; सन्दर्भ स्पष्ट किए गए -इस सबमें कोई बुराई नहीं थी। वरन् यह तो किसी सभ्य समाज के सविवेक होने का द्योतक है।
किन्तु इस चर्चा में शंका करनेवाले को अपमानित करना अनैतिक था और इस चर्चा के दौरान मानस की प्रतियां जलाना अपराध था।
तुलसी, राम और मानस; ये तीनों ही अग्नि के प्रभाव क्षेत्र से बहुत दूर निकल चुके हैं। मान-अपमान जैसे लौकिक शब्द भी इनके आभामंडल के तेज में विलुप्त हो जाते हैं। किंतु इनके विषय में चर्चा करते हुए अभद्रता या अराजकता की लक्ष्मण रेखा लांघनेवाला अपने संस्कारों का आधार कार्ड अवश्य सार्वजानिक कर देता है!
इस घटना पर इसके अपराधियों को लज्जित होना चाहिए और इस पर प्रतिक्रिया करने से पहले राम में आस्था रखने वाले हर मनुष्य को यह चौपाई अवश्य स्मरण रखनी चाहिए :

सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे॥

✍️ चिराग़ जैन

वसन्त का मौसम

सर्द हवाओं के प्रकोप से निकलकर, देह जब मंद समीर के स्पर्श से खिल उठती है; तब वसंत घटित होता है। कोहरे की सत्ता में दबी-दुबकी धरती जब रश्मियों के गुनगुने स्पर्श से रोमांचित हो उठती है; तब वसंत घटित होता है। जाड़े का ऊनी बोझा छोड़कर जब बदन, सरसों का तेल मलकर धूप सेंकते हुए मीठी नींद में गोते लगाता है, तब वसंत घटित होता है।
वसंत का आगमन पूरी सृष्टि को संकुचन के श्रम से मुक्त करके विस्तार के आनंद का आमंत्रण देता है। वसंत इस सत्य की सूचना है कि विपत्ति में जो वनस्पति बदरंग होकर बदसूरत दिखने लगती है, समय बदलने पर उसी की रंगत से वसुंधरा सिंगर सकती है।
खेतों में फूली हुई सरसों, बाग में महक उठी गुलदाउदी, क्यारियों में मोती की चादर बनकर पसरी हुई जिप्सी ग्रास, अपनी नाज़ुक डालियों पर इतराकर खिल उठा गेंदा, हज़ारों रंगों की कल्पनाएँ साकार करता ट्यूलिप, पीले और हरे रंग के लाजवाब संयोजन से खिल उठे डूरंटा व फ़ाइकस और न जाने कितने ही पौधे उतावले हो होकर वसुंधरा को सुन्दर बनाने पर तुल जाते हैं। लाल चम्पा उचककर गुलाब की पाँखुरियों को चिढ़ाने लगती है। उधर गुडहल हाथ बढ़ाकर अपने होने का शोर मचाने लगता है। गुलाब अपनी राजसी ठसक के साथ अपने कंटीले सुरक्षाचक्र में बैठा हुआ कनखियों से इन सबको देखता रहता है।
खेत गोभी के गुलदस्ते से सज उठते हैं और मटर की झालरों से क्यारियों की किस्मत सँवर जाती है। मेंढ़ पर गाजर, मूली, चुकंदर, शलगम, की पत्तियाँ बाँहें खोलकर सूर्य की किरणों का स्वागत करती दिखाई देती हैं। उधर आम, महुआ, चीकू और लोकाट सरीखे वृक्ष सृष्टि को सर्दी की भीषण तपस्या का फल देने की तैयारी करने लगते हैं। इस ऋतु में बादल आकाश से ग़ायब नहीं होते, बल्कि छितराकर आकाश मे वंदनवार की तरह लटक जाते हैं।
सूर्य की किरणों से पहाड़ी बर्फ पिघलती है तो नदियों के संगीत में हर्ष और उल्लास के साज जुड़ जाते हैं। मौसम खुलता है तो मन भी अपनी एक-एक पाँखुरी खोल देता है। किसी बगीचे की तरह ही मन में भी प्रेम और भोग के फूल खिल उठते हैं। फूलों के आभूषण से सजा अनंग, अंग-अंग में लास्य कर उठता है। हरियाली देखकर आँखों की चमक बढ़ जाती है।
कुल मिलाकर, पाँचों इंद्रियों की क्षुधापूर्ति के लिए इस ऋतु में रस उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि रसराज और ऋतुराज का संयोग सहज लगता है। वाणी रसराज से विभूषित होती है और धरती ऋतुराज से। यहाँ तक कि धवला माँ सरस्वती भी पीले गेंदे और नीले अपराजिता को स्वीकार कर लेती हैं। एक ओर वीणा के तार छिड़ जाते हैं तो दूसरी ओर बाँसुरी बज उठती है। योग और भोग का सुंदर समागम है वसंत। श्वेत और पीत का अलौकिक संयोग है वसंत। वसंत इस सत्य का उद्घाटन है कि सृष्टि का कोई भी तत्व यदि संतुलन की मर्यादा न छोड़े तो वह जगत् के शृंगार का कारण बन जाता है।
सो आइये, अवचेतन को अध्यात्म की देहरी पर विराजित करके, चेतना की पाँचों इंद्रियों को वसंत का भोग करने का आमंत्रण दें। स्पर्शन को धूप का गुनगुना एहसास दें। रसना को खेतों की ताज़गी भोगने दें। घ्राण को प्रकृति की गंध का भोग लगाएं। चक्षु को बगीचे के रंगों का सुख दें और कर्ण को पंछियों के कलरव से लेकर नदियों की कलकल तक का आनंद उठाने दें।

✍️ चिराग़ जैन

डॉ विष्णु सक्सेना

बात उस दौर की है, जब हिन्दी कवि सम्मेलनों के समापन काव्य पाठ की डोर पर से गीतकारों की गिरफ्त ढीली पड़ रही थी। राजनैतिक परिप्रेक्ष्य और सामरिक परिदृश्य ने तनाव इतना बढ़ा दिया था कि मंच के एक कोने में बैठने वाला हास्य-कवि जनता को आकृष्ट करने लगा था। कवि सम्मेलन बदलकर ‘हास्य कवि सम्मेलन’ होने लगे थे।
घनाक्षरी और दोहे जैसे छन्द हास्य के परिधान पहन कर इतराने लगे थे। हास्य गीत, पैरोडी, बतरस, चुटकियां और चुटकुले लोकप्रियता के सिंहासन पर विराजमान थे। भीगी कोरों और गुलाबी मुस्कानों के स्थान पर ‘ठहाकों’ ने श्रोता दीर्घा को आलिंगनबद्ध कर लिया था।
यद्यपि गीत के अनेक पुराने अलमबरदार मंच पर अभी भी उपस्थित थे किंतु हास्य की प्रभावशाली सत्ता के कारण मंच पर आनेवाले नए रंगरूटों का आकर्षण, गीत के स्थान पर हास्य की ओर अधिक था।
इस स्थिति में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक नौजवान अपनी आवाज़ में खनक और संस्कारों में बृज का परिवेश लेकर मंच पर चढ़ा। इस युवा की भाषा इतनी सरल थी कि ठहाके के मोहपाश में बंधे हुए श्रोता भी शृंगार के इस स्वर को अनसुना न कर सके। श्याम रंग में रंगा यह गीतकार, अपना इकहरा बदन लिए जब माइक तक आता था, तो समान्य देहयष्टि के कारण बहुत समान्य ही प्रतीत होता था किंतु जैसे ही अपनी सधी हुई आवाज़ में डुबोकर शब्दों का उच्चारण करता था तो श्रोता दीर्घा को सम्मोहित कर लेता था।
बीच में ऐसे भी दौर आए जब कारगिल युद्ध के समय लोगों ने अपने मूल स्वभाव को छोड़कर वीर रस लिखना शुरू कर दिया। लेकिन डॉ विष्णु सक्सेना ने हर दौर में, हर हाल में बस प्रेम ही गाया।
इस एकाग्र साधना के परिणामस्वरूप आज कवि-सम्मेलन जगत् में उनका न केवल अलग मुकाम है, अपितु विशेष पहचान भी है। डॉ विष्णु सक्सेना उन अंगुलगणित कवियों में शुमार हैं, जिनका अपना नैसर्गिक फैन्स क्लब है।
गीत और सृजन के प्रति उनकी निष्ठा तथा अनवरत सक्रियता उन्हें अनुकरणीय बनाती है। लगभग चार दशक के उनके कवि सम्मेलनीय जीवन मे कई खरगोश उन्हें चुनौती देते हुए दौड़ गए, किंतु अपने छोटे-छोटे कदमों से धरती नापते हुए वे लगातार चल रहे हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि कौन इस ट्रैक पर उनसे आगे दौड़ रहा है और कौन उन्हें ओवरटेक कर रहा है!
तकनीक के बदलते चेहरे पर अपनी साधना का तिलक लगाने के लिए वे आजकल अनवरत कार्य कर रहे हैं। कवि-सम्मेलन की यात्राओं के बावजूद निरंतर सृजनरत रहकर कला की पूंजी को समृद्ध करनेवाले चुनिंदा लोगों में से एक डॉ विष्णु सक्सेना का आज जन्मदिन है।
ईश्वर उनकी एकाग्र साधना में त्राटक सिद्ध करे! सृजन की ईमानदार साधना उनकी सकारात्मकता के तंतुओं को पुष्ट करे! प्रेम की सुगंध का आवरण उन्हें कपट की खरपतवार से अछूता रखे -इसी शुभेच्छा के साथ उन्हें जन्मदिन की lovely बधाइयाँ।

✍️ चिराग़ जैन

साहित्य : पैथोलॉजी लैब

साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो मेडिकल प्रोसेस में पैथोलॉजी लैब की होती है। साहित्य, समाज के भीतर व्याप्त व्याधियों को ढूंढकर तंत्र के सम्मुख रखता है और फिर तंत्र अपने अनुभव, ज्ञान तथा मशीनरी के माध्यम से उस व्याधि का उपचार करता है।
कभी किसी मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट देखेंगे, तो पाएंगे कि लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में केवल उन्हीं बिंदुओं को बोल्ड अक्षरों में लिखा जाता है, जहाँ नियत मापदंडों के अनुसार परिणाम नहीं होते।
अब अगर कोई यह कहे कि पूरी रिपोर्ट में इतना कुछ बढ़िया चल रहा है, वह किसी को नहीं दिखता, एक जगह कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ आया है तो उसे बोल्ड करके दिखाया जा रहा है। या कोई यह रिपोर्ट देखकर पैथोलॉजिस्ट का गिरेबान पकड़ ले कि साले तू नेगेटिविटी फैला रहा है, तूने बीमारी ढूंढी है अब तू ही सर्जरी भी कर।
आजकल कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपनी मेडिकल रिपोर्ट देखकर भड़क कर कहते हैं कि रामलाल की रिपोर्ट में तो केवल यूरिक एसिड बढ़ा हुआ दिखाया था, मेरी रिपोर्ट में किडनी की गड़बड़ बता रहा है। ये लैब वाला रामलाल का चमचा है।
विश्वास कीजिए, पैथोलॉजी लैब आपके स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है। यदि रोगी इन लैब्स से ही इलाज पूछने लग जाएंगे तो उपचार नहीं, विध्वंस हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन

सम्मेद शिखर

सावधान देश के कर्णधारो!
सम्मेद शिखर के मुद्दे पर जैन समाज के साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह घर के एक और बेटे को घर से बाहर कर देने का षड्यंत्र है। भारत के लगभग सभी सामाजिक संगठनों में तन-मन-धन से योगदान देनेवाले जैनियों ने कभी स्वयं को सनातनियों से अलग नहीं माना। व्यवसाय, व्यापार और नौकरी-पेशों से आजीविका जुटानेवाले जैनियों ने मंदिर, अस्पताल, शिक्षण संस्थान, धर्मशालाएं, अनाथालय, वृद्धाश्रम, गौशाला और न जाने कितने ही लोककल्याणकारी प्रकल्पों की स्थापना की है। वैष्णोदेवी, बांकेबिहारी, काशी विश्वनाथ, खाटूश्याम, जगन्नाथजी, केदारनाथ, हरिद्वार, शिरडी, कामाख्या, स्वर्ण मंदिर और अन्य तमाम तीर्थस्थलों पर जैन समाज ने न केवल श्रद्धा से शीश झुकाया है, अपितु क्षेत्र के विकास हेतु उन्मुक्त हृदय से योगदान भी दिया है। अयोध्या के राम मन्दिर आंदोलन में जैन समाज मंदिर निर्माण की मांग करनेवालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चला।
आस्था, उत्सव, संयम और अहिंसा की जीवनशैली वाले इस समाज ने न तो कभी इस देश के संविधान का अपमान किया न ही नागरिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया। न कभी अपनी आस्थाएं किसी पर थोपने की कोशिश की और न ही कभी किसी की आस्थाओं को ढकोसला कहने का कार्य किया। अनुशासित इतने कि श्रवणबेलगोला में लाखों लोग जुटते हैं लेकिन कभी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। जैन साधुओं के चातुर्मास, पंचकल्याणक, पर्युषण पर्व और महावीर जयंती के महोत्सव में हज़ारों-लाखों की भीड़ जुटती है, लेकिन कभी कहीं अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।
देश के संचालन हेतु ईमानदारी से अपना टैक्स जमा कराने वालों में जैन समाज अग्रणी है। भारतीय शौर्य के प्रतीक महाराणा प्रताप के टूटते आत्मबल को संबल देने के लिए अपनी पूंजी का तिनका-तिनका लुटा देनेवाले भामाशाह के के वंशज आज इस देश में अपनी आस्थाओं की रक्षा हेतु आंदोलन करने पर विवश हैं। गुरु के साहबज़ादों की ससम्मान अंत्येष्टि के लिए सोने की मोहरें बिछाकर आततायी का अहंकार तोड़नेवाले टोडरमल के बेटे आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। देश की आज़ादी के लिए अपने सीने पर लाठी खानेवाले लाला लाजपत राय के नौनिहालों से उनकी श्रद्धा का मेरुदंड छीना जा रहा है। मानस की चौपाइयों को अपने सुर और स्वर से सजानेवाले रवीन्द्र जैन का कुनबा आज चीखने को विवश है। अंतरिक्ष में भारतीय वैभव का ध्वज फहरानेवाले विक्रम साराभाई के कुटुम्बी आज सत्ता से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।
प्रश्न झारखंड की सरकार या केंद्र की सरकार का नहीं है। प्रश्न यह है कि जब गिरनार के उर्जयन्त गिरी पर्वत को जैनियों से छीनकर ‘हिन्दू तीर्थ’ घोषित किया गया था, क्या तब जैन समाज की भावनाओं का किसी सत्ताधारी को रत्तीभर भी ख्याल आया था? प्रश्न यह है कि क्या उस समय जैन धर्मावलंबियों के साथ ठीक वही दुर्व्यवहार नहीं किया गया था, जो आक्रमणकारी मुग़लों के साथ किया जाता है?
और अब सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल घोषित करने का सरकारी दुस्साहस!
जैन समाज न तो कहीं बाहर से आक्रमण करके इस देश में आया है और न ही किसी तरह की विदेशी ताकतों के इशारे पर संचालित है। जैन संस्कृति न केवल इस देश की धरती पर उपजी है अपितु अपने स्वेद से इस देश को सींचने में भी उल्लेखनीय योगदान देती रही है। भोज, बिम्बिसार, अशोक और चन्द्रगुप्त सरीखे राजनैतिक पौरुष से जैन समाज ने इस देश का निर्माण किया है।
मान्यताओं का मतभेद हो तो हो, लेकिन हमारे पुरखों और हिन्दुओं के पुरखों में भी कहीं कोई भेद नहीं है। इसलिए शिखर जी की शुचिता को अक्षुण्ण रखने के लिए जारी इस आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में भारत के वर्तमान सत्ताधीश यह बात अच्छी तरह से मन में बैठा लें कि यदि जैन समाज को पराया सिद्ध करने का कोई प्रयास किया गया तो अहिंसा की साधना करनेवाला यह समाज अहिंसा और अनुशासन से बड़ी से बड़ी साज़िश की चूल हिलाने में सक्षम है। यह याद रहे कि असहयोग और सविनय अवज्ञा सरीखे अहिंसक अस्त्रों का प्रभाव पहले भी इस देश ने देखा है। यह याद रहे कि सीने पर लाठी खाकर अपने प्राण देने वाले लालाजी के हाथ में कोई हथियार नहीं था, लेकिन उनकी मृत्यु से उपजी ज्वाला ने ब्रितानिया शासन का भविष्य फूँक कर रख दिया। याद रहे कि भीतरी यात्रा में निमग्न शांत तपस्वियों की साधना भंग करनेवाले कालयवन, उन्हीं की नयनोर्जा से भस्म हो जाते हैं। याद रहे कि वर्चस्व की होड़ करनेवाला अंततः अपने अस्तित्व से हाथ धो बैठता है।

…………………….

सत्ताधीशो!
गिरिडीह में मधुबन से पारसनाथ पर्वत की ओर जानेवाली सड़क पर पांव रखते ही जैन धर्मावलंबियों के अंतःकरण में सम्मेद शिखर की आस्था का अनहद नाद गूंजने लगता है। गुणायतन, तेरापंथी कोठी, भूमिया जी, बीसपंथी कोठी और विमल समाधि मंदिर के दर्शन करते हुए जब कोई जैन तीर्थयात्री सम्मेद शिखर की यात्रा प्रारम्भ करता है, उस क्षण उसकी शिराओं में पावनता का एहसास प्रवाहित होने लगता है।
वैभव और संपन्नता का जीवन जीनेवाला जैन समुदाय बहुत कम सुविधाओं के बावजूद शिखर जी की यात्रा में अलौकिक आनंद की अनुभूति करता है। अर्थ के बल पर अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त होटल और परिसर बनवा लेना जैनियों के लिए बिल्कुल भी कठिन नहीं है, किंतु इन सुविधाओं के साथ इस क्षेत्र की पावनता के सम्मुख जो संकट उत्पन्न होगा; उसके लिए जैन समाज का कोई भी नुमाइंदा कभी तैयार नहीं हो सकता।
सम्मेद शिखर हमारे लिए एक तीर्थक्षेत्र ही नहीं अपितु दैवीय ऊर्जा का एक भंडारगृह भी है। सत्तू, गुलदाना और बेसन के सेव खाकर पर्वत की जो कठिन यात्रा जैन मतावलंबी करते हैं उसे ‘यात्रा’ नहीं, ‘वंदना’ कहा जाता है।
यह अकेली संज्ञा ही जैन समाज के लिए इस तीर्थक्षेत्र का महत्व स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है। अपनी काया से इस दुर्गम पर्वत की यात्रा को ‘वंदना’ कहा जाता है। इसका तात्पर्य है कि हमारे लिए यह पूरा पर्वत एक वेदी है, जिस पर अपनी काया के संपूर्ण अस्तित्व के समर्पण के साथ ‘वंदना की जाती है।
सुनने में आया है कि झारखंड सरकार इस पर्वत को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने जा रही है। यह सुनना जैन समाज के लिए ठीक ऐसे ही है, ज्यों कोई हमारे देवता को शो-पीस कहकर बेचने की बात कर रहा हो। जैसे कोई आस्था की किसी हाट में कीमत लगा रहा हो।
पर्यटन इन्द्रियों की लिप्सा की पुष्टि करता है और अध्यात्म इन्द्रियों को जीतने की राह दिखाता है। इन दोनों विरोधाभासी विषयों को एक साथ रखना कम से कम आस्था के अस्तित्व पर तो कुठाराघात होगा ही होगा।
जैन समाज भगवान महावीर के सिद्धांतों का अनुगामी है। पारसनाथ पर्वत पर न हिम है, न ही वन्यजीव! इस पर्वत की यात्रा का मार्ग भी बहुत रमणीक नहीं है। आस्थाओं के कुछ केंद्र यहाँ अवश्य हैं, जिनकी सादगी और एकरूपता आपके ‘भौतिक पर्यटकों’ का मनोरंजन करने में सक्षम नहीं हैं। इस क्षेत्र की सादगी का अर्थ अध्यात्म के बटोही को समझ आता है। इसलिए इसे पर्यटक स्थल घोषित करना सरकार की एक अपरिपक्व तथा अनावश्यक सोच का उदाहरण बनेगा।
भारत आस्थाओं का देश है। जैन दर्शन और जैन समाज ने देश के उन्नयन हेतु अग्रिम पंक्ति में रहकर सेवा की है। देश के अर्थ की जड़ों को अपने स्वेद से सींचनेवाला जैन समुदाय पूरे विश्व में शान्तिप्रिय जीवनशैली के लिए जाना जाता है। ऐसे में यदि जैन समाज को अपने तीर्थक्षेत्र की शुद्धता को बचाने के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है तो यह विषय समूचे भारतीय समाज की सोच पर प्रश्नचिह्न जड़ देगा।
जैन समाज आहत है। अहिंसा के अनुगामी अनशन और आंदोलन की राह पर निकल पड़े हैं। भामाशाह के बेटे अपनी श्रद्धा की शुचिता मांग रहे हैं। देश के राजनैतिक सिंहासन पर उनका राज है, जो आस्था और धार्मिक भावना का अर्थ भी समझते हैं और ताकत भी!
ऐसे मे सरकार को चाहिए कि पर्यटन की चकाचौंध से जैन समाज के इस आस्था केंद्र को दूर रखे क्योंकि आत्मा के स्तर पर घटित होनेवाली लौ की ज्योति भौतिकता की हैलोजन से बहुत ऊपर होती है। क्योंकि यदि इस आंदोलन में जैन समुदाय को कड़वे शब्द बोलने पड़े तो झारखंड की सरकार भारत की मीठी संस्कृति से आँखें नहीं मिला सकेगी।
क्योंकि स्वर्णभद्र कूट से जो हवाएँ टकराती हैं, उनके विघटन की ख़बर तक छापने कभी कोई नहीं आया!

✍️ चिराग़ जैन

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