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लालकिला कवि-सम्मेलन

प्यारे देशवासियो!
आपको यह सूचित करते हुए ख़ुशी हो रही है कि हम पंजाबी, हम सिंधी, हम ये, हम वो सब कुछ हैं लेकिन सुरक्षा कारणों से हम हिंदी नहीं हो पा रहे हैं। यह बताते हुए मैं फूला नहीं समा रहा हूँ कि हिंदी कवि-सम्मेलन जगत् का शीर्ष कहा जाने वाला लालकिला कवि-सम्मेलन इस बार सुरक्षा कारणों से “स्थगित” कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली सरकार केअधीनस्थ सभी भाषा अकादमियां कवि-सम्मेलन का आयोजन करती हैं। इस श्रृंखला में हिंदी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी और संस्कृत भाषा के कवि-सम्मेलन होते रहे हैं। इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय कवि-सम्मेलन था “हिंदी भाषा” का गणतंत्र दिवस कवि-सम्मेलन।
उक्त कार्यक्रम हर साल लालकिले के भीतर फुटबॉल मैदान में होता था। बीच में कुछ वर्ष यह आयोजन सुरक्षा कारणों से तालकटोरा स्टेडियम में भी हुआ। लेकिन इसके रद्द अथवा स्थगित होने की कोई घटना याद नहीं आती।
वैसे इस कार्यक्रम का रद्द होना देशहित में ही है। इसकी लोकप्रियता और गरिमा को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक अनेक प्रधानमंत्रियों ने इसमें उपस्थित रहकर अपना समय नष्ट किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और राज्यपालों को तो इसका आकर्षण कभी छोड़ ही न सका। ऐसे में इसके न होने से कितने सारे महत्वपूर्ण लोगों का कितना सारा कीमती समय बचा; यह गणतंत्र के लिए शुभ है।
अकादमी की ओर से आधिकारिक सूचना यह है कि स्थान उपलब्ध न होने के कारण कवि-सम्मेलन स्थगित किया जा रहा है। यह अच्छी बात है। गणतंत्र के अवसर पर लालकिले को सुरक्षा एजेंसियों ने किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया है ताकि आतंक की काली नज़र लालकिले की आभा को धूमिल न करदे। यदि लालकिले को कुछ हो जाता तो गणतंत्र परेड की झाँकियाँ कहाँ जाकर अपने पैर दबवातीं।
मेरे एक मित्र हैं जिनको अब मैं शत्रु मानने लगा हूँ। उन्होंने मुझसे इतना घटिया सवाल पूछा कि जब स्थान बदल कर बाकी भाषाओं का कवि-सम्मेलन हो सकता है तो हिंदी का क्यों नहीं। अब बोलो, कौन समझाए इनको! अरे यार, हिंदी की सुरक्षा ज़्यादा ज़रूरी है। हिंदी घुट-घुट कर मर जाए, तो हम स्वीकार कर सकते हैं लेकिन हिंदी आतंकियों की गोली से मरे इसे हमारी सरकार किसी सूरत बर्दाश्त नहीं कर सकती। वैसे भी, जिस प्रकार अन्य खेलों के उत्थान के लिए क्रिकेट पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है; जिस प्रकार पिछड़ों के विकास के लिए अगड़ों का शोषण ज़रूरी है उसी प्रकार अन्य भाषाओं के कवि-सम्मेलन की सफलता के लिए हिंदी के कवि-सम्मेलन को ठण्डे बस्ते में डालना अनिवार्य है।
अब ये मत पूछना कि विश्व पुस्तक मेला हज़ारों कीअव्यवस्थित भीड़ के साथ प्रगति मैदान में सुरक्षित रह सकता है तो कवि-सम्मेलन एक व्यवस्थित श्रोता समूह के साथ बंद इमारत में असुरक्षित क्यों है? ये भी मत पूछना कि छत्रसाल स्टेडियम में ऑड-इवन की क़ामयाबी का जश्न मनाने के लिए स्थान उपलब्ध हो सकता है तो कवि-सम्मेलन के लिए इतने बड़े शहर में स्थान का अभाव क्यों है?
इस प्रकार के प्रश्न बेमानी हैं। सरकार ने जनता की सुरक्षा के लिए ख़ुद को संकट में डाला। छत्रसाल स्टेडियम में मुख्यमंत्री जी ने सारे संकटों के सम्मुख अपनी छाती अड़ा दी और जनता के मुँह को काला होने से बचा लिया। इसको कहते हैं नेतृत्व। ऐसे लोगों की भावनाओं पर प्रश्न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को संदेह के घेरे में खड़ा कर देगा।
इसलिये एक टुच्चे से कवि-सम्मेलन के न होने का शोक न मनाओ रे बंधु बल्कि अपने भाग्य को सराहो कि हमारा देश किन महान विभूतियों के हाथ में है।

और हाँ
वो एन्ड में क्या बोलते हैं
जय हिन्द!

✍️ चिराग़ जैन

इनक्रेडिबल इण्डिया

दुनिया की समस्या ये है कि विश्व से आतंकवाद कैसे समाप्त हो। फ़्रांस इस सोच में व्यस्त है कि isis को कैसे समाप्त किया जाए। अमरीका ये सोच रहा है कि हमला ज़मीनी होना चाहिए या हवाई। चीन इस चिंता में है कि विश्व की अर्थव्यवस्था को अपने पक्ष में कैसे पलटा जाए। पाकिस्तान यह जुगत भिड़ा रहा है कि चीन और अमरीका दोनों से मित्रता कैसे बनाई रखी जाए। ऐसे में हमारे प्रश्न ये हैं कि हमें शाहरुख और आमिर की फ़िल्म देखनी चाहिए या नहीं। हमारी चिंता ये है कि मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन पर काटे गए केक में कितना ख़र्चा हुआ। हम इस मुद्दे पर उलझे हैं कि रामदेव की मैगी नेस्टले की मैगी से बेहतर है या नहीं।
न्यूज़ का इंटरनेशनल बुलेटिन देख कर समझ आता है कि ‘इनक्रेडिबल इण्डिया’ का मतलब क्या है।
जब आमिर खान अतुल्य भारत के विज्ञापन कर रहे थे तो ऐसा लगता था जैसे भोला-भाला पीके दाढ़ी बनाते नाई की तशरीफ़ में घुसा पायजामा निकाल रहे हों। और असहिष्णुता वाला बयान देकर उन्होंने वो पायजामा वापस वहीँ घुसा दिया।

✍️ चिराग़ जैन

पेरिस में आतंकी हमला

उत्सवों के मौसम में पेरिस की आबो-हवा आतंकी हमलों से विषैली हो गई। शुक्रवार की शाम वीकेंड की शुरुआत थी। सैंकड़ों बेगुनाह दहशतगर्दी के शिकार हुए।
आख़िर कब पूरी दुनिया एकजुट होकर इन मुट्ठी भर जाहिलों को क़ाबू करेगी। हम कब अपनी जातियों, सम्प्रदायों. भूगोलों, देशों, भाषाओँ से ऊपर उठकर मानवता के लिए एक होंगे।
जब किसी की मृत्यु की ख़बर आती है तो एक क्षण के लिए जीवन की आपाधापी व्यर्थ लगने लगती है। इसी तरह जब कहीं किसी आतंकवादी घटना का ज़िक्र आता है तो ये पुरस्कार वापसी, ये राज्यसभा का गणित, ये टीपू सुल्तान विवाद … सब अनर्गल जान पड़ते हैं।
एक बार इंसान होकर सोचें तो शायद इंसानियत के इन दुश्मनों को समाप्त किया जा सके।

✍️ चिराग़ जैन

मोदी… मोदी…

मोदी जी नेपाल गए। लोगों ने नारे लगाए -“मोदी …मोदी।” मोदी जी प्रसन्न हुए। मोदी जी अमरीका गए। लोगों ने नारे लगाए- “मोदी …मोदी।” मोदी जी आत्मविश्वासी हो गए। मोदी जी जापान गए। लोगों ने नारे लगाए- “मोदी ..मोदी।” मोदी जी बेबाक़ हो गए। मोदी जी चीन गए। लोगों ने नारे लगाए- “मोदी ….मोदी।” मोदी जी ने विपक्षियों की बातें सुननी बंद कर दीं। मोदी जी जर्मनी गए। लोगों ने नारे लगाए- “मोदी …मोदी। मोदी जी ने सबकी बात सुननी बंद कर दी।
मोदी जी कश्मीर में परास्त हुए। लेकिन कानों में गूँजता रहा- “मोदी …मोदी।” मोदी जी दिल्ली हार गए। लेकिन कानों में गूँजता रहा- “मोदी …मोदी। मोदी जी बिहार में हारे तो भ्रम टूटा। चेहरा उतर गया। कान सुन्न हो गए। उनको आडवाणी जी की आवाज़ सुनाई दी। जोशी जी की बात पर उनका ध्यान गया। लेकिन आज मोदी जी ब्रिटेन पहुँच गए। लोगों ने फिर नारे लगाए- “मोदी… मोदी।” तभी मोबाईल पर किसी हितचिंतक ने फोन करके कहा- “भारत में आपकी लोकप्रियता कम हुई है।” मोदी जी ने ज़ोरदार अट्टहास किया। मोबाइल को हिक़ारत से स्विच ऑफ़ किया। और हाथ हिलाते हुए उनका अभिवादन करने लगे जो नारे लगा रहे थे- “मोदी …मोदी।”
✍️ चिराग़ जैन

इसे कहते हैं बाज़ी

सियासत के एक खेमे ने कुछ कलाकारों को बटोरा …सरकार का विरोध करने के लिए।
फिर सियासत के दूसरे खेमे ने कुछ कलाकारों को बटोरा …कलाकारों का विरोध करने के लिए।
अब कुछ दिन हो-हल्ला होगा।
एक खेमे के कलाकार दूसरे खेमे के कलाकारों को गालियाँ देंगे। खूब शोर होगा। सोशल मीडिया पर खेमेबाज़ी होगी। जब माहौल खूब बिगड़ लेगा तो एक दिन टीवी चैनल पर दो बड़े दलों के राजनेता दुखी होते हुए बयान देंगे – “हमें बहुत दुःख है कि साहित्य और कला के क्षेत्र से जुड़े लोग आपस में इस तरह लड़ते-मरते हैं। अरे भाई! तुम कलाकार हो, सृजन करो, कविता लिखो, मनोरंजनकरो। राजनीति करना आपको शोभा नहीं देता।”

✍️ चिराग़ जैन

स्वराज पर्व

बधाई हो!
दिल्ली सरकार का ‘स्वराज पर्व’ रद्द हो गया। मतलब यह कि केन्द्र सरकार स्वतंत्रता दिवस मनाएगी, और सारी सरकारें भी स्वतंत्रता दिवस मनाएंगी, लेकिन दिल्ली सरकार स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाएगी। अख़बार में आया है।
पहली बार पता चला है कि स्वतंत्रता दिवस भी सबका अलग-अलग है। सुना है कि दिल्ली पुलिस ने “दिल्ली सरकार के स्वतंत्रता दिवस” पर सुरक्षा मुहैया करने से इनक़ार कर दिया है, कारण यह कि वह केन्द्र सरकार के स्वतंत्रता दिवस को सुरक्षित रखने में व्यस्त रहेगी।
दिल्ली सरकार के मंत्री ने और भी आगे की बात कही है। उनका बयान आया है कि मौसम की भविष्यवाणी को देखते हुए स्वराज पर्व रद्द किया गया है। ये बात तार्किक लगती है। दरअस्ल 15 अगस्त इस बार पहली बार 15 अगस्त के दिन पड़ रहा है। यह भी पहली बार है कि अगस्त के महीने में बरसात हो रही है। लेकिन केन्द्र सरकार के मौसम विभाग को ऐसी बातों की कोई परवाह नहीं है। वह जानता है कि बादल और वर्षा दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर लालक़िले की प्राचीर तक आ भी गए तो माननीय प्रधानमंत्री जी उन दोनों को अपनी लच्छेदार भाषा और रोचक शैली में उलझा लेंगे और बरसने का मौक़ा ही नहीं देंगे। लेकिन दिल्ली सरकार के आयोजनों में ऐसी क्षमता का सर्वथा अभाव है।
दशकों से चले आ रहे “स्वतंत्रता दिवस कवि-सम्मेलन” को भी इसी रद्दीकरण की टोकरी में पटक दिया गया है। इत्तिफ़ाक़न अगले वर्ष गणतंत्र दिवस कवि-सम्मेलन भी गणतंत्र दिवस के ही अवसर पर आयोजित होना है। उस समय भी पुलिस केन्द्र सरकार के गणतंत्र दिवस की सुरक्षा में व्यस्त रहेगी और नेहरू जी के समय से चला आ रहा गणतंत्र दिवस कवि सम्मेलन “दिल्ली सरकार के गणतंत्र दिवस” का हिस्सा होने की वजह से रद्द कर दिया जायेगा। उस समय दिल्ली सरकार के मंत्री भयंकर ठंड का पूर्वानुमान देखते हुए ऐसा निर्णय ले लेंगे।
मोदी जी की किताब का लोकार्पण बारिश से प्रभावित नहीं हुआ; बिहार की चुनावी सभाओं पर मौसम ने कोई कुठाराघात नहीं किया; संसद के बाहर प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस को सुरक्षा मुहैया कराने में दिल्ली पुलिस को कोई कष्ट नहीं हुआ। लेकिन दिल्ली की जनता को आज़ादी का पर्व मनाने के लिये संकट खड़ा हो गया।
आतंक की इस देश में यह पहली जीत है। अब तक धमाकों के बावजूद हमने आतंकियों की दहशत को कोई प्रमाण-पत्र नहीं दिया था। इस बार विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी “केजरीवाल बनाम जंग” की जंग में आतंकियों की आड़ में छिपकर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के पौरुष की शहादत पर तीन दिन का मौन रखेगी और “दिल्ली सरकार के स्वतंत्रता दिवस” को विफल करने की ख़ुशी में नज़ीब जंग आतंकवाद को शौर्य पुरस्कार से नवाज़ेंगे।

✍️ चिराग़ जैन

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