Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
विश्व योग दिवस की शुभकामनाएँ। योग पूरी दुनिया में नए आयामों को खोल रहा है किन्तु फिर भी योग के जितने आयामों से हमने पटाक्षेप किया है उसका कोई मुक़ाबला नहीं है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर देश भर में अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। एक बड़ा तबका इन कार्यक्रमों में योगाभ्यास ही करने जाता है। लेकिन उन लोगों के लिये भी इन कार्यक्रमों की उपयोगिता है जिन्हें योगाभ्यास से कोई सरोकार नहीं है।
विपक्ष इन कार्यक्रमों से दूर रहकर अपने हठयोग का प्रदर्शन करता है। अनेक छुटभैये इन कार्यक्रमों में अपना ‘राजयोग’ तलाशने जाते हैं। पार्क में जब कोई ख़ूबसूरत लड़की वज्रासन और पादहस्तासन करती है तो कई युवक वहाँ खड़े-खड़े ‘ताड़ासन’ करते पाए जाते हैं। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि कई एकड़ में फैले पार्क में योगिणियों के आसपास की वायु में ऐसा क्या विशेष होता है कि पूरे पार्क के साधक वहीं साधना करने को लालायित रहते हैं।
सवेरे पार्क में तो योगाभ्यास होता ही है, हम तो सामान्य जीवन में भी योग को छोड़ नहीं पाते। हमारी संसद में पूरे साल जिस मुद्दे पर सरकार अनुलोम करती है, विपक्ष उस पर विलोम कर रहा होता है। सरकारी दफ़्तरों में काम करने के नाम पर बाबू लोग योगनिद्रा में चले जाते हैं। थाने में रपट लिखाने जाओ तो पुलिसवाले ‘उष्ट्रासन’ करते मिलते हैं। आध्यात्मिक गुरुओं ने सिद्धासन लगाया और गहन साधना से कई एकड़ जमीनें हथिया लीं। बिल्डर्स ‘काकी मुद्रा’ और ‘शीतली प्राणायाम’ करके निवेशकों की गाढ़ी कमाई गड़प कर गए।
अफसर लोग टेबल के नीचे हाथ फैलाकर ‘भ्रष्टासन’ कर रहे हैं और ठेकेदार ये सन्देश दे रहे हैं कि यदि सही तरीके से अपने हाथों से दूसरों के पैर पकड़ लिए जाएँ तो पाचन शक्ति इतनी सुदृढ़ हो जाती है कि सीमेंट और लोहा भी पचाया जा सकता है। न्याय प्रक्रिया सात दशक से शिथिलासन का अभ्यास कर रही है। पत्रकारिता नॉन स्टॉप कपालभाति कर रही है। उनकी उच्छवास की गति इतनी तेज़ है कि लाख कोशिशों के बावजूद उनके कपाल में कुछ घुसता ही नहीं।
इस देश का सामान्य नागरिक भी अनवरत योगाभ्यास करता है। सुबह उठते ही वह उकड़ू बैठ कर योगाभ्यास करना शुरू करता है, उसके बाद दिन भर शीर्षासन, उत्तानपादासन, उपवास और वैवश्याभ्यास करते हुए उसका ‘ध्यान’ दो रोटियों पर केंद्रित हो जाता है। वह सरकार और व्यवस्था की ओर अपेक्षा की दृष्टि से ‘त्राटक’ करता है और तंत्र उससे नज़र बचाते हुए अपने कानों में अंगूठे घुसाता है और आँखों पर उँगलियाँ रखकर मुंह से घूँ-घूँ की ध्वनि निकालने लगता है।
✍️ चिराग़ जैन
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जंतर मंतर पर गजेन्द्र सिंह फांसी झूल गया। मीडिया की मौज हो गई। गजेन्द्र सिंह पर हर चैनल ने पीएचडी कर मारी। वहां वसुंधरा क्यों नहीं गई। वहां अरविन्द केजरीवाल क्यों चुप रहा। किसने उसकी चिता जलाई। कौन उसकी बेटी है। किसको उसने फोन किया। सारी पड़ताल दो दिन में हो गई।
उसको न्याय मिलने ही वाला था कि नेपाल की धरती हिल गई। नेपाल में तबाही मच गई और मीडिया में हाहाकार।गजेन्द्र के परिवार की गुहार इस हाहाकार में दब गई। उन अनाथ बच्चों को स्टूडियो से बाहर फ़ेंक कर मीडिया नेपाली हो गया। कौन सी बिल्डिंग गिरी। जब बिल्डिंग गिरी तो लोग कैसे भागे। किस मंदिर में चमत्कार हुआ। किस मलबे में कितने लोग फंसे हैं। सारी रिसर्च ही गई। अभी मलबा पूरी तरह हटा भी नहीं था कि रामदेव की पुत्रजीवक वटी का मुद्दा मीडिया की मशीन में पेल दिया गया। सुबह से शाम तक हर चैनल पर रामदेव और त्यागी जी। उस दवाई के नाम में क्या गुनाह था ये स्पष्ट होता इससे पहले मीडिया को कुमार विश्वास मिल गया। मिडिया ने त्यागी जी को त्याग कर कुमार विश्वास और लड़की का दामन थाम लिया। दोनों पक्ष ये कहते रहे कि हमारे बीच कोई सम्बन्ध नहीं हुए।लेकिन मीडिया ने दो दिन तक कुमार विश्वास का चीरहरण किया। कुमार की इज़्ज़त पूरी तरह लुटती इससे पहले सल्लू मियां पर फैसला आ गया। बेचारे सलमान को जिसने केवल एक फुटपथिये को कुचला था। उसको इतनी भारी सज़ा हो गई। अदालत की इस बर्बरता पर मीडिया ने सवाल उठाए। पूरे देश में दुःख की लहर दौड़ गई। अब देखना ये है कि अगला नंबर किसका है।
हमारा देश इतने जागरूक मीडिया से धन्य है। वो और देश होंगे जिनकी मिडिया को मुद्दों की तलाश होती है। हमारे न्यूज़ चैनल तो जिस पर बात करने लगें, वही मुद्दा हो जाता है। कभी-कभी तो लगता है कि मुद्दे खुद न्यूज़ चैनल के बाहर लाइन बनाकर खड़े हैं। हालात ये है कि किसी भी मुद्दे को दो दिन से ज़्यादा का स्लॉट नहीं मिल पा रहा। इतनी व्यस्तता के बीच भी संसद की चर्चा, भूखे को रोटी, सरकारी भ्रष्टाचार, गर्मी से झुलसते लोग, हवा में बढ़ता प्रदूषण और जीवन स्तर की बेहतरी को दरकिनार कर हमारा मीडिया ऐसे बिना बात के मुद्दों पर पूरी ऊर्जा से चीखता चिल्लाता है; इससे ज़्यादा महानता और क्या होगी।
✍️ चिराग़ जैन
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प्रशांतभूषण (अजीत)- “केजरी डर्लिंग, सारा शहर मुझे ऑनेस्ट के नाम से जानता है। अगर सारे स्टिंग हासिल करना चाहते हो, तो मेरी कुछ शर्तें माननी होंगी।”
अरविंद केजरीवाल (धर्मेन्दर)- “कुत्ते-कमीने मैं तेरा इस्तीफ़ा ले लूंगा।”
योगेन्द्र यादव (अमज़द ख़ान)- “अरे ओ केजरी! ई बैंगलोर वाले कौन चक्की काआटा खिलाते हैं रे। जब से लउटे हो ससुर गाली पर गाली दिये जात हो।”
मनीष सिसोदिया (नाना पाटेकर)- हा हा हा हा, हा हा हा हा। आ गए, आ गए हमारी बदनामी का तमाशा देखने। अब स्टिंग चला देंगे। असलियत ऐसी बाहर आयेगी, सच्चाई बाहर आएगी। थोड़ी देर स्टिंग चलता रहेगा। फिर मेरा भाई एंकर बुलेटिन बना लेगा। फिर सब चर्चा करके घर चले जाएँगे, खाना खाएंगे, सो जाएंगे। तुम्हारी ये योगेन्द्र यादवी, ये भूषणी एक दिन इस पार्टी की मौत का तमाशा इसी ख़ामोशी से देखेगी।
अन्ना हज़ारे (अमिताभ बच्चन)- आज ख़ुश तो बहुत होंगे तुम। देखो, जो आज तक किसी स्टिंग में नहीं दिखा, जिसने आज तक किसी को गाली नहीं दी, जिसने आज तक किसी सफ़ाई अभियान में हिस्सा नहीं लिया, वो आज जगह जगह सफ़ाई देता फिर रहा है।
जनता (प्राण) – साब! आज तक जनता से किसी ने इतना बड़ा धोखा नहीं किया। ये तुम नहीं तुम्हारी 67 सीटें, तुम्हारी कुर्सी बोल रही है। जिस दिन ये पॉवर ये कुर्सी नहीं होगी उस दिन तुम… (केजरी जी स्टिंग वाली भाषा में चिल्लाते हैं) …चिल्लाओ नहीं साहेब…… ख़ांसी उठ जायेगी।
नोट : पिक्चर अभी बाक़ी है मेरे दोस्त।
✍️ चिराग़ जैन
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बरवाला में आज हमला दिवस था। आश्रम पर हमला हुआ। बचाने आए भक्तों पर हमला हुआ। पकड़ने आए पुलिसवाले पिटे। देखने गए गांववाले पिटे। दिखाने गए मीडियावाले पिटे। घुटने टूटे, कैमरे टूटे और टीआरपी के रिकॉर्ड भी। अदालत नाराज़ है कि अदालत की तौहीन हुई। पुलिस नाराज़ है कि पुलिस की तौहीन हुई। मीडिया नाराज़है कि मीडिया की तौहीन हुई। भक्त नाराज़ हैं कि संत की तौहीन हुई।
पुलिस आई, पैरामिलिट्री आई, प्राइवेट मिलिट्री आई। सारा दिन बरवाला में बम, लाठी, गोली चली, चैनल्स पर लाइव टेलीकास्ट चला, शाम को सभी चैनल्स पर शब्दों का युद्ध हुआ।
किसी ने बताया कि बाबा कबीरपंथी है। ऐसा लगा कि दिन भर लोकतंत्र घायल होता रहा। दिन भर धर्म घायल होता रहा। लेकिन शाम को मीडिया की बहस में जब बाबा को कबीरपंथी बताया गया तो ऐसा लगा कि एक ही पल में कबीर लहूलुहान हो गए।आश्रम के भीतर से जितने पत्थर फेंके गए उनसे कबीर का अंग-अंग ज़ख़्मी हो गया।बरवाला की दिशा में कान लगाकर सुना तो लगा कोई कराह रहा है। उस कराह में एक टीस है, कोई बुदबुदाता जाता है-
कबिरा पिटा हिसार में, पूछ रहा है रोय
दो पार्टिन के बीच में, खींच लिया क्यों मोय
✍️ चिराग़ जैन
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लाउड स्पीकर ने धर्मगुरु से पूछा- मैं तो साईं भी नहीं हूँ फिर मुझ पर विवाद क्यों?
धर्मगुरु बोले – क्योंकि तूने हमसे ऊंची आवाज़ में बात की।
लाउड स्पीकर झुक कर बोला – लेकिन मैंने तो आपकी ही आवाज़ बुलंद की हुजूर।
धर्मगुरु मुस्कुराए – ये समझ ले अब तू बेकार हो गया था। मीडिया की आवाज़ तुझसे ज़्यादा बुलंद है और मीडिया की मुंडेर तक पहुँचने के लिए तुझ पर खडा होना ज़रूरी था।
✍️ चिराग़ जैन
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दिल्ली विश्वविद्यालय में नये पाठ्यक्रम लागू हो गये हैं। चार साल वाला। कल स्नातक स्तर की हिंदी की पाठ्य पुस्तक से मुठभेड़ हो गयी। कहने लगी मैं साहित्य की पुस्तक हूँ। सुनकर मेरे भीतर के साहित्यिक ने कनखियों से एकाध पृष्ठ उघाड़ दिये। ये इत्तेफ़ाक़ ही था कि जो पृष्ठ खुला उस पर शाहरुख़ ख़ान का चित्र था, रा-वन वाला। मेरे साहित्यकार को कुछ शंका सी हुई। अगला पृष्ठ खोला, तो वो बोला- बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी तो सीधी-सादी लड़की शराबी हो गयी। …मैंने चारों तरफ़ नज़र घुमाई, शायद कहीं तारांकित लिखा हो- ‘शराब पीना सेहत के लिये हानिकारक है, इस पुस्तक में सम्मिलित कोई भी कवि शराब का सेवन या उसका प्रचार नहीं करता।’ …लेकिन अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं दिखा। मेरा साहित्यकार आगे बढ़ा -‘जींस पहन के जो मैंने मारे ठुमके, तो लट्टू पड़ोसन की भाभी हो गयी। साहित्यकार कल्पना के कक्ष में खो गया। एक प्रोफ़ेसर काले गॉगल्स लगाये, मिनि स्कर्ट और शॉर्ट टॉप पहनकर ईअरफोन कान में लगाये विवेकानंद स्टेच्यू के आगे से गुज़रते हुए हिंदी विभाग में प्रवेश करती है।
40 लड़कों की कक्षा में प्रवेश करते ही हर विद्यार्थी से कड़ाई से पूछती है, आप में से जिसके पड़ोस में कोई पड़ोसन न हो बाहर हो जाओ। 10 लड़के बाहर चले जाते हैं। फिर पूछती है जिसकी पड़ोसन की भाभी न हो वो बाहर चला जाये। 20 विद्यार्थी फिर बाहर चले गये। 10 शेष बचे। अध्यापिका ने प्रत्येक छात्र से पड़ोसन के अंगोपांग की जानकारियां जुटानी शुरू ही की थी कि टोकने की आदत से मजबूर एक विद्यार्थी ने प्रश्न किया- मैडम ये बलम पिचकारी क्या होती है। मैडम ने साहित्य के सम्मान के लिये तुरंत बलम और पिचकारी के मध्य अल्पविराम लगाया। घर जाकर अध्यापिका अल्पविराम को राखी बांधेगी। यदि अल्पविराम समय पर न आता तो वह छात्र समास रूपी दुश्शासन का प्रयोग कर अध्यापिका का चीर, कोष्ठक में मिनी स्कर्ट, हरण कर लेता।
अभी एक संकट टला ही था कि दूसरा प्रश्न आ गया, मैडम प्रस्तुत पाठ में पड़ोसन की भाभी ही लट्टू क्यों हो रही है, पड़ोसन क्यों नहीं। क्या कवि अपनी प्रेयसी की भाभी पर फ्लैट है? क्या कवि शादीशुदा महिलाओं पर अधिक रीझता है।
अध्यापिका प्रश्न का उत्तर तलाशती इससे पूर्व ही एक और प्रश्न उछला- मैडम, यदि यह कविता किसी कवयित्री द्वारा रचित है तो इसमें लट्टू होने का कर्म पड़ोसन के भैया को करना चाहिये, भाभी को नहीं। और अगर ये कविता कोई कवि लिख रहा है तो बलम की पिचकारी से आहत होकर वह उन्मादी क्यों हुआ जाता है। क्या यह कविता समलैंगिकता का समर्थन करती है?
कक्षा के प्रश्नों से घबराकर अध्यापिका कक्षा से और साहित्यकार कल्पना से बाहर आ गये। पलटते-पलटते एक पृष्ठ पर तुलसी, कबीर दिखाई दिये। आरक्षित से। उपेक्षित से। साहित्यकार ने क्षोभ में भरकर कहा- ये पुस्तक साहित्य की नहीं है। पुस्तक ने इतराते हुए प्रेमचंद का निबंध दिखाया… चुप रहो। इसमें प्रेमचंद हैं, जो प्रेमचंद के साथ छप गया, वो सब साहित्य है।
जाओ अपना रास्ता नापो। मत मानो मुझे साहित्य। छात्र तो मानेंगे ही, 75 में से 55 नम्बर मास्टर की दया पर मिलेंगे। नहीं मानेंगे तो फैल करवा दूंगी चारों सालों कू!
✍️ चिराग़ जैन