Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
इस देश के सभी लोग चाहते हैं कि हम लोग अपने त्योहार मिलजुलकर मनाएं। अच्छी बात है। मनाने भी चाहियें। लेकिन जब वे ही सब लोग किसी चुनौती से जूझते हैं तो हम साथ खड़े क्यों नहीं दिखाई देते। जब हमारा लचर न्यायतंत्र दशकों की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद किसी कठोर निर्णय पर पहुँचता है तो हम हिन्दू-मुस्लिम हो जाते हैं। जब आप फ़िल्म बनाते हैं तो भेदभाव भूल कर उसमें क़ौमी एकता का मसाला फिट करके हिंदुओं से भी कमाते हैं और मुस्लिमों से भी। लेकिन आधी रात को दारू पी कर जब आप ट्विटर लॉगिन करते हैं तो आपको याद आ जाता है कि इस देश में आपके रहते एक मुस्लिम को फाँसी की सज़ा कैसे सुनाई जा सकती है।
आप नवाज़ शरीफ से दरख्वास्त करते हैं कि प्लीज़ टाइगर को हमें दे दो। हमारा देश बहुत ठाली है। मेमन की फांसी के बाद हमारे पास बावेला उठाने को कोई मुद्दा नहीं बचेगा। हमारे धार्मिक संगठन निकम्मे हो जाएंगे। हमारी अदालतें खंडहर बन जाएंगी। हमारे बुद्धिजीवी बेरोज़गार हो जाएंगे। हमारा देश आप ही के रहमो करम पर है। इसलिए “प्लीज़” टाइगर हमें दे दीजिये।
….शर्म आनी चाहिए। जिस पाकिस्तान के लोगों की इमेज डैमेज का काम आपने अपनी महान फ़िल्म “बजरंगी भाईजान” से किया है उसी की दी हुई बोटियाँ आपके ट्वीट्स में लार टपकाती नज़र आ रही हैं। हमने कभी आपको पराया नहीं समझा। जब अदालत ने आपको बेल दी तो इस देश के हज़ारों लोग लपककर आपको बधाई देने पहुंचे थे। इन्हीं लोगों को मौत के घाट उतारनेवाले (चाहे वो हिन्दू हों या मुस्लिम) को आप सपोर्ट कर रहे हैं।
आपकी उँगलियाँ नहीं कांपी। आपके ज़मीर ने कोई करवट न ली। आपके दिल से कोई आवाज़ न आई। जिन लोगों ने आपको सर-माथे पर बैठाया उन लोगों के हत्यारों के समर्थन में खड़े होने से आपकी टांगों ने इनकार न किया।
आपकी फिल्मों में कोई स्टोरी हो या न हो; आपकी हरकतों में कोई अभिनय हो या न हो; आपके नृत्य में कोई लरजिश हो या न हो…. केवल आपकी सूरत देखने भर को ये जनता अपनी जेब से सौ-सौ करोड़ रूपये लुटा देती है। और कितनी दौलत चाहिए आपकी हवस को।
सॉरी टू से मिस्टर खान, यू आर सच ए थैंकलेस पर्सन।
✍️ चिराग़ जैन
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विश्व योग दिवस की शुभकामनाएँ। योग पूरी दुनिया में नए आयामों को खोल रहा है किन्तु फिर भी योग के जितने आयामों से हमने पटाक्षेप किया है उसका कोई मुक़ाबला नहीं है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर देश भर में अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। एक बड़ा तबका इन कार्यक्रमों में योगाभ्यास ही करने जाता है। लेकिन उन लोगों के लिये भी इन कार्यक्रमों की उपयोगिता है जिन्हें योगाभ्यास से कोई सरोकार नहीं है।
विपक्ष इन कार्यक्रमों से दूर रहकर अपने हठयोग का प्रदर्शन करता है। अनेक छुटभैये इन कार्यक्रमों में अपना ‘राजयोग’ तलाशने जाते हैं। पार्क में जब कोई ख़ूबसूरत लड़की वज्रासन और पादहस्तासन करती है तो कई युवक वहाँ खड़े-खड़े ‘ताड़ासन’ करते पाए जाते हैं। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि कई एकड़ में फैले पार्क में योगिणियों के आसपास की वायु में ऐसा क्या विशेष होता है कि पूरे पार्क के साधक वहीं साधना करने को लालायित रहते हैं।
सवेरे पार्क में तो योगाभ्यास होता ही है, हम तो सामान्य जीवन में भी योग को छोड़ नहीं पाते। हमारी संसद में पूरे साल जिस मुद्दे पर सरकार अनुलोम करती है, विपक्ष उस पर विलोम कर रहा होता है। सरकारी दफ़्तरों में काम करने के नाम पर बाबू लोग योगनिद्रा में चले जाते हैं। थाने में रपट लिखाने जाओ तो पुलिसवाले ‘उष्ट्रासन’ करते मिलते हैं। आध्यात्मिक गुरुओं ने सिद्धासन लगाया और गहन साधना से कई एकड़ जमीनें हथिया लीं। बिल्डर्स ‘काकी मुद्रा’ और ‘शीतली प्राणायाम’ करके निवेशकों की गाढ़ी कमाई गड़प कर गए।
अफसर लोग टेबल के नीचे हाथ फैलाकर ‘भ्रष्टासन’ कर रहे हैं और ठेकेदार ये सन्देश दे रहे हैं कि यदि सही तरीके से अपने हाथों से दूसरों के पैर पकड़ लिए जाएँ तो पाचन शक्ति इतनी सुदृढ़ हो जाती है कि सीमेंट और लोहा भी पचाया जा सकता है। न्याय प्रक्रिया सात दशक से शिथिलासन का अभ्यास कर रही है। पत्रकारिता नॉन स्टॉप कपालभाति कर रही है। उनकी उच्छवास की गति इतनी तेज़ है कि लाख कोशिशों के बावजूद उनके कपाल में कुछ घुसता ही नहीं।
इस देश का सामान्य नागरिक भी अनवरत योगाभ्यास करता है। सुबह उठते ही वह उकड़ू बैठ कर योगाभ्यास करना शुरू करता है, उसके बाद दिन भर शीर्षासन, उत्तानपादासन, उपवास और वैवश्याभ्यास करते हुए उसका ‘ध्यान’ दो रोटियों पर केंद्रित हो जाता है। वह सरकार और व्यवस्था की ओर अपेक्षा की दृष्टि से ‘त्राटक’ करता है और तंत्र उससे नज़र बचाते हुए अपने कानों में अंगूठे घुसाता है और आँखों पर उँगलियाँ रखकर मुंह से घूँ-घूँ की ध्वनि निकालने लगता है।
✍️ चिराग़ जैन
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जंतर मंतर पर गजेन्द्र सिंह फांसी झूल गया। मीडिया की मौज हो गई। गजेन्द्र सिंह पर हर चैनल ने पीएचडी कर मारी। वहां वसुंधरा क्यों नहीं गई। वहां अरविन्द केजरीवाल क्यों चुप रहा। किसने उसकी चिता जलाई। कौन उसकी बेटी है। किसको उसने फोन किया। सारी पड़ताल दो दिन में हो गई।
उसको न्याय मिलने ही वाला था कि नेपाल की धरती हिल गई। नेपाल में तबाही मच गई और मीडिया में हाहाकार।गजेन्द्र के परिवार की गुहार इस हाहाकार में दब गई। उन अनाथ बच्चों को स्टूडियो से बाहर फ़ेंक कर मीडिया नेपाली हो गया। कौन सी बिल्डिंग गिरी। जब बिल्डिंग गिरी तो लोग कैसे भागे। किस मंदिर में चमत्कार हुआ। किस मलबे में कितने लोग फंसे हैं। सारी रिसर्च ही गई। अभी मलबा पूरी तरह हटा भी नहीं था कि रामदेव की पुत्रजीवक वटी का मुद्दा मीडिया की मशीन में पेल दिया गया। सुबह से शाम तक हर चैनल पर रामदेव और त्यागी जी। उस दवाई के नाम में क्या गुनाह था ये स्पष्ट होता इससे पहले मीडिया को कुमार विश्वास मिल गया। मिडिया ने त्यागी जी को त्याग कर कुमार विश्वास और लड़की का दामन थाम लिया। दोनों पक्ष ये कहते रहे कि हमारे बीच कोई सम्बन्ध नहीं हुए।लेकिन मीडिया ने दो दिन तक कुमार विश्वास का चीरहरण किया। कुमार की इज़्ज़त पूरी तरह लुटती इससे पहले सल्लू मियां पर फैसला आ गया। बेचारे सलमान को जिसने केवल एक फुटपथिये को कुचला था। उसको इतनी भारी सज़ा हो गई। अदालत की इस बर्बरता पर मीडिया ने सवाल उठाए। पूरे देश में दुःख की लहर दौड़ गई। अब देखना ये है कि अगला नंबर किसका है।
हमारा देश इतने जागरूक मीडिया से धन्य है। वो और देश होंगे जिनकी मिडिया को मुद्दों की तलाश होती है। हमारे न्यूज़ चैनल तो जिस पर बात करने लगें, वही मुद्दा हो जाता है। कभी-कभी तो लगता है कि मुद्दे खुद न्यूज़ चैनल के बाहर लाइन बनाकर खड़े हैं। हालात ये है कि किसी भी मुद्दे को दो दिन से ज़्यादा का स्लॉट नहीं मिल पा रहा। इतनी व्यस्तता के बीच भी संसद की चर्चा, भूखे को रोटी, सरकारी भ्रष्टाचार, गर्मी से झुलसते लोग, हवा में बढ़ता प्रदूषण और जीवन स्तर की बेहतरी को दरकिनार कर हमारा मीडिया ऐसे बिना बात के मुद्दों पर पूरी ऊर्जा से चीखता चिल्लाता है; इससे ज़्यादा महानता और क्या होगी।
✍️ चिराग़ जैन
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प्रशांतभूषण (अजीत)- “केजरी डर्लिंग, सारा शहर मुझे ऑनेस्ट के नाम से जानता है। अगर सारे स्टिंग हासिल करना चाहते हो, तो मेरी कुछ शर्तें माननी होंगी।”
अरविंद केजरीवाल (धर्मेन्दर)- “कुत्ते-कमीने मैं तेरा इस्तीफ़ा ले लूंगा।”
योगेन्द्र यादव (अमज़द ख़ान)- “अरे ओ केजरी! ई बैंगलोर वाले कौन चक्की काआटा खिलाते हैं रे। जब से लउटे हो ससुर गाली पर गाली दिये जात हो।”
मनीष सिसोदिया (नाना पाटेकर)- हा हा हा हा, हा हा हा हा। आ गए, आ गए हमारी बदनामी का तमाशा देखने। अब स्टिंग चला देंगे। असलियत ऐसी बाहर आयेगी, सच्चाई बाहर आएगी। थोड़ी देर स्टिंग चलता रहेगा। फिर मेरा भाई एंकर बुलेटिन बना लेगा। फिर सब चर्चा करके घर चले जाएँगे, खाना खाएंगे, सो जाएंगे। तुम्हारी ये योगेन्द्र यादवी, ये भूषणी एक दिन इस पार्टी की मौत का तमाशा इसी ख़ामोशी से देखेगी।
अन्ना हज़ारे (अमिताभ बच्चन)- आज ख़ुश तो बहुत होंगे तुम। देखो, जो आज तक किसी स्टिंग में नहीं दिखा, जिसने आज तक किसी को गाली नहीं दी, जिसने आज तक किसी सफ़ाई अभियान में हिस्सा नहीं लिया, वो आज जगह जगह सफ़ाई देता फिर रहा है।
जनता (प्राण) – साब! आज तक जनता से किसी ने इतना बड़ा धोखा नहीं किया। ये तुम नहीं तुम्हारी 67 सीटें, तुम्हारी कुर्सी बोल रही है। जिस दिन ये पॉवर ये कुर्सी नहीं होगी उस दिन तुम… (केजरी जी स्टिंग वाली भाषा में चिल्लाते हैं) …चिल्लाओ नहीं साहेब…… ख़ांसी उठ जायेगी।
नोट : पिक्चर अभी बाक़ी है मेरे दोस्त।
✍️ चिराग़ जैन
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बरवाला में आज हमला दिवस था। आश्रम पर हमला हुआ। बचाने आए भक्तों पर हमला हुआ। पकड़ने आए पुलिसवाले पिटे। देखने गए गांववाले पिटे। दिखाने गए मीडियावाले पिटे। घुटने टूटे, कैमरे टूटे और टीआरपी के रिकॉर्ड भी। अदालत नाराज़ है कि अदालत की तौहीन हुई। पुलिस नाराज़ है कि पुलिस की तौहीन हुई। मीडिया नाराज़है कि मीडिया की तौहीन हुई। भक्त नाराज़ हैं कि संत की तौहीन हुई।
पुलिस आई, पैरामिलिट्री आई, प्राइवेट मिलिट्री आई। सारा दिन बरवाला में बम, लाठी, गोली चली, चैनल्स पर लाइव टेलीकास्ट चला, शाम को सभी चैनल्स पर शब्दों का युद्ध हुआ।
किसी ने बताया कि बाबा कबीरपंथी है। ऐसा लगा कि दिन भर लोकतंत्र घायल होता रहा। दिन भर धर्म घायल होता रहा। लेकिन शाम को मीडिया की बहस में जब बाबा को कबीरपंथी बताया गया तो ऐसा लगा कि एक ही पल में कबीर लहूलुहान हो गए।आश्रम के भीतर से जितने पत्थर फेंके गए उनसे कबीर का अंग-अंग ज़ख़्मी हो गया।बरवाला की दिशा में कान लगाकर सुना तो लगा कोई कराह रहा है। उस कराह में एक टीस है, कोई बुदबुदाता जाता है-
कबिरा पिटा हिसार में, पूछ रहा है रोय
दो पार्टिन के बीच में, खींच लिया क्यों मोय
✍️ चिराग़ जैन
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लाउड स्पीकर ने धर्मगुरु से पूछा- मैं तो साईं भी नहीं हूँ फिर मुझ पर विवाद क्यों?
धर्मगुरु बोले – क्योंकि तूने हमसे ऊंची आवाज़ में बात की।
लाउड स्पीकर झुक कर बोला – लेकिन मैंने तो आपकी ही आवाज़ बुलंद की हुजूर।
धर्मगुरु मुस्कुराए – ये समझ ले अब तू बेकार हो गया था। मीडिया की आवाज़ तुझसे ज़्यादा बुलंद है और मीडिया की मुंडेर तक पहुँचने के लिए तुझ पर खडा होना ज़रूरी था।
✍️ चिराग़ जैन