+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

लालकिले का टेंडर

मई 2014 में हमने अपना स्वाभिमान पाँच वर्ष के लिए एक कॉन्ट्रेक्टर को आशाओं की लीज़ पर दिया था। कॉन्ट्रेक्टर ने कॉन्ट्रेक्ट शुरू होने से पहले ही सपनों की बड़ी किश्त प्रत्येक भारतवासी को अदा भी की। हम उन सपनों की हुंडी को मन में दबाए हुए स्वाभिमान के लालकिले का विकास होने का इंतज़ार करते रहे। कॉन्ट्रेक्ट शुरू होते ही लालकिले के परंपरागत प्रवेश-पत्र बंद करके नए पत्रक छपवाए गए। हमें बताया गया कि इन नए पत्रकों के चलन से असामाजिक तत्वों का लालक़िले में प्रवेश असम्भव हो जाएगा। बाद में जब नए पत्रकों के बंडल लेकर असामाजिक तत्व लालक़िले के अंदर ही उनकी कालाबाज़ारी करते पकड़े गए तो कॉन्ट्रेक्टर ने शिकायतकर्ता को ही सुरक्षा में सेंध लगाने के ज़ुर्म में प्रतिबंधित करवा दिया। हम अपनी ही इमारत में प्रवेश के लिए कतारें बनाए खड़े रहे।
कुछ रोज़ बाद हमारे स्वाभिमान की प्राचीर पर कॉन्ट्रेक्टर के मित्र ने अपने मोबाइल फोन का विज्ञापन चिपका दिया। एक-एक मेहराब नए फोन के इश्तिहार से ढाँप दी गई। प्रचारकों ने बताया इन्हीं इश्तिहारों के पीछे विकास का कबूतर अंडे देगा। हम संतुष्ट हो गए।
एक दिन कॉन्ट्रेक्टर किसी विदेशी के साथ रिक्शा में बैठकर चांदनी चौक आया और मुनादी कर दी कि लालक़िले से चावड़ी बाज़ार होते हुए फतेहपुरी तक बुलेट ट्रेन दौड़ेगी। किसी ने हाथ जोड़कर पूछा कि चावड़ी बाजार में संकरी गलियों के कारण हाथठेला भी ठीक से नहीं निकल पाता। शिकायत सुनकर कॉन्ट्रेक्टर का पारा चढ़ गया। वे लताड़ते हुए गुर्राए- ‘तुम्हारा कभी भला नहीं हो सकता। हम बुलेट ट्रेन चलाने की बात कर रहे हैं और तुम हाथ ठेले पर अटके हो।’ शिकायतकर्ता अपना-सा मुँह लेकर अपने ठेले पर बैठ गया और कॉन्ट्रेक्टर का रिक्शा रास्ते के हथठेलों को खदेड़ता हुआ लालक़िले में घुस गया।
आज ख़बर आई है कि कॉन्ट्रेक्ट समाप्त होने में डेढ़ साल बचा है और ठेकेदार ने स्वाभिमान की इमारत की बुनियाद को पाँच साल के लिए सबलैट कर दिया है। विकास का कबूतर सबलेटिंग के इसी कॉन्ट्रेक्ट के पीछे जा छुपा है। ज़्यादा हो-हल्ला न करना, नहीं तो विकास का कबूतर डर जाएगा और अंडे देने का प्रोग्राम टालकर पिकनिक मनाने विदेश चला जाएगा।
लेकिन भाईसाहब की निष्पक्षता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। डालमिया जैसे उपेक्षित उद्योगपति को कॉन्ट्रैक्ट देकर उन्होंने सिद्ध किया है कि खरबूजा किसी एक अम्बानी की बपौती नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

आरक्षण के आंदोलन

प्रधानमंत्री ने विश्व भर में घूम-घूमकर देश की छवि सुधारी है। और छवि वास्तव में सुधरी भी है, लेकिन देश नहीं सुधरा। हम आज भी किसी देवता की तस्वीर को चप्पल से पीटकर अपने दलित होने की कुंठा निकाल रहे हैं। हम भगवान की तस्वीर पर जूते फेंककर सरकार से आरक्षण बहाल रखने की फिरौती मांग रहे हैं। यह सब देखकर बाबा भीमराव अंबेडकर फूले नहीं समा रहे होंगे। रेलगाड़ियाँ रोक दी गई हैं। बाज़ार बन्द पड़े हैं। सड़कों पर हथियारबंद गुंडे गुंडई कर रहे हैं। इन सबको गुंडागर्दी का आरक्षण चाहिए। ये सब बाबा अम्बेडकर के संविधान की धज्जियाँ उड़ाने की स्वतंत्रता चाहते हैं। ये चाहते हैं कि जब पुलिस इन्हें हायतौबा करने से रोके तो संविधान पुलिस के हाथ बांध दे, लेकिन संविधान इन्हें हिंसा करने से रोके तो ये संविधान का बोरिया बांध दें।
सरकार इन्हें नहीं रोकेगी। वह माननीय न्यायालय से कहेगी कि अगले चुनाव में हमें इन लड़कों से विजय की पालकी उठवानी है इसलिए हम इन्हें बहन-बेटियों की इज़्ज़त लूटने से नहीं रोकेंगे सो तुम्हारे पास दो ही उपाय हैं या तो अपनी बहू-बेटियों को घर में घोंट दो या फिर इन लड़कों को आरक्षण की रिश्वत देकर विदा कर दो। न्यायालय सरकार को फटकारता है। सरकार आँसू बहाते हुए आरक्षण मांगनेवाली भीड़ को बताती है कि हमने तुम्हारी बात रखी तो हमें न्यायालय ने डाँट दिया। सुनकर हथियारबंद गुंडों का मन पिघल जाता है। वे न्यायालय की ज़्यादतियों से टूट जाते हैं और जिलाधीश का दफ्तर फूँक देते हैं। वे बेबस होकर बसें जलाने पर मजबूर हो जाते हैं। न्यायालय से न्याय न मिलने की पीड़ा से त्रस्त होकर वे बेचारे, आम लोगों से मारपीट करते हैं।
वे ब्राह्मणों के आराध्य को चप्पल से पीटते हैं। वे हिन्दू-देवी देवताओं को अपमानित करते हैं। इससे क्रुद्ध होकर हिंदुओं का खून खौल जाता है। उनके भीतर परशुराम उतर आते हैं। वे भीमराव अंबेडकर और कांशीराम की मूर्तियों पर कीचड़ उछालते हैं।
उधर पटेल, जाट, गुर्जर समुदाय इन सब घटनाक्रमों का महीन अध्ययन करते हुए अपने लिए आरक्षण की रणनीति बनाते हैं। माननीय न्यायालय सरकार की ओर देखता है और सरकारें वोटबैंक की ओर। आंदोलन के बैनरतले होनेवाले फसादात का धुआँ आकाश में छाने लगता है और विश्व में भारत की छवि सुधरने का परचम धूसर हो जाता है।
हाँ, इस सबके बीच स्कूल गए बच्चों की, दफ़्तर के लिए निकले बेटे की, टूर पर गए पति की और गश्त पर गए पिता की चिंता में कुछ आँखें राह देखती रह जाती हैं। इस सबके बीच कोई नन्हा फरिश्ता दुनिया में आने से पहले ही आँखे मूंद जाता है। इस सबके बीच किसी चायवाले के घर चूल्हा नहीं जल पाता। इस सबके बीच किसी गोलगप्पेवाले का ठेला उदास खड़ा रह जाता है। इस सबके बीच कोई दर्द दवा तक नहीं पहुँच पाता है। इस सबके बीच कुछ मेहनतकशों की मजूरी नहीं हो पाती। इस सबके बीच कुछ अहम ज़रूरतें पूरी नहीं हो पातीं।

✍️ चिराग़ जैन

पुलिस विभाग

ट्रेन में चलनेवाले मुसाफिरों से पैसे वसूलते पुलिसवालों का वीडियो देखा। मन क्षोभ और घृणा से भर गया। खाकी वर्दी की धौंस और सरकारी तंत्र के निकम्मेपन पर थूक रहा था पूरा वीडियो। सत्तर साल हो गए इस देश को आज़ाद हुए। सवा सौ करोड़ भारतीयों को मूलभूत सुविधाएँ देने में पूरी तरह नाकाम यह सिस्टम शर्म आ जाने की सीमा से कहीं आगे बढ़ चुका है।
पुलिस विभाग की अभद्रता, ढिठाई और निष्ठुरता ने जनहित के ढोंग की हर लम्हा खिल्ली उड़ाई है। अपराध और शोषण से त्रस्त नागरिक भी इन थानों में घुसने से कतराता क्यों है -इस प्रश्न का उत्तर न तो सरकार के पास है, न ही पुलिस की छवि सुधारने के लिए किए जा रहे आयोजनों के आयोजकों के पास।
भारत के विकास कार्यों हेतु रात-दिन मेहनत करके टैक्स चुकानेवाला नागरिक भी यदि किसी स्थिति में पुलिस की सहायता लेना चाहे तो उसे दुर्व्यवहार झेलने के लिए तैयार रहना पड़ता है। थाने में सहायता मिले या न मिले, एकाध गाली हर किसी को मिल ही जाती है। जनता के टैक्स के पैसों पर पलनेवाला ये विभाग, जनता की जेब से रिश्वत लूटनेवाला ये विभाग, जब किसी सभ्य नागरिक को गरियाता है, तब ऐसा लगता है जैसे कोई खाना खाने के बाद पत्तल में छेद कर रहा हो।
रिश्वत लेकर कार्रवाई करना और गाली-गलौज करना इस विभाग के कुछ नुमाइंदों को इतना भा गया है कि जो कुछ लोग ईमानदार होकर किसी पीड़ित की वास्तविक मदद करना भी चाहते हैं, उन्हें या तो निष्क्रिय हो जाना पड़ता है या फिर इनके रंग में रंग जाना पड़ता है। शहरों की पढ़ी-लिखी जनता भी इस महकमे की कारगुज़ारियों से बच नहीं पाती, फिर गाँव-कस्बों के सीधे-सादे लोगों का तो कहना ही क्या!
इस देश की पुलिस को रामायण के बाली की तरह यह वरदान प्राप्त है कि जो भी नागरिक बिना किसी एप्रोच के किसी पुलिसवाले के सामने खड़ा हो जाएगा, उसका इज़्ज़तदार होने का भरम समाप्त हो जाएगा और चंद मिनिटों में वह स्वयं को अपराधी मानने लगेगा।
देश के हुक्मरानो! खरबों रुपये के घोटाले आपको मुबारक़, देश की अंतरराष्ट्रीय छवि भी आपको मुबारक़, देश के चुनावों की राजनीति भी आपको मुबारक़, राहुल-मोदी की महाभारत भी आप जानो; इस देश के आम नागरिक को अपनी समस्या बताकर बिना प्रताड़ित हुए थाने से घर लौट सकने की स्थितियाँ इस देश को सौंप दीजिये ताकि आप जब देश की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधरने का ढोल पीटें तो कोई वायरल वीडियो आपके रंग में भंग न डाल सके।

✍️ चिराग़ जैन

गणतंत्र दिवस

आज राजपथ पर महाराष्ट्र की झाँकी निकली तो महाकवि भूषण के घनाक्षरी से पूरा वातावरण काव्यमय हो गया। अभी भूषण की धमक गूंज ही रही थी कि छत्तीसगढ़ की झाँकी महाकवि कालिदास की विशाल मूर्ति और मेघदूत के श्लोकोच्चार के साथ पुनः कविता का जयघोष करती निकल गई।

कल गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर भोपाल में था। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग ने राष्ट्रकवि प्रदीप सम्मान अर्पण समारोह का आयोजन किया था। जिस समय “अंग्रेजो भारत छोड़ो” के उद्घोष को राजद्रोह घोषित करके स्वाधीनता के नायकों को जेल में ठूसा जा रहा था उस समय एक ब्राह्मण के बेटे ने उसी नारे को थोड़ा सलीके से रचकर जनता के आक्रोश को जीवंत रखने का विद्वतकर्म किया। जब तक अंग्रेज सरकार को यह ज्ञात हुआ कि “दूर हटो ऐ दुनियावालो हिंदुस्तान हमारा है” एक फिल्मी गीत मात्र न होकर स्वाधीनता संग्राम का उद्घोष है; तब तक आज़ादी की ललक फिल्मी पर्दे पर चढ़कर पूरे देश में फैल चुकी थी।

प्रदीप जी ने ऐसे ऐसे विलक्षण गीत रचे कि अनायास ही भारतीय शौर्य के अद्वितीय गायक बन गए। स्वाधीनता के बाद जब 62 की लड़ाई में भारतीय बेटों की अर्थियां पूरे देश को उद्वेलित कर रही थीं तब मेजर शैतान सिंह भाटी की शहादत से बेचैन होकर प्रदीप जी ने वह अमर तराना रच दिया जिसके बिना भारतीय राष्ट्रप्रेम की कथा लिखी ही नहीं जा सकती। 26 जनवरी 1963 को पहली बार लता जी ने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में “ऐ मेरे वतन के लोगो” को स्वर दिया तो ऐसा लगा जैसे किसी झुंझलाए हुए बच्चे से किसी ने उसका हाल पूछ लिया हो। एक गीत ने पूरे देश की आँखें नम कर दी। भारतीय सेना के शौर्य की गाथा इस करीने से बयान हुई कि युद्ध की पीर लोगों में सिहरन पैदा कर गई।

कल के समारोह में ये सारे किस्से एक-एक कर जीवंत हो गए। मंच पर प्रदीप जी की सुपुत्री मुटुल जी और कैफ भोपाली साहब की सहबज़ादी परवीन कैफ उपस्थित थीं। गत चार दशक से भारत में वीर रस के पर्याय के रूप में प्रतिष्ठापित डॉ हरिओम पँवार को राष्ट्रकवि प्रदीप सम्मान अर्पित किया गया।

सुबह गणतंत्र दिवस की परेड देखने के लिए टेलीविज़न ऑन किया तो लता जी वही अमर गीत गाती दिखीं। दूर कहीं किसी समारोह से ‘कर चले हम फिदा’ की स्वरलहरी सुनाई दी। अभी होशंगाबाद जाने के लिए टैक्सी मंगाई तो रेडियो पर “ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम” सुन रहा हूँ।

भारत की जनता में गहरे तक बसे इस देशभक्ति के जज़्बे को सलाम। ज़माने भर की व्यस्तताओं के बीच भी कैसे अचानक से हमारी देशभक्ति अपने विराट रूप में प्रकट होकर पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध जाती है; यह सुखकारी है।

इस देशभक्ति के जीर्णोद्धार में “वंदेमातरम” से लेकर “जन-गण-मन” तक और “सारे जहाँ से अच्छा” से लेकर “ऐ मेरे प्यारे वतन” तक के असंख्य गीतों का योगदान हमारे कवि हृदय में नई ऊर्जा का संचरण कर देता है।

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली के मुख्यमंत्री के नाम एक खुला पत्र

श्री मान अरविंद केजरीवाल जी
मुख्यमंत्री
दिल्ली सरकार

सरजी!
हमें इस बात का भान है कि आप जब से सरकार में आए हैं, तब से पूरी क़ायनात आपके खि़लाफ़ हो गई है। पूरे देश की राजनीति, नौकरशाही और व्यवस्था सिर्फ इसी प्रयास में है कि आपको कुर्सी से कैसे हटाया जाए।
स्वयं प्रधानमंत्री आपके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। उधर राज्यपाल ने आपके सुख-चैन की सुपारी दे रखी है। यहाँ तक कि ईश्वर भी आप ही से चिढ़कर स्मॉग भेजने लगा है। और तो और आपकी ईमानदारी और लोकप्रियता से जलकर किरण बेदी, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, योगेंद्र यादव, शाज़िया इल्मी, कुमार विश्वास, कपिल मिश्रा और ख़ुद अन्ना हज़ारे तक अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के पूरा न होने पर आपको अकेला छोड़ गए हैं।
दिल्ली पुलिस, डीडीए जैसे महत्वपूर्ण विभाग साज़िशन आपके नियंत्रण से बाहर रखे गए हैं। महत्वपूर्ण सरकारी आयोजनों में आपको निमंत्रित न करके अपमानित किया जाता है। आपकी सरकार के आयोजनों को सुरक्षा का अड़ंगा लगाकर अनुमति नहीं दी जाती। मीडिया के सारे बेईमान मिलकर आपके खि़लाफ़ हो गए हैं। और रही-सही कसर आपका स्वास्थ्य पूरी कर देता है। कभी मानसिक तो कभी शारीरिक स्वास्थ्य की सुरक्षा में भी आपका खासा समय व्यतीत हो जाता है।
इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए हिम्मत तो नहीं हो रही किन्तु एक मतदाता होने के नाते मैं आपको सूचित करना अपना अधिकार समझता हूँ कि जिस केंद्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री होने का आप लुत्फ़ उठा रहे हैं, वह दिल्ली इन दिनों बहुत समस्याओं से घिरी हुई है।
आपकी गाड़ियों का क़ाफ़िला जिन चौराहों से दनादन दौड़ता हुआ निकलता है, उन चौराहों पर किन्नरों की उपस्थिति आपकी सरकार की नपुंसकता का मज़ाक उड़ाते हुए आपके मतदाताओं को सरेआम लूटती है। पुलिसवाले यह नंगा नाच देखते हैं और ख़ामोशी से स्टॉप लाइन क्रॉस करनेवालों से पैसे वसूलते रहते हैं।
डीटीसी के ड्राइवर ढिठाई से यातायात नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी लम्बी-चौड़ी बस से आम आदमी को खदेड़कर यह संदेश देते हैं कि सरकार ने आम आदमी को कीड़ा-मकौड़ा समझ लिया है, जिसकी जान की किसी को कोई परवाह नहीं है।
पार्किंग वाले 20 रुपये घंटे को पचास रुपये करने पर आमादा हैं और अनधिकृत पार्किंग में धड़ल्ले से गाड़ियों की वसूली की जा रही है। कानूनी निष्क्रियता का इतना अंधेरा छा गया है कि सिग्नल पर लालबत्ती का रंग लोगों को दिखना बंद हो गया है।
रेहड़ी-पटरीवाले आपके संरक्षण में घटोत्कच्छ की भाँति पूरी सड़क घेरने लगे हैं और रोड टैक्स चुकानेवाले वाहन चालक रोड ढूंढ रहे हैं। टूटी हुई सड़कें और टूटती जा रही हैं।
आपको झुग्गी-झोंपड़ियों में अपने राजनैतिक भविष्य का सूर्य दिखाई देता है और मध्यमवर्गीय दिल्ली अपनी ख़ामोशी का परिणाम झेलती जा रही है। सरकारी विज्ञापन आपकी सरकार को रामराज्य घोषित करना चाहते हैं किंतु उन विज्ञापनों को पढ़नेवाला दिल्लीवासी उनमें सिस्टम की बेशर्मी और ढिठाई पढ़ता है।
अगले वर्ष चुनाव है सरजी! दिल्ली की क़ानून व्यवस्था और यातायात व्यवस्था चरमरा चुकी है। यदि इन खंडहरों पर ढंग से लीपापोती नहीं की गई तो पोलिंग बूथ जाने के लिए घर से निकला आपका वोटर ट्रैफिक जाम में फँसकर रह जाएगा।

-आपका दिल्लीवासी
✍️ चिराग़ जैन

प्रश्न पूछना पाप है

साहब ने शतरंज की चाल चली। चार-पाँच चाल चलने के बाद, साहब हारने लगे। आँख बचाकर शतरंज की टेबल से उठकर, वे लूडो खेलने लगे। देश शतरंज को भूल गया और लूडो देखने लगा। थोड़ी देर बाद लूडो में भी साहब की सारी गोटियाँ पिट गईं। देश साहब की बुद्धिमत्ता पर लगाने के लिए प्रश्नचिन्ह लेने दौड़ा और जब तक वापस लौटकर आया तो साहब कैरम खेलते पाए गए। किसी जिज्ञासु ने पूछा कि लूडो और शतरंज का क्या हुआ तो साहब उसे बताने लगे कि शतरंज में मेरी गोटी लाल होने लगी तो लूडो के वज़ीर को कैरम की रानी ने शह दे दी। अभी-अभी बेसबॉल के रैकेट से दो सफेद गोटियाँ बाहर पहुँचाई हैं।
‘लेकिन आप तो कह रहे थे कि सफेद गोटियाँ विपक्षियों ने बाहर भेजी हैं!’ -जिज्ञासु आश्चर्यचकित होकर बोला।
प्रश्न सुनकर साहब के चेहरे पर महानता के चिन्ह उभर आए, लेकिन वे विनम्र होते हुए बोले- ‘यही तो हमारा बड़ा दिल है रे। हम काम करके क्रेडिट नहीं बटोरते।’
‘लेकिन आधार, मनरेगा, मंगल यान, एफडीआई के क्रेडिट लेने के लिए तो आपने सारी सीमाएँ लांघ दी थीं।’ -जिज्ञासु, साहब की विनम्रता को सत्य समझकर पूछने की हिम्मत कर बैठा।
सहब ने विनम्रता का कुर्ता उतार फेंका और राष्ट्रभक्ति की कमीज़ चढ़ाते हुए चिल्लाए- ‘अब ऊँची कूद में भी सीमा नहीं पार करूंगा तो विरोधी खिलाड़ी मुझे हरा देंगे। और मैं नहीं चाहता कि मैं हार जाऊँ और भारत की जनता को नज़रें झुकानी पड़ें।’
जिज्ञासु ने नहले पर दहला फेंकते हुए पूछा- ‘पर अपने कट्टर विरोधियों को अपनी पार्टी जॉइन करवाने के कार्य से आपने समर्थकों को नज़रें झुकाने पर विवश किया है।’
अब साहब का धैर्य डोल गया। वे अपनी फुलप्रूफ प्लानिंग का वर्णन करते हुए बोले- ‘मिस्टर जिज्ञासु! समर्थक हमारी पेड ऑडियन्स हैं। उनको स्पॉन्सर्स की उंगलियों पर तालियाँ बजानी होंगी। अभी किसी नेता के पाला बदलने पर थोड़ी ज़िल्लत उठानी होगी लेकिन कुछ दिन बाद इनके ज़ख़्मों पर नारंगी ब्रांड का मरहम लगाकर इन्हें मैनेज कर लेंगे। फिर भी स्थिति न संभली, तो आस्था की एस्टरॉयड डोज़ से फ़ास्ट रिलीफ़ की व्यवस्था कराई जाएगी।’
जिज्ञासु दुःखी होकर बोला कि यह तो चीटिंग है। पेड ऑडियन्स और डोपिंग दोनों ही खेल के नियम के खि़लाफ़ है।
अब साहब ने जिज्ञासु को कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि अपने राइट हैंड को एसएमएस किया- ‘नेक्स्ट टारगेट जिज्ञासु भाई।’
दस मिनिट में राइट हैंड का रिप्लाई आया- ‘टारगेट अचीव्ड।’

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!