Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
उत्तर प्रदेश का विवेक तिवारी मामला सुखिऱ्यों में आया और सियासत गरमा गई। चुनावी माहौल में इस तरह की घटना को भुनाने में कोई भी पीछे नहीं है। क़ानून व्यवस्था के लिए हमेशा कठघरे में रही समाजवादी पार्टी ने योगी से इस्तीफ़ा मांग लिया। कांग्रेस ने भी सरकार की विफलताओं का ढोल गले मे लटका लिया। दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने भी कटाक्ष करते हुए हिन्दू-मुस्लिम कार्ड खेल दिया। योगी सरकार ने भी चौतरफा हमलों से बचने के प्रयास में आरोपी पुलिसकर्मियों की बर्ख़ास्तगी, गिरफ़्तारी और जाँच के आदेश दे दिए। पीड़ित परिवार को पच्चीस लाख रुपये के मुआवज़े का ऐलान कर दिया। मृतक के परिवारवालों ने मुख्यमंत्री के न आने की स्थिति में अंतिम संस्कार न करने की घोषणा कर दी। बाद में इसी परिवार ने एक करोड़ रुपये और सरकारी नौकरी की मांग की। और अब यही परिवार पच्चीस लाख और सरकारी नौकरी के आश्वासन पर अंतिम संस्कार के लिए तैयार हो गया।
घटना की चश्मदीद गवाह यह स्वीकार कर रही है कि रात को सुरक्षा जाँच के लिए रुकने को विवेक तिवारी तैयार नहीं थे। उन्होंने न केवल पुलिस के आदेश की अनदेखी की बल्कि भागने की कोशिश भी की। पुलिसकर्मियों का दावा है कि उन्होंने आत्मसुरक्षा में गोली चलाई। यदि कोई व्यक्ति बेरिकेड्स तोड़कर भागने की कोशिश करे तो वहाँ खड़े पुलिसवाले को यह कैसे पता चलेगा कि उसमें बैठा व्यक्ति अपराधी नहीं बल्कि ऐपल कम्पनी का एरिया मैनेजर है। जब सुरक्षा जाँच के लिए गाड़ी रोकनी होती है तो सामान्यतया पुलिसवाले गाड़ी के आगे खड़े होकर उसे हाथ के इशारे से रोकते हैं। गाड़ी के भीतर बैठी चश्मदीद यह स्वीकार कर रही है कि पुलिस के निर्देश पर विवेक ने गाड़ी नहीं रोकी और भागने की कोशिश की।
यदि कोई पुलिसवाला सड़क पर खड़े होकर एक गाड़ी को रोकने का प्रयास करे और वाहन चालक भागने का प्रयास करे तो इस बात की बहुत संभावना है कि वाहन चालक ने पुलिसकर्मी के ऊपर गाड़ी चढ़ाने से परहेज नहीं किया। इस परिस्थिति में पुलिसकर्मी उसकी प्रवृत्ति का आकलन करते हुए त्वरित कार्रवाई में गोली चला दे तो वह अपराधी कैसे हुआ? यदि इसी गाड़ी में विवेक तिवारी की जगह कोई अपराधी ही होता और इस घटना में पुलिसवाला गोली नहीं चलाता और वह थोड़ी दूर जाकर कोई दुर्घटना या अपराध कर देता तो यही मीडिया प्रश्न उठाता कि सुरक्षा जाँच पर खड़े पुलिसवाले क्या कर रहे थे?
क्या कोई चैनल या विरोधी दल इस बात पर ध्यान देना चाहेगा कि पुलिस के रोकने पर गाड़ी भगाने की क्या आवश्यकता थी। ऐसा क्या कारण था कि देर रात तक कम्पनी में काम करके अपनी सहकर्मी के साथ घर लौट रहे विवेक तिवारी के पास एक मिनिट सुरक्षा जाँच पर रुकने का समय नहीं था। सोशल मीडिया की ख़बरों और मीडिया की हेडलाइन्स से यह साफ़ है कि भावुकता में पूरा देश पुलिसवाले को अपराधी मान बैठा है। एसआईटी के गठन से पूर्व ही हम भावुक लोग फैसला दे चुके हैं कि जो बेचारा मर गया है वह ग़लत हो ही नहीं सकता। ऐसी जल्दबाज़ी ठीक नहीं है।
पुलिस और जनता के मध्य जो घृणा का सम्बंध क़ायम हो गया है उसका लाभ अपराधी उठाने लगेंगे तो स्थिति भयावह हो जाएगी। इस भयावह स्थिति के दर्शन हम घाटी में कर चुके है। जनता के मन में सेना के विरुद्ध विष घोलकर आतंकी चांदी कूट रहे हैं। यह स्थिति देश में न आए इसके लिए पुलिस को अपने व्यवहार, मीडिया को अपनी जल्दबाज़ी, जनता को अपनी विवेकशून्यता और राजनैतिक दलों को अपने आचरण पर नियंत्रण करना होगा। समाज व्यवस्था भंग हो गई तो कुछ भी शेष न रह सकेगा। चार वोट कम पड़े तो राजनीति को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, चार सेकेंड बाद ख़बर चल जाएगी तो चैनल की टीआरपी पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। गाँव में एक कहावत कही जाती है कि सात घर तो डायन भी छोड़ देती है।
✍️ चिराग़ जैन
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रोज़गार की प्रवृत्ति से व्यक्ति की प्रवृत्ति का आकलन करना हमारी पुरानी आदत है। पूरी वर्ण-व्यवस्था इसी आदत की देन थी। इसी आदत के चलते हम कथावाचकों को संत मानने लगे। हम यह सोच ही न पाए कि किसी कहानी को रोचक ढंग से कहने के लिए क़िस्सागोई का अभ्यास किया जाता है, भक्ति का नहीं। इसी भ्रांति ने धर्म का सत्यानाश किया है। धर्मस्थलों की देखरेख के लिए नियुक्त केयरटेकर को हमने धर्म का ठेकेदार समझ लिया। धीरे-धीरे हम सन्त-फ़क़ीरों और धर्म में रोज़गार तलाशने वालों के मध्य भेद करने की क्षमता खो बैठे।
ठीक ऐसा ही हम अनूप जलोटा प्रकरण में कर रहे हैं। अनूप जलोटा एक श्रेष्ठ गायक हैं। उन्होंने ग़ज़ल गायकी में हाथ आजमाए लेकिन उनकी आवाज़ भजन के लिए अधिक उपयुक्त थी, इसलिए उन्होंने भजन गाना शुरू कर दिया। लेकिन हम उन्हें आध्यात्मिक पुरुष मान बैठे। जैसे हम जागरण में भजन गानेवाले आर्केस्ट्रा आर्टिस्ट को माता का भक्त मान बैठते हैं और भेंट चढ़ाकर उनसे आशीर्वाद की अपेक्षा करते हैं।
इस अंतर को समझना होगा। बिग बॉस में इस बार जोड़ी की एंट्री होनी थी। अनूप जी से भी जोड़ी से ही एंट्री मंगवाई गई होगी। एक भजन गायक की कम उम्र की प्रेमिका वह भी तीन असफल विवाह सम्बन्धों के बाद… इस परिस्थिति में बिगबॉस के निर्माताओं को रोचक तत्व दिखाई दिया। यही रोचकता तलाशकर टीआरपी का धंधा करना रिएलिटी शो बनानेवालों का रोज़गार है।
कोई व्यक्ति अपना रोज़गार कैसे करता है, कितनी ईमानदारी से करता है; इन्हीं प्रश्नों की चर्चा महत्वपूर्ण है। कोई अपने व्यक्तिगत जीवन में क्या करता है इससे उसके रोज़गार पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विश्व भर को चमत्कृत करनेवाले आइंस्टाइन को उनके परिवार ने एक बेहद ग़ैर-ज़िम्मेदार व्यक्ति घोषित किया था। किसी के व्यक्तिगत जीवन से उसकी प्रतिभा, उसके सामाजिक जीवन, उसके रोज़गार का आकलन करेंगे तो हम युगों के बहुत क़ीमती रत्न खो देंगे क्योंकि हर हीरा अपने निजी जीवन में केवल एक पत्थर होता है।
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय राजनैतिक परिप्रेक्ष्य एक अस्थिर युग की ओर बढ़ रहा है। मोदी सरकार के विरुद्ध एकजुट हो रहे क्षेत्रीय दलों का उद्देश्य यदि देश का विकास करना रहा होता तो सम्भवतः आशा की किरण फूट सकती थी, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है। शासन के लोभ में विचारधारा तक को दरकिनार कर देने वाले सत्ता-लोलुप देश और समाज का कितना भला कर सकते हैं, यह स्पष्ट है। भारत का संविधान कहता है कि धर्म के आधार पर बने किसी संगठन को राजनैतिक दल की मान्यता नहीं दी जा सकती किन्तु अंधा भी देख सकता है कि भारतीय राजनीति की धुरि धर्म, सम्प्रदाय, जाति जैसे शब्दों से ही संचालित है। यदि देश के विकास और आम नागरिक के हितों की चिंता किसी की दृष्टि में चमक उठे तो फिर जनता का समर्थन जुटाना मुश्किल न होगा। यह सत्य है कि राजनैतिक मक्कारियों और ढिठाई से इस देश का मतदाता लोकतंत्र से ऊब गया है इसीलिए राजनैतिक दलों को अपने नैतिक चरित्र में सुधार करना होगा। फुटेज कैप्चर की ड्रामेबाज़ी और जनता के हितों का नाम लेकर बहाए जा रहे मगरमच्छी आँसू बेअसर होते जा रहे हैं। सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि राजनैतिक भ्रष्टाचार और झूठ-धोखाधड़ी की ख़बरें अब जनमानस को आश्चर्यग्रस्त नहीं करतीं। यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए भयावह है। इसी स्थिति का दुष्परिणाम है कि जंतर-मंतर पर जब अन्ना ने जनता का आह्वान किया तो पूरा देश उमड़ पड़ा। अन्ना आंदोलन भारतीय राजनैतिक रवैये को जनता का प्रत्युत्तर था। यह और बात है कि जनता में अरमानों पर पैर रखकर वह आंदोलन भी राजनीति की अट्टालिकाओं पर क़ाबिज़ हो जाने का जरिया बन कर नष्ट हो गया। हम भाजपा से दवाई मांगते हैं तो वो कहती है कि सत्तर साल से कांग्रेस ने दवाई नहीं दी। अब हम क्या चार साल में ही दवा दे दें। जाओ कुछ दिन और कोढ़ से मवाद बहने दो। कांग्रेस से दवाई मांगते हैं तो वह कहती है कि आरएसएस देश को बाँट रहा है। इसलिए पहले मोदी को हटाएंगे तब आना। फुटपाथों पर सोने वाले अभी भी छहों ऋतुएं फुटपाथ पर बिता रहे हैं। सरकार गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील में जितना रुपया फ्लैक्स प्रिंटिंग में लुटा रही है उतने से यदि फुटपाथों को छप्पर दे दिया जाता तो जनता के मन में पसरा अंधकार कुछ कम होता। सरकारी योजनाएँ मख़ौल बन कर रह गई हैं। जनता अपने भाग्य का अंधकार स्वीकार कर चुकी है। सिद्धू के पाकिस्तान दौरे पर एक सप्ताह हंगामा होता है और जनता की मूलभूत समस्याएं केरल की बाढ़ में जलसमाधि ले लेती हैं। सरकार हर साल बरसात में बाढ़ग्रस्त क्षेत्र में हेलीकॉप्टर का दौरा करके वोट के बीज बिखेर आती है। नदियों का पानी ज़हर हो गया है, हम साँस लेने के लिए हवा खींचते हैं और फेफड़ों तक दमे का संचार हो जाता है। प्रश्न मोदी, राहुल, माया, अखिलेश, लालू, नीतीश, उद्धव, ओवैसी, महबूबा, केजरीवाल, ममता या अन्य किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत इच्छाशक्ति का नहीं बल्कि भारतीय राजनैतिक परिदृश्य से उठ रही सड़ांध का है। बलात्कार, लूटमार, अपहरण, ठगी, कालाबाज़ारी और भ्रष्टाचार की ख़बरें संसद की निष्ठा पर प्रश्न उठाती हैं। अराजक भीड़ कानून हाथ में लेकर लोकतंत्र की न्यायव्यवस्था को ठेंगा दिखा देती है। राजनैतिक संरक्षण के दम पर कोई भी ऐरा-ग़ैरा तंत्र को लताड़ सकता है। …क्या है ये सब? देश की जनता सोशल मीडिया की अफ़वाहों को भी गंभीरता से ले लेती है साहिबों! भावुक भारतीयों को बरगलाना बहुत आसान है। यदि यह भावुकता आपके चरित्र के विरुद्ध एकजुट हो गई तो जो स्थिति उत्पन्न होगी वह संभाली न जा सकेगी। इसलिए आपसे विनम्र निवेदन है कि जनता के हितों को अपनी वास्तविक वरीयता सूची में स्थान दीजिये, चुनाव की जीत तो झख मार के ख़ुद आपके पीछे आएगी!
✍️ चिराग़ जैन
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कितना शानदार लोकतंत्र है हमारा। पाँच दिन से पूरा देश तमाशबीन बनकर जनमत के मखौल का खेल देख रहा है। कांग्रेस जानती है कि पैसे फेंके जाएंगे तो उसके विधायक बिक जाएंगे, इसलिए उसने जनता के जीते हुए प्रतिनिधियों को बाक़ायदा नज़रबंद कर लिया है। भारतीय जनता पार्टी जानती है कि बहुमत साबित करने के लिए विधायक तोड़ने होंगे। वह यह भी जानती है कि बहुमत साबित हुआ, तो उसकी धूर्तता सबके सम्मुख स्पष्ट हो जाएगी। राज्यपाल जानते हैं कि सरकार बनाने के लिए हर हद्द तक का भ्रष्टाचार होगा। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जानते हैं कि कांग्रेस, भाजपा और जेडीएस में से कोई भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि अपनी सरकार बनाने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहे हैं।
कार्यपालिका जानती है कि निजी हितों के लिए अनधिकृत रूप से पैसे का नक़द लेन-देन अपराध है। कार्यपालिका यह भी जानती है कि नोटबन्दी के बाद से इतनी बड़ी नक़दी अपने पास रखना अपराध है। मीडिया जानती है कि शतरंज की बिसात पर पैसे फेंककर काले घोड़ों को सफेद करने की जुगत चल रही है। सोशल मीडिया धड़ल्ले से इस ख़रीद-फ़रोख़्त पर चुटीले, तीखे, कड़वे और चटखारे भरे संदेश वायरल कर रहा है।
भाजपा के प्रवक्ता से पूछो कि यह क्या हो रहा है तो वह चुपके से अपनी पार्टी के इस अपराध में लिप्त होने की बात स्वीकार करते हुए दलील देते हैं कि हरियाणा में इंदिरा गांधी ने अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए यही किया था, तब हम इसे अपराध मानते थे लेकिन अब हमारी बज्जी है, इसलिए अब हम इसे अपराध नहीं मानते।
कांग्रेस के प्रवक्ता से पूछो कि गोवा में आप सबसे बड़ी पार्टी की दुहाई देकर सरकार बनाने का दावा कर रहे थे तो फिर अब आप आधी रात को सुप्रीम कोर्ट क्यों चले गए। कांग्रेसी प्रवक्ता इस प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट कहता है कि गोवा में हमने वह बात कही, जिससे हमें लाभ हो रहा था और कर्नाटक में भी हम वही बात कह रहे हैं जिससे हमें लाभ मिले अब ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हों तो इसमें हमारी क्या ग़लती है?
सोशल मीडिया पर जो कांग्रेस को आइना दिखाए उसे ‘अंधभक्त’ कहकर ज़लील किया जाएगा। जो भाजपा का सच बोलने की कोशिश करे उसे ‘राष्ट्रद्रोही’ कहकर अपमानित किया जाएगा।
जनता पूछती है कि सबसे ज़्यादा वोट कांग्रेस को पड़े तो सबसे ज़्यादा सीटें भाजपा की कैसे आ गईं। उत्तर मिलता है कि सीटों का बँटवारा इस तरह से किया गया है कि चाहे एक वोट का अंतर हो, लेकिन सीट जीतने का जुगाड़ हो जाएगा।
जनता पुनः पूछती है कि फिर सबसे ज़्यादा सीट वाली पार्टी के सामने कम सीटों वाले दो मिलकर कैसे सरकार बना सकते हैं। उत्तर मिलता है कि दोनों पार्टियों ने तय कर लिया है कि मिल-बाँटकर मलाई खा ली जाएगी इसलिए रैलियों की गाली-गलौज को भूलकर गले लग जाओ।
जनता पुनः पूछती है कि हमने तो रैलियों की बातें सुनकर ही आपको वोट दिया था। उत्तर मिलता है कि हमने भी वोट लेने के लिए ही रैलियाँ की थीं। हमारा उद्देश्य जनकल्याण नहीं था, चुनाव जीतना था। पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है साहब। रात-दिन एक करने पड़ते हैं। इलेक्शन मैनेजमेंट कोई हँसी-खेल नहीं है। इतनी मेहनत से मिले वोटों को विपक्ष में बैठकर बर्बाद तो नहीं कर सकते ना। जहाँ इतना पैसा लगा, वहाँ थोड़ा और सही। एक बार कुर्सी मिल गई तो छह महीने में सारा ख़र्चा निकल आएगा।
जनता भौंचक्की होकर पूछती है कि चुनाव आयोग तो बताता है कि चुनाव लड़ने के लिए सीमित धन व्यय करना होता है। उत्तर मिलता है, छोड़ो यार, किस युग में जी रहे हो। उतने पैसे में कोई पार्षद का चुनाव भी न जीत पाएगा। ये सब औपचारिकता के लिए लिखा जाता है। सबको पता है कि इलेक्शन कितने करोड़ों का खेल है।
जनता की आँखे फट जाती हैं। वह प्रश्नवाचक दृष्टि से चुनाव आयोग की ओर देखती है। चुनाव आयोग जनता से मुँह फेरकर खड़ा हो जाता है। जनता आशा से भरकर कार्यपालिका की ओर देखती है तो पुलिसवाला उसे डाँटकर बोलता है- ‘अबे तैने वोट दे दिया ना, अब अपना हिल्ला कर, ये बड़े लोगों के काम हैं इन पचड़ों में क्यों पड़ता है?’ जनता हिम्मत करके न्यायपालिका की ओर देखती है तो न्यायपालिका अपने काले कोट में से पट्टी फाड़कर कस के अपनी आँखों पर बांध लेती है।
जनता हारकर मीडिया के पास पहुँची, तब तक ख़बर आ गई थी कि कांग्रेस के कुछ विधायक रिसोर्ट से ग़ायब हो गए। पूरे चैनल में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कोई कांग्रेस के प्रवक्ता को लाइन अप कर रहा है। कोई बीजेपी के प्रवक्ता का फोनो कर रहा है। कोई ग्राफिक बना रहा है। जनता ठिठककर धम्म से ज़मीन पर बैठ जाती है। स्टूडियो में आवाज़ गूंजती है – ‘कट, कट, कट, अरे यार ये फ्लोर पर कौन बैठा है इसे बाहर करो। …स्पॉट दादा देखो ज़रा!’
…बिजली की गति से दो स्पॉट बॉय आते हैं और जनता को उठाकर स्टूडियो से बाहर फेंक देते हैं।
जनता अपने हाथ में टिफिन पकड़े अपने दफ़्तर की ओर चल देती है। हाज़िरी रजिस्टर पर आधे दिन की तनख़्वाह कटवाती है और शाम को छुट्टी होने का इंतज़ार करने लगती है।
✍️ चिराग़ जैन
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जीवन की अथक जिजीविषा यदि हताशा के चरम पर पहुँची है तो परिस्थितियों ने विवशता का कितना भयावह चेहरा प्रस्तुत किया होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। हिमांशु रॉय जैसे बेटे को खोकर भी यदि इस राष्ट्र ने तंत्रजन्य विद्रूपताओं का सम्यक चिंतन नहीं किया तो स्थितियों का यह चेहरा इतना वीभत्स हो जाएगा कि उसके महामिलन से उत्पन्न संतति युग को महाविनाश के कुरुक्षेत्र की ओर ले जाएगी। हिमांशु रॉय की प्रेरणादायक जवानी जिस एक क्षण में आत्मघात की देहरी पर बलिदान हो गई उस एक क्षण से अपनी पीढ़ियों को बचाने के लिए अनर्गल मुद्दों में नष्ट होने वाले समय को मनुष्यता के वास्तविक विकास में समर्पित करना होगा। आह! संवेदनाएँ सिहर उठती हैं, क्या अनुभूति रही होगी उस क्षण जब कोई जुझारू जीवन अपने मुँह में पिस्तौल रख पाया होगा। कितनी मेहनत लगी होगी उन उंगलियों को ट्रिगर दबाने के लिए। उफ्फ! आत्मा काँप जाती है। हे ईश्वर, इस देश की जवानी को तंत्र की विफलताओं से बचाना। नमो नारायण!
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Himanshu Roy Suicide
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मौसम विभाग की भविष्यवाणी कमज़ोर साबित हुई। तूफान की गति और प्रचंडता बताने में मौसम विभाग निष्फल सिद्ध हुआ। ज्ञात हो कि मौसम विभाग के बताए गए समय से दो दिन पूर्व ही देश भर के मीडिया में तूफान कहर बरपाने लगा था।
टेलीविज़न चैनलों के संवाददाताओं और प्रस्तोताओं के चेहरे की बदहवासी से स्पष्ट हो रहा था कि तूफान भयंकर है और संवाददाता के ठीक पीछे दुबका हुआ है। चैनल के ग्राफिक आर्टिस्ट्स के दिलो-दिमाग़ में तूफान ने हंगामा मचाया कि उड़ती हुई धूल को गूगल से डाउनलोड करके भारतीय टच कैसे दिया जाए।
सोशल मीडिया पर भी तूफान की गति भयंकर थी। व्हाट्सएप्प पर ताज़ा अपडेट के टेक्सट तथा वीडियोज़ के ऊँचे बवंडर आवश्यक संदेशों को उड़ा ले गए। फेसबुक पर तूफानी चुटकुलों ने देश के अन्य मुद्दों के हज़ारों पेड़ गिरा दिए।
महानगरों में किसी के टकराने से भी यदि किसी पेड़ में कुछ स्पंदन हुआ तो उसे रिकॉर्ड करके उतावलों ने तूफान सिद्ध कर दिया। कहीं-कहीं तो पेड़ के न हिलने की स्थिति में कैमरे को हिला-हिलाकर शूटिंग करके भी तूफान के वीडियो वायरल किये गए। रेडियो प्रस्तोताओं ने भी अपने श्रोताओं को फोन कर करके उनके घर के पर्दों का हिल्लन जँचवाया।
इस भयंकर अप्रकृतिक आपदा में कई सौ मीटर फुटेज बर्बाद हो गई। अड़तालीस से ज़्यादा घण्टों के मारे जाने की सरकार ने पुष्टि की है। सरकार ने चेतावनी जारी करते हुए सभी नागरिकों को किसी भी वास्तविक मुद्दे के सिर उठाने की स्थिति में ऐसे तूफान के प्रति सतर्क रहने को कहा है।
✍️ चिराग़ जैन