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‘सत्ता का खेल तो चलेगा। सरकारें आएंगी-जाएंगी। पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतन्त्र अमर रहना चाहिए। क्या आज के समय में ये कठिन काम नहीं हो गया है? ये चर्चा तो आज समाप्त हो जाएगी। मगर कल से जो अध्याय शुरू होगा, उस अध्याय पर थोड़ा ग़ौर करने की ज़रूरत है। ये कटुता बढ़ना नहीं चाहिए।’ -पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के ये शब्द आज भी रह-रहकर हमारे कानों में गूंजते हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में वितण्डावाद का जो ताण्डव हम दिन-प्रतिदिन देख रहे हैं, उसके अंत में हमारे पास कटुता के अतिरिक्त कुछ शेष न रह जाएगा। राजनैतिक दलों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर जिस तरह से एक पूरी पीढ़ी की सोच को सीमित करने का प्रयास किया है, वह पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के स्वर में वर्णित ‘लोकतंत्र’ की परिकल्पना के विपरीत आचरण का मार्ग है। मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल की है।
रामायण ने हमें सिखाया है कि शत्रु जिस द्वार से आक्रमण करेगा, समाधान भी उसी द्वार से आएगा। यही कारण है कि लक्ष्मण मूर्च्छित हुए तो वैद्य सुषेण भी उसी लंका से उपचार के लिए आए, जिससे मेघनाद आया था।
यदि हम आज से ही सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय कुछ बातों का पालन करना प्रारंभ करें तो शायद इस माध्यम का प्रयोग करके प्रोपेगैंडा करने वाली सभी एजेंसियाँ हतोत्साहित होंगी। फिर देशहित की बात करने पर जब कोई आप पर तंज करेगा कि आप राजनैतिक माहौल सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं; तो आप उसे बता सकेंगे कि हम अफवाह के उस तंत्र की जड़ खोद रहे हैं, जिसकी डालियों पर सामाजिक विघटन के फल लगते हैं।
1. यदि जन-सामान्य की समस्या से जुड़ी अथवा लोकतंत्र की समालोचना से संबंधित किसी पोस्ट को अमुक राजनैतिक दल का ‘विरोध’ सिद्ध करने का प्रयास किया जाए तो ऐसे कमेंट्स को इग्नोर करेंगे। उन्हें उत्तर देते ही आप उन्हें सफल कर देंगे क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह है कि आप विषय को भूलकर स्वयं को निष्पक्ष साबित करने में व्यस्त हो जाएँ।
2. अश्लील, अभद्र तथा असंसदीय शब्दावली का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को (भले ही वह आपकी पोस्ट के समर्थन में हो) तुरंत ब्लॉक करेंगे।
3. किसी भी सम्प्रदाय की आड़ में कट्टरता, अराजकता और हिंसा का समर्थन करनेवाले व्यक्ति की पोस्ट/कमेंट को इग्नोर करेंगे।
4. उन फेक प्रोफाइल्स की पहचान करके उन्हें अपनी मित्रता सूची से बाहर करेंगे, जिनका निर्माण ही किसी दल अथवा विचारधारा के प्रचार हेतु किया गया है। ध्यान से देखने पर आप समझ जाएंगे कि ऐसी प्रोफाइल्स पर डीपी से लेकर वॉल तक कहीं भी प्रोफ़ाइल होल्डर की पहचान नहीं मिलती। इनकी वॉल पर या तो डीपी चेंज नोटिफिकेशन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा या फिर राजनैतिक दलों के प्रोपेगेंडा पेज से शेयर करके लाई गई पोस्ट्स होंगी। ये ही वो प्रोफाइल्स हैं जिनके दम पर राजनैतिक दल अफवाह और झूठ फैलाने तथा मुद्दों से भटकाने में सफल होते हैं।
5. किसी भी राजनेता के निजी जीवन में प्रवेश करके उसकी चरित्र हत्या को ‘आलोचना’ का नाम देने वाली पोस्ट से दूरी बनाए रखेंगे। क्योंकि किसी की निजता का सम्मान न किया गया तो भविष्य में कोई भी समाज के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं करेगा।
6. किसी राजनेता का नाम बिगाड़कर, या उसे फेंकू, तड़ीपार, पप्पू, टोंटीचोर आदि नाम से संबोधित करनेवालों को दूर से प्रणाम करेंगे क्योंकि इनके पास कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक समझ नहीं है, ये लोग सुनी-सुनाई अभद्रता से विषय को भटकाना चाहते हैं।
7. किसी भी राजनेता की बीमारी, चोट, कद-काठी, लिंग, जाति, धर्म, रंग, चेहरा-मोहरा और बोली का उपहास करके मूल विषय को भटकाने के प्रयासों से सावधान रहेंगे क्योंकि हमें राजनेताओं से जनता का नेतृत्व करवाना है, उनसे पारिवारिक सम्बंध नहीं जोड़ना है।
8. टीवी डिबेट में अलग-अलग राजनैतिक दलों के प्रवक्ता जिन जुमलों से बहस को नष्ट कर देते हैं, उन जुमलों से अपनी पोस्ट्स और कमेंट बॉक्स को बचाएंगे।
9. वर्तमान अथवा भविष्य के प्रश्न को इतिहास, जाति अथवा सम्प्रदाय पर अटकाकर नष्ट करने वालों को उत्तर देने में ऊर्जा ध्वंस नहीं करेंगे।
10. फेसबुक पर कुछ भी लिखने से पूर्व यह विचार अवश्य करेंगे कि इससे किसी प्रकार से मनुष्यता अथवा लोकतंत्र तो आहत नहीं हो रहा।
ये नियम यदि हमने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से पालन करने आरम्भ कर दिए तो मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि आप बहुत जल्दी ही अपने समाज को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे वितण्डों से मुक्ति होता देखेंगे।
और एक अंतिम बात- अपने रक्त संबंधों; पारिवारिक मित्रों; सहकर्मियों; सहयात्रियों अथवा संबंधियों से चर्चा करते समय यदि अपने पक्ष और संबंध में से किसी एक को चुनना पड़े तो संबंध को बचाएंगे क्योंकि जो हमारे अपने हैं, वो आज नहीं तो कल हमारे साथ अवश्य खड़े होंगे।
भारत एक ऐसा उपवन है जहाँ अलग-अलग रंग के फूल खिलते हैं। हमें उन व्यापारियों की कोई ज़रूरत नहीं है, जो फूलों को डालियों से अलग करके बाज़ार में बेच दें। हमें तो वह माली चाहिए जो अलग-अलग रंग के फूलों को करीने से लगाकर बगीचे की सुंदरता बढ़ा सके।
सहमत हों, तो राष्ट्रहित में शेयर ज़रूर करें।
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय जनता पार्टी के चुनावी चाणक्य बाक़ायदा मीडिया के सामने बैठक बुलाकर यह बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का वोट अपनी ओर मिलाने के लिए वे जाट नेताओं को माना रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी घोषणा करके दलितों की पार्टी होने का दावा करती है। एआईएमएम घोषित करती है कि वह मुसलमानों की पार्टी है। शिवसेना डंके की चोट पर ख़ुद को हिन्दू समाज की पार्टी बताती है। शिरोमणि अकाली दल के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि वह सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है।
और यह सब तब जबकि हमारे यहाँ संवैधानिक रूप से धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर कोई राजनैतिक दल गठित नहीं किया जा सकता।
आज जब दिल्ली में जाटों की मनुहार चल रही थी तो उस पंचायत में भाग लेने के लिए माननीय गृहमंत्री जी गणतन्त्र दिवस की परेड से सीधे वहाँ पधारे थे। बाद में टीवी चौनल्स पर जाट नेता सर-ए-आम बता रहे थे कि जाट किस दल को वोट देंगे। और यह सब तब जबकि हमारा संविधान हमें बताता है कि भारत में गुप्त मतदान प्रणाली है और किसी भी मतदाता पर न तो किसी को मत देने के लिए दबाव बनाया जा सकता है न ही उससे पूछा जा सकता है कि वह अपने मताधिकार का प्रयोग किसके पक्ष में करेगा!
इन सब विरोधाभासों को देखता हूँ तो समझ आता है कि भारतीय लोकतंत्र एक ऐसा ढकोसला बनकर रह गया है जिसकी गरिमा को तार-तार करने में पूरा तंत्र समान रूप से सक्रिय है। सभी राजनैतिक दल भारतीय लोकतंत्र को बाल पकड़कर घसीटते हुए जुआघर में लाते हैं और बारी-बारी से उसका चीरहरण करते हैं। बस अंतर इतना है कि जब एक पक्ष चीरहरण कर रहा होता है तो दूसरा पक्ष पांडवों के कपड़े पहन लेता है और जब दूसरा पक्ष चीरहरण में संलग्न होता है तो पहला पक्ष लपक के उसके कपड़े लपेटकर नैतिक होने का अभिनय करने लगता है।
लोकतंत्र बेचारा ईश्वर से गुहार लगाता है। बीस-तीस वर्ष की गुहार के बाद ईश्वर तो नहीं आता लेकिन ईश्वर का गेट-अप पहनकर कोई आता है और दोनों पक्षों को तितर-बितर करके ख़ुद चीरहरण करने लगता है। सभागार में बैठे राजा से लोकतंत्र इसलिए कुछ नहीं कह पाता, क्योंकि राजा की आँखों पर लोकतंत्र ने ख़ुद अपने हाथों से पट्टी बांधी है।
सभा में कुछ विदुर भी हैं। जो इस चीरहरण पर दोनों पक्षों से प्रश्न करता है। लेकिन दोनों पक्ष चीरहरण की अनैतिकता पर उत्तर देने की बजाय विदुर से प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब उस पक्ष वाले चीरहरण कर रहे थे तब तुम कहाँ थे?
विदुर बताता है कि मैं उनसे भी प्रश्न कर रहा था। लेकिन वे उसकी बात नहीं मानते और उसके प्रत्येक प्रश्न पर प्रतिप्रश्न उछाल कर उसे लोलक की भाँति इधर-से-उधर दौड़ाते रहते हैं।
इस भागदौड़ से परेशान होकर कभी-कभी विदुर किसी एक पक्ष के साथ चीरहरण में शामिल हो जाता है और जो विदुर ऐसा नहीं कर पाता वह इस गुत्थी को सुलझाने में उलझ जाता है कि दोनों में से कौन सा पक्ष अधिक बेहतर है। वह जिसने एक ही झटके में लोकतंत्र को निर्वस्त्र कर दिया, या फिर वह जिसने तड़पा-तड़पा के हलाल स्टाइल में कपड़े उतारे।
आज गणतंत्र दिवस के दिन यह लिखते हुए मेरे भीतर एक सिहरन हो रही है कि इस देश के गणतंत्र पर राजनीति का घुन लग चुका है। बेशर्मी और ढिठाई से दल बदलने वाले लोग; अपनी कही हुई बात से पलट जाने वाले लोग; जिसे गाली दें, स्वार्थ के लिए उसके गले लग जाने वाले लोग; जिसकी उंगली पकड़ कर चले, उसे लात मारने वाले लोग; रंगे सियारों की तरह अपने मुंह में तिनके ठूस कर मौक़ा मिलते ही हुआ-हुआ करने वाले लोगों में से भारतीय समाज का भविष्य तलाश पाना लगभग असंभव हो चुका है।
चुनाव के इस भौंडे नाटक के बीच भारतीय जनमानस के भविष्य पर कालिख पोती जा रही है। लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि यदि एक व्यक्ति भी इस लेख से यह समझ सका कि जिन राजनैतिक सियारों के स्वर में स्वर मिलाकर हम अपने आंगन में विष बो रहे हैं, उनका न हो हमारे धर्म से कोई सरोकार है, न हमारे वंशजों से, न हमारे भविष्य से और न ही हमसे; तो मुझे लगेगा कि अभी इस राष्ट्र की राजनीति को यह भय दिखाया जा सकता है कि जनता का विवेक अभी मरा नहीं है।
© चिराग़ जैन
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‘मनसुख’ अपने खेत के एक कोने में पक्षियों के लिए चुग्गा डाल रहा था। उसे ऐसा करते देख गाँव के मास्टरजी ने उसे रोकना चाहा। मनसुख ने मास्टरजी को निष्ठुर, निर्दयी और चिड़िया-विरोधी कहकर अपमानित किया और सारे गाँव में कहता फिरा कि ”मास्टर ‘चुग्गा विरोधी गैंग’ का सरगना है। खाली पड़े खेत में चिड़ियों को चुग्गा डालता हूँ, बेचारी चिड़ियों का पेट भर जाता है। इसमें इस मास्टर का क्या जाता है!”
किसान ने यह बात इतने ज़ोर-शोर से प्रसारित की कि गाँव के कुछ लड़कों ने ‘पंछी करुणा दल’ बनाकर बात को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया।
किसी ने कहा, मास्टर चाहता है कि चुग्गे का अन्न मास्टर को दे दिया जाए। किसी ने कहा कि मास्टर चिड़ियों को समाप्त करके, ख़ुद पूरे आकाश में उड़ना चाहता है। किसी ने कहा कि मास्टर किसान के खेत हड़पने का षड्यंत्र कर रहा है।
मास्टर को देखते ही ‘पंछी करुणा दल’ के लड़के नारा लगाने लगे- ‘हम चिड़ियों के ख़ास हितैषी, मास्टरजी की ऐसी-तैसी।’
इन सब बातों से आहत होकर मास्टरजी ने चुप्पी ओढ़ ली। किसान और गाँव के लड़के मास्टर को जलाने के लिए जेब से पैसा ख़र्च करके मनसुख के खेत में चुग्गा डालने लगे। पंछियो के झुंड के झुंड खेतों पर मंडराने लगे।
बुआई का समय आया तो मनसुख ने चुग्गा डालना बन्द कर दिया और खेत में बीज बोए। पंछियों ने बुआई का एक-एक बीज चुग्गा समझकर चुग लिया। मनसुख को दुःख तो हुआ लेकिन उसे इस बात की ख़ुशी ज़्यादा थी कि मास्टर के बच्चे की हेकड़ी निकल गयी और चुग्गा डालने की परंपरा स्थापित हो गयी।
अगले दिन मनसुख ने फिर बीज बोए। लेकिन अब तक उसकी स्थापित की हुई परम्परा जड़ पकड़ चुकी थी। एक सप्ताह तक किसान रोज़ बुआई करता रहा लेकिन पंछियों को खेत से उड़ाने का साहस न जुटा सका, क्योंकि परम्परा उसी की बोई हुई थी।
अब मनसुख को पंछियों पर क्रोध आने लगा लेकिन ज्यों ही उसने पंछी भगाने के लिए उठने लगा तो देखा कि सामने से ‘पंछी करुणा दल’ के लड़के बोरी भर मक्का लिए चले आ रहे थे। पास आकर बोले, आओ मनसुख भाई, खेत में चुग्गा डालें।
मनसुख निरुत्तर बैठा रहा। लड़के नारा लगाते हुए उसके खेत में चुग्गा डालने लगे। मनसुख का गला रुंध गया, आँखें डबडबा आईं लेकिन कानों में लड़कों की आवाज़ लगातार आ रही थी- ‘…मास्टरजी की ऐसी-तैसी।’
✍️ चिराग़ जैन
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सरकार सदन में चिल्लाती है कि हम जन-कल्याण करेंगे। विपक्ष भी सदन में चिल्लाता है कि हम जन-कल्याण करवाएंगे। दोनों तरफ़ की आवाज़ें ऊँची होती जाती हैं। शोर-शराबा बढ़ता है तो स्पीकर सदन की कार्रवाई स्थगित कर देते हैं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी आवाज़ लिए सदन के बाहर निकल आते हैं। उन्हें बाहर आता देखकर मीडिया उनके मुँह पर माइक लगा देता है।
पक्ष के प्रतिनिधि माइक देखते ही चिल्लाने लगते हैं। उनको चिल्लाते देखकर विपक्ष भी मीडिया के एकाध माइक लपककर चिल्लाने लगता है। दोनों एक-दूसरे पर अनुशासनहीनता, संवेदनहीनता और जनविरोधी होने का आरोप लगाते हैं। सरकार बताती है कि विपक्ष सदन नहीं चलने दे रहा। विपक्ष बताता है कि सरकार सदन चलाना नहीं चाहती। ख़ूब शोर-शराबा होता है।
दोनों के जन-कल्याण के दावों को सुनकर स्पीकर महोदय दोनों को सदन में बुला लेते हैं। सदन की कार्यवाही शुरू होती है। फिर दोनों तरफ़ के लोग हंगामा करते हैं। फिर सदन स्थगित होता है। फिर मीडिया बाइट लेता है। फिर सदन शुरू होता है… फिर स्थगन… फिर मीडिया… फिर अंदर… फिर बाहर…!
पूरा सत्र बीत जाता है… पूरा कार्यकाल बीत जाता है… पूरे दशक बीत जाते हैं… पूरे युग बीत जाते हैं… विपक्ष सरकार बन जाता है… सरकार विपक्ष में जा बैठती है… अंदर-बाहर के इस खेल में राजनीति का खेत जुतता रहता है… नयी-नयी पार्टियाँ उग आती हैं… कहीं पीपल की डालियाँ कीकरों की गलबहियाँ कर लेती हैं तो कहीं बरगद की कोई डाल अपनी जड़ें जमाकर ख़ुद को बरगद घोषित कर देती हैं… अंदर-बाहर का कार्यक्रम जारी रहता है!
सरकार कहती रहती है कि हम जनकल्याण करके रहेंगे… विपक्ष कहता रहता है तुम्हें जनकल्याण करना ही होगा। जनकल्याण संसद के खम्भों से टेक लगाकर खड़ा-खड़ा ख़ुद स्तम्भ बन चुका है और जनता जब रायसीना के आसपास से निकलती है तो लाल खंभों पर खड़ी एक इमारत की ओर टकटकी लगाकर देखती रहती है। उस समय उसे यह याद ही नहीं रहता कि जितनी देर वह संसद की ओर निहार रही थी, उतनी देर वह गोल-गोल घूम रही थी।
✍️ चिराग़ जैन
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हमें बचपन से यह पढ़ाया गया है कि फलाने राजा ने ख़ुश होकर फलाने व्यक्ति को स्वर्ण मुद्राएँ दीं। बस यहीं से हमारे मस्तिष्क को कैप्चर करने का खेल शुरू हो गया। हम कलाकार हैं, तो अपनी कला से राजा को ख़ुश करने में लगे रहे। हम विद्वान हुए, तो अपनी विद्वत्ता से राजा को ख़ुश करते रहे। हम चतुर हुए, तो अपना समस्त चातुर्य राजा को ख़ुश करने में झोंक दिया। बुद्धिमान हुए, तो बुद्धिमत्ता राजा को ख़ुश करने में जुट गयी।
मतलब यह कि कला, विद्वत्ता, चातुर्य और बुद्धिमत्ता; राजा से स्वर्ण मुद्राएँ पाने की होड़ में व्यस्त हो गयीं और राजा इन सबको काम पर लगाकर शासन में अपनी मनमानी करके ख़ुश रहा।
इन्हीं कहानियों ने हमें यह भी बताया कि नगर की समस्त सुंदर कन्याओं का अंतिम उद्देश्य यही है कि राजकुमार उनके सौंदर्य पर मोहित हो जावे। इसलिए आज भी सत्ताधीशों के राजकुँवर सुन्दर कन्याओं पर आकृष्ट होकर उनका जीवन धन्य करते पकड़े जाते हैं।
हमें बचपन से यह पढ़ाया गया है कि फलाने राजा ने ख़ुश होकर फलाने व्यक्ति को स्वर्णमुद्राएँ दीं। बस यहीं से हमारे मस्तिष्क को कैप्चर करने का खेल शुरू हो गया। हम कलाकार हैं, तो अपनी कला से राजा को ख़ुश करने में लगे रहे। हम विद्वान हुए, तो अपनी विद्वत्ता से राजा को ख़ुश करते रहे। हम चतुर हुए, तो अपना समस्त चातुर्य राजा को ख़ुश करने में झोंक दिया। बुद्धिमान हुए, तो बुद्धिमत्ता राजा को ख़ुश करने में जुट गयी।
मतलब यह कि कला, विद्वत्ता, चातुर्य और बुद्धिमत्ता; राजा से स्वर्णमुद्राएँ पाने की होड़ में व्यस्त हो गयीं और राजा इन सबको काम पर लगाकर शासन में अपनी मनमानी करके ख़ुश रहा।
इन्हीं कहानियों ने हमें यह भी बताया कि नगर की समस्त सुंदर कन्याओं का अंतिम उद्देश्य यही है कि राजकुमार उनके सौंदर्य पर मोहित हो जाये। इसलिए आज भी सत्ताधीशों के राजकुँवर सुन्दर कन्याओं पर आकृष्ट होकर, उनका जीवन धन्य करते पकड़े जाते हैं।
इन कहानियों के अनुसार राजा के दो ही काम थे- प्रथम, अपने मंत्रियों से ऊल-जलूल सवाल पूछना और द्वितीय, आखेट करना। इन दोनों से जो समय बचता था, वह रूठी रानी को मनाने में व्यतीत हो जाता था।
मंत्रियों के भी दो ही काम थे। या तो वे सबसे होनहार मंत्री से ईर्ष्या करने में व्यस्त रहते थे या फिर राजा के बेसिरपैर के टास्क पूरे करने में लगे रहते थे। इन दोनों से चिढ़कर ही वे अक्सर राजा को शिकार के समय जंगल में अकेला छोड़कर जानबूझकर भटक जाते थे। लेकिन शिकार में भटकने के बावजूद बिना जीपीएस के ही राजा भटकता हुआ अपने महल पहुँच जाता था।
राजकुमारियाँ सखियों के साथ जलक्रीड़ा और वनभोज (पिकनिक) में व्यस्त रहती थीं। जहाँ कोई भूत-प्रेत या राजकुमार उनके रूप-लावण्य पर मोहित होने पहुँच ही जाता था। (इस सीन में कभी कोई जंगली जानवर नहीं आ सका, क्योंकि जंगली जानवर प्रोटोकॉल के बाहर कभी नहीं जाते।) सो, राजकुमार की एंट्री होते ही राजकुमारी उसके सफेद घोड़े पर सवार होकर दूरदेश चली जाती थी। अक्सर कहानी यहाँ ख़त्म हो जाती थी। राजकुमारी को दूरदेश ले जाकर राजकुमार ने उससे क्या व्यवहार किया; यह हमें किसी कहानी ने नहीं बताया।
जनता इन कहानियों में कभी-कभार ही प्रकट होती थी। उसका उपयोग यही था कि वह कोई ‘समस्या’ लेकर लड़ते-झगड़ते राजदरबार में पहुँचे और राजा के शेष मंत्रियों की ईर्ष्या को धता बताकर सबसे चतुर मंत्री उनके झगड़े का कोई भी ऊल-जलूल समाधान देकर राजा को ख़ुश कर दे।
राजा के ख़ुश होते ही कहानी ख़त्म हो जाती है। फिर जनता की समस्या का समाधान जनता को भाये या न भाये- इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जनता का कहानी में कोई रोल है भी तो उससे यही पता चलता है कि जनता या तो कोई ठग है, जो अपनी चतुराई से राजदरबार का हिस्सा बन जाता है। या फिर कोई निर्धन ब्राह्मण है जिसकी गुणवती कन्या पर मोहित होकर राजा उसका दारिद्र्य दूर कर देता है। या फिर कोई व्यापारी है, जिसकी मिलावटखोरी को राजा के सिपाही पकड़ ही लेते हैं। राजा की सवारी निकलने पर सड़क के दोनों ओर सिर झुकाकर खड़ी भीड़ जनता है। या फिर राजा के कारनामों पर महल के बाहर इकट्ठी होकर राजा का जयजयकार करनेवाला समूह, जनता है।
इन सब संस्कारों को हम इक्कीसवीं सदी तक घसीट लाए हैं। संविधान ने हमें सिंहासन पर बैठा दिया था, लेकिन हमने अपनी आदत के अनुसार अपने लिए एक राजा चुना और उसके महल के बाहर खड़े होकर उसकी जय-जयकार करने लगे।
✍️ चिराग़ जैन
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एक एंकर स्टूडियो में नशा करके ख़बर पढ़ रहा था तो पूरे देश ने उसका मज़ाक़ बनाकर रख दिया। यह सरासर बदतमीज़ी है। ऐसे किसी का मज़ाक़ बनानेवाले समझ लें कि मज़ाक़ बनाने का अधिकार केवल मीडिया के पास है। वह लोकतंत्र, न्यायपालिका, जनभावना, चुनाव प्रक्रिया, राजनीति और यहाँ तक कि किसी की मुर्दनी तक का मज़ाक़ बनाने के लिए स्वतंत्र है।
रिया चक्रवर्ती की निजता, सुशांत राजपूत की आत्महत्या, आर्यन खान की गिरफ्तारी, शशि थरूर की निजी ज़िन्दगी, अभिषेक बच्चन की शादी, सुनील दत्त की शवयात्रा… सबको बेचकर खाने का अधिकार है मीडिया के पास।
कोसी नदी में कब बाढ़ आएगी और क्या तबाही मचाएगी इसको लेकर तीन-चार दिन तक शोर मचता है और फिर अगली ख़बर चलते ही कोसी का गला सूख जाता है। अब टकराएगा तूफान, ऐसे आएगा तूफान, यमुना की बाढ़ में डूब रही है दिल्ली, देश में केवल दो दिन का कोयला बचा है शेष, इतने बजे टकराएगा धूमकेतु, इस तारीख़ को तबाह हो जाएगी धरती… यह सब मज़ाक़ देश के मनोरंजन के लिए थोड़े ही किये जाते हैं। ये तो कवरिंग फायर की तरह चलने वाली ख़बरें हैं जिनकी आड़ में ‘जाने क्या क्या’ जनता की आँख में धूल झोंककर पार कर दिया जाता है।
यह मज़ाक़ देशहित में किया जाता है ताकि देश अनावश्यक तनाव से बचा रहे। इतने राष्ट्रभक्त पत्रकारों का मज़ाक़ उड़ाने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।
नशा किया तो क्या अपराध हो गया। पहली बात तो यह कि अगले ने दिल्ली या यूपी में शराब पी थी। अगर बिहार या गुजरात में पी होती तब बोलते। तब कह सकते थे कि अपराध हुआ है। आपको भाई का डेडिकेशन ही समझ नहीं आता। इत्ती शराब पीने के बाद भी देश की ऐसी-तैसी करने के इस मौक़े पर भाई लड़खड़ाता हुआ स्टूडियो पहुँचा होगा। फिर सारे स्टाफ के सामने न्यूज़रूम में अपनी छाती ठोककर चिल्लाया होगा- ‘आज बुलेटिन तेरा भाई पढ़ेगा!’
ये होती है अपने काम के प्रति निष्ठा। सारे कांग्रेसी चमचे बेचारे राष्ट्रवादी पत्रकार के पीछे पड़ गए हैं। आर्यन की तरह ड्रग्स तो नहीं ली ना दीपक जी ने। आपने यह तो देख लिया कि वे लड़खड़ाती हुई ज़ुबान से विपिन रावत और वीके सिंह में अंतर नहीं कर पाए… अरे यही तो है सच्चा राष्ट्रवाद। देश का सैनिक हो, केंद्रीय मंत्री हो या फिर सीडीएस ही क्यों न हो… माननीय दीपक जी सबको एक नज़र से देखते हैं। और जो उनके माथा पकड़ने का झूठा प्रचार किया जा रहा है वह दरअस्ल सिर झुकाकर शहीदों को नमन किया जा रहा था। आप कांग्रेसी क्या समझेंगे इस भावना को कि सेल्यूट मारने के लिए दीपक जी ने एक नहीं दोनों हाथ अपने माथे तक उठा लिए और इस प्रक्रिया में उन्हें जैसे ही संस्कृति की याद आई उन्होंने दोनों हाथों से सेल्यूट मारते हुए सिर नीचे झुका लिया था। इसे कहते हैं सैनिकों का सम्मान। तुम क्या जानो इस भावना को।
तुम क्या चाहते हो कि इनकी जगह राहुल गांधी से न्यूज़ पढ़वाई जाए। उसे एक वाक्य तो ठीक से बोलना नहीं आता। उसको न्यूज़ स्टूडियो में बैठा दिया तो वो वहाँ भी कुर्ते की जेब फाड़ लेगा। अरे एहसान फरामोशों। अब से पहले ‘ड्रंक न्यूज़ एंकर’ सर्च करने पर गूगल में एक भी भारतीय चेहरा नहीं दिखता था, अब टॉप पर गूगल सर्च में दीपक जी छाए हुए हैं। राष्ट्र का नाम कितना ऊँचा हुआ है। पता-वता कुछ है नहीं; …चले आए हैं माननीय दीपक जी का मज़ाक़ बनानेवाले।
✍️ चिराग़ जैन