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चरित्र निर्माण के विवेकहीन पाठ्यक्रम

बचपन में हमें जो कहानियाँ पढ़ाई गयी हैं; उनके झोलझाल को समझने में पूरी ज़िन्दगी कन्फ्यूज़ हो गयी है। कबूतर और बहेलिये की कहानी ने हमारे दिमाग़ में भरा कि हमें सबकी मदद करनी चाहिए। तो सारस और केकड़े वाली कहानी ने बताया कि जिसकी मदद करोगे, वही तुम्हें मार डालेगा। बन्दर और...

दो साल बाद कवि सम्मेलन

दो साल के घनघोर निठल्लेपन के बाद मुझे कवि-सम्मेलन का आमंत्रण मिला तो मैं फूला नहीं समा रहा था। सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल न होता तो उस दिन मेरा आयतन दो गज की सीमा को पार कर गया होता। जिस मोबाइल की घण्टी से भी रेमडिसिवर की बदबू आने लगी थी, उससे फिर से होटल से उठाए हुए...

कोरोना में अवसर

कोरोना की दूसरी लहर बीत चुकी है, लेकिन राजनीति में ख़ुशी की लहर नहीं आई। वे अब भी आपस में लड़ रहे हैं। जब देश में कोरोना का ताण्डव चल रहा था तो पॉलिटिकल पार्टियों में इस बात पर लड़ाई थी कि ये जनता तुम्हारी है, इसे तुम बचाओ। अब जब ताण्डव शान्त हुआ है तो हर पार्टी यह...

शर्म आनी चाहिए जनता को

कोरोना की वर्तमान स्थिति भयावह है। जनता को चाहिए कि अपनी सुरक्षा के लिए सरकारी नियमों का पालन करे। बाज़ारों में भीड़ देखकर सरकार को घबराहट होती है। जनता होली जैसे अनावश्यक त्योहारों की आड़ लेकर समारोह करने की सोच रही है। लोग, होली मंगल मिलन जैसे बेहूदे कामों के लिये...

अजीब सवाल है

हमारे यहाँ एक नया चलन चल पड़ा है कि जैसे ही आप कोई पर्व मनाने लगो तो कुछ लोग उसके लिए तर्कहीन प्रश्न उठाते हैं और दूध में खटाई डालकर स्वयं को लीक से हटकर चलता दिखाने की कोशिश में लग जाते हैं। कल यही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के साथ भी हुआ। जब सब लोग महिलाओं की उपलब्धि,...

कुण्ठित के नाम पाती

हे कुण्ठेश! जिसकी कविता में कमी न निकाल सको, उसकी प्रस्तुति पर प्रश्न खड़े कर दो। जिसकी प्रस्तुति भी परफेक्ट हो, उसकी कविता की विषयवस्तु को कठघरे में घसीट लो। जो इस मोर्चे पर भी अंटे में न आए, उसके चरित्र पर कीचड़ उछाल दो। जिसका चरित्र भी कीचड़ से बच जाए, उसके निजी जीवन...
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