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जो व्यक्ति घर में फैले कचरे से परेशान है, वह घर से प्यार करता है। उसे यह कहकर ट्रोल नहीं किया जा सकता कि वह हमारे घर को कचरा कहकर हमारी भावनाओं को आहत कर रहा है।
जो कचरे को देख ही नहीं पा रहा है, वह उसे साफ़ कैसे करेगा? यदि कभी उसे सफाई का अभिनय करना भी पड़ा तो वह अनजाने में घर का ज़रूरी सामान कचरे के दाम बेच देगा। क्योंकि जो लोग उसे सामान और कचरे की पहचान करा सकते थे उनकी आवाज़ को तो उसने घरद्रोही कहकर ख़ामोश कर दिया था।
जो मेहमान के आने पर कचरे को कोने में दुबकाने में विश्वास करता है, वह घर भर को बदबू से भरने की तैयारी कर रहा है। दीवार के ऊपर चूना पोत देने से भीतर की दीमक ढक जाती है, मरती नहीं है। घर को दीमक मुक्त करने के लिए दीमक की बांबी तक पहुँचना होगा। लेकिन जो भी इस प्रयास में दीवार को खुरचने चला, उसे आपने घरद्रोही कहकर प्रताड़ित किया। उसके हाथ में जो औज़ार थे, उन्हें हथियार सिद्ध करके आपने उसे घर से बहिष्कृत भी करवा दिया। घर के प्रति उसकी सद्भावना को निर्वसन करके निष्कासित कर दिया।
जिन हाथों में दीमक के उपचार का यंत्र था, वे हाथ अपने चीथड़े सम्भालने में व्यस्त हो गए। उधर दीमक दीवार को खोखला करके बाहर निकलने लगी तो उस शक्तिहीन बहिष्कृत को कोसते हुए आपने दीवार से बाहर निकलते घिनौने बुरादे के आगे कोई शोपीस रख दिया। जब दीमक वह शोपीस भी खाने लगी तो आपने किसी दूसरी दीवार पर घर के किसी पुरखे की तस्वीर टांक दी और घोषित कर दिया कि घर का जो सदस्य इस तस्वीर का सत्कार नहीं करेगा, वह घर द्रोही होगा।
घरवाले पुरखे की तस्वीर पूजने में व्यस्त हो गए और दीपक पुरखों की विरासत को खोखला करती रही। जब तस्वीर भी दीमक के आगोश में समाने लगी तो सबको अलग अलग तस्वीरें थमा दी गईं।
पुरखों के बनाए घर पर दीमक लगी है और हम अपनी अपनी तस्वीरें लेकर इतरा रहे हैं। जिसने यह दीमक देख ली उसकी आँखें मत फोड़ो। जो रोज़ नया शोपीस रखकर आपको एक कमरे से दूसरे कमरे में टहला रहा है, उसके मन का कपट समझने का प्रयास करो, क्योंकि उसने आपके पूरे घर को दीमक का चारा बना डाला है।
✍️ चिराग़ जैन
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‘व्यू बढ़ाने के लिए कुछ भी करेंगा‘ -यह वाक्य वर्तमान समाज का मूलमंत्र बन गया है। किसी की औक़ात और हैसियत इस बात से मापी जाने लगी है कि उसे कितने लोग फॉलो करते हैं। दुनिया के तमाम काम लाइक, फॉलो, सब्रक्राइब, शेयर और कमेंट जैसे शब्दों तक सीमित हो गए हैं।
आप कितने भी बड़े योगी हों, अगर आपके सोशल मीडिया फॉलोअर्स नहीं हैं, तो आपका योग किसी काम का नहीं। और अगर आपने किसी तरह से सोशल मीडिया पर स्वयं को योगी सिद्ध कर दिया तो फिर योग की कोई सिद्धि हो या न हो, कोई फर्क़ नहीं पड़ता। इसीलिए सफल योगी बनने के लिए योग करने से अधिक आवश्यक है, ट्वीट करना।
आपकी दुकान चले या न चले, फेसबुक चलती रहनी चाहिए। फेसबुक की एक्टिविटी रुक गयी तो दुकान पर ग्राहकों की भीड़ से कोई लाभ नहीं।
आप वाइल्ड लाइफ सफारी पर जाएँ तो पर्यटक बनकर नहीं, फोटोग्राफर बनकर जाएँ। शेर दिखे तो उसे निहारने की बजाय कैमरा निकालकर जिराफ़ बन जाइए। न जाने कौन-सा क्लिक आपको इंस्टा पर फेमस कर देगा।
रील्स देखो तो समझ आता है कि फेमस होने की इस होड़ में न कोई मर्यादा शेष बची है, न ही कोई हिचक। साठ सेकेंड तक दर्शकों को अपनी रील पर रोके रखने के लिए सारी सीमाएं लांघ दी गईं। कूल्हे मटकाकर दर्शकों का मन नहीं बहला तो नंगी पीठ दिखाकर रोक लिया। इससे भी बात नहीं बनी तो भद्दी गालियाँ देकर फेमस होने निकल पड़ी। आजकल स्कर्ट या फ्राक के नीचे के वस्त्र दिखाने तक को नॉर्मल माना जाने लगा है। 30 सेकेंड की इन वीडियो क्लिप को मिलियन और बिलियन व्यू का आँकड़ा दिलाने के लिए युवतियों ने लज्जा को ब्रेन से ब्लॉक कर दिया है।
पुरुष भी इस अपराध में समान उत्तरदायी है। पूरा-पूरा दिन स्क्रॉल करके रील देखनेवाले अंगूठों की रेखाएँ घिसने लगी हैं। मोबाइल की स्क्रीन में क़ैद हो चुकी आँखों में इतनी रौशनी ही नहीं बची है कि हम अपने समाज पर घिर आए अंधेरे को पहचान सकें। जिस युवा पीढ़ी के हाथों में देश की बागडोर होनी थी उसके हाथ टच स्क्रीन मोबाइल की अदृश्य बेड़ियों से बंधे हुए हैं। अफ़ीम के नशे से तो देश बच गया लेकिन मोबाइल के असीम नशे से बचने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है।
ट्रेन के आगे लेटने से लेकर अनावश्यक और वीभत्स स्टण्ट करने तक सब कुछ करने की हिम्मत है इस पीढ़ी के पास। फेसबुक लाइव पर आत्महत्या तक देख चुके हम लोग फेमस होने की इस अंतहीन होड़ में अपने वारिसों के स्वर्णिम भविष्य की बलि लिए चले जा रहे हैं। मृत्यु के भयावह वीडियो जब तक गूगल और फेसबुक के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस द्वारा अवरुद्ध किए जाते हैं तब तक उन्हें डाउनलोड करके व्हाट्सएप पर वायरल कर दिया जाता है। यूट्यूब का सिस्टम गुप्तांगों की पहचान करने में सक्षम है और ऐसे सभी वीडियो ब्लॉक कर देता है जिनमें स्त्री अथवा पुरुष के गुप्तांगों का स्पष्ट प्रदर्शन हो।
गूगल की इस क्रूरता से लड़ने के लिए हमारे क्रांतिकारी युवाओं ने ऐसे झीने उपाय खोज लिए हैं, जिन्हें गूगल की आँखें न बेंध सकें लेकिन समान्य व्यूअर का मन बहलता रहे। झीना परिधान ख़रीदने की स्थिति न हो तो किसी भी कपड़े पर पानी डालकर अपने फॉलोअर का मन बहलाया जा सकता है।
आप किसी भी धर्म से संबद्ध हों, फेमस होने की भूख ने आपके समाज के युवाओं को अभद्र तथा आपके समाज की युवतियों को अश्लील बनाने की पूरी तैयारी कर ली है। सुहागरात की वीडियो बनाकर वायरल करने तक के क़िस्से सामने आ रहे हैं।
प्रेम, वात्सल्य, संवेदना, करुणा और यहाँ तक कि हास्य भी किसी एक इमोजी का मोहताज होकर रह गया है। प्रतिक्रिया के बहाने आपके सोचने-समझने की क्षमता जीवित न हो जाए इसलिए आपका स्मार्टफोन आपको हर बात का उत्तर देने के लिए प्री-फिक्स वाक्यों का सुझाव दे देता है। हर भाव को व्यक्त करने के लिए इमोजी उपलब्ध है, अब आप अपने चेहरे पर भाव लाए बिना भी अपनी प्रतिक्रिया लिखकर भेज सकते हो।
ज़ुबान कट जाए तो जी सकते हैं लेकिन अंगूठा कट गया तो जीना सम्भव न होगा। दवाई छूट सकती है लेकिन पोस्ट नहीं छूटनी चाहिए। बैंक का ब्याज कम हो जाए पर चैनल का ग्राफ नहीं गिरना चाहिए। चैनल की पॉपुलरिटी कम होने लगे तो किसी को गाली दे दो, किसी की चरित्र-हत्या कर दो, ख़़ुद नंगे हो जाओ या किसी को नंगा कर दो… चैनल चलता रहना चाहिए।
कुछ न कर सकें तो भी ‘केवल फेमस होने की भूख से ओतप्रोत’ अनर्गल, अश्लील, भौंडी, भद्दी, अभद्र वीडियो पोस्ट करनेवालों को ब्लॉक करने की पहल भी कर ली तो इस मरती हुई संस्कृति को कुछ साँसें उधार देनेवालों में आपका नाम भी शामिल होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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एक राजा के दो बेटे थे। एक नाटे कद का था और दूसरा लंबे कद का। बचपन से ही दोनों में तनाव रहता था। जब वे बड़े हुए तो राजा ने राज्य का बंटवारा कर दिया और पूरे देश के अधिकतम नाटे नागरिक नाटे बेटे के देश में चले गए। मूल राज्य में लंबे नागरिक रह गए। लेकिन कुछ नाटे लोग अपना देश छोड़कर नाटे देश में नहीं गए और लंबे राजा के शासन में रहने लगे।
लंबे राजा ने अपने राज्य में बचे सभी नाटे लोगों को माली, तांगा, मजदूरी, दर्जी, हजामत और अन्य छोटे कामों में लगाए रखा। वे सोचने-समझने का विवेक न हासिल कर लें इसलिए नगर में जगह जगह उनके लिए नाटे बाबा के नाम पर समुदाय केंद्र बना दिये जहां हर ढाई पहर बाद पूरे नाटे समुदाय को इकट्ठा होना अनिवार्य कर दिया। अपने लोगों से उनके बीच यह बात और फैला दी कि वो जितने ज़्यादा बच्चे पैदा करेंगे उतना ही उनका भला होगा। उन्हें यह भी बता दिया कि उनकी किसी भी परम्परा में यदि बदलाव किया गया तो यह उनकी सामुदायिक भावनाओं का अपमान होगा।
अब लंबे लोग व्यापार करते रहे और नाटे लोग उनके यहां नौकरी करते रहे और बदबूदार परंपराओं को निबाहते हुए जनसंख्या बढाने में लगे रहे। विकासहीन रूढ़ियों में बंधी यह जनसंख्या अपने संकरे मुहल्लों में सीमित रहकर बीमारियों और अशिक्षा का शिकार बनी रही।
कुछ समय बाद लंबे समुदाय के कुछ लोग नाटे लोगों की इस दशा से द्रवित हुए और उन्होंने स्वयं को लंबे समुदाय का शुभचिंतक घोषित करके राज्य की सत्ता हथिया ली। सत्ता हाथ में आते ही उन नए राजाओं ने सबसे पहले नाटे समुदाय में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना शुरू किया। उनके समुदाय केंद्र ध्वस्त करने शुरू कर दिए। और अपने लोगों से लंबे समुदाय में यह बात फैला दी कि लंबे लोगों को भी हर ढाई पहर बाद लंबे बाबा के समुदाय केन्द्र पर इकट्ठा होना चाहिए और ज्यादा बच्चे पैदा करने चाहियें।
अब अपने ऊपर अचानक आए संकट से नाटे लोगों का समुदाय जागरुकता की ओर बढ़ने लगा है और शिक्षा, सभ्यता तथा विकास के पथ पर अग्रसर लंबू समुदाय काम-धंधा, रोज़गार, कला, हास्य और उत्सव भुलाकर कट्टरता, घृणा, प्रतिहिंसा, नारेबाजी और उपद्रवों में रुचि लेने लगा है।
सत्ता में बैठे लोग मन ही मन खुश हैं कि उन्होंने नाटे लोगों के विकास की बाड़ गिरा भी दी और लंबे समुदाय वाले उन्हें अपना शुभचिन्तक भी मान रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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‘भैया, दिल्ली वाला गीत अभी क्यों रिलीज़ किया। यूक्रेन युद्ध पर कुछ इमोशनल-सा वीडियो बना दो। ग़ज़ब वायरल होगा। दिल्ली-विल्ली तो कभी भी चल जाएगा, इस टाइम वॉर के पोटेंशियल को कैश करो।’ -यह सलाह देनेवाला शख़्स मेरा हितचिंतक है, यह तय है। डिजिटल मार्केटिंग और आधुनिक बाज़ारों के मापदंड पर यह सलाह सही भी हो सकती है लेकिन मेरे भीतर का कबीर इस सलाह को सुनकर प्रसन्न होने की बजाय भयभीत हो गया है।
युद्ध बाज़ार में खींच लाया गया है और अब बाज़ार इससे लाभ उठाने के लिए युद्धरत है। यह मानवीय संवेदना की मृत्यु की घोषणा है।
पत्रकारिता का काम है कि भूख से पीड़ित व्यक्ति की सूचना समाज तक पहुँचाए। कविता का दायित्व है कि वह उस भूखे तन की न्यूनतम आवश्यकता पूर्ण करने योग्य संवेदना समाज में प्रसारित करे और राजनीति की प्रवृत्ति है कि वह उस भूखे को रोटी देते हुए फ़ोटो खिंचाकर उसका श्रेय लेने का श्रम करे। किन्तु लाइक्स और शेयर्स की अंधी दौड़ में संलग्न समाज उस भूखे तन को नोच-नोच कर वायरल होने का उपाय ढूंढ रहा है।
लाइक्स और शेयर्स की यह होड़ इतनी वीभत्स है कि घर परिवार में मृत्यु होने पर ‘शव’ के चित्र और ‘शवदाह’ के वीडियो लाइव करने से भी हमें संकोच नहीं होता। चुम्बन से लेकर गर्भावस्था तक सब कुछ केवल लाइक्स बटोरने का ज़रिया हो चला है।
अमानुष होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि किसी की आह सुनकर हमारी आँख में आँसू आने की बजाय, उस आह को बेचने के विचार से हमारी आँखों में चमक आ जाती है। युद्ध के सभी वीडियो बाज़ार ही वायरल करा रहा है यह सत्य नहीं है किन्तु हर वायरल होती वीडियो की संवेदना का बाज़ार भाव टटोला जा रहा है यह भयावह है।
अपने समाज के युवक-युवतियों को जब ‘अश्लील’ और ‘लगभग अश्लील’ रील्स तथा शॉट्स बनाते देखता हूँ तो एहसास होता है कि ‘समाज’ नामक जिस किले में हमने अपने परिवारों को सुरक्षित कर दिया था उसकी दीवारों में दरार पड़ गयी है। टीन-एजर्स को जब सार्वजनिक वीडियो में ‘गालियाँ’ बकते देखता हूँ तो साफ़ दिखाई देता है कि आँखों की हया और बड़े-बुजुर्गों के लिहाज का जो छप्पर हमने समाज पर डाल रखा था वह तार-तार हो गया है और हमारा समाज खुले आसमान के नीचे लगभग नंगा बैठा है।
इसके तन पर जो कुछ कतरनें बची हैं, उन्हें संवेदना की सीवन से न सीया गया तो आश्चर्य न करना कि बाज़ार में मातम की डिमांड होने पर पड़ोसी के घर का मातम बेचनेवाला यूट्यूबर अपने घर में ही प्रोडक्शन करने का जुगाड़ कर ले। अपराध का वीडियो आसानी से वायरल होता है, इस वीडियो को बनाने के लिए आपका नौनिहाल अपराध की राह पर किस दूरी तक जा सकता है, इसका अनुमान बहुत आवश्यक हो चला है। थोड़ी-सी उघाड़ करने से लाइक्स तेज़ी से आने लगे तो आपकी बेटियाँ लोभ के इस अंधकूप में जल्दी ‘सेलिब्रिटी’ बनने के लिए क्या कुछ कर जाएंगी इसका आभास बेहद ज़रूरी है।
हर आँसू, हर संवेदना, हर पीड़ा और हर रिश्ते को वायरल होने का एक अवसर मानना इन कर्णधारों को कितना बर्बर कर देगा… यह यथाशीघ्र अनुभूत कर लीजिए क्योंकि यदि ये शोर एक प्वाइंट और बढ़ गया तो फिर किसी भी तरह से आपकी बात इनके कानों तक नहीं पहुँच सकेगी। ‘कुछ भी’ करके वायरल होने की दौड़ लगाते इन होनहारों को रोक लो, वरना ये वायरल होने के लिए ‘कुछ भी’ कर जाएंगे…!
✍️ चिराग़ जैन
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‘सत्ता का खेल तो चलेगा। सरकारें आएंगी-जाएंगी। पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतन्त्र अमर रहना चाहिए। क्या आज के समय में ये कठिन काम नहीं हो गया है? ये चर्चा तो आज समाप्त हो जाएगी। मगर कल से जो अध्याय शुरू होगा, उस अध्याय पर थोड़ा ग़ौर करने की ज़रूरत है। ये कटुता बढ़ना नहीं चाहिए।’ -पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के ये शब्द आज भी रह-रहकर हमारे कानों में गूंजते हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में वितण्डावाद का जो ताण्डव हम दिन-प्रतिदिन देख रहे हैं, उसके अंत में हमारे पास कटुता के अतिरिक्त कुछ शेष न रह जाएगा। राजनैतिक दलों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर जिस तरह से एक पूरी पीढ़ी की सोच को सीमित करने का प्रयास किया है, वह पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के स्वर में वर्णित ‘लोकतंत्र’ की परिकल्पना के विपरीत आचरण का मार्ग है। मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल की है।
रामायण ने हमें सिखाया है कि शत्रु जिस द्वार से आक्रमण करेगा, समाधान भी उसी द्वार से आएगा। यही कारण है कि लक्ष्मण मूर्च्छित हुए तो वैद्य सुषेण भी उसी लंका से उपचार के लिए आए, जिससे मेघनाद आया था।
यदि हम आज से ही सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय कुछ बातों का पालन करना प्रारंभ करें तो शायद इस माध्यम का प्रयोग करके प्रोपेगैंडा करने वाली सभी एजेंसियाँ हतोत्साहित होंगी। फिर देशहित की बात करने पर जब कोई आप पर तंज करेगा कि आप राजनैतिक माहौल सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं; तो आप उसे बता सकेंगे कि हम अफवाह के उस तंत्र की जड़ खोद रहे हैं, जिसकी डालियों पर सामाजिक विघटन के फल लगते हैं।
1. यदि जन-सामान्य की समस्या से जुड़ी अथवा लोकतंत्र की समालोचना से संबंधित किसी पोस्ट को अमुक राजनैतिक दल का ‘विरोध’ सिद्ध करने का प्रयास किया जाए तो ऐसे कमेंट्स को इग्नोर करेंगे। उन्हें उत्तर देते ही आप उन्हें सफल कर देंगे क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह है कि आप विषय को भूलकर स्वयं को निष्पक्ष साबित करने में व्यस्त हो जाएँ।
2. अश्लील, अभद्र तथा असंसदीय शब्दावली का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को (भले ही वह आपकी पोस्ट के समर्थन में हो) तुरंत ब्लॉक करेंगे।
3. किसी भी सम्प्रदाय की आड़ में कट्टरता, अराजकता और हिंसा का समर्थन करनेवाले व्यक्ति की पोस्ट/कमेंट को इग्नोर करेंगे।
4. उन फेक प्रोफाइल्स की पहचान करके उन्हें अपनी मित्रता सूची से बाहर करेंगे, जिनका निर्माण ही किसी दल अथवा विचारधारा के प्रचार हेतु किया गया है। ध्यान से देखने पर आप समझ जाएंगे कि ऐसी प्रोफाइल्स पर डीपी से लेकर वॉल तक कहीं भी प्रोफ़ाइल होल्डर की पहचान नहीं मिलती। इनकी वॉल पर या तो डीपी चेंज नोटिफिकेशन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा या फिर राजनैतिक दलों के प्रोपेगेंडा पेज से शेयर करके लाई गई पोस्ट्स होंगी। ये ही वो प्रोफाइल्स हैं जिनके दम पर राजनैतिक दल अफवाह और झूठ फैलाने तथा मुद्दों से भटकाने में सफल होते हैं।
5. किसी भी राजनेता के निजी जीवन में प्रवेश करके उसकी चरित्र हत्या को ‘आलोचना’ का नाम देने वाली पोस्ट से दूरी बनाए रखेंगे। क्योंकि किसी की निजता का सम्मान न किया गया तो भविष्य में कोई भी समाज के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं करेगा।
6. किसी राजनेता का नाम बिगाड़कर, या उसे फेंकू, तड़ीपार, पप्पू, टोंटीचोर आदि नाम से संबोधित करनेवालों को दूर से प्रणाम करेंगे क्योंकि इनके पास कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक समझ नहीं है, ये लोग सुनी-सुनाई अभद्रता से विषय को भटकाना चाहते हैं।
7. किसी भी राजनेता की बीमारी, चोट, कद-काठी, लिंग, जाति, धर्म, रंग, चेहरा-मोहरा और बोली का उपहास करके मूल विषय को भटकाने के प्रयासों से सावधान रहेंगे क्योंकि हमें राजनेताओं से जनता का नेतृत्व करवाना है, उनसे पारिवारिक सम्बंध नहीं जोड़ना है।
8. टीवी डिबेट में अलग-अलग राजनैतिक दलों के प्रवक्ता जिन जुमलों से बहस को नष्ट कर देते हैं, उन जुमलों से अपनी पोस्ट्स और कमेंट बॉक्स को बचाएंगे।
9. वर्तमान अथवा भविष्य के प्रश्न को इतिहास, जाति अथवा सम्प्रदाय पर अटकाकर नष्ट करने वालों को उत्तर देने में ऊर्जा ध्वंस नहीं करेंगे।
10. फेसबुक पर कुछ भी लिखने से पूर्व यह विचार अवश्य करेंगे कि इससे किसी प्रकार से मनुष्यता अथवा लोकतंत्र तो आहत नहीं हो रहा।
ये नियम यदि हमने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से पालन करने आरम्भ कर दिए तो मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि आप बहुत जल्दी ही अपने समाज को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे वितण्डों से मुक्ति होता देखेंगे।
और एक अंतिम बात- अपने रक्त संबंधों; पारिवारिक मित्रों; सहकर्मियों; सहयात्रियों अथवा संबंधियों से चर्चा करते समय यदि अपने पक्ष और संबंध में से किसी एक को चुनना पड़े तो संबंध को बचाएंगे क्योंकि जो हमारे अपने हैं, वो आज नहीं तो कल हमारे साथ अवश्य खड़े होंगे।
भारत एक ऐसा उपवन है जहाँ अलग-अलग रंग के फूल खिलते हैं। हमें उन व्यापारियों की कोई ज़रूरत नहीं है, जो फूलों को डालियों से अलग करके बाज़ार में बेच दें। हमें तो वह माली चाहिए जो अलग-अलग रंग के फूलों को करीने से लगाकर बगीचे की सुंदरता बढ़ा सके।
सहमत हों, तो राष्ट्रहित में शेयर ज़रूर करें।
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय जनता पार्टी के चुनावी चाणक्य बाक़ायदा मीडिया के सामने बैठक बुलाकर यह बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का वोट अपनी ओर मिलाने के लिए वे जाट नेताओं को माना रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी घोषणा करके दलितों की पार्टी होने का दावा करती है। एआईएमएम घोषित करती है कि वह मुसलमानों की पार्टी है। शिवसेना डंके की चोट पर ख़ुद को हिन्दू समाज की पार्टी बताती है। शिरोमणि अकाली दल के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि वह सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है।
और यह सब तब जबकि हमारे यहाँ संवैधानिक रूप से धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर कोई राजनैतिक दल गठित नहीं किया जा सकता।
आज जब दिल्ली में जाटों की मनुहार चल रही थी तो उस पंचायत में भाग लेने के लिए माननीय गृहमंत्री जी गणतन्त्र दिवस की परेड से सीधे वहाँ पधारे थे। बाद में टीवी चौनल्स पर जाट नेता सर-ए-आम बता रहे थे कि जाट किस दल को वोट देंगे। और यह सब तब जबकि हमारा संविधान हमें बताता है कि भारत में गुप्त मतदान प्रणाली है और किसी भी मतदाता पर न तो किसी को मत देने के लिए दबाव बनाया जा सकता है न ही उससे पूछा जा सकता है कि वह अपने मताधिकार का प्रयोग किसके पक्ष में करेगा!
इन सब विरोधाभासों को देखता हूँ तो समझ आता है कि भारतीय लोकतंत्र एक ऐसा ढकोसला बनकर रह गया है जिसकी गरिमा को तार-तार करने में पूरा तंत्र समान रूप से सक्रिय है। सभी राजनैतिक दल भारतीय लोकतंत्र को बाल पकड़कर घसीटते हुए जुआघर में लाते हैं और बारी-बारी से उसका चीरहरण करते हैं। बस अंतर इतना है कि जब एक पक्ष चीरहरण कर रहा होता है तो दूसरा पक्ष पांडवों के कपड़े पहन लेता है और जब दूसरा पक्ष चीरहरण में संलग्न होता है तो पहला पक्ष लपक के उसके कपड़े लपेटकर नैतिक होने का अभिनय करने लगता है।
लोकतंत्र बेचारा ईश्वर से गुहार लगाता है। बीस-तीस वर्ष की गुहार के बाद ईश्वर तो नहीं आता लेकिन ईश्वर का गेट-अप पहनकर कोई आता है और दोनों पक्षों को तितर-बितर करके ख़ुद चीरहरण करने लगता है। सभागार में बैठे राजा से लोकतंत्र इसलिए कुछ नहीं कह पाता, क्योंकि राजा की आँखों पर लोकतंत्र ने ख़ुद अपने हाथों से पट्टी बांधी है।
सभा में कुछ विदुर भी हैं। जो इस चीरहरण पर दोनों पक्षों से प्रश्न करता है। लेकिन दोनों पक्ष चीरहरण की अनैतिकता पर उत्तर देने की बजाय विदुर से प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब उस पक्ष वाले चीरहरण कर रहे थे तब तुम कहाँ थे?
विदुर बताता है कि मैं उनसे भी प्रश्न कर रहा था। लेकिन वे उसकी बात नहीं मानते और उसके प्रत्येक प्रश्न पर प्रतिप्रश्न उछाल कर उसे लोलक की भाँति इधर-से-उधर दौड़ाते रहते हैं।
इस भागदौड़ से परेशान होकर कभी-कभी विदुर किसी एक पक्ष के साथ चीरहरण में शामिल हो जाता है और जो विदुर ऐसा नहीं कर पाता वह इस गुत्थी को सुलझाने में उलझ जाता है कि दोनों में से कौन सा पक्ष अधिक बेहतर है। वह जिसने एक ही झटके में लोकतंत्र को निर्वस्त्र कर दिया, या फिर वह जिसने तड़पा-तड़पा के हलाल स्टाइल में कपड़े उतारे।
आज गणतंत्र दिवस के दिन यह लिखते हुए मेरे भीतर एक सिहरन हो रही है कि इस देश के गणतंत्र पर राजनीति का घुन लग चुका है। बेशर्मी और ढिठाई से दल बदलने वाले लोग; अपनी कही हुई बात से पलट जाने वाले लोग; जिसे गाली दें, स्वार्थ के लिए उसके गले लग जाने वाले लोग; जिसकी उंगली पकड़ कर चले, उसे लात मारने वाले लोग; रंगे सियारों की तरह अपने मुंह में तिनके ठूस कर मौक़ा मिलते ही हुआ-हुआ करने वाले लोगों में से भारतीय समाज का भविष्य तलाश पाना लगभग असंभव हो चुका है।
चुनाव के इस भौंडे नाटक के बीच भारतीय जनमानस के भविष्य पर कालिख पोती जा रही है। लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि यदि एक व्यक्ति भी इस लेख से यह समझ सका कि जिन राजनैतिक सियारों के स्वर में स्वर मिलाकर हम अपने आंगन में विष बो रहे हैं, उनका न हो हमारे धर्म से कोई सरोकार है, न हमारे वंशजों से, न हमारे भविष्य से और न ही हमसे; तो मुझे लगेगा कि अभी इस राष्ट्र की राजनीति को यह भय दिखाया जा सकता है कि जनता का विवेक अभी मरा नहीं है।
© चिराग़ जैन