Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमने लड़ाकों के इतने गुण गाए हैं, कि हम सौहार्द और शांति को ‘हीन’ मान बैठे हैं। हम अहिंसा का संदेश देनेवाले महावीर की संज्ञा को समझने में चूक गए हैं। अध्यात्म की पाठशाला में हमने ‘धैर्य’; ‘क्षमा’; ‘दया’; ‘करुणा’; ‘विश्वास’; ‘आत्मबल’; ‘त्याग’ और ‘परोपकार’ की थ्योरी अवश्य पढ़ी, किंतु प्रैक्टिकल करने के समय हमने धैर्य को उद्वेग से रिप्लेस कर दिया। क्षमा को हम प्रतिशोध की ज्वाला में भस्म कर बैठे। दया और करुणा को हमने अनावश्यक घोषित कर दिया। विश्वास करनेवाले को हम मूर्ख कहने लगे। आत्मबल की धार को हमने कृत्रिम अस्त्र की ओट में ओझल कर दिया। त्याग को हमने कायरता और पलायन कहना शुरू कर दिया तथा परोपकार को हमने स्वार्थ की नृशंसता से विक्षिप्त कर डाला।
अब हमारे पास समाज को बाँटने के लिए घृणा की दुधारी तलवार है, जिससे हम अपने विवेक का कचूमर निकाल चुके हैं। पिछली कई सदियों से हम लगातार इस तलवार से वार करते जा रहे हैं और हर वार आख़िरकार हमें और अधिक विवेकहीन बनाए जा रहा है।
और मज़ेदार बात यह है कि इस तलवार को हम अपनी मर्ज़ी से नहीं अपितु किसी न किसी सत्ता के कहने से चला रहे हैं। अंग्रेजों ने हमें हिन्दू मुस्लिम में बाँटकर दोनों वर्गों के हाथ में ऐसी तलवारें थमा दीं और हम लगे अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने। ऊँची जाति-नीची जाति, सिया-सुन्नी, दिगंबर-श्वेतांबर, सरयूपारीण-कान्यकुब्ज; भूमिहार-वेदपाठी, दक्षिण भारतीय-उत्तर भारतीय; सैयद-खान और न जाने कितने सारे वर्गों में बँटकर हम एक-दूसरे से घृणा करते रहे हैं। हमें यह कहा जाता रहा है कि तुमने तलवार नहीं चलाई तो सामने वाले तुम्हें मार देंगे। जबकि सामनेवाले हमारी तलवार की पहुँच में थे ही नहीं। हमारी घृणा की तलवार हमें ही लहुलुहान करती रही है और सामनेवाले अपनी घृणा की तलवार से खूनम-खून होने के लिए आत्मनिर्भर हैं। लेकिन हम हर रक्तपात का गुणगान करते हुए नाचते रहे हैं।
हम यह बात मान चुके हैं कि लड़नेवाले ही जिवित रहते हैं। जबकि लड़ाई की राह छोड़कर मौन हो गए अवतारों ने हमें बताया कि बाहर चल रही इस भीषण मारकाट से अधिक कठिन है अपने आपको जीतना।
लेकिन हम कमाल के लोग हैं। हमने हर युग में समाज को विवेकशील बनानेवाले को मौत के घाट उतार दिया। हमने मूर्खता की पोल खोलनेवाले हर शख़्स को ‘धर्मविरोधी’ घोषित करके मार डाला। हमने सुकरात की हत्या की क्योंकि उसने हमें विवेकशील बनाने की भूल की। हमने मीरा को मार डाला क्योंकि उसने हमें प्रेम के विदेह होने की सूचना दी। हमने जीसस को मार डाला क्योंकि उसने हमें करुणा का पाठ पढ़ाया। हमने गांधी को मार डाला क्योंकि उसने हमारे आत्मबल को जागृत करने का दुस्साहस किया।
बिल्कुल सही हुआ इन सबके साथ। ये सब लोग अपने-अपने समय की सियासत के लिए ख़तरा बन गए थे। इसलिए इनका मरना आवश्यक हो गया था। इन सभी के हाथ आडंबर के बदबूदार पर्दे को खींचकर फेंक देना चाहते थे। ऐसे में अगर इन्हें जिवित छोड़ दिया जाता तो ये समाज को सत्य के सम्मुख ला खड़ा करते। इससे तो समाज विवेकी बन जाता। फिर घृणा की तलवार का चलना असंभव था। फिर आडंबर का धंधा चलना नामुमकिन था।
फिर रक्तपात पर जयकारे नहीं, करुणा उपजती। फिर युद्ध को किसी जीवन का लक्ष्य नहीं, बल्कि किसी समस्या का अंतिम उपाय समझा जाता।
ऐसी स्थिति में भय की सत्ता ध्वस्त हो जाती। ऐसे में घृणा का कारोबार चौपट हो जाता। लोग ख़ुद को लहुलुहान करना छोड़ देते तो मरहम के व्यापारी देवदूत का रूप धरकर उन्हें ग्राहक कैसे बनाते।
इसलिए विवेक जगानेवाले को मौत के घाट उतार देना सत्ता के लिए परम आवश्यक है। इसलिए आडंबर का कोलाहल ‘शोर’ बन जाने की हद्द तक बना रहना चाहिए क्योंकि अगर इस शोर से मनुष्य के कानों को थका नहीं दिया गया तो ये कान अपने राम, अपने कृष्ण, अपने महावीर, अपने बुद्ध, अपने वाल्मीकि, अपने रैदास, अपने जीसस और अपने पैगंबर का मौन सुन लेंगे और यह स्थिति हथियारों के व्यापारियों के लिए घातक सिद्ध होगी। विवेक जाग गया तो अर्थ की सत्ता निस्तेज हो जाएगी। विवेक जाग गया तो अनर्थ हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
आर्टिस्ट ग्रीन रूम में तैयार था मगर
इस ज़िन्दगी ने मंच का परदा गिरा दिया
जिजीविषा की लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद ठहाके का हिचकी में तब्दील होना यकायक पलकें नम कर गया। ऐसा लगा ज्यों किसी ने अचानक हमारे बिल्कुल आसपास की रौनक को वीराने में बदल दिया हो। मृत्यु को बहुत नज़दीक से देखा है, इसलिए भयभीत तो नहीं हुआ लेकिन विरक्ति का एक आश्चर्यबोध मन में अवश्य भर गया।
इस ख़बर को सुनने के बाद स्वयं से देर तक वाद-विवाद हुआ। क्या हम कलाकारों का संघर्ष कभी यह विश्व समझ पाएगा? क्या सफलता-विफलता के मध्य खड़े एक कोरे मनुष्य के ललाट का लेखा पढ़ने की फ़ुरसत कभी इस जगत् को मिल सकेगी? ट्रेड मिल पर दौड़कर स्वयं को सुदर्शन बनाए रखने की क़वायद हमें क्यों करनी पड़ती है, क्या इस प्रश्न का उत्तर यह दुनिया कभी ख़ुद से मांगेगी?
दिल्ली के निगम बोध घाट पहुँचा तो राजू भाई की अंत्येष्टि में भारी भीड़ थी। इस हुज़ूम में दस प्रतिशत मीडियाकर्मी थे, जो दुनिया को अलविदा कहकर जा रहे कलाकार की अंतिम यात्रा की कुछ फुटेज जुटाने के उद्देश्य से वहाँ उपस्थित थे। दस प्रतिशत कुटुम्बीगण थे, जिनके भीतर का रीतापन माप पाना उस दिन किसी पैमाने के वश में नहीं था। पन्द्रह-बीस प्रतिशत मित्र, सहकर्मी तथा प्रशंसक रहे होंगे, जो किसी साथी के छूट जाने की अंतिम छुअन को अनुभूत करने वहाँ पहुँचे थे।
इसके अतिरिक्त शेष सभी वहाँ एक साथ कई सारे सेलिब्रिटीज़ के साथ सेल्फ़ी खिंचाने का अवसर भुनाने पहुँचे थे। मसान के भयावह सत्य में एक ओर फूलों से सजी गाड़ी में से दिवंगत राजू श्रीवास्तव का पार्थिव शरीर उतारा जा रहा था और दूसरी ओर ‘अबे देख सुरेन्दर शर्मा’; ‘ओए वो देख अशोक चक्रधर’ की उत्सुक प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए लोग अपने स्मार्टफोन में तस्वीरें उतारने में व्यस्त थे।
एक बार तो मुझे लगा कि डिजिटाइज़ेशन ने मृत्यु की भयावहता को घिनौना भी बना दिया है। लेकिन फिर समझ आया कि एक आमजन के जीवन में कलाकार का कुल अस्तित्व मनोरंजन की एक रात या सेल्फी के एक अवसर से अधिक कुछ नहीं है। मैं भीड़ से दूर एक बेंच पर बैठा सब कुछ देख रहा था, कोई मेरे साथ फोटो खिंचाने आया भी तो मैंने अपने विरक्तिसिक्त मन से उसकी इच्छा पूरी कर दी।
एक ओर मंत्र पढ़े जा रहे थे, दूसरी ओर कुछ जोशीले युवा ‘राजू भाई अमर रहें’ के नारे लगा रहे थे। एक तरफ़ कुछ आँखें भीग रही थीं, दूसरी ओर कुछ चेहरों पर इस बात की ख़ुशी थी कि कितने सारे सितारे इतनी आसानी से मिल गए।
इस आसानी की क़ीमत चुकाकर राजू भाई चिता पर लेट चुके थे। शो-बिज़ का भौंडा दिखावा ज़ारी था। छोटे-मोटे कलाकार भरे मन से इस दिखावटी दुनिया में होने का मूल्य अदा कर रहे थे और असली फनकार चिता की लपटों में लिपटा हवा हुए जा रहा था। चिता के धुएं से हवा में कुछ आकृतियाँ उभर रही थीं, मानो ठहाकों का शहंशाह हवा की मिमिक्री करता हुए दूसरे लोक में जा रहा हो…!
✍️ चिराग़ जैन
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जो व्यक्ति घर में फैले कचरे से परेशान है, वह घर से प्यार करता है। उसे यह कहकर ट्रोल नहीं किया जा सकता कि वह हमारे घर को कचरा कहकर हमारी भावनाओं को आहत कर रहा है।
जो कचरे को देख ही नहीं पा रहा है, वह उसे साफ़ कैसे करेगा? यदि कभी उसे सफाई का अभिनय करना भी पड़ा तो वह अनजाने में घर का ज़रूरी सामान कचरे के दाम बेच देगा। क्योंकि जो लोग उसे सामान और कचरे की पहचान करा सकते थे उनकी आवाज़ को तो उसने घरद्रोही कहकर ख़ामोश कर दिया था।
जो मेहमान के आने पर कचरे को कोने में दुबकाने में विश्वास करता है, वह घर भर को बदबू से भरने की तैयारी कर रहा है। दीवार के ऊपर चूना पोत देने से भीतर की दीमक ढक जाती है, मरती नहीं है। घर को दीमक मुक्त करने के लिए दीमक की बांबी तक पहुँचना होगा। लेकिन जो भी इस प्रयास में दीवार को खुरचने चला, उसे आपने घरद्रोही कहकर प्रताड़ित किया। उसके हाथ में जो औज़ार थे, उन्हें हथियार सिद्ध करके आपने उसे घर से बहिष्कृत भी करवा दिया। घर के प्रति उसकी सद्भावना को निर्वसन करके निष्कासित कर दिया।
जिन हाथों में दीमक के उपचार का यंत्र था, वे हाथ अपने चीथड़े सम्भालने में व्यस्त हो गए। उधर दीमक दीवार को खोखला करके बाहर निकलने लगी तो उस शक्तिहीन बहिष्कृत को कोसते हुए आपने दीवार से बाहर निकलते घिनौने बुरादे के आगे कोई शोपीस रख दिया। जब दीमक वह शोपीस भी खाने लगी तो आपने किसी दूसरी दीवार पर घर के किसी पुरखे की तस्वीर टांक दी और घोषित कर दिया कि घर का जो सदस्य इस तस्वीर का सत्कार नहीं करेगा, वह घर द्रोही होगा।
घरवाले पुरखे की तस्वीर पूजने में व्यस्त हो गए और दीपक पुरखों की विरासत को खोखला करती रही। जब तस्वीर भी दीमक के आगोश में समाने लगी तो सबको अलग अलग तस्वीरें थमा दी गईं।
पुरखों के बनाए घर पर दीमक लगी है और हम अपनी अपनी तस्वीरें लेकर इतरा रहे हैं। जिसने यह दीमक देख ली उसकी आँखें मत फोड़ो। जो रोज़ नया शोपीस रखकर आपको एक कमरे से दूसरे कमरे में टहला रहा है, उसके मन का कपट समझने का प्रयास करो, क्योंकि उसने आपके पूरे घर को दीमक का चारा बना डाला है।
✍️ चिराग़ जैन
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‘व्यू बढ़ाने के लिए कुछ भी करेंगा‘ -यह वाक्य वर्तमान समाज का मूलमंत्र बन गया है। किसी की औक़ात और हैसियत इस बात से मापी जाने लगी है कि उसे कितने लोग फॉलो करते हैं। दुनिया के तमाम काम लाइक, फॉलो, सब्रक्राइब, शेयर और कमेंट जैसे शब्दों तक सीमित हो गए हैं।
आप कितने भी बड़े योगी हों, अगर आपके सोशल मीडिया फॉलोअर्स नहीं हैं, तो आपका योग किसी काम का नहीं। और अगर आपने किसी तरह से सोशल मीडिया पर स्वयं को योगी सिद्ध कर दिया तो फिर योग की कोई सिद्धि हो या न हो, कोई फर्क़ नहीं पड़ता। इसीलिए सफल योगी बनने के लिए योग करने से अधिक आवश्यक है, ट्वीट करना।
आपकी दुकान चले या न चले, फेसबुक चलती रहनी चाहिए। फेसबुक की एक्टिविटी रुक गयी तो दुकान पर ग्राहकों की भीड़ से कोई लाभ नहीं।
आप वाइल्ड लाइफ सफारी पर जाएँ तो पर्यटक बनकर नहीं, फोटोग्राफर बनकर जाएँ। शेर दिखे तो उसे निहारने की बजाय कैमरा निकालकर जिराफ़ बन जाइए। न जाने कौन-सा क्लिक आपको इंस्टा पर फेमस कर देगा।
रील्स देखो तो समझ आता है कि फेमस होने की इस होड़ में न कोई मर्यादा शेष बची है, न ही कोई हिचक। साठ सेकेंड तक दर्शकों को अपनी रील पर रोके रखने के लिए सारी सीमाएं लांघ दी गईं। कूल्हे मटकाकर दर्शकों का मन नहीं बहला तो नंगी पीठ दिखाकर रोक लिया। इससे भी बात नहीं बनी तो भद्दी गालियाँ देकर फेमस होने निकल पड़ी। आजकल स्कर्ट या फ्राक के नीचे के वस्त्र दिखाने तक को नॉर्मल माना जाने लगा है। 30 सेकेंड की इन वीडियो क्लिप को मिलियन और बिलियन व्यू का आँकड़ा दिलाने के लिए युवतियों ने लज्जा को ब्रेन से ब्लॉक कर दिया है।
पुरुष भी इस अपराध में समान उत्तरदायी है। पूरा-पूरा दिन स्क्रॉल करके रील देखनेवाले अंगूठों की रेखाएँ घिसने लगी हैं। मोबाइल की स्क्रीन में क़ैद हो चुकी आँखों में इतनी रौशनी ही नहीं बची है कि हम अपने समाज पर घिर आए अंधेरे को पहचान सकें। जिस युवा पीढ़ी के हाथों में देश की बागडोर होनी थी उसके हाथ टच स्क्रीन मोबाइल की अदृश्य बेड़ियों से बंधे हुए हैं। अफ़ीम के नशे से तो देश बच गया लेकिन मोबाइल के असीम नशे से बचने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है।
ट्रेन के आगे लेटने से लेकर अनावश्यक और वीभत्स स्टण्ट करने तक सब कुछ करने की हिम्मत है इस पीढ़ी के पास। फेसबुक लाइव पर आत्महत्या तक देख चुके हम लोग फेमस होने की इस अंतहीन होड़ में अपने वारिसों के स्वर्णिम भविष्य की बलि लिए चले जा रहे हैं। मृत्यु के भयावह वीडियो जब तक गूगल और फेसबुक के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस द्वारा अवरुद्ध किए जाते हैं तब तक उन्हें डाउनलोड करके व्हाट्सएप पर वायरल कर दिया जाता है। यूट्यूब का सिस्टम गुप्तांगों की पहचान करने में सक्षम है और ऐसे सभी वीडियो ब्लॉक कर देता है जिनमें स्त्री अथवा पुरुष के गुप्तांगों का स्पष्ट प्रदर्शन हो।
गूगल की इस क्रूरता से लड़ने के लिए हमारे क्रांतिकारी युवाओं ने ऐसे झीने उपाय खोज लिए हैं, जिन्हें गूगल की आँखें न बेंध सकें लेकिन समान्य व्यूअर का मन बहलता रहे। झीना परिधान ख़रीदने की स्थिति न हो तो किसी भी कपड़े पर पानी डालकर अपने फॉलोअर का मन बहलाया जा सकता है।
आप किसी भी धर्म से संबद्ध हों, फेमस होने की भूख ने आपके समाज के युवाओं को अभद्र तथा आपके समाज की युवतियों को अश्लील बनाने की पूरी तैयारी कर ली है। सुहागरात की वीडियो बनाकर वायरल करने तक के क़िस्से सामने आ रहे हैं।
प्रेम, वात्सल्य, संवेदना, करुणा और यहाँ तक कि हास्य भी किसी एक इमोजी का मोहताज होकर रह गया है। प्रतिक्रिया के बहाने आपके सोचने-समझने की क्षमता जीवित न हो जाए इसलिए आपका स्मार्टफोन आपको हर बात का उत्तर देने के लिए प्री-फिक्स वाक्यों का सुझाव दे देता है। हर भाव को व्यक्त करने के लिए इमोजी उपलब्ध है, अब आप अपने चेहरे पर भाव लाए बिना भी अपनी प्रतिक्रिया लिखकर भेज सकते हो।
ज़ुबान कट जाए तो जी सकते हैं लेकिन अंगूठा कट गया तो जीना सम्भव न होगा। दवाई छूट सकती है लेकिन पोस्ट नहीं छूटनी चाहिए। बैंक का ब्याज कम हो जाए पर चैनल का ग्राफ नहीं गिरना चाहिए। चैनल की पॉपुलरिटी कम होने लगे तो किसी को गाली दे दो, किसी की चरित्र-हत्या कर दो, ख़़ुद नंगे हो जाओ या किसी को नंगा कर दो… चैनल चलता रहना चाहिए।
कुछ न कर सकें तो भी ‘केवल फेमस होने की भूख से ओतप्रोत’ अनर्गल, अश्लील, भौंडी, भद्दी, अभद्र वीडियो पोस्ट करनेवालों को ब्लॉक करने की पहल भी कर ली तो इस मरती हुई संस्कृति को कुछ साँसें उधार देनेवालों में आपका नाम भी शामिल होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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एक राजा के दो बेटे थे। एक नाटे कद का था और दूसरा लंबे कद का। बचपन से ही दोनों में तनाव रहता था। जब वे बड़े हुए तो राजा ने राज्य का बंटवारा कर दिया और पूरे देश के अधिकतम नाटे नागरिक नाटे बेटे के देश में चले गए। मूल राज्य में लंबे नागरिक रह गए। लेकिन कुछ नाटे लोग अपना देश छोड़कर नाटे देश में नहीं गए और लंबे राजा के शासन में रहने लगे।
लंबे राजा ने अपने राज्य में बचे सभी नाटे लोगों को माली, तांगा, मजदूरी, दर्जी, हजामत और अन्य छोटे कामों में लगाए रखा। वे सोचने-समझने का विवेक न हासिल कर लें इसलिए नगर में जगह जगह उनके लिए नाटे बाबा के नाम पर समुदाय केंद्र बना दिये जहां हर ढाई पहर बाद पूरे नाटे समुदाय को इकट्ठा होना अनिवार्य कर दिया। अपने लोगों से उनके बीच यह बात और फैला दी कि वो जितने ज़्यादा बच्चे पैदा करेंगे उतना ही उनका भला होगा। उन्हें यह भी बता दिया कि उनकी किसी भी परम्परा में यदि बदलाव किया गया तो यह उनकी सामुदायिक भावनाओं का अपमान होगा।
अब लंबे लोग व्यापार करते रहे और नाटे लोग उनके यहां नौकरी करते रहे और बदबूदार परंपराओं को निबाहते हुए जनसंख्या बढाने में लगे रहे। विकासहीन रूढ़ियों में बंधी यह जनसंख्या अपने संकरे मुहल्लों में सीमित रहकर बीमारियों और अशिक्षा का शिकार बनी रही।
कुछ समय बाद लंबे समुदाय के कुछ लोग नाटे लोगों की इस दशा से द्रवित हुए और उन्होंने स्वयं को लंबे समुदाय का शुभचिंतक घोषित करके राज्य की सत्ता हथिया ली। सत्ता हाथ में आते ही उन नए राजाओं ने सबसे पहले नाटे समुदाय में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना शुरू किया। उनके समुदाय केंद्र ध्वस्त करने शुरू कर दिए। और अपने लोगों से लंबे समुदाय में यह बात फैला दी कि लंबे लोगों को भी हर ढाई पहर बाद लंबे बाबा के समुदाय केन्द्र पर इकट्ठा होना चाहिए और ज्यादा बच्चे पैदा करने चाहियें।
अब अपने ऊपर अचानक आए संकट से नाटे लोगों का समुदाय जागरुकता की ओर बढ़ने लगा है और शिक्षा, सभ्यता तथा विकास के पथ पर अग्रसर लंबू समुदाय काम-धंधा, रोज़गार, कला, हास्य और उत्सव भुलाकर कट्टरता, घृणा, प्रतिहिंसा, नारेबाजी और उपद्रवों में रुचि लेने लगा है।
सत्ता में बैठे लोग मन ही मन खुश हैं कि उन्होंने नाटे लोगों के विकास की बाड़ गिरा भी दी और लंबे समुदाय वाले उन्हें अपना शुभचिन्तक भी मान रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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‘भैया, दिल्ली वाला गीत अभी क्यों रिलीज़ किया। यूक्रेन युद्ध पर कुछ इमोशनल-सा वीडियो बना दो। ग़ज़ब वायरल होगा। दिल्ली-विल्ली तो कभी भी चल जाएगा, इस टाइम वॉर के पोटेंशियल को कैश करो।’ -यह सलाह देनेवाला शख़्स मेरा हितचिंतक है, यह तय है। डिजिटल मार्केटिंग और आधुनिक बाज़ारों के मापदंड पर यह सलाह सही भी हो सकती है लेकिन मेरे भीतर का कबीर इस सलाह को सुनकर प्रसन्न होने की बजाय भयभीत हो गया है।
युद्ध बाज़ार में खींच लाया गया है और अब बाज़ार इससे लाभ उठाने के लिए युद्धरत है। यह मानवीय संवेदना की मृत्यु की घोषणा है।
पत्रकारिता का काम है कि भूख से पीड़ित व्यक्ति की सूचना समाज तक पहुँचाए। कविता का दायित्व है कि वह उस भूखे तन की न्यूनतम आवश्यकता पूर्ण करने योग्य संवेदना समाज में प्रसारित करे और राजनीति की प्रवृत्ति है कि वह उस भूखे को रोटी देते हुए फ़ोटो खिंचाकर उसका श्रेय लेने का श्रम करे। किन्तु लाइक्स और शेयर्स की अंधी दौड़ में संलग्न समाज उस भूखे तन को नोच-नोच कर वायरल होने का उपाय ढूंढ रहा है।
लाइक्स और शेयर्स की यह होड़ इतनी वीभत्स है कि घर परिवार में मृत्यु होने पर ‘शव’ के चित्र और ‘शवदाह’ के वीडियो लाइव करने से भी हमें संकोच नहीं होता। चुम्बन से लेकर गर्भावस्था तक सब कुछ केवल लाइक्स बटोरने का ज़रिया हो चला है।
अमानुष होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि किसी की आह सुनकर हमारी आँख में आँसू आने की बजाय, उस आह को बेचने के विचार से हमारी आँखों में चमक आ जाती है। युद्ध के सभी वीडियो बाज़ार ही वायरल करा रहा है यह सत्य नहीं है किन्तु हर वायरल होती वीडियो की संवेदना का बाज़ार भाव टटोला जा रहा है यह भयावह है।
अपने समाज के युवक-युवतियों को जब ‘अश्लील’ और ‘लगभग अश्लील’ रील्स तथा शॉट्स बनाते देखता हूँ तो एहसास होता है कि ‘समाज’ नामक जिस किले में हमने अपने परिवारों को सुरक्षित कर दिया था उसकी दीवारों में दरार पड़ गयी है। टीन-एजर्स को जब सार्वजनिक वीडियो में ‘गालियाँ’ बकते देखता हूँ तो साफ़ दिखाई देता है कि आँखों की हया और बड़े-बुजुर्गों के लिहाज का जो छप्पर हमने समाज पर डाल रखा था वह तार-तार हो गया है और हमारा समाज खुले आसमान के नीचे लगभग नंगा बैठा है।
इसके तन पर जो कुछ कतरनें बची हैं, उन्हें संवेदना की सीवन से न सीया गया तो आश्चर्य न करना कि बाज़ार में मातम की डिमांड होने पर पड़ोसी के घर का मातम बेचनेवाला यूट्यूबर अपने घर में ही प्रोडक्शन करने का जुगाड़ कर ले। अपराध का वीडियो आसानी से वायरल होता है, इस वीडियो को बनाने के लिए आपका नौनिहाल अपराध की राह पर किस दूरी तक जा सकता है, इसका अनुमान बहुत आवश्यक हो चला है। थोड़ी-सी उघाड़ करने से लाइक्स तेज़ी से आने लगे तो आपकी बेटियाँ लोभ के इस अंधकूप में जल्दी ‘सेलिब्रिटी’ बनने के लिए क्या कुछ कर जाएंगी इसका आभास बेहद ज़रूरी है।
हर आँसू, हर संवेदना, हर पीड़ा और हर रिश्ते को वायरल होने का एक अवसर मानना इन कर्णधारों को कितना बर्बर कर देगा… यह यथाशीघ्र अनुभूत कर लीजिए क्योंकि यदि ये शोर एक प्वाइंट और बढ़ गया तो फिर किसी भी तरह से आपकी बात इनके कानों तक नहीं पहुँच सकेगी। ‘कुछ भी’ करके वायरल होने की दौड़ लगाते इन होनहारों को रोक लो, वरना ये वायरल होने के लिए ‘कुछ भी’ कर जाएंगे…!
✍️ चिराग़ जैन