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गुरूपूर्णिमा

एक महान आदमी में सीखने की प्रवृत्ति इतनी अधिक थी कि उसने गधे को भी गुरू बना लिया। लेकिन आजकल लोग गुरु को गधा बनाने पर तुले रहते हैं। इसका कारण ये नहीं है कि नयी पीढ़ी उद्दंड है बल्कि सुभद्रा मैया जब पिताजी की डींगों का इम्प्रेशन अभिमन्यु पर झाड़ रही थी तो अभिमन्यु माँ के पेट पर पेट के बल लेटा था।
गुरु पूर्णिमा का पर्व बढ़िया पर्व है। लेकिन गुरू का आकार इतना विशाल है कि पूर्णिमा को गुरु अपने पीछे छिपा लेता है। चेले पूर्णिमा को देख ही नहीं पाते। गुरुर्ब्रह्मा…… टाइप के श्लोक या गुरु गोविन्द दोउ खड़े….. टाइप के दोहे दोहराने में ही उनकी अमावस हो जाती है और पूर्णिमा गुरू के आभामंडल में समा जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

मारो वरना मारे जाओगे

लड़ना हमारी पौराणिक परम्परा है। हम सृष्टि के आदि से लड़ते आ रहे हैं। रामायण में लड़े, महाभारत में लड़े, बंगाल में लड़े, पानीपत में लड़े, उत्तर-दक्खिन-पूरब-पश्चिम हर दिशा में हमने किसी न किसी कालखंड में लड़ने की संभावनाएँ तलाश ही लीं। समाज ने शांति के लिये संतों का निर्माण किया, संतों ने आपस में लड़ना शुरू कर दिया।
हमारे इस युद्ध प्रेम को देखकर तुर्कों, मंगोलों और अफ़गानों से लेकर अंग्रेजों, पुर्तगालियों और फ़्रांसिसियों तक ने अपने निठल्ले बैठे लड़ाके हमारी ओर रवाना किये। किसी से सत्रह बार हारे तो किसी को सत्रह बार हराया।
अंग्रेज़ बेचारे यहाँ व्यापार करने के उद्देश्य से आये, लेकिन यहाँ की लड़ाका प्रतिभा को देखकर अपने मूल उद्देश्य से पथभ्रष्ट होकर ऊलजलूल लड़ाइयों में फँस गये। हमने उनसे कहा कि हम लड़ लड़ कर अपने देश का नास करेंगे। ये सुनकर वो हमसे लड़ने लगे और बोले, ऐसे कैसे नास करोगे। हमारे रहते तुम नास नहीं कर सकते। …बस इसी भावना से प्रेरित होकर वो यहाँ रेललाइनें बनाने लगे, पुल बनाने लगे, शहर बसाने लगे। हमें लगा कि नास और विकास की लड़ाई में हम हारे जा रहे हैं। बस फिर क्या था, हमने ज़ोर की लड़ाई की और अंग्रेज़ों को देश से बाहर खदेड़ दिया।
उनके जाते ही हम बँटवारे के नाम पर लड़े। फिर हैदराबाद, कश्मीर, जूनागढ़, बांग्लादेश, अरुणाचल और मुम्बई ने समय समय पर लड़ाई का मुद्दआ बनकर इस देश की परम्परा की रक्षा की।
नेहरू जी ने चीन के प्रधानमंत्री को एक बार इस मिट्टी का भोजन कराया, अपने बग़ीचे की हवा खिलाई, भाई इस हद तक प्रभावित हुआ कि चीन लौटते ही कर्ज़ चुका दिया। शास्त्री जी ने ताशकंद जाकर शांति समझौता किया, हमने उनसे लड़ाई कर ली कि आपकी हिम्मत कैसे हुई शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने की। उनकी हालत से सबक लेकर इंदिरा जी ने पाकिस्तान से लड़ाई की तो हम इंदिरा जी पर राशन पानी लेकर चढ़ गये, कि लड़ने की क्या ज़रूरत थी। उनको अपनी भूल का एहसास हुआ, उन्होंने तुरंत शिमला समझौता कर लिया तो हम उनसे फिर लड़े कि ये क्या बात हुई, पहले लड़ी फिर समझौता कर लिया।
तब से राजनेताओं ने सबक ले लिया ,वज़ह मत तलाशो, बस लड़ते रहो …अब इसने कुछ कहा है …चलो लड़ते हैं, अब इसने कुछ नहीं कहा है …चलो लड़ते हैं। लड़ाई का ये अनवरत क्रम देश के अस्तित्व का आधार बन गया है।
सीमा पर पाकिस्तान ने हमारे सैनिकों से लड़ाई की। ख़बर मिलते ही सरकार और विपक्ष संसद में लड़ने लगे। चैनल आपस में लड़ने लगे कि ख़बर किसने सबसे पहले दी। एक ने कहा मैंने सबसे पहले बताया कि पाँच सैनिक मरे हैं। दूसरे ने कहा, मैंने तो पहले के मरते ही न्यूज़ फ़्लैश कर दी थी कि पाँच मरेंगे। तीसरे ने कहा, मैंने तो सुबह ही ज्योतिषि से बुलवा दिया था कि शाम तक पाँच मरेंगे। एक ने संवेदनशील होते हुए कहा, ये पाँचों जब सेना में भर्ती हो रहे थे, तभी हमने घोषणा कर दी थी कि इनका मरना तय है।
बहरहाल, ख़बर तो आ चुकी है। अब संसद इस विषय पर लड़ रही है कि आगे किस तरह लड़ना है। किसी का कहना है कि गोले-बारूद से लड़ो, किसी की सलाह है कि बातचीत में लड़ो। किसी विद्वान ने सलाह दी है कि लड़ो मत, लड़ने की चर्चा करते रहो। इससे लड़ाई का माहौल बना रहता है और लड़ाकों का हौंसला भी बना रहता है।
महापुरुषों के कथन काम आ रहे हैं- हार मत मानो, जीवन एक युद्ध है, जीवन एक रणक्षेत्र है, अपने हक़ के लिये लड़ो, सच के लिये लड़ो, लड़ते रहो, भिड़ते रहो, मरते रहो, मारते रहो… उस मसख़रे को भूल जाओ जिसने कहा था- जीवन एक रंगमंच है, इस सत्य को याद रखो कि तुम्हारा जीवन एक एक्शन फ़िल्म है… सेंसर की परवाह मत करो, लड़ो, लड़ो, मारो वरना मारे जाओगे।

✍️ चिराग़ जैन

चुनावी माहौल में

कुछ पुरानी बहसें देख रहा था यूट्यूब पर। चुनावी माहौल में मुँह में तिनके दबाये कई भेड़िये रंगे सियारों के समर्थन से स्वयं को महान सिद्ध करते नज़र आये। “जनता”, “लोकतंत्र”, “ईमानदारी”, “राष्ट्रहित”, “जनसेवा” और “भारत माता” जैसे शब्दों को बोलकर अपना वाक्युद्ध जीतने पर जब वे कुटिल मुस्कान मुस्काते थे तो ऐसा जान पड़ता था कि जिस्म का धंधा करने वाली कोई त्रिया, सावित्री और अनुसूया से अपनी तुलना कर पावनता के मुख पर तमाचे मार रही हो।
मैं लोगों के मुख पर मुस्कान पिरोने वाला एक अदना सा कलाकार हूँ। सामान्य स्थितियों से हास्य जुटाना मेरा काम है। शब्दजाल बुनना और वाक्पटुता से सम्मोहन करने की कला मुझे और मेरे सहकर्मियों को माँ सरस्वती ने जन्म के समय सौगात में दे दी थी। ऐसे में किसी प्रकार की लच्छेदारी में से झाँक रही रंगदारी को पहचानना मेरे लिये कठिन कार्य न था।
हर चैनल की हर बहस में अनवरत एक-दूसरे की कुत्ता-फजीहत और खिखियाती हँसी का जब बहावानुवाद किया तो ये स्वर सुनाई पड़े- “तुम सब मूर्ख हो सालो! हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। हम ऐसे ही चैनलों पर टाइम पास करके चले जायेंगे और तुम अपने-अपने टीवी के सामने बैठे ये देखकर ख़ुश होते रहना कि फ़लां ने फ़लां को बढ़िया जवाब दे दिया। ये न्यूज़ चैनल भी हमारे ही चमचे हैं।”
वे जानते हैं कि हम इस बात से कोई सरोकार नहीं रखते कि जिन सवालों के जवाब इन बहसों में तलाशने का ढोंग किया जा रहा है, वे दरअसल हमारे हैं ही नहीं। वे ये भी जानते हैं कि इन बहसों को जनता ऐसे ही सुनती है जैसे बालिका वधु देख रही हो। सास-बहू पर विज्ञापन आ गये तो एनडीटीवी लगा लिया, थोड़ा मज़ा रवीश का ले लिया, फिर वहाँ विज्ञापन आये तो डिस्कवरी लगा लिया, तेंदुए और तेंदुई का संभोग देख लिया, वहाँ से कहीं और, और वहाँ से कहीं और।
हम रिमोट पर उंगलियाँ टिकाये लगातार अपने आप को बेवक़ूफ़ बनाये जा रहे हैं। हर पार्टी के अपने स्पोक्सपर्सन हैं, ये वो लोग हैं जो बहस बहुत अच्छी कर लेते हैं। ये वो टेस्ट खिलाड़ी हैं जो हारे हुए मैच को ड्रॉ की ओर ले जाने का हुनर जानते हैं। ये वो लोग हैं जो बहुत कम, य बहुत ज़्यादा बोल कर बहस का टाइम पास करना जानते हैं। ये वो लोग हैं जिनके किसी भी बयान को “उनकी निजी सोच” बताकर पार्टी अपना पल्ला झाड़ सकती है। यदि देश सेवा का हित है तो प्रवक्ताओं की क्या ज़रूरत? (मेरी इस बात पर कुछ लोग मेरा राजनैतिक बचकानापन कहकर खिल्ली उड़ासकते हैं) लेकिन उनको मैं पहले ही बता दूँ कि संगीन राजनैतिक अपराधों के इस दौर में राजनीति इसी बात का लाभ उठा रही है कि उन्होंने जनता को आपस में लड़ना सिखा दिया है।
किसी ने कोई बयान दे दिया, किसी ने उसका खंडन कर दिया, किसी ने स्याही फेंक दी, किसी ने चप्पल फेंक दी… हम देश की राजधानी में जीवन यापन कर रहे हैं। राजनीति जहाँ श्वास लेती है उस वातावरण से हम भी सिंचित हो रहे हैं। देश भर को प्रभावित करने वाली बौद्धिक तरंगें जब उद्घटित होती हैं तो सर्वप्रथम हमसे टकराती हैं। जब इस दौर से इतिहास प्रश्न करने खड़ा होगा तो उस समय दिल्ली की आम जनता से भी यह पूछा जायेगा कि तुमने क्यों इन सपोलियों को अपने आस-पास पनपने दिया। मैं जानता हूँ कि आप कहेंगे कि हम क्या कर सकते हैं? प्रश्न ये नहीं है कि हम क्या कर सकते हैं; प्रश्न ये है कि हमारी कुछ करने की इच्छाशक्ति कहाँ चली गयी।
चुनाव हो चुका है, 4 दिसम्बर से पहले मैं ये बातें करता तो लोग इसमें किसी पार्टी की महक ढूंढने लगते। इंदिराजी ने सबसे पहले मीडीया की ताक़त को समझा और आपातकाल के दौरान सर्वप्रथम मीडिया को पंगु बना दिया गया। सरकारी मीडिया आज तक उन सरकारी इंगितों का उल्लंघन करने का साहस नहीं जुटा पाया। तब से आज तक टीवी हमें बेवक़ूफ़ बनाता जा रहा है। अब तो राजनैतिक पार्टियों ने बाक़ायदा मीडिया प्रबंधन के लिये प्रकोष्ठ बना दिये हैं। साइबर मैनेजमेंट के लिये कार्यालय खोल दिये हैं। ठीक चुनाव के दिन जबकि चुनाव प्रचार बंद हो चुका है, सुबह-सुबह आपके घर पर एक अख़बार आता है और उसका मुखप्पृष्ठ एक पार्टी विशेष का विज्ञापन कर रहा होता है।
मैं ये नहीं कहता कि इन सब बातों को पढ़कर क्रांति की मशाल उठा लो। इस दौर में क्रांति के लिये घर-बार फूँकना कदाचित् कठिन न हो, लेकिन एक काम तो हम कर ही सकते हैं कि जब इस प्रकार के ढोंगी चैनलों पर राजनेताओं को बिठाकर एक-एक घंटे के बुलेटिन बनाये जा रहे हों तो उस वक़्त अपना चैनल बदल दो। जिस टीआरपी के दम पर ये लोग हमको बेचे जा रहे हैं, उसी टीआरपी को अपनी ताक़त बनाओ। जब इस तरह की बहसों की टीआरपी घटेगी तो कम से कम इन चैनल्स से मिलने वाली फ़ुटेज के दम पर राजनीति करने वाले लोग तो कम होंगे।
किसने क्या बयान दिया, या दिल्ली में किसकी सरकार आयेगी इस पर किस नेता की क्या राय है… इस प्रकार की बहसों से अगर हमने चैनल बदलना सीख लिया तो कम से कम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की दरारों को भरने में हम कुछ कर सकेंगे।

✍️ चिराग़ जैन

एफबी युग

फेसबुक की सूर्यरेखा अहर्निश गहराती जा रही है। लोगों के जीवन में फेसबुक ने इतना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है कि कुछ लोगों ने तो हर श्वास और हर उच्छ्वास की सूचना देना शुरू कर दिया है।
बहुत जल्द ही ईश्वर भी मनुष्य के जीवन की अवधि मापने के लिए श्वास, वर्ष अथवा ऋतुओं जैसी पुरातन इकाइयों के स्थान पर फेसबुक लाइक्स की गणना करेगा। फिर ये चार दिन की ज़िंदगानी सौ लाइक्स की ज़िन्दगी बन जाएगी। धर्मगुरु प्रवचनों में कहेंगे कि ईश्वर ने इस फेसबुक स्टेटस अपडेट करने के लिए ये ज़िन्दगी दी है, ऑफ़लाइन रहकर इस अनमोल जीवन को नष्ट न करो। धर्मशास्त्रों में लिखा जाएगा कि जो प्राणी दूसरों के स्टेटस पर लाइकदान नहीं करेगा उसे अगले जन्म में फेसबुक पर लॉगिन करने की सुविधा नहीं मिलेगी। दान तब भी चार प्रकार का ही रहेगा- लाइकदान, कमेंट दान, स्माइली दान और शेयर दान।
गूगलदृष्टा ऋषि हमें बताएंगे कि जो प्राणी दूसरों की अपडेट को लगातार इग्नोर करता है, उसे टैगिंग जैसे महान कष्ट को भोगना पड़ेगा। इस ख्याति से आकृष्ट हो देवतागण भी फेसबुक आई डी बना लेंगे। उदाहरण के लिए सूर्यदेव की फेसबुक प्रोफाइल पर रोज सुबह अपडेट होगा – ‘राइज़िंग फ्राॅम द ईस्ट’। इस स्टेटस के साथ सूर्यदेव अख़बार के ‘सूर्योदय समय’ की फोटो डालेंगे। चिड़िया इस स्टेटस पर ‘चीं-चीं’ कमेंट करेंगी। फूल इसके नीचे स्माइली पोस्ट करके लिखेंगे ‘खिल रहे हैं।’ दोपहर में सूर्यदेव फिर स्टेटस डालेंगे – ‘फीलिंग हॉट’। उसके नीचे पसीने का कमेंट होगा- ‘बह रहा हूँ।’
कुत्तों को रात में चिल्लाना नहीं पड़ेगा, वे आधी रात को ‘क्राइंग’ की स्माइली पोस्ट करके आराम से सो जाएंगे। चैकीदार हर एक घंटे बाद लिख देंगे- ‘जागते रहो।’ चोर उस स्टेटस को पढ़कर सावधानी पूर्वक चोरी का स्टेटस डालेंगे।
सब कुछ कितना आसान हो जाएगा। हिन्दू मुस्लिम दंगे ट्विटर-फेसबुक दंगों में तब्दील हो जाएंगे। किसी बात पर चार ट्विटरिये चार फेसबुकियों की प्रोफाइल पर पोर्न पोस्ट कर देंगे। इसके जवाब में फेसबुकिये ट्विटरियों की प्रोफाइल पर वायरस छोड़ देंगे। भयंकर दंगा होगा। ख़ूनख़राबे की जगह ब्लॉक-बवेला होने लगेगा।
सूर्य रोज़ निकलेगा लेकिन फेसबुक पर। हवा बहेगी लेकिन फेसबुक पर। चांद उगेगा लेकिन फेसबुक पर। फूल खिलेंगे लेकिन फेसबुक पर। बच्चा पैदा भी फेसबुक पर होगा, वह अपनी पहली किलकारी गले से नहीं कीबोर्ड से लिखेगा। वो रोज़ स्कूल जाने का स्टेटस डालेगा। फेसबुक पर ही शादी, वहीं बच्चे, वहीं बुढ़ापा और वहीं मौत। फेसबुक पर ही शव यात्रा होगी और वहीं दाह संस्कार।
कोई यूजर ट्विटर की प्रोफाइल डिलीट करके फेसबुक पर साइन अप करेगा तो उसे पुनर्जन्म कहा जाएगा। प्राणी इस चक्र से छुटकारा पाने के लिए धर्म की शरण में जाएगा तो धर्म उसे बताएगा कि ‘ये सब सोशल साइट्स मिथ्या हैं, इनसे मोह न रखो। इनमें तुम्हारा समय और जीवन नष्ट हो जाएगा। हमारी एप्प डाउनलोड करो। वहां अनेक यूजर्स हैं जो इन सब चक्करों से मुक्त हो अपने नेटपैक को धर्म पर व्यय कर रहे हैं। जल्दी साइन अप करो प्राणी। तुम्हारा कल्याण होगा।’

✍️ चिराग़ जैन

बजट का मौसम

बजट का मौसम आ गया है। बजट एक वार्षिक कार्यक्रम है, वार्षिक इसलिये कि यह हर वर्ष बनाया जाता है। और कार्यक्रम इसलिये कि इसके सभी कार्य एक क्रम में होते हैं। देश में एक रेलमंत्री होता है, जो मंत्री बनने के बाद रेल से यात्रा करना अमूमन छोड़ देता है, इसलिये जब कभी वह रेल से सफ़र करता है तो उसकी तस्वीर अख़बार में प्रकाशित की जाती है। अक्सर यह तस्वीर रेल से उतरते हुए खींची जाती है। इस तस्वीर को देखकर देश समझ लेता है कि जब वे रेल से उतर रहे हैं तो रेल में चढ़े भी ज़रूर होंगे। हालाँकि चढ़ने के लिये उतरना और उतरने के लिये चढ़ना कतई ज़रूरी नहीं है। जैसे रेल के किराये। इनका उतरते हुए चित्र कभी नहीं खींचा गया।
ख़ैर, हम बजट के कार्य के क्रम की बात के सफ़र पर थे, लेकिन बीच में जं़ंजीर खींच कर फालतू जंक्शन पर टहलने लग गए थे। आइये वापस ट्रेन में सवार होते हैं। तो जी एक रेलमंत्री नाम का आदमी देश में होता है, वो आम बजट से पहले रेल का ख़ास बजट लेकर संसद नामक स्थान पर जाता है। यह ठीक ऐसा होता है जैसे मिनिस्टर की मर्सिडीज़ के आगे बुलैरो में सिक्योरिटी वाले चलते हैं, मरेंगे तो वो मरेंगे और वित्तमंत्री नामक मर्सिडीज़ बच जाएगी।
जब ये रेलमंत्री नाम का व्यक्ति रेल बजट नाम का एक दस्तावेज़ लेकर संसद नामक स्थान पर जैसे ही पहुँचता है तो संसद में कार्रवाई नामक कोई चीज़ शुरू हो जाती है। इस कार्रवाई नामक चीज़ को सुचारु रूप से चलाने के लिये ज़रूरी होता है कि रेलमंत्री धीमे स्वर में बजट बोलना शुरू करते रहें, पक्ष वाले लोग मुस्कुराते हुए बैठे रहें, विपक्ष वाले विरोध करते रहें और लगे हाथ संसद के फ़र्नीचर की गुणवत्ता भी ठोक-बजा कर परखते रहें। अध्यक्ष शोर मचाने वालों को मुस्कुराते हुए डाँटते रहें और विपक्ष वाले मुस्कुराते हुए डँटते रहें।
दिन भर में कई बार इस क्रिया को दोहराने के बाद जब विपक्ष इस बात से आश्वस्त हो जाता है कि अंग्रेजों के ज़माने में भी फ़र्नीचर की क्वालिटी को लेकर कोई समझौता नहीं किया जाता था, और अध्यक्ष इस बात से आश्वस्त हो जाते हैं कि उनके जुमलों का समुचित रियाज़ द्रुतविलंबित से तीव्र तक हर प्रकार से हो चुका है तब सब मुस्कुराते हुए सदन से बाहर आ जाते हैं और बजट नामक मसौदा पास हो चुका होता है।
इसके बाद विपक्ष क्रम से इसको जन-विरोधी बजट बताते हुए सरकार को धिक्कारता है, सरकार विपक्ष की हरक़त को नासमझी बताते हुए विपक्ष को फटकारती है। मीडिया रात के प्राइम टाइम में वेल्ले लोगों के साथ बैठ कर बजट पर चर्चा करता है, जिसका अमूमन यही परिणाम निकलता है कि कोई परिणाम नहीं निकलता।
इस बार रेलमंत्री ने किराए नहीं बढ़ाए, क्योंकि किराए तो बजट से पहले ही बढ़ा दिए थे, लेकिन सरचार्ज बढ़ा दिए, क्योंकि सरचार्ज बजट से पहले नहीं बढ़ाए गए थे। रेलमंत्री ने फ़्यूल चार्ज बढ़ा दिया है क्योंकि डीजल महंगा हो रहा है। अब वित्तमंत्री डीजल के रेट बढ़ा देंगे क्योंकि रेल का किराया महंगा हो रहा है। जनता एक बार वित्तमंत्री की ओर देखती है, फिर रेलमंत्री की ओर। बार बार ऐसा करने के कारण जनता की गर्दन दर्द करने लगती है और उसमें झटका आ जाता है। जनता बजट का पंगा छोड़ कर बाम ढूंढने चली जाती है। बाम वाला बताता है कि वित्तमंत्री ने बजट में जिन चीज़ों के दाम बढ़ाए हैं, उनमें बाम भी शामिल है। सुनकर जनता बिना बाम लगाए योगा करने लगती है। योगा करते देख उसको बाबा रामदेव पकड़ लेते हैं। वहाँ से भागती जनता छुपती फिरती है, क्योंकि इस देश की जनता को बोलना तो सिखाया जाता है, लेकिन ये नहीं बताया जाता कि कब बोलना है। हम प्रतीक्षारत हैं कि कभी तो कोई बताएगा कि अब बोलो। इसी प्रतीक्षा में इसी प्रकार बजट बनते रहेंगे और हम बिना बाम लगाए चोरी-चोरी चुपके-चुपके योगा करके ख़ुश होते रहेंगे कि हमने बाबा रामदेव को बेवकूफ़ बना दिया।

✍️ चिराग़ जैन

टैगपीड़ित की गुहार

प्रिय टैगियो!
गणतंत्र दिवस की असीम शुभकामनाओं के साथ आपके साथ एक बात सांझी करना चाहता हूँ। मैं जब अपना फ़ेसबुक लॉगिन करता हूँ तो उसमें हर बार 100-150 नोटिफ़िकेशन्स होते हैं। उनमें से अधिकतर उन पोस्ट्स के होते हैं जिनमें मुझे ज़बर्दस्ती टैग किया गया है। अक्सर उन फोटोग्राफ्स या पोस्ट्स से मेरा कोई लेना-देना नहीं होता। लेकिन लोग निरंतर कहने के बावजूद मुझे टैग करते रहते हैं। इन अनर्गल नोटिफ़िकेशन्स की सूची में कई महत्वपूर्ण नोटिफ़िकेशन्स भी होते हैं जो नज़र से छूट जाते हैं।
दुर्भाग्य की बात ये है कि इन टैगबुकियों में से कुछ ऐसे भी परिचित होते हैं जो अनफ्रैंड नहीं किये जा सकते। फेसबुक जैसे सोशल माध्यमों पर इस प्रकार किसी की स्वतंत्रता में दखलंदाज़ी क्या अच्छी बात है!
कोई हरिद्वार होकर आया, वहाँ फोटो खिंचाई और उसमें मुझे टैग कर दिया; जबकि उसके हरिद्वार जाने में मेरी कोई ग़लती या योगदान नहीं है। किसी ने गली के नुक्कड़ पर पप्पू स्टूडियो में काला चश्मा पहन कर फोटो खिंचाई और बत्तीसी दिखाते हुए मुझे टैग कर दिया, इसमें मेरी क्या ग़लती है भाई! किसी ने चंकी पांडे के साथ फोटो खिंचाई, बहुत अच्छी बात है। उसको फ़ेसबुक पर अपलोड किया, और भी अच्छी बात है, लेकिन उसमें मुझे क्यों टैग किया; ये मुझे समझ नहीं आता। अरे भाई, आप मेरी फ्रैंड लिस्ट में हो ही, आपका स्टेटस अपडेट मेरे नोटिफ़िकेशन्स में दिख ही जायेगा, मुझे ज़रूरी लगेगा तो मैं उसको लाइक भी करूंगा और उस पर टिप्पणी भी करूंगा, लेकिन टैग कर के मेरा बलात्कार क्यों किया जाता है।
हो सकता है कि मैं इस विषय को अधिक खींच रहा होऊं, लेकिन इस खीझ के पीछे मैंने कितनी झल्लाहट झेली है, इसका अनुमान यही है कि इस पोस्ट में प्रदर्शित क्रोध मेरी पीड़ा का सात-आठ प्रतिशत ही है।
स्थिति यहाँ तक भयावह हो गई है कि मैं रात को सपने में भी ‘रिमूव टैग’ का ऑप्शन ढूंढता रहता हूँ। टैग शब्द से मुझे इतनी नफ़रत हो गई है कि मैंने पंप शूज़ पहनने शुरू कर दिये हैं। टैगियों ने मुझे इतना सताया है कि मैंने ‘टैगोर’ साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है।
बंधु! कृपया मुझे इस समस्या का कोई उचित समाधान बताने का कष्ट करें। आपकी अति कृपा होगी। मैं चाहता तो ये पोस्ट अपनी टाइमलाइन पर लिखकर आपको उसमें आपको टैग कर सकता था, लेकिन मैं टैग की पीड़ा को समझता हूँ, इसलिये जनहित में ऐसा नहीं किया।

आपका (अभी तक) अपना
टैग पीड़ित
✍️ चिराग़ जैन

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