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फेसबुक के प्रयोक्ताओं को रोज़ कुछ अच्छा स्टेटस डालने का शौक तो चर्रा गया है, लेकिन इसके साथ अपनी सृजनात्मक क्षमता बढ़ाने की ललक नहीं जगी। ऐसे में दूसरों की प्रोफाइल से स्टेटस या स्टेटसांश कॉपी करके अपनी timeline पर पेस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इसमें कोई बुराई तो नहीं है, लेकिन कष्ट तब होता है जब उसके नीचे से मूल लेखक का नाम गायब कर दिया जाता है।
जिनके अपने बच्चे नहीं होते वो दूसरों के चुरा लें क्या। ज़्यादा शौक़ है तो बच्चा गोद ले लो। गोद लेने वाली स्त्री को चरित्रहीन तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बच्चा चुरा लेने वाली स्त्री अपराधिन अवश्य कहलाती है।
किसी की बात पसंद आये तो उसको कॉपी-पेस्ट करने की बजाय शेयर करने में क्या दिक्कत है भाई। कॉपी-पेस्ट करने में लेखक का नाम न लिखो तो “अज्ञात” या “फ़ॉर्वर्डेड” ही लिख दो।
विचार या रचनाएँ चुरानेवाले लोग कभी दो कौड़ी के दो शब्द भी ख़ुद लिख कर देखें। उसके बाद शब्दकोष में भी उन शब्दों को उसी क्रम में देख कर दुःख न हो तो कहना। किसी की रचना चुराने वाले बुरे लोग हैं। ऐसे लोगों का बहिष्कार करें और इसको स्वच्छ भारत अभियान का ही एक हिस्सा समझें।
-चौरकर्म पीड़ित
✍️ चिराग़ जैन
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भारत रत्न का सवाल है साहब। विवाद लाज़मी है। इतिहास साक्षी है हमने आज तक आसानी से किसी को महान नहीं माना। आसान और महान का कोई तारतम्य नहीं है ना। रामको जंगल भेजा, पत्नी से वियोग कराया, उनका घर उजाड़ दिया तब पता चला कि वो महान हैं। नानक, कबीर, महावीर, गांधी सबके साथ यही किया हमने। रूल इज़ रूल। फिर चाहे वो कोई भी हो।
हाँ, अगर कोई विदेशी रिकमेन्डेशन जुगाड़ ले, फिर उसकी महानता पर हमें कोई संदेह नहीं रहता। जैसे टैगोर; जिसको अंग्रेजों ने महान मान लिया उसकी महानता सर्टिफाइड हो गयी।
बीच में कई सालों तक हमने कई सालों को भारत रत्न नहीं दिया। कोई महान था ही नहीं। फिर सिलसिला शुरू हुआ तो मरे हुए भी लाइन में लग गए।
सचिन तेंदुलकर का क़द ऊंचा था; तो ये विवाद किया कि खेल को भारत रत्न क्यों? इस विवाद की आवाज़ इत्ती ज्यादा थी कि किसी और महापुरुष के दावे की रिरियाहट सुनाई ही नहीं दी।
अब मामला अटल जी के नाम का है। तो नेताजी को ताव आ गया। उधर सपाइयों ने लोहिया की चारपाई मैदान में पटक कर ताल ठोक दी। मायावती इसलिए चुप हैं कि उनके अम्बेडकर आलरेडी एक अदद भारत रत्न कब्ज़ाए बैठे हैं। लालूजी दाल-रोटी के सवाल में उलझे हैं वर्ना राबड़ी जी का नाम प्रपोज़ किया जा सकता था।
कई बार लगता है कि हमारे वोटर आईडी कार्डपर एक-एक भारत रत्न छापने का आदेश ज़ारी किया जाना चाहिए। और जिसके कार्ड पर भारत रत्न खुद छपने से इनकार कर दे, उसे सम्मानित मान लिया जाना चाहिए।
गांधी, सुभाष, गौतम, महावीर, भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे लोग सम्मान के इस खेल से बहुत ऊपर हैं साहब। किसी तमगे का लालच दिखा कर इनको छेछालेदार के इस भौंडे दंगल में घसीटना भारत का भी अपमान है और इन रत्नों का भी।
✍️ चिराग़ जैन
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कोसी का बढ़ता पानी तीन दिन मीडिया में बहता रहा। कोसी भी उचक-उचक कर देखती रही कि ख़बर में क्या चल रहा है। एक ही ख़बर को बार-बार देख बेचारी बोर हो गयी। बिहार देखता रह गया और कोसी उतार पे आ गयी।
किसी ने पूछा कि इतना सारा पानी (जो पूरे बिहार पर आफ़त बनकर टूटने वाला था) आख़िर अचानक कहाँ हवा हो गया। मैंने कहा- “पानी था ही नहीं, हवा ही थी। जो थोड़ा-बहुतेरा पानी आया था, सो मीडिया ने पी लिया।”
ठीक इसी तरह की आफ़त महीने भर पहले पॉवर प्लांट्स में कोयले की कमी को लेकर मची थी। पूरा देश अँधेरे में डूबने वाला था। खबर करंट की तरह दौड़ी। हा-हाकार मच गया। एनटीपीसी और अन्य पॉवर कम्पनियां अपना-अपना कोयला टटोलने लगीं। कोयला, जो पहले भी मीडिया का एक्सपीरियंस होल्डर रहा है, चुपचाप सारा तमाशा देखता रहा। दो दिन हल्ला मचा। ख़बर भी चलती रही और बिजली भी।
2012 में दुनिया ख़त्म होनी थी, नहीं हुई। मीडिया ने बचा लिया। फिर कानपुर में सोना निकलना था, नहीं निकला।शायद मीडिया से घबराकर किसी बिल में जा छुपा। साईं-शंकराचार्य विवाद पर हिन्दू-हिन्दू दंगे होने थे, नहीं हुए। ईश्वर ने स्वयं आकर मिडिया के पैर जो पकड़ लिए।
मैंने एक वरिष्ठ पत्रकार से पूछा- “उत्तरदायित्व का मतलब समझते हैं आप?”
वो बोले – “आधे घंटे बाद समझूंगा यार, अभी बुलेटिन जाना है।”
✍️ चिराग़ जैन
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अश्लीलता समाज के लिए हानिकारक है और समाज अश्लीलता के लिए। पार्क में पेड़ के पीछे बैठी लड़की तभी अश्लील कही जा सकती है जब वो मेंरे साथ न बैठी हो। यदि उसको मेरे साथ बैठने में ऐतराज़ न हो तो मुझे नाक-भौं चढाने वालों को अनपढ़ और मैनर्सलैस कहने में क्या एतराज़ हो सकता है।
पड़ोसी की बीवी को कपड़े सुखाते देखकर आहें भरनेवाले जब उसको दूधवाले से हंसकर बात करते देखकर बातें बनाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे योगाचार्य उबकाई को चिगलते हुए हाज़मा दुरुस्त करने की कसरत करा रहा हो। लेकिन योगाचार्य कसरत कराता है साहब। उबकाई आती रहती है। कसरत करने वाले हाथ हिलाते रहते हैं। कसरत करने वालियां सांस लेती रहती हैं। कसरत कराने वाला भी सांस लेता रहता है।
खैर छोड़िये हम अश्लीलता पर थे।
योगा में अश्लीलता कहाँ। अश्लीलता अंग्रेजी में अश्लीलता नहीं रहती। उन गलियारों में वो मॉडर्न होती है। अश्लील लोग लड़कियों को पीठ पीछे माल, बम, पटाखा, आइटम जैसे भद्दे शब्दों से बुलाते हैं लेकिन सभ्य लोग उनको मुँह पर बेहिचक हॉट और सैक्सी कहते हैं । वो एडवांस जो हैं।
अश्लीलता का दायरा लिंगभेद भी जानता है। फिल्म के पोस्टर पर सनी लियोने का भीगे कपडे से ढंका चित्र अश्लील है लेकिन पीके के पोस्टर पर आमिर खान का रेडियो की ओट में समाया बदन आर्टिस्टिक है। रेडियो और कपडे का क्या मुकाबला साहब। रेडियो आमिर खान को पसंद है। इसलिए वो ग्रेट है। सनी की चद्दर में कहाँ कुछ छिपता है यार। इसलिए विरोध हुआ। हमें अंडर एस्टीमेट कर डाला। हमने साड़ी वाली माधुरी को भी उसी सौन्दर्यपरक नज़र से देखा था, ये भीगी चद्दर वाली…..हुँह।
सड़क पर खड़ी लडकियों को जब कोई गुंडा छेड़ता है तो अक्षय कुमार उसकी धुलाई कर डालते हैं। क्योंकि वो हीरो हैं। फिर अक्षय कुमार खुद उनको छेड़ते हैं। लेकिन वो अश्लील थोड़े ही हैं, वो तो हीरो हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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न्यूज़ चैनल्स की रिपोर्ट्स देख कर लग रहा है कि मोदी जी ब्रिक्स राष्ट्रों से यही पूछने गए थे की दिल्ली में भाजपा की सरकार कैसे बनाई जाए!
✍️ चिराग़ जैन
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बुश बैरॉन का एक टीवी हमारे पास भी था। घर का सबसे स्पेशल कोना सुशोभित होता था उससे। क़माल ये था कि संज्ञा के तौर पर टीवी ने पूरा कमरा हड़प लिया था। टीवीवाला कमरा नाम था उस चुम्बकीय कक्ष का। कुछ अपरिहार्य कर्मों के इतर, लगभग सबके सभी नित्य-अनित्य कर्म उस कमरे में सम्पन्न होते थे।
एंटीने की तकनीकी कमज़ोरी ने हमें बरखा और तेज़ हवा से घृणा करना सिखा दिया था। किसी की पतंग जब एरियल के जंजाल में फँस जाती थी, तो ऐसा लगता था कि परमात्मा ने लोगों का सुख छीनने के उद्देश्य से इस पतंगासुर की रचना की होगी। जी करता था कि पतंग उड़ानेवालों को उन्हीं की सद्दी से फाँसी लगा दें।
‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ सुनने के आदी हो चुके लोग, इसे सुनने के लिये लड़ने लगे। बेशक़ उन्हें पंडित जी के रागों, बहुभाषीय कलाकृति और चेहरे में कोई रुचि नहीं थी, लेकिन तनुजा, अमिताभ बच्चन और रेखा जैसी सूरतों को बार-बार देखना किसी मंत्रजाप से कम न था। ब्योमकेश बख्शी, मशाल, हम लोग, बुनियाद, जुनून, इम्तिहान, कैप्टन व्योम, चन्द्रकांता और न जाने कितने स्पीड ब्रेकर उग आये थे मुहल्ले की चौपाली संस्कृति तक पहुँचाने वाली सड़क पर। फिर रामानंद सागर ने ऐसा ब्रह्मास्त्र फेंका कि बस मुहल्ला कल्चर पर परमाणु आ गिरा।
स्मिता पाटिल और सलमा सुल्तान के भावविहीन चेहरों से समाचार सुनना सबको भाने लगा। जब कभी एक गंजा-सा आदमी बुलेटिन पढ़ने आ जाता था, तो देखनेवालों के चेहरे पर ऐसे भाव होते थे, जैसे बढ़िया सलाद की आखि़री किश्त में कड़वा खीरा आ गया हो। कृषि दर्शन आये या फ़ीचर फ़िल्म, टेलिविज़न अपने समभाव से चालू रहता।
जो माँ पहले खेलने-कूदने पर धुन देती थी, अब न खेलने पर धुनने लगी। बच्चों का सारा दिन टीवी के आगे बैठे रहना उसे अखरता था। लेकिन टीवी बच्चों का हमजोली बन गया था। माँ चार गाली बच्चों को देती तो दो टीवी को भी पड़ती।
धीरे-धीरे टीवी ने हमें ग़ुलाम बना लिया। रंगोली की हेमामालिनी, सुरभि की रेणुका शहाणे, शक्तिमान के मुकेश खन्ना और फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन की तबस्सुम ने जबसे अपने आपको हमारा ‘दोस्त’ कहना शुरू किया, तब से हमने लंगोटिया यारों का रजिस्ट्रेशन करवाना बंद कर दिया।
तहक़ीक़ात की बीयर से शुरू हुआ शौक़ आज संबंधों की जासूसी के नशे तक पहुँच चुका है। मनोहर श्याम जोशी के ‘हम लोग’ आज परिवार के नाम पर घिनौने और भद्दे संबंधों का नंगा नाच देखकर ख़ुश हैं। स्टोन बॉय की सहृदयता का सिलसिला अब शिनचैन की ढिठाई तक आ पहुँचा है। सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ है। मुहल्लों को दूरदर्शन खा गया, और दूरदर्शन को केबल, केबल को भी इंटरनेट का ख़ौफ़ हो गया। शेर को सवाशेर मिलता ही है। पर एक बात साफ़ है कि ऑडियन्स कैप्चर की इस शतरंज में मोहरे हैं – ‘हम लोग’!
✍️ चिराग़ जैन